व्यंग्य-विनोद // कुर्सी जनम-जनम की चेरी // राकेश अचल

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फर्नीचर में एक कुर्सी ही ऐसी है जिसे लेकर हमारा समाज बेहद संवेदनशील रहा है ,पहले ये रूतबा तख्त को भी हासिल था लेकिन वक्त गुजरा साथ ही तख्त के तलबगार कम हो गए ,अब मारामारी कुर्सी को लेकर है.मारामारी इतनी है की अब प्रतीक्षा सूची में भी आपका नाम आ जाये तो आप अपने आपको खुशनसीबों की सूची में शामिल मान सकते हैं .

ऊपर वाले ने कुर्सी को वो तौफीक दी है की हर कोई उसका मुरीद है .कुर्सी में नियंत्रण की ताकत छिपी है इसलिए हर कोई कुर्सी पर काबिज होना चाहता है.सियासत वाले तो कुर्सी के लिए मरने-मारने पर आमादा नजर आते हैं .कई तो ऐसे   हैं जो कुर्सी मिलने तक अपने हाथ में कंकन तक नहीं बंधवाते ,और जब कुर्सी मिल जाती है तो उसी के होकर रह जाते हैं ,अजीब शै है ये कुर्सी .

हाल ही में हमारे माहुल बाबा से किसी ने कुर्सी के बारे में एक सवाल कर लिया ,माहुल बाबा एकदम सीधे-सादे इंसान हैं,निश्छलता से बोले जी ! कुर्सी तो अपनी जनम-जनम की चेरी है,जब बहुमत मिलेगा तो कुर्सी हमें छोड़कर आखिर जाएगी कहाँ ?पीढ़ियों से ये कुर्सी हमारी सेवा कर रही है और हम इसके मार्फत देश की सेवा कर रहे हैं.यानी हम तो जनम-जनम से सेवाधारी हैं .

माहुल बाबा का कुर्सी मोह देखकर बड़ी मुश्किल से चाय बेचते-बेचते कुर्सी तक पहुंचे महेंद्र बाबा भड़क गए.बोले-"अजीब उजबक है,अहंकारी है जो कुर्सी के लिए ठीक वैसे ही सबसे आगे अपनी बाल्टी रख देता है जैसा जलसंकट से ग्रस्त इलाकों में लोग नल के सामने अपनी बाल्टी रखते हैं "

कुर्सी के मामले में अपनी दिलचस्पी न के बराबर है,अपने राम तो दरी-चटाई वाले आदमी है ,चाहे जहां बिछाओ और चाहे जब लपेट लो,कोई अनकट नहीं,कोई पर्तिस्पर्धा नहीं ,सो जब माउल और महेंद्र के बीच कुर्सी को लेकर तनातनी देखी तो सौरों की तरह अपने कान भी खड़े हो गए .कान तभी खड़े होते हैं जब उनमें तेल न पड़ा हो.कानों में तेल डालकर बैठने वाले जागरूक नागरिक नहीं माने जाते .अगर आप कानों में तेल डालकर बैठेंगे तो आपको नीरो की बाँसुरी के सुर भी नहीं सुनाई देंगे .

बहरहाल बात कुर्सी की थी,नीरो की नहीं ,नीरो को जो करना है सो वो कर रहा है,उसे कोई रोकने वाला नहीं हैं,रोक भी नहीं सकता और कोई रोके भी तो उसे रुकना नहीं है ,उसके बड़े-बड़े सपने हैं ,और सपने देखने पर देश-दुनिया में कोई पाबंदी नहीं है ,लेकिन सपने देखने पर उज्र करना किसी भी सभ्य समाज में उचित नहीं माना जाता .

माहुल बाबा का कुर्सी के बारे में सपना देख महेंद्र बाबा के माउथ पीस सक्रिय हो गए जोर   -जोर से बोलने लगे -अभी तो कोई कुर्सी खाली ही नहीं है भाई ,इसलिए कुर्सी के ख्वाब न देखो .और देखना भी है तो खुलकर मत देखो .ख्वाब देखना भी अहंकार प्रदर्शित करने जैसा है ,और अहंकार पर एकाधिकार इन दिनों महेंद्र बाबा का है,वे इसे किसी दूसरे को करने ही नहीं देते ,जिसने अहंकार करने की ज़रा भी कोशिश की वे सामने वाले की सीटी बजा देते हैं ,उनकी मजबूरी है .

हमारे यहां कुरसीचार हर पांच साल में होता है,इसे पाने के लिए तमाम ठठकर्म करना पड़ते हैं,घाट-घाट का  पानी पीना पड़ता है,देहरी-देहरी माथा टेकना पड़ता है,लोगों की चिरौरियाँ करना पड़तीं हैं ,सबसे रिश्तेदारी कायम करना पड़ती है .इसे ही दुसरे शब्दों में मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कहते हैं .कुर्सी तक मजबूर महात्मा ही पहुँच पाते हैं ,हम-आप जैसे लोगों के नसीब में तो कोई कुर्सी होती ही नहीं .हम सब केवल कुर्सी को दंडवत कर सकते हैं ,आशीर्वाद ले सकते हैं .

करसी पर बैठे लोग बड़े भव्य-दिव्य दिखाई देते हैं,उनके हाथ चूमने का मन करता है ,लेकिन चूम नहीं सकते,क्योंकि उनके हाथ,हाथ नहीं रहते कर-कमल हो जाते हैं .कुर्सी पाने के पहले आदमी को काफी साफ़-सफाई करना पड़ती है,खर-पटबार हटाना पड़ती है,बाधाएं दूर करना पड़तीं हैं .मुगलिया   काल में इसे तख्तापलट कहते थे ,आजकल ये कुर्सी पलट हो गया है.आप किसी को पल्टे बिना कुर्सी तक पहुँच ही नहीं सकते .कुर्सी पलट के बाद भी आपको चुनाव की आग से गुजरना पड़ता है .चुनाव अग्नि-परीक्षा के समान है,जो इसे पास कर लेता है उसकी काया कंचन की हो जाती है ऐसा चुनाव पुराण में कहा गया है..

बहरहाल हम अपनी बात को यहीं विराम देते हैं क्योंकि हमें दूसरे काम भी देखना हैं ,इन कामों का कुर्सी से कोई लेना-देना नहीं है .कुर्सी माहुल बाबा और महेंद्र भाई को ही मुबारक हो,हमें तो ऊपर वाले का आशीर्वाद ही पर्याप्त है.

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@ राकेश अचल

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