व्यंग्य // पेट्रोल की आकाश छूती कीमतें : होली की बोम पंचमी तक // ओम वर्मा

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अपनी बाइक धकाता हुआ वह मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचा और फिर मूरत के ठीक सामने उसे टिकाकर प्रभु से मुखातिब होते हुए बोला-

“आज खुश तो बहुत होगे तुम! देखो जो आज तक तुम्हारे मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा, जिसने आज तक तुम्हारे आगे सर नहीं झुकाया, जिसने आज तक तुम्हारे आगे हाथ नहीं जोड़े, वो आज तुम्हारे सामने हाथ फैलाए खड़ा है! बहोत खुश होगे तुम कि आज मैं हार गया हूँ! लेकिन जानते हो कि जिस वक़्त मैं यहाँ खड़ा हूँ, उस वक़्त मेरी वह बाइक जिसके टायरों से शहर के सारे पेट्रोल पंपों के मीटरों के सामने की ज़मीनों में गड्ढे या निशान बन गए, वो बाइक जिस पर सवारियों का बोझ बढ़ा तो उसका एवरेज बढ़ा, वो बाइक जो ज़िंदगी भर चलती रही और घर वालों को तुम्हारे दर्शन करवाती रही, वो बाइक आज पेट्रोल पंप की सरहद से यहाँ तक घसीटता हुआ लाया हूँ। और ये तुम्हारी हार है। क्या कसूर है उसका? कौनसा पाप, कौनसा जुर्म किया है उसने? क्या उसका जुर्म यह है कि वह मेरी बाइक है? क्या उसका जुर्म यह है कि उसने मेरे बीवी-बच्चों को ढोया? क्या उसका जुर्म यह है कि मैंने उसे बैंक से लोन लेकर खरीदा? ये किस जुर्म की सजा दी जा रही है उसे?

हम कार वाले से बिना कार वाले हो गए, लड़कियों के चक्कर काटने की मेरी उम्र बिना बाइक के निकल गई, मैंने कभी तुमसे कुछ नहीं माँगा। लेकिन आज, आज माँगता हूँ। मेरे गुनाहों की सजा मेरी बाइक को मत दो! मैं अपने आप को तुम्हारे हवाले कर रहा हूँ, जो चाहे कर लो, लेकिन बाइक में मुझे पेट्रोल भरवाने की शक्ति दे दो!”

“दुखी क्यों होता है वत्स”, तभी जैसे आकाशवाणी हुई, “अपनी ख़यालों की दुनिया से बाहर आ और देख। पेट्रोल पंपों पर आज चौरासी रु. के भाव में भी वही भीड़ है जो पचास रु. के समय थी। बल्कि ज्यों ज्यों पेट्रोल की कीमतें बढ़ती गईं वाहनों की कीमतें और सड़कों पर उनकी संख्या बढ़ती गई। और तू पेट्रोल की कीमत बढ़ने का रोना रो रहा है!”

ओह! जैसे वह स्वप्न से जागा। यह उसका स्वप्नभंग था। ऐसे स्वप्नभंगों को कुछ बाल की खाल निकालने वाले मोहभंग बताते आए हैं । हालाँकि मोहभंग की बात तो कुछ लोग आज़ादी के बाद से ही करते आए हैं। बहरहाल, वह तुरंत तैयार होकर बाइक उठाकर पेट्रोल पंप की ओर भागा। लाइन में लगकर उसने आज भी हमेशा की तरह सौ रु. का पेट्रोल भरवाया और कुछ देर बाहर खड़े होकर छुप छुप के नज़ारा करने लगा। उसने देखा कि पेट्रोल भरवाकर निकल रहे हर शख्स के चेहरे पर वही भाव थे जो तीन सौ रु. का पिज्जा ऑर्डर करने वाले के चेहरे पर होते हैं। वह गहन चिंतन में डूब गया। उसे लगा कि विरोध के मुद्दे और उसके तरीके भी अब ऐसे हो गए हैं कि विरोध शब्द अपना अर्थ ही खोने लगा है। पेट्रोल मूल्यवृद्धि के विरोध में कभी नेता प्रतिपक्ष ने बैलगाड़ी से संसद तक पहुँचकर सरकार को हिलाकर रख दिया था। मगर आज विरोध करना हो तो वाहन रैली निकाली जाती है। टेलीफ़ोन बार बार बंद रहने पर ‘टेलीफ़ोन की शवयात्रा निकाली गई’ जैसे समाचार तो खूब सुने थे मगर पेट्रोल महँगा होने पर ‘वाहनों की शवयात्रा निकाली गई’ टाइप कोई समाचार उसने कभी नहीं सुना। आवश्यकताएँ सीमित रखने का सिद्धांत अब बीते युग की बात हो गई है, अब तो उन्हें कैसे बढ़ाया जाए, हर पल इस पर काम चलता है।

जैसे होली की बोम पंचमी तक ही मारी जाती है, वैसे ही इन दिनों पेट्रोल की ‘आकाश छूती’ कीमत का हल्ला भी पाताल के गर्त में दफ्न हो जाता है। टीवी-स्क्रीन को तोड़कर बाहर निकल आने को आतुर सारे पेनलिस्ट भी सेटटॉप बॉक्स में जाकर दुबक जाते हैं।

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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // पेट्रोल की आकाश छूती कीमतें : होली की बोम पंचमी तक // ओम वर्मा"

  1. बहुत सटीक कटाक्ष।दुनिया उसी गति से चल रही है।समस्याओं का ढ़िढ़ोरा पीटा जा रहा है और इन समस्याओं के नाम पर जिन्हें रेवड़ियाँ खाना थी,खा चुके और आने वाले दिनों में हो सकता है दूसरे आकर यही काम करें और ....

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