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छः रचनाएँ // डॉ. रूपेश जैन 'राहत'

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रचना क्रम:

१. क्यों नहीं तू बन जाती

२. धूं धूं कर दहक रहा

३. मुझको दीवाना कह लो

४. आ जाती हैं कुछ यादें

५. इंसान की तरह जीता हूँ

६. बेर का पेड़

१. क्यों नहीं तू बन जाती


नहीं जानता कि तू क्या चाहती है

पर ये जानता हूँ मेरा प्रेम निर्मल है

जीवन में उतार चढ़ाव कहा नहीं आते

पर रथ के पहिये यूँ नहीं साथ छोड़ जाते |

क्यों नहीं तू बन जाती नदिया

जहाँ मेरा अस्तित्व विलीन हो जाए

क्यों नहीं तू बन जाती तू वो वीणा

जहाँ मेरा सर्वस्व तल्लीन हो जाये |

मेरे जीवन का आइना तुम बन जाओ

जहाँ मेरा प्रतिबिम्ब भी तुम्हारा हो

मेरा दिन मेरी रात तुम बन जाओ

जहाँ मेरा अंत और आरंभ भी तुम्हारा हो |



२. धूं धूं कर दहक रहा

तेरी याद जीने नहीं देती

दायित्वों का ख्याल मरने नहीं देता

जिस्म पर निशान हलके फुल्के लगते हैं

अंतरमन धूं धूं कर दहक रहा है |

तेरा यूँ जाना क्या जरूरी है

चीजों को सम्हलने में व़क्त लगता है

अगर तुझे लगता है कि देर हो गयी है तो तू गलत है

हर देर नई शुरुआत बना दूंगा |

प्यार की परीक्षा हमेशा ही कठिन होती है

सो हमेशा से लड़ रहा हूँ |



३. मुझको दीवाना कह लो

तुम्हें प्यार नहीं तो क्या

मुझको दीवाना कह लो

उम्मीदे वफ़ा नहीं तो क्या

मुझको दीवाना कह लो |

धूं धूं जलते अंतर्मन में

प्राण अभी बाकी रह गये

अस्तित्व बिखरने को था

ठोकर खाकर सम्हल गये |

दे जाती हो मृगतृष्णा तो क्या

मुझको दीवाना कह लो

नित्य प्रतीक्षा व्यर्थ तो क्या

मुझको दीवाना कह लो |

संघर्ष जीवन में कम नहीं

छोटी छोटी खुशियां बटोर लो

सुख दुःख के साथी हैं मुश्किल

जो मिला उसी में प्रेम टटोल लो |

तेरा आना भ्रम तो क्या

मुझको दीवाना कह लो

तुम्हें प्यार नहीं तो क्या

मुझको दीवाना कह लो |



४. आ जाती हैं कुछ यादें

धूल की पर्तों के नीचे तस्वीरों में अहसास जगाती हुई

ख़्वाहिशें कांधे पे लिए कुछ इठलाती हुईं

आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं ।

चढ़ती हुई जवानी में फ़ितरतन नगमे गुनगुनाती हुई

बेशर्मी में मुस्कुराते, गले लगते शर्माती हुई

आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं ।

चादर पे जुम्बिशें रात चांदनी जाती हुई,

शोख़ नखरे, बलखाती, हसरतें दौड़ाती हुईं

आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।

नजर उठा के देखो तो बेचैन कर जाती हुई

हवा के रुख पे जज़्बात सजाती हुई,

आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।



५. इंसान की तरह जीता हूँ

हालात के मारे हार जाता हूँ कई बार

फिर भी खड़ा हो जाता हूँ हर बार, बार बार

इंसान हूँ, इंसान की तरह जीता हूँ

टूटा हुआ पत्थर नहीं जो फिर ना जुड़ पाऊँगा ।

तेज धूप के बाद ढलती हुई साँझ

आती जाती देख रहा बरसों से

इसी लिए चुन लेता हूँ हर बार नये

नहीं होता निराश टूटे सपनों से ।

क्या हुआ जो पत-झड़ में

तिनके सारे बिखर गये

चुन चुनके तिनके हर बार

नीड़ नया बनाऊँगा।

इंसान हूँ, इंसान की तरह जीता हूँ

टूटा हुआ पत्थर नहीं जो फिर ना जुड़ पाऊँगा।



६. बेर का पेड़

आज जब मैंने

अपने कमरे की खिड़की खोली तो

दूर कोने पर

मुझे बेर का पेड़ दिखाई दिया

कुछ वाक़्यात

फ़ौरन ही जेहन में उतर आये

मेरा बेर तोडना

तोड़े हुए बेरों को

ललचाकर देखना

बेरों को मुंह से काटना, कि

उनमें कीड़े-इल्लियाँ दिखाई देना

कई बार ऐसा होने पर

मेरा झुंझला जाना

फिर मीठे - मीठे बेरों के बीच

मेरी झुंझलाहट ख़त्म हो जाना

आज मुझे यकीं हो गया है, कि

ये बेर का पेड़

मेरी यादों में

एक यादगार हिस्सा बन गया है।

--

कवि परिचय


डॉ. रूपेश जैन 'राहत'

बायोडाटा: बुंदेलखंड के एक खूबसूरत शहर टीकमगढ़ में डॉ.रूपेश जैन का जन्म हुआ | प्रारंभिक शिक्षा टीकमगढ़ में ही प्राप्त कर आगे की पढ़ाई के लिये इन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया | हालांकि ये स्कूल में ही कवितायें लिखने लगे थे पर इनका साहित्य के प्रति वास्तविक रुझान विश्वविद्यालय में अध्यन के दौरान ही हुआ | विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ. हरीसिंह गौर को समर्पित इनकी एक पुस्तक “श्रद्धा सुमन” डॉ हरीसिंह उत्सव (२५ दिसम्बर २००४) के अवसर पर प्रकाशित हो चुकी है| वर्तमान में डॉ. रूपेश जैन एक फार्मास्यूटिकल कंपनी में कार्यरत है साथ ही साहित्य में भी रूचि रखते हैं|

कविता 4796166395399546697

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