पुष्पांजलि // ‘बाल कवि बैरागी’ // डा. सूर्यकांत मिश्रा

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           (बाल कवि बैरागी)

० केरल से गरगिल घाटी तक ‘सारा देश हमारा’

बाल कवि बैरागी जैसा की उनके नाम से ही प्रतीत होता है कि वे बालपन से साहित्य से रग-रग से नाता रखते थे। श्री बैरागी जी साहित्य जगत के ऐसे नक्षत्र थे, जो साहित्यकारों ही नहीं बल्कि राजनीतिकारों के भी आदर्श थे। पूर्व राज्यसभा सांसद बैरागी जी ने अपने आदर्शों के साथ कभी समझौता नहीं किया। जहां उन्होंने अपनी कविताओं में राजनीति और सामाजिक समस्याओं से बखूबी पिरोया। वहीं ओज की कविताओं के माध्यम से स्कूली छात्रों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाना भी अपना परम कर्तव्य माना। अपने स्वाभिमान, अपने सम्मान को कभी किसी के सामने न झुकने देने वाले श्री बैरागी जी ने देश धर्म को सबसे ऊपर स्थान दिया। ओज और भरतीय संस्कृति को अपने साहित्यिक छंदों में पिरोकर समाज को दिशा देने वाले बाल कवि बैरागी ने इस दुनिया से बिदा लेने से पूर्व देश के प्रति अपनी जवाबदारियों को पूरा ही नहीं कर दिखाया, बल्कि भविष्य की पीडिय़ों के लिए अपने विचारों की पूरी श्रृंखला साहित्य के माध्यम से संजोकर देश के प्रति सजग और ईमानदार रहने की प्रेरणा भी दे गये है। उनके उच्च संस्कारों की प्रणीति थी, जो उन्होंने शब्दों में कुछ यूं बयां कर दिखाया-

चाहे सभी सुमन बिक जाये,

चाहे ये उपवन बिक जाये,

चाहे सौ फागुन बिक जाये,

पर मैं गंध नहीं बेचुंगा,

अपनी गंध नहीं बेचूंगा।।

बाल कवि बैरागी जी की वास्तविक नाम नंदराम दास बैरागी था। सवाल यह उठता है उनका यह वास्तविक नाम क्यों लोगों की जुंबा पर नहीं है, और वे बाल कवि बैरागी के नाम से कैसे पहचाने गये? श्री बैरागी जी के संबंध में जानकारी का खजाना खोलने पर पता चलता है कि उन्होंने अपने बालपन में उस समय शब्द रचना के माध्यम से कविता गढ़ी, जब बच्चे ठीक ढंग से दुनिया को समझ भी नहीं पाते। उन्होंने कक्षा चौथी का दरवाजा खटखटाया ही था कि विद्या की देवी सरस्वती ने उन्हें वह आशीर्वाद दिया, जिसके लिए तपस्वी वर्षों तप किया करते है। उनकी बालपन की उस कविता ने शिक्षकों पर अच्छा खास असर डाला और वे अपने शिक्षकों के चेहते बन गये। उन्होंने साहित्यिक रचनाओं तक ही खुद को सीमित न रखते हुए देश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। उन्होंने कभी भी राजनीतिक मंचों से कविता पाठ नहीं किया, और नहीं कविता के मंच से राजनीति की बात की। मुझे याद है, जब वे इस संस्कारधानी सर्वेश्वर स्कूल में एक कवि सम्मेलन में आये थे और लोगों ने उनसे इस प्रकार की फरमाईश की थी। तब उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे कविता के मंच से राजनीति की कोई बात नहीं करेंगे।

राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में उदीयमान शख्स से लेकर वृद्धावस्था तक अपना लोहा मनवाने वाले साहित्य के समर्पित पुजारी बाल कवि बैरागी ने खुद को फिल्मी दुनिया की तड़क भड़क में जाने से नहीं रोका। उन्होंने बड़े फिल्मकारों के अनुनय-विनय पर अपनी साहित्यिक सृजन को गीतों के माध्यम से दर्शकों के दिलों तक पहुंचाया। श्री बैरागी जी ने अपने आठ दशक के जीवन काल में दो दर्जन से अधिक फिल्मों में गीत रचना की, उनके फिल्मी दुनिया में दिये गये योगदान का अध्ययन करने पर पता चला है कि उनके द्वारा लिखित प्रसिद्ध गीत को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने गाते हुए गर्व महसूस किया। श्री बैरागी जी ने ‘रेशमा और शेरा’ फिल्म के लिए ‘ तूं चंदा मैं चांदनी, तू तरूवर शाख रे...’ को बड़े ही निराले अंदाज में लिखा और लता जी ने उसे उसी अंदाज में स्वर देकर अमर गीतों की सूची में शामिल करा दिया। बाल कवि बैरागी जी के राजनीति, साहित्य और रजत पट पर किये गये योगदान पर विचार करे तो मुझे कह कहने में संकोच नहीं की विद्या की देवी मां वीणापाणी ने देश की धरती पर ऐसा बिरला इंसान पाकर खुद भी गर्व महसूस किया होगा।

साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में बराबर दखल लगने वाले बाल कवि बैरागी जी ने अपने मानवीय कर्तव्यों को बखूबी निभाया। न केवल हिंदुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया के अनेक मुल्कों में श्री बैरागी जी के प्रशंसकों की भरमार रही है। इतनी बड़ी दुनिया में अपने प्रशंसकों से सीधे संपर्क रखने के लिए श्री बैरागी जी ने एक बड़ा संकल्प ले रखा था और वह था, अपने चाहने वालों के पत्रों का खुद की हस्तलिपि में स्नेह स्वीकार करते हुए उनसे पत्राचार बनाये रखना। उनके सामिप्य रहने वालों का कहना है कि वे पत्राचार करते समय ऐसे शब्दों और विचारों का इस्तेमाल किया करते थे कि हर किसी को ऐसा महसूस होता था, कि श्री बैरागी जी उनके परिवार से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए है। देश में ऐसे चंद लोग ही हुए है, जो अपने प्रशंसकों को इस तरह कर स्नेह देते है। साहित्यकारों के दुनिया में ऐसे चितेरे हरिवंशराय बच्चन का नाम भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है।

अपने बाल्यकाल से साहित्य से जुड़ाव रखने वाले बाल कवि बैरागी जी की अंतिम सांसें भी साहित्यिक योगदान से ओत-प्रोत रही। ऐसा भी कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों को भी साहित्य के मंच पर समर्पित कर दिया। जैसा की समाचार पत्रों और समाचार चैनलों पर बताया गया कि अंतिम सांस लेने से पहले वे रविवार 13 मई को नीमच के एक कार्यक्रम में शामिल होकर अपने निवास मनासा लौटे थे। मैं यही कह सकता हूं कि बचपन से मां सरस्वती की गोद में पले बड़े श्री बैरागी जी को मां सरस्वती ने अंतिम समय तक उसी सेवा में जुड़े रहने और साहित्य की पूजा करने शक्ति और सामर्थ्य प्रदान किया। अपने सरल हृदय और हंसमुख व्यवहार के चलते ही आम और खास लोगों ने उन्हें अपने हृदय में स्थान दिया। श्री बैरागी जी को उनके साहित्यिक समर्पण के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया। आज उनके न रहने पर उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति हमें दुखी कर सकती है, किंतु उनकी साहित्यिक रचनाएं हमें आजीवन प्रेरणा देती रहेगी।

मुझे याद है छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा कक्षा 12वीं की सामान्य हिंदी (अंग्रेजी माध्यम) में शामिल बैरागी जी की लिखित कविता ‘सारा देश हमारा’ को पढ़ाते हुए मेरे अंदर ओज के भाव जाग जाया करते थे। बाल कवि बैरागी जी ने नौजवानों का आह्वान करते हुए बड़े तेज शब्दों में मां भारती की वंदना की है-

केरल से करगिल घाटी तक,

गोहाटी से चौपाटी तक,

सारा देश हमारा...

जीना हो तो मरना सीखो,

गूंज उठे या नारा,

सारा देश हमारा...

हमारे देश के नौजवानों की भटकती राहों ने श्री बैरागी जी को अंदर तक परेशान कर दिया था। तब उन्होंने इसी ‘सारा देश हमारा’ में जवानों का जागरण करते हुए लिखा-

लगता है ताजे लोहों पर, जमी हुई है काई,

लगता है फिर भटक गयी है, भारत की तरूणायी,

काई चीरों ओ रणधीरों, ओ जननी के भाग्य लकीरों,

बलिदानों का पुण्य महुरत, आता नहीं दुबारा,

जीना हो तो मरना सीखो, गूंज उठे यह नारा,

सारा देश हमारा...

मैं देश के महान कवि, साहित्यकार, राजनीतिकार और फिल्मी दुनिया तक अपनी गूंज पहुंचाने वाले कुशल चितेरे को इन्हीं शब्दों के साथ आदरांजलि देते हुए गर्व का अनुभव कर रहा हूं। बैरागी जी ने अपनी इसी ‘सारा देश हमारा’ कविता में देश की नौजवान पीढ़ी को आगाह करते हुए यह संदेश भी दिया कि तुम्हें मजहब, भाषा, पानी, पर्वत आदि के नाम पर बांटने का प्रयास शुरू हो चुका है, किंतु तुम्हें इनसे बचकर रहना है। उन्होंने देश के जवानों को कर्मठ रहने की शिक्षा देते हुए कहा है कि-

संकट अपना बाल सखा है, इसको कंठ लगाओ,

क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे, मिलकर बोझ उठाओ,

भाग्य भरोसा कायरता है, कर्मठ देश कहां मरता है।।

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डा. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कालोनी

प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5

वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)

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