कुकविताएँ // अजित वडनेरकर

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तस्वीर

सबसे पहले
फ्रेम हुआ धराशायी
फिर कड़कड़ाकर टूटा काँच
गिरी फिर खनखनाकर
दीवार में अटकी कील

फिर गिरा कुछ चूना, गारा।
गिरे कुछ लेवड़े* पलस्तर के
लटक गए कुछ भीत पर ही धरा ताकते

चौखट के भीतर तसवीर थी सलामत
इस बार फ्रेम में मढ़ने का नहीं
दीवार में ही
जड़ने का मंसूबा था।

#कुकविता #थोकबस

*पलस्तर की पपड़ियाँ
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हम
जा डूबेंगे उसी ताल-कीच में
जहाँ से मृणाल तन्तु
नील गगन को उठते हैं
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काल वही
बचा रह जाएगा
जो पतझड़ में
हर स्खलन में
हर गलन में
लाल वही

#कुकविता #सतपुड़ा
फोटो- Abir Wadnerk
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तात
कहूँगा शीघ्र ऐसा कुछ
जो कह न पाए कभी
अरस्तू, फ़लातून, सुकरात

किसी साधु, मुनि, आचार्य, ब्रह्मर्षि,
वज्र, तीर्थंकर, सिद्ध, अर्हत, महर्षि,
धर्मकाय, मुकुन्द, राजर्षि,
धर्मकेतु, श्वेतकेतु, महासिद्धु
संन्यासी, धर्मात्मन, वाक्पति विशुद्धु
किसी मुख से
निकली न होगी ऐसी बात

करें कुछ धीर धारण तात
सुनें कल मन की बात

सर्वसर्वेश्वरसदासर्वोदयीसर्वात्मन
सर्वज्ञाता, सर्वत्राता, सर्वमोचक हैं अपन
सकलजग देख ढिंचक, है मगन
#एकअप्रैल2018 #कुकविता
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एक कलाकर्मी (चापलूस) की अभिलाषा

शॉल, श्रीफल, प्रशस्ति
अपरिमित भूसम्पदा मिले सस्ती
खुले गुरुकुल, कलाग्राम
गोत्र, गात्र, गोशाल, वैदिक छवि, भव्य
उल्लेख हो अगर, चन्दन, पंचगव्य

प्रशस्त हो उद्यानपाली
चांदनी, बरगद, करंजा
हरसिंगार, महुआ, आम
सुव्यवस्थित वृक्षावली

पटकथाओं में बटुक उल्लेख करें सानी, पानी
प्रातः प्रनामी

मन तृप्त हो
कब यह सब प्राप्त हो
रीतता जाता कलश है आयु का
स्वामी,
सत्ता का कुछ तो अंश दो इधर भी
तन बना
रोगी स्नायु का

जीवन यापन भत्ता दे दो
साल बचा है एक ही साधो
सुन लो ओ सट्टी के माधो
थोड़ी सी तो सत्ता दे दो
कैसा भी अलबत्ता दे दो
साल भर का भत्ता दे दो

#कुकविता
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हल्दी नहीं लगवाएगी लखमारानी

लोबिया बघारने के बाद लखमारानी ने
दाल के अदहन की तैयारी शुरू की
तीसरे चूल्हे पर आधी भरी देगची रखी पर ठिए का कोयला दरक गया।
आखिर रात का दिया काम आया। उल्टा किया। तब कही देग टिकाया। अब नहाने की बारी।

लखमारानी रोज यही करती। पहले सब्जी। फिर दाल। इसलिए कि उसे बार बार देखना नहीं पड़ता। इस बीच जाकर नहा लेती।

तुलसी, महादेव और पोपट को पानी। गणेश को तिलक और नीम की जड़ में लोटा खाली कर जब रसोई में लौटती, दाल में अदहन आ चुका होता। पानी का अंदाज़ ऐसा नीक कि एक बूंद हंडी से बाहर नहीं गिरता, बस खदकता रहता भीतर भीतर।

माँ ने सिखाया था बचपन में। उबाल से पहले हांडी में हल्दी छोड़ने से उफान कम आता है।

आठ विधवाओं की गृहस्थी का जिम्मा सम्भालती लखमा ने सोच रखा है, जि़ंदगी बिता देगी 'लसूड़िया बामन' के इसी विधवाधाम में।

सभी की कहानियाँ सुन चुकी है लखमा। रसोई का ही जिम्मा है उसका। सन्तोष से खिलाती है सभी दुखियारियों को। भात, सब्ज़ी, रोटी, बूरा, चूरमा। इतने में ही धाप लेती जीती-जागती शोकान्तिकाएँ। पहले माँ को, फिर इन मुरझाई स्त्रियों की पुराणपोथी बाँचते हुए क्रोध से भर जाती है रानी लखमा।

उसे खूब गुस्सा आता है। वह सबको खूब सुनाती है। किसी भी बात पर। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, स्त्रियों के दुख, पुरुषों की मूर्खता, उनका अहंकार, उनकी स्त्रैणता, उनकी कापुरुषता इन सब विषयों का जो भी अर्जित ज्ञान है, उस पर गर्व है लखमारानी को। वह सब पर चिल्लाती है, व्यंग्य बाण चलाती है। एक खदबदाती हाँडी है लखमारानी जो अक्सर उफान पर ही रहती है। उफनती चलती है।

माँ ने सिखाया था बचपन में। हाँड़ी में हल्दी छोड़ने से उफान कम आता है।

लखमारानी ने तय किया है वह अपनी काया पर हल्दी न लगने देगी।
वह अपना उफान कम न होने देगी।

#कुकविता
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▪️बुतपरस्त-बुतशिकन

जि़ंदा लोगों को दफ़ना दिया, टांग दिया सूली पर, पिला दिया ज़हर
विचार तब भी ज़िंदा है।

प्रतिमाओं का ढहाना असभ्यता है
पर इन्सानी फ़ितरत ही कही जाएगी।

बुद्ध ही बुत होकर प्रतिमाओं का पर्याय हो गए
बुतपरस्त भी बुतशिकन निकले तो अचरज कैसा!!
विचारधारा
जब हो सियासी क़िलों का ग़ारा
तब दुर्ग बचाना अहम बात है।

क़िलों के ढहने पर बुतों के धराशायी होने का सोग कैसा !!
बन जाएँगे बुत
बहुत

पहले खुद सम्भल जाएं, जिन्हें बनना था सहारा
ग़फ़लत में खुद हो गए पाषाण
जिसमें अब नहीं तराशी जाती छवियाँ

उम्मीदें इन्सान से होती हैं
प्रतिमाओं से भी रहती
उन शिलाओं का क्या
जिनमें कोई आकृति नहीं उभरती

#कुकविता #थोड़ा_कहा_बहुत_समझना
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सूरज ▪पत्नी▪ प्याज ▪वाशिंग मशीन

शाम तक था सूरज गगन में
चला गया टहलने
शाम तक थी पत्नी साथ
लौट गई
नौकरी करने
शाम तक था टोकरी में प्याज
खप गया पोहे में

अभी जाऊँगा बाजार, ले आऊँगा
मीडियम साइज़
किलोभर
सूरज भी सुबह लौट आएगा ओट से
पत्नी भी आ ही जाती शनिवार को
धुले कपड़े लेकर
पर शुक्र को मुझे दिल्ली जाना है
दो दिन तो लग ही जाएँगे
जानती है, सो न आएगी। स्थगित रहा मिलना।

कह गई है, अगली बार जरूर लेनी है वाशिंग मशीन
8500 वाली
अकेले की गिरस्ती में ज़रूरी है
भरोसा है 500 तो कम करवा ही लेगी।
बस, मैं खिसक लूंगा काउंटर से

ये तय है, धोएगी वही गात्र मेरे।
देखेगी, मुग्ध होकर। अपनी गृहस्थी की
पांचवी या शायद छठी वाशिंग मशीन।

#कुकविता #एक_अरमानी_गद्यांश_जो_इस_रूप_में_याद_आया
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Post-mortem ब्यौहार

जीते जी और मरणोपरांत
सब पूरे हों अनुष्ठान
साहित्य जगत
की
लगत भगत
नई नहीं
नामवर भी कई नहीं।

दर्ज हर बात इतिहास में होगी
धड़कन बंद होते ही
शुरू हो जाती है
इतिहास की घड़ी
सब भाग के लेखे
काल के लेखे
देखेगी दुनिया तब
सचमुच ईमान से देखे

#कुकविता
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छद्म युद्धाभ्यास !!

इस देश की बौद्धिक ताक़तें एक समय कुंद हो गईं, जब उन्होंने पाया कि उनकी मनचीती पार्टी और मनचीते व्यक्ति के हाथ तक नहीं पहुँची सर्वोच्च सत्ता की रास।
पंचवर्षीय कार्यकाल के चार बरस बीत चुके थे
पाँचवाँ चल रहा था।

कवियों, लेखकों, विद्वानों ने कुछ नया नहीं रचा।
पर वे सक्रिय दिखे कुछ यूँ मानों क्रान्ति हो रही हो। अलबत्ता अपनी दीवार पर गोबर से तत्कालीन सत्ता और उसके प्रमुख पर चुटकुले गढ़ने में उन्होंने लगा दी सारी ताक़त
[फिर याद करें, इस भ्रम में मानों आपात्काल लगा हो और वे क्रान्ति रच रहे हैं]

बौद्धिक प्रतिष्ठानों की सत्ता चुनौती पर थी। सत्ता जिनकी भी थी, जैसी भी थी, उससे पहले भी
उन्होंने सम्भाली थी, जैसी भी सम्भाली थी। मुद्दा एक व्यक्ति विशेष के प्रति, कुछ व्यक्तियों-विचारधाराओं से जुड़े गतिहीन विचारकों की ठहरे पानी जैसी सोच का था। उनके लिए आम जनता, आम चुनाव, लोकतन्त्र जैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं था। उनकी प्रिय चुनी हुई सरकार के दशकों के शासनोपरान्त
जनता के परिवर्तन-समर्थक निर्णय को भी वे चार साल तक नकारते रहे।

कोई आपात्काल नहीं लगा, कोई क्रान्ति नहीं हुई, जिसने अच्छे भले लेखकों, कवियों, आलोचकों, अध्यापकों, को चुटकुलेबाजों से होड़ करते देखा। अनेक लोगों नें हर वर्ग में बेहतरीन लतीफ़े भी गढ़े नतीजे में जनता के दिल से उतर गए।

ऐसी अनहोनी, जो हुई नहीं, उसके विरोध में पूरे पाँच साल चलती रही कुतर्क क्रान्ति। बौद्धिकों ने यूँ गँवाए पूरे पाँच साल। कुछ इस तरह कि जो भी हो, सब मूर्ख मतदाताओं का फ़ैसला होगा, जिसे पिछली बार की तरह वे नकार देंगे। अनुकूल हुआ तो 'जनता-जनार्दन' कहेंगे।

अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इस पद्धति से किया छद्म युद्धाभ्यास

#थोड़ा_कहा_बहुत_समझना #कुकविता
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परजीवी

वे मार चुके है। हर उस शै को जिस पर पले।
अब मरते हुए डर रहे हैं।
वे फिर जन्मेंगे। किसी और नाम से। इस आसन्न सन्त्रास के साथ कि नहीं
डरता कोई उनसे। विदूषक से
ज़्यादा भाव पर, तौला नहीं किसी ने
दरअसल वे ऊसर खेत के
बिजुके हैं। जहाँ न कुछ उगेगा, न पनपेगा
उगा भी तो कौन चुगेगा !!
अस्तित्व संकट से जूझते वे अतीत से
परजीवी हैं
हर काल में होते हैं

#कुकविता
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इज्जतदारी

कुछ टीवी पर बिक गए, कुछ रेलवे के
ठेके पर। कुछ सस्ते प्लाट पर
और कुछ बेनामी सौदों पर।
सबसे आसान बिकना
सरकारी मकान पर
होता है
इनमें विराजते टाइपराइटरों के
होते हैं दो मुँह, चार कान
कई मकान
कॉर्नर पे दुकान
तब भी छूटता नहीं सरकारी
मकान, जिसका गैरेज
काम वाली का आशियाना है, बेगार के बदले।
भाई साहब तब भी रहते तनाव में
स्साला, जितनी मिलनी चाहिए
मिलती नही इज्जत इन सब के बदले

#थोड़ा_कहा_बहुत_समझना #कुकविता
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सब ईश्वर तुम्हारी महिमा

तुम तक पहुंचना
संघर्ष बना,
जो कि होना नहीं था,
हुआ
अनुष्ठानों की वजह से,
जिन्हें रचा पुरोहितों ने, तुमने नहीं।

और जब तुम मिले,
बड़ी सहजता से
यूँ कि किसी अनीश्वरवादी ने ही
मेरे घर का पता
दिया हो तुम्हें
या खुद ही घर तक छोड़ गया हो।
और लौट गया हो बाहर ही से
कुछ इस तरह कि
अजित भाई से कल मिल लेंगे
आज उन्हें प्रभु से मिल लेने दें जी भर।
बड़े परेशान रहे बीते दिनों।

तो ऐसे मित्र भी सदा से प्रभु तुम्हारी ही कृपा से रहे हैं।
ऐसे अवसरों पर,
मैं कभी मार्क्सवाद को बीच में नहीं लाता
और वाम जैसे अधोराजनीतिक पद को भी वर्जित समझें।

#कुकविता
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(अजित वडनेरकर के फ़ेसबुक वाल [ https://www.facebook.com/ajit.wadnerkar ]से संकलित व साभार पुनर्प्रकाशित)

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1 टिप्पणी "कुकविताएँ // अजित वडनेरकर"

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