व्यंग्य // एक कुत्ते की आत्मकथा // राकेश अचल

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आखिर कुत्ता तो कुत्ता ही होता है. कुत्ता आदमी के बिना और आदमी कुत्ते के बिना नहीं रह सकते . कुत्ते का आदमी से सनातन रिश्ता है,यानी जब से धरती पर सनातन सभ्यता है तभी से ये रिश्ता चला आ रहा है .इस अर्वाचीन रिश्ते की वजह से कई चीजें इधर से उधर हो गयीं हैं, कुत्ता आदमी की तरह हो चला है और आदमी कुत्ते की तरह .

मैंने जब से होश सम्हाला है तभी से अपने घरों में कुत्ते को मौजूद देखा है.घर बदलते हैं , शहर बदलते हैं लेकिन कुत्ते नहीं बदलते, केवल उनके नाम बदलते हैं . कभी शेरू, कभी रामू, कभी मोगली . कभी टाइगर, कभी डोना, कभी छोटी  , लेकिन कुत्ता तो कुत्ता ही रहता है .आपने विश्नोई महिलाओं को हिरण के बच्चों को स्तनपान करते देखा होगा लेकिन मेरी मां हमारे कुत्ते शेरू को स्तनपान कराती थीं , लेकिन उनकी तस्वीर कभी किसी अखबार में नहीं छपी , छपती भी कैसे , उस समय ये रिश्ते बेहद संवेदनशील होते थे .

आप शेरू और मुझमें कुछ समानताएं तलाशना चाहें तो मुझे कोई उज्र नहीं , लेकिन जो हकीकत थी सो मैंने आपकी बता दी .हम महाभारतकाल से तो कुत्ताप्रेमी रहे ही हैं, महाभारतकाल के पहले हमें कुत्तों और आदमी के रिश्तों के होने का यकीन तो है लेकिन कोई सबूत हमारे पास नहीं है. मोहन जोदाड़ो और हड़प्पा की खुदाई में भी इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं मिला . हाँ तो मैं आदमी और कुत्तों के रिश्तों की बात कर रहा था . मैं आपको बता दूँ की पहले कुत्तों के काटने से रैबीस का रोग नहीं होता था . हमें हमारे पालतू कुत्तों ने सैकड़ों बार काटा , और ऐसी-ऐसी जगह काटा की आप कल्पना नहीं कर सकते लेकिन हम कभी नहीं मरे. आज साथ साल बाद भी ज़िंदा हैं तो सिर्फ इसलिए की हमारे कुत्ते आज के आदमी की भांति जहरीले नहीं थे .

हमें यानी मानव समाज को कुत्तों का शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि हमें कुत्तों ने बहुत कुछ सिखाया है . महिर्षि पतंजलि ने तक कुकरासन कुत्तों से सीखा और आदमी को सीखा दिया .कुत्तों से शिकार करना,स्वामिभक्ति जैसे महान गुण आदमी को सीखने को मिले . दुम हिलाना,तलवे चाटना, गुर्राना कुछ ऐसी विधाएँ हैं जो सिर्फ कुत्तों में ही पायी जाती थीं, लेकिन कुत्ते और आदमी के रिश्ते इतने प्रगाढ़ रहे की कुत्तों ने अपनी ज्ञान राशि पूरी की पूरी आदमी को समर्पित कर दी .

हमें फख्र होना चाहिए की आज कुत्ते हमारे समाज की ही नहीं सियासत की जरूरत भी बन गए हैं . कुत्ते थे तभी उन्हें देखकर हमने पत्रकारिता में ''वाच-डॉग''का सृजन किया . एचएमवी वालों ने कुत्तों से प्रेरणा लेकर संगीत का अपना लोगो बनाया , वे चाहते तो गधे या सियार को भी चुन सकते थे लेकिन उन्होंने कुत्ते को चुना , उसका मान बढ़ाया,क्योंकि कुत्ता ही इस लायक था , आदमी भी कुत्ते का मुकाबला इस मामले में नहीं कर पाया .

कुत्ते की किस्मत से हम क्या पूरा भारत जलता है,एक कुत्ता है जो जीते जी धर्मराज के साथ स्वर्ग चला गया, आदमी तो जीते जी नर्क में ही रहने के लिए अभिशप्त है और फिर राज अगर कीचड़ और कमल का हो तो कहना ही क्या है ? कुत्ते हर राजनीतिक दल की पसंद होते हैं ,कोई उनका इस्तेमाल चुनावों में करता है तो कोई गाँवों में . ज़रूरत आदमी को कुत्ता बना सकती है लेकिन कुत्ते को आदमी नहीं बना सकती है. आपको ताज्जुब होगा की आदमी कुत्ते की मौत मर सकता है किन्तु कुत्ता कभी आदमी की मौत नहीं मरता .

कुत्ते की आत्मकथा लिखते हुए मैं कुत्तों की आत्मकथा लिखने जा बैठा , मुझे एक ही बात अटपटी लगती है कि अब बड़े-बड़े नेताओं का सामन्यज्ञान भी कुत्तों के बारे में कम होता जा रहा है. वे कुत्तों से देशभक्ति सीखने का उपदेश देने लगे हैं जबकि कुत्तों का देशभक्ति से कोई लेना-देना नहीं है . कुत्ते केवल और केवल स्वामीभक्त होते हैं , वे साहब के भक्तों की तरह किसी के अंधभक्त भी नहीं होते .कुत्ता समाज को इस बात पर आपत्ति हो सकती है की उन्हें गलत ढंग से इस्तेमाल किया गया .कुत्ते अदालत भी जा सकते हैं, उन्हें जाना भी चाहिए , ये उनका हक बनता है.

माफ़ कीजिये मैं कुत्तों की बात करते-करते ये भूल ही गया कि अभी मुल्क में न कुत्तों का अपना कोई संगठन है और न कोई सियासी दल,कुत्ते इस फिराक में हैं कि उन्हें अपने से मिलता-जुलता कोई संगठन या दल मिल जाये तो उनका भी काम बन जाये और दल वालों का भी . मैं तो कहता हूँ कि जिस घर में कुत्ते नहीं वो घर फिर घर नहीं . कुत्तों को लेकर हमारी एक राष्ट्र नीति होना चाहिए . आज भी मुल्क में बड़ी संख्या में कुत्ते सड़क पर रहते हैं,सड़क पर खाते हैं, सोते हैं, इश्क-मोहब्बत करते हैं और सड़क पर ही मर आते हैं .

कोई सरकार कुत्तों की अवैध कालोनियों को वैध करने के बारे में गंभीर नहीं है क्योंकि बेचारे कुत्ते किसी के वोटर नहीं है, यदि होते तो मुमकिन है कि इन कुत्तों के लिए भी कोई न कोई आवास योजना बना ही ली जाएगी . कुत्तों के लिए आवास एक गंभीर समस्या है ,उनके उपचार की भी कोई माकूल व्यवस्था नहीं है. सरकार ने कुत्तों के अस्पाताल को तोड़फोड़ कर वहां शॉपिंग काम्प्लेक्स बना दिए हैं. हम लालची हैं,बेशर्म हैं, खुदगर्जी हैं . हमें इसके लिए कुत्तों से माफ़ी मांगना चाहिए

हम अपने पुरखे कृष्णचन्द्र जी से डरते हैं इसलिए कुत्ते की जगह कुत्तों की आत्मकथा लिख रहे हैं, किसी गधे की नहीं, गधे की आत्मकथा केवल और केवल कृष्णचन्द्र जी लिख सकते थे , गधे और कुत्ते में जमीन-आसमान का अंतर् है, यही अंतर् मुझमें और कृष्ण चन्दर जी में हैं . उन्होंने गधों को कृतार्थ किया, मैं कुत्तों को कृतार्थ कर रहा हूँ. ये सोच कर कि किसी न किसी दिन कुत्ते हमारे भी शुक्रगुजार होंगे कि हमने भी दुनिया को एक नायाब और पठनीय आत्मकथा दी.

आइये अब आप भी मेरी तरह कुत्तों के बारे में बहुत कुछ जान गए होंगे ,इसलिए मेरे साथ एक सुर में बोलिये-''कुत्तावाद,जिन्दावाद , कुत्ता है जहां , आदमी है वहां . हर-हर कुत्ता-घर-घर कुत्ता . इति कुत्ता महात्त्म्य प्रथम और अंतिम अध्याय समाप्त . ॐ कुत्ता शरणम , ॐ कुत्ते नम:.

@ राकेश अचल

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