रतन लाल जाट की कविताएँ

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

"माँ"



तू कितना दर्द सहती है माँ!
तेरा उपकार जन्मों तक रहेगा॥
कभी चुका ना पायेंगे।
हम तुम्हारा कर्ज ये॥-२
अपने जिगर से तू,
एक नया जिगर है बनाती।
अपने खून से तू,
अलग नया खून है बनाती॥
एक जान में और जान बसाती है माँ!
तू कितना दर्द सहती है माँ!………
तू भगवान की भी एक माँ है।
जो खुद तेरी कोख से लेते जन्म हैं॥
तू रूप है उस भगवान का
और एक वरदान है तेरी दुआ।
तू कितना दर्द सहती है माँ!………
चाहे कोई लाख पराया हो।
चाहे कितना ही वो पापी हो?
मगर माँ तेरे आँचल में ,
वो एक अच्छा इन्सान बन जाये।
तू एक जननी और तू जन्मभूमि।
साथ ही तू है एक देव-शक्ति॥
तेरे तीन रूप हैं माँ!
तू कितना दर्द सहती है माँ!………


जो वक्त हमको मिले,
हम करें तेरी पूजा।
फिर भी ना कभी ये,
कर्ज हम पायें चुका॥
तू कितना दर्द सहती है माँ!………

यदि इस जहाँ में तू ना होती,
तो यह जहाँ अधूरा लगता।
उस रब के साथ तेरा संग होता नहीं,
तो उनका भी हाल बुरा होता॥
तू कितना दर्द सहती है माँ!………




गीत- मेरा वतन हिन्दू है।


सारा जहाँ कहता है,
मेरा वतन हिन्दू है।
हिन्द देश की भाषा,
हिन्दी मेरी जान है॥

बोले-बोले मेरी जूबां,
गीत गायें हिमालय और नदियाँ।
कहानी सुनाये सागर,
हिन्द देश की हरदम॥
नर-नारी बोले हिन्दी,
हिन्दी अपना श्रंगार है।
भारत माँ के शीश का,
यही एक सरताज है॥

मुख से बोले हिन्दी,
हस्त से लिखे हिन्दी।
नचाती है हमको हिन्दी,
सिर ऊँचा उठाती है हिन्दी॥
डाल-डाल, पत्ती-पत्ती,
तुझको है प्यारा।
गान हिन्दी का,राग हिन्दी का॥
रस तेरा, छन्द तेरे,
तेरे कितने अलंकार है?

मोती-सी चमक,लगते हैं अक्षर।
जैसा बोलते,वैसा ही लिखते हैं हम॥
गाँव में है हिन्दी,
शहर में भी हिन्दी।
घर-घर,गली-गली,
हर कहीं है हिन्दी॥
हिन्दी बोले पढ़े-लिखे,
हिन्दी समझे और जाने।
समझे अपनढ़ जन भी अपने,
खग बोले,पशु भी समझे॥

भरा-भरा है भण्डार,
शारदा ने दिया वरदान।
लन्दन से न्यूयार्क,
पूर्व से पश्चिम।
सातों महाद्वीप,
सागर भी पाँच॥
जानते हैं,सीखते हैं,
फिर मधुर बोलते हैं।
हिन्दी लिखें
और बोले हम हिन्दी रे॥



गीत- पहला रिश्ता है”



पहला रिश्ता है, आत्मा का परमात्मा से।
जो इस दुनिया में, बड़ा ही प्यारा है॥
ये रिश्ते-नाते बनते हैं, सदियों में एकबार।
निभाना जरूरी है इनको, वरना हो जायेंगे तार-तार॥
रिश्ते एक-दूजे को, बाँधे है अपनों से।
अपनी मर्यादा में, कर्म-धर्म के वो साथ हैं॥
पहला रिश्ता है………………………………………

दूजा रिश्ता माना है, माँ-बाप का हमने।
जो धरती पर अपने, साकार रूप भगवान है॥
तीजा रिश्ता आता है।
अपनी जिन्दगी में, बड़ी मुश्किल से॥
गुरू का शिष्य से,
निस्वार्थ-भाव उसको, सच्चा बनाता है॥


बाकी सब रिश्ते, बाद में बनते हैं।
भैया और बहिनां, प्यारे दोस्त हमारे॥
पति-पत्नी के साथ, रिश्तेदार सारे।
बनते-बिगड़ते, फिर जुड़ जाते हैं॥
इन रिश्तों को निभाना है।
तभी जीवन में खुशियाँ है॥
वरना हम मनुज से, पशु-दानव लगते हैं॥


सुबह का सूरज है युवा



सुबह का सूरज है युवा
कभी आँधी तो कभी है तूफाँ
किसी के आगे ना वो झुका
इतिहास बदले जिधर भी मुड़ा

देश की नाव चलाने वाले
सबकी शान बढ़ाने वाले
कुर्बानी जान की देने वाले
इसी जोश-जुनून का नाम है युवा

अंधेरे घर में लगता है दीपक
जीवन की गाड़ी में अपना है टिकट
हार के ना बैठता वो है जीवट
सोचती है दुनिया कर दिखता है युवा
नदी का कगार है
मेहनत की पगार है
तलवार की धार है
फौलाद से मजबूत है युवा

अंधे की लाठी बनना है
गरीब को बाटी देना है
सोने जैसी माटी करना है
नहीं डरना जब साथी है युवा

जो बाधाओं से लड़कर
मौत से भी ना डरकर
पहुँच जाये मंगल पर
नामुमकिन को मुमकिन करता है युवा

नेता इनसे परेशान
लुटेरे भी है हैरान
जीवन-समर का मैदान
सब कुछ हासिल कर सकता है युवा


चेहरे पर मुस्कान लिए
दिलों का अरमान सँजोए
काँटों पर कदम बढ़ाए
चलते रहने वाला है युवा

युवा भारत की तकदीर
जैसे हो कोई अमिट लकीर
इनको ना तुम समझो फकीर
फूँक मारकर पर्वत उड़ाता है युवा

बस, जरूरत है एक अंगार की
निर्जीव को जीव दे उस ललकार की
सारी जिम्मेदारी है कर्णधार की
हर दिल का असीम विश्वास है युवा




क्रोध



क्रोध आत्मा का नाश है
जलता हुआ एक अंगार है
खुशियों का करे जो शिकार है
इस पर सबको ही धिक्कार है

हरियाली सूख जाए
चारों तरफ धूप छाए
अपनों से दूर ले जाए
सपनों को चूर डाले
यही क्रोध की पहचान है

मौत बन मंडराता
भंवरा बन सोंख जाता
हम फूल-से गए मुरझा
खिलेंगे फिर कैसे दुबारा
जब क्रोध बना तलवार है


प्रेम के बल जीत
क्रोध पर तू मीत
जीवन का यह गीत
करे चित सबको धीर
डूबते जहाँ प्रेम-कगार है








जैसे बेटी



आंगन में बुलबुल जैसे
जीवन में रुनझुन जैसे
जैसे एक मंदिर में भगवान है
जैसे बगिया में कोई गुलाब है

हँसी-खुशी दे जाती
संगीत की तरह बेटी
दुःख-गम ले जाती
संजीवन की तरह बेटी
अपना सारा वो प्यार है
दिल का वो अरमान है

जीवन की पहचान
आज बनी है बेटी
चेहरे की मुस्कान
अब हुई है बेटी
एक नया विश्वास है
दिल में जगा अहसास है

शक्ति है भक्ति अपनी
देवी और परी दोनों है बेटी
जन्नत अपना बेटी
मन्नत भी माँगता मैं यही
घर-आँगन रोशन है
जीवन में छाया आनंद है


गीत- “भारत मेरा दुनिया से न्यारा” 

  
                                            
  भारत मेरा दुनिया से न्यारा,
                  सारे जहाँ का प्यार है यहाँ।
कदम–कदम पर प्यार ही मिलता।
                  अनजान भी अपना-सा लगता॥

एक-दूसरे में कोई भेद नहीं।
             सुख–दुख मिलकर बाँटते हैं भारतवासी॥
सदा ही प्रेम की बरसात होती।
               जो सबके दिलों को है सींचती॥
ऐसा और कहीं ना है नजारा।
भारत मेरा दुनिया से न्यारा………………………॥

विश्वगुरु हैं हम,
       सबको सिखाया है ज्ञान।
हिमालय-से अटल,
        गंगा जितने पावन हैं।
थार का दुख-दर्द,
         मैदान की खुशियाँ है॥

दामन थामे हैं सत्य का,
          व्रत निभाते हैं अहिंसा का।
पाप–चोरी नहीं हैं यहाँ,
          हर दिल में भारत माँ का है प्यार भरा॥ 
भारत मेरा दुनिया से न्यारा………………………॥


जब भी कभी मैं टूट जाता



जब भी कभी मैं टूट जाता,
दुःख और दर्द से हार जाता
उस वक्त बस तुम ही मेरा,
सिर्फ सहारा एक मात्र बच जाता

जब भी कभी आँखों से आँसू छलकते
और शब्द लबों पर खामोश हो जाते
सारे हालात दिल में दिल में घुटते
तब तुम ही मेरे अंतिम लफ्ज बन जाते

सामने कभी कुछ दिखायी न देता मुझको
हर तरफ अंधकार ही ढक लेता मुझको
दीप बनकर एक नयी रोशनी तुझसे
जगमगाती है चमक के जैसे मुझको

जब भी कभी रोना आता जोर-जोर-से
और सुनने वाला पास नहीं कोई मेरे
उस वक्त यार तुम ही प्यार लुटाये
हसीन मुस्कान के साथ रंगीन लम्हें


दिल की घंटी



वैसे तो हमेशा मोबाइल की घंटी बजते ही
मेरे दिल की घंटी सब कुछ बयान कर देती
कि अमुक का कॉल है और यह काम है
पर, कभी-कभी दिल कहीं जा घूम हो जाता
तब फिर कैसे पता चले कि किसका कॉल है

क्योंकि उस वक्त सिर्फ दिल मेरा
एक उसी में जाकर खो जाता
हर एक पल उसी का इन्तजार करता
यह पागल दिल मेरा तन्हा-तन्हा
देखता है राह उसकी जिसे कभी ना देखा
शेष बची आशाएं मेरी मिफ जाती
जब सच ही किसी और का कॉल आता





जब कोई किसी को



जब कोई किसी को बस में बिठाकर
या किसी को खड़ा छोड़ खुद कहीं बैठकर
चल देता है या विदा उनसे होता है
उस वक्त उन दिलों पर क्या गुजरती है
पूछो तो कोई जबाव नहीं मिलता
पर खामोशी और मौन सब कुछ बयां करता
माँ बेटे को और बाप बेटी को
या कोई अपरिचित किसी का बना चिर-परिचित हो
या फिर किसी नाम में छिपा कोई अमिट बंधन हो
क्या उनकी आंखें चुपचाप यूँ ही टकटकी लगाये हैं
और क्यों उनके लबों पर होती कोई कंपकंपी है
क्या गुजरती है उनके ख्वाब और सपनों पर
किस रूप में आने लगती है उनको दुनिया नजर
जब कोई किसी को चाहता पल भी नहीं छोड़ना
कसकर थामे हुए हाथ को भी पड़ता है छोड़ना
और लाख खुशी के बीच भी आंसूं रोके नहीं रूकते
बस टपटप झरने-से गिरने है आँखों से
वो कोई रिश्तेदार नहीं है फिर भी ना जाने क्यों
उनके बीच कोई रिश्ता है जिसका कोई नाम ना हो
सिवा प्रेम और त्याग के कुछ नहीं स्वार्थ हो
ऐसा लगता है जैसे सारी दुनिया मिट गयी
या फिर कोई स्वर्ग हमारा ढह गया कहीं
आजकल ये हवा कुछ बदल-सी गयी है
नजरें भी कुछ घूरती नजर आती है
पर फिर भी वो प्रेम-वसंत नहीं सूखा है
कुछ गुल तो आज भी महकते हैं
जब कोई कुछ पल मिलकर
हजारों बरस की कमी भर देता
या तड़पते प्यासे दिल में प्यार की बौछार से सींचता


---

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "रतन लाल जाट की कविताएँ"

  1. रचनाकार पत्रिका आज के युग में हिन्दी साहित्य के लिए संजीवनी का काम कर रही है

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.