लघुकथा // कशमकश // संजय दुबे

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रात काफी हो चुकी थी। शायद दो बज चुके थे। आसमान में चांद अपनी गति से चल रहा था। चांदनी रात होने से घर की छत पर दूर-दूर तक सब कुछ रोशन था। यूं तो जाड़े में कोहरे की वजह से अंधेरा कुछ ज्यादा ही लगता है, फिर भी मन की बेचैनी बहुत कुछ साफ-साफ दिखा देती है।

दरअसल कल की बात अभी तक दिल में चुभ रही है। आखिर वह ऐसी बात क्यों बोला, जिससे हमें तकलीफ हुई। ना सिर्फ तकलीफ बल्कि टीस भी है। दर्द  किसी ने भी दिया हो, कैसा भी हो, पता नहीं क्यों चुभता जरूर है। वैसे जाड़े की इस चांदनी रात में जो सबसे ज्यादा चुभ रहा है, वह है प्रकाश, रोशनी। काश आज अंधेरा होता तो हम अपने मन की बात चांद से कह पाते!

चांद खुद तो अकेला है, लेकिन रोशनी उसके साथ है। रोशनी और चांद का संबंध कुछ वैसा ही है, जैसा मेरा और मुझे दर्द देने वाले का है। वह नहीं मिलता तो दर्द होता है, और मिलता है तो हमारा अकेलापन छीन लेता है। मन कितना अबोध है, पर उम्र अबोध वाली नहीं रह गई है। मन बेचैन होता है तो मुसीबत होती है और बेचैन नहीं होता है तो अपनापन नहीं दिखता। भावों, जज्बातों में शराफत दिखती है और शराफतदार लोग अमूमन जज्बाती नहीं होते हैं।

दुनिया अजीब कसमसाहट में जी रही है। जीऊं तो आफत न जीऊं तो भी आफत। वैसे शायद जिंदगी इसी को कहते हैं। सच कहूं तो जिन्हें अपनी जिंदगी का अहसास नहीं है, वे कैसे जानेंगे कि मरने के बाद क्या होता है।  

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