लघुकथा // लक्ष्य // राजेश माहेश्वरी

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स्वामी सदानंद जी के आश्रम में उनके दो शिष्य रामसिंह और हरिसिंह रहते थे। एक दिन स्वामी जी ने दोनो को शहर से कुछ सामान लाने के लिए भेजा। वे दोनों खुशी खुशी अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गये। उस समय बारिश का मौसम था और चारों हरियाली फैली हुई थी जिससे दोनों मंत्रमुग्ध थे। सूर्यास्त का समय हो रहा था और आकाश में इंद्रधनुष की छटा बिखरी हुई थी। हरिसिंह ने इसे देखकर रामसिंह को कहा कि देखो रामसिंह वहाँ पर कैसी रोशनी दिख रही है और ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ पर सोना उपलब्ध है।

हम चलकर एकबार देख तो ले क्योंकि यह दृश्य कितना मनोहारी है यदि सोना नहीं भी हुआ तो हमें ऐसा अद्भुत दृश्य देखने का सौभाग्य तो प्राप्त हो ही जाएगा। रामसिंह ने कहा कि नहीं हरिसिंह हमारा लक्ष्य गंतव्य तक पहुँचना है और स्वामी जी के निर्देश का उल्लंघन करना हमारे लिए उचित नहीं होगा। हरिसिंह उसकी बात सुनकर उससे सहमत नहीं हुआ और वह उसे छोड़कर उस दिशा में आगे बढ़ गया।

अब रामसिंह अकेला ही नियत समय पर अपने गंतव्य पर पहुँच कर हरिसिंह का इंतजार करने लगा। जब पूरी रात बीत गयी और हरिसिंह नहीं आया तो वह अपने साथियों को लेकर उसकी खोज में निकल पड़ा। हरिसिंह लगभग 10 किमी. दूर एक खेत में भूखा प्यासा बेहोश पड़ा था और उसे उठाकर शहर लाया गया। उसे जब होश आया तो उसने बताया कि मैं सोने की मृगतृष्णा में उस ओर चल पड़ा और ना जाने कितने आगे पहुँचने पर भी वह स्थान उतना ही दूर महसूस होता था। मैं सोना पाने की लालच में आगे बढ़ता चला गया और अंत में भटककर थकान और कमजोरी के कारण गिर पड़ा। मैं पानी पानी चिल्ला रहा था परंतु उस निर्जन स्थान पर मेरी सुनने वाला कोई नहीं था।

मैंने रामसिंह की बात नहीं मानकर बहुत बड़ी गलती की परंतु यह आप लोगों की कृपा है कि मुझे खोजकर मेरी जान बचायी। मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच गया हूँ कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य का निर्धारण करने के पश्चात कभी भटकना नहीं चाहिए अन्यथा उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता और वह जीवन में असफल रहता है।

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RAJESH MAHESHWARI

106, NAYAGAON CO-OPERATIVE

HOUSING SOCIETY, RAMPUR,

JABALPUR, 482008 [ M.P.]

Email-authorrajeshmaheshwari@gmail.com

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