स्व. शिशुपाल सिंह यादव 'मुकुंद' की कविताएँ

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स्व श्री शिशुपाल सिंह यादव 'मुकुंद' का जन्म दुर्ग छतीसगढ़ ,में 18  अप्रेल 1898 में तथा अवसान अक्टूबर 1976 को हुआ | वे शिक्षक थे |उनकी लिखी कुछ रचना प्राप्त हो सकी है, जिसे सहेजने का काम आरंभ किया है |वे अपने समय के ओज कवि थे |  उनके नाम के साथ  गूगल सर्च में यह पाया कि सन 1933,22 November ,  को दुर्ग आगमन पर उनके सम्मान में दो कवियों ने काव्य-पाठ किया था, एक थे स्व. श्री उदय राम उदय, दूसरेस्व. श्री शिशुपाल सिंह यादव 'मुकुंद' | - सुशील यादव


दुश्मन दावादार है

१.
तानाशाही शासन जन का ,पा सकता क्या प्यार है
कभी छिपाए छिप ना सकता ,बोझिल पापाचार है
पाकिस्तान हिन्द से लड़कर ,आज हुआ नापाक है
सिंह साथ लड़ना गीदड़ का . सचमुच बेकार है
२.
निराधार है यवन सैन्य अब , रहा न कुछ भी सार है
न तो बुद्धि है और न बल है , खाता रह-रह मार है
लानत मिया अय्यूब शान पर , चोरी वह करवाता है
चोरो की नजरों में दिखता , हरदम कारागार है
३.
सान दिया है खुद भारत ने , तलवारों पर धार है
मस्ती मिटी पाक की अब तो,सभी तरह बेजार है
हैरत में है ब्रिटिश- अमरीका, लख भारत बेजोड़ है
बच्चा- बच्चा भारत मां का, सच्चा पहरेदार है  ४,
४.
कहाँ शत्रु की वः हस्ती है . उसकी कहाँ बाहर है
कहाँ हजार बरस लड़ने की ,भुट्टो की ललकार है
पाकिस्तान लिए कर झोली ,दर-दर मारा फिरता है
त्राहिमाम अब त्राहिमाम अब ,इसकी यही पुकार है
५,
लुटा चुका अय्यूब खान निज . खुशियों का त्यौहार है
गुमसुम सुस्त कराची एकदम ,ठप्प सभी कारोबार है
चीन बेशर्म के झांसे में . पाक हुआ वीरान है
वतन -परस्ती यवन भूलते , वे तो  सब गद्दार है

स्व. शिशुपाल सिंह यादव 'मुकुंद'


      

       रण-भेरी ....


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काश्मीर घाटी में हलचल . झेलम में तूफान उठा |
गगन भेद बंगाल देश में , प्रलेनकाएई तूफान उठा ||
यवन- उपद्रव घोर भयावह , सीमा पर उनकी फेरी |
बुला रहा समरांगण युवको ,बाजी देश में रणभेरी ||
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चंचल लहार उठी सागर में , धरती डगमग डोल उठी |
सन पैसठ शहीद की आत्मा ,कानो में  यह बोल उठी ||
कर में निज बन्दूक सम्हालो , करो नहीं क्षण -भर देरी |
बुला रहा समरांगण युवको ,बाजी देश में रणभेरी ||
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बाँध-बांध हथियार विहंसते , गाते गीत किसान चले |
मातृभूमि की रक्षा खातिर , हिन्दू और पठान चले ||
पाक -चीन -अमरीका से ही , आई विपदा बहुतेरी |
बुला रहा समरांगण युवको ,बाजी देश में रणभेरी ||
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गुरूद्वारे की कसम उठाकर , कर ले सिख्ख कृपाण  चले |
जाट ,गोरखे, गूजर- छत्रिय,  साज-साज धनु बाण चले ||
अरि के शीश कटे रण भीतर , लगे हजारों की ढेरी ||
बुला रहा समरांगण युवको ,बाजी देश में रणभेरी ||
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भुट्टो तथा याहया के सर ,भारी गाज गिराना है |
बने अखण्ड हिन्द यह फिर से , पाकिस्तान मिटाना है ||
शेख मुजीब छुड़ा लो तरुणों ,दुनिया रीझ बने चेरी |
बुला रहा समरांगण युवको ,बाजी देश में रणभेरी ||

स्व. शिशुपाल सिंह यादव 'मुकुंद'

           दुनिया बे-ईमान की ....

सिसक झोपडी चुप सोती है
मानवता कराहती रोती है
सेठो की है  महल अटारी
चले सड़क पर मोटर गाडी
कीमत नहीं अन्नदाता उस -निस्पृह दीन- किसान की
सम्हल -सम्हल कर पग रखना है ,दुनिया बे-ईमान की
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स्वार्थी भूले भगत सिंह को
आजादी के चरण -चिन्ह को
कौन चन्द्रशेखर न जानना
निज स्वार्थ को बड़ा मानना
स्मृति में नहीं दिखती है , कथा शुद्ध बलिदान की
सम्हल -सम्हल कर पग रखना है ,दुनिया बे-ईमान की
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खाओ -पियो मौज करो बस
निचोड़ लो चालाकी से रस
कल-पुर्जो का कलयुग ठहरा 
यन्त्र -भावना निहित गहरा
पूजा होती नहीं ह्रदय से ,कभी यहां भगवान की
सम्हल -सम्हल कर पग रखना है ,दुनिया बे-ईमान की
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सतत युद्ध की है विभीषिका
शांत न चीन ,पाक-अमरिका
विश्व -शांति की धुंधली रेखा
कब मिट जावे शंकित लेखा
नहीं कुशलता भाषित होती , मानव -पावन प्राण की
सम्हल -सम्हल कर पग रखना है ,दुनिया बे-ईमान की
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था सुकरात हेतु विष- प्याला
ईसा हेतु क्रास की माला
गांधी की छाती पर गोली
यहाँ सत्य की हरदम होली
कौड़ी की इज्जत न यहाँ है ,सच्चे शुचि इंसान की
सम्हल -सम्हल कर पग रखना है ,दुनिया बे-ईमान की
 
स्व. शिशुपाल सिंह यादव 'मुकुंद'

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