हास्य-व्यंग्य // रम्य रचना : कद्दू पर हंसो मत // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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कितनी अजीब बात है कि कद्दू को हमने कभी गंभीरता से ग्रहण नहीं किया। कद्दू नाम लेते ही हंसी आने लगती है। उसे सदैव मज़ाक की तरह ही उपयोग में लाया जाता है। कद्दू गोल-मटोल है तो भला इसमें उसका क्या दोष? न जाने कितने लोग गोल –मटोल होते हैं। उनकी तोंद कद्दू से स्पर्धा करती है और प्राय: कद्दू को मात दे देती है, लेकिन इससे क्या ? उन्हें कद्दू नाम से पुकारा जाना तो सरासर गलत है। आप काणे को काणा और लंगड़े को लंगडा कहेंगे तो वह नाराज़ तो होगा ही। व्यंग्यकारों का तो यहाँ तक कहना है की आपको कद्दू को भी कद्दू नहीं बोलना चाहिए। कद्दू बेचारा गरीब, निरीह और निरापद है। ‘कद्दू’ कहकर उसपर छींटाकशी करना, यह कोई अच्छी बात नहीं है। हम विकलांग को विकलांग कहकर चिढाते नहीं, उसे दिव्यांग कहते हैं। गांधी जी इसी तरह अछूतों को अछूत न कहकर हरिजन कहते थे। कद्दू को भी कद्दू नहीं कहना चाहिए। उसे सीता-फल कहिए ना ! सीताफल नाम ही कद्दू को सीता की पवित्र रसोई में ले जाता है। लेकिन नहीं। हम तो उसे कद्दू ही कहेंगे ! कितनी गलत बात है ! भले ही प्यार में ही क्यों न कहते हों, हम स्वस्थ और गोल-मटोल बच्चों तक को तो कद्दू कहकर चिढाते हैं। इतना ही नहीं, कोई भी बेकार, बेमतलब की चीज़ देखी नहीं कि उसे कद्दू कह मारा। पिछले चुनाव में कई बड़े बड़े कद्दावर नेता चुनाव हार गए थे। इस पर टिप्पणी करते हुए कटाक्ष किया गया काहे के कद्दावर, सारे नेता कद्दू निकले, कद्दू !

लेकिन सब्जी के तौर पर भारत में खाई जानेवाली कद्दू एक काफी प्रचलित सब्जी है। कद्दू की बेल होती है। सामान्यत: इसके पेड़ नहीं होते। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने कद्दू को पेड़ पर उगाना भी संभव कर लिया है। नालंदा में कद्दू के एक पेड़ पर साल भर कद्दू फलता है। कद्दू की फसल एक कैश-फसल मानी गई है, इधर मंडी में कद्दू बिका नहीं कि उधर कैश जेब में आ गया। विज्ञान कद्दू को ककडी, लौकी और खीरा के परिवार का मानता है। यह बात दूसरी है की सामान्य लोग ऐसा नहीं सोचते। वे तो इसे तरबूज के परिवार का मानते हैं – आकार में वैसा ही बड़ा और गोल-मटोल। कद्दू बेशक एक सब्जी तो है लेकिन खाने की थाली में कद्दू देखकर ज्यादहतर लोग मुंह बनाने लगते हैं। बहुत ही कम लोग होंगे जिन्हें कद्दू पसंद हो। लेकिन जिन्हें पसंद है वे बड़े शौक से इसका सेवन करते हैं। कद्दू की सूखी और कभी कभी शोरबेदार सब्जी तो बनाई ही जाती है, इसका रायता, भरता और इसकी टिक्कियाँ भी बनाई जाती हैं। कद्दू के गुलगुले, हलवा, बर्फी और खीर तक बनाई जाती है। और तो और कद्दू की प्यूरी तक बना ली जाती है। शोरबे को गाड़ा करने के लिए कद्दू की ’ग्रेवी’ अच्छी मानी गई है। बिहार में छटी का पर्व ‘नहाय-खाय’ से आरम्भ होता है, और ‘खाय’ के लिए चने की दाल, भात और कद्दू की ही सब्जी बनाई जाती है। किन्तु प्रतिपदा को कद्दू का सेवन वर्जित माना गया है जब कि व्रत में कद्दू की खीर खाने की सिफारिश की जाती है। पूरियों के साथ कद्दू बड़ा ही स्वादिष्ट लगता है। सब्जी मंडी में इसे बेचने वाले “कदुआ पुरी पुरी चिल्लाय” कहकर इसे बेंचते हुई देखे जा सकते हैं।

महिलाओं की सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ तो आपने देखी, सुनी होंगीं, लेकिन यदि आपसे यह कहा जाए कि कद्दू के ‘मोटापे’ की प्रतियोगिताएं भी होती हैं तो चौंकिए मत। कैलीफोर्नियाँ में कद्दू प्रतियोगिताएं पिछले चालीस वर्षों से नियमित रूप से होती आई हैं। इसमें सबसे भारी-भरकम और गोल-मटोल कद्दू का चुनाव कर, उसे पुरस्कृत किया जाता है। लोग ट्रेलर के जरिए और ट्रकों द्वारा कद्दुओं को प्रतियोगिता स्थल तक पहुंचाते हैं। पिछली बार जिस कद्दू को इनाम मिला था उसका वज़न १९८५ पौंड था (आश्चर्य!) तथा इनाम की राशि सात लाख रूपए थी !

कहते हैं एक बार अन्य कई तीर्थयात्रियों के साथ तुकाराम ने एक कद्दू को भी तीर्थयात्रा पर भेज दिया। हुआ यों कि कुछ तीर्थ यात्री, यात्रा करने से पूर्व तुकाराम का आशीर्वाद लेने उनके पास पहुंचे। तुकाराम जी ने पूछा आप लोग तीर्थ यात्रा पर क्यों जा रहे हैं ? यात्रियों ने कहा, हमारा तीर्थयात्रा का मकसद केवल यही है कि इससे हमारी कुछ बुराइयाँ ख़त्म हो जाएं। तुकाराम ने आशीर्वाद स्वरूप उन्हें एक कद्दू दिया और कहा अपने साथ हर तीर्थ स्थान पर इसे भी लेते जाएं और हर नदी में जिसमे आप स्नान करें इस कद्दू को भी स्नान कराएं। तीर्थ यात्री जब वापस लौटे तो जो कद्दू उन्हें भेंट स्वरूप मिला था उसे उन्होंने तुकाराम जी को वापस करते हुए कहा, यह कद्दू भी तीर्थ करके वापस आया है और आपके चरणों में हम इसे लौटा रहे हैं। तुकाराम जी बहुत खुश हुए। बोले अब आपलोग सब इसकी सब्जी खाकर जाएं। सब्जी बनाई गई और सबको परोसी गई। लेकिन उसे खाते ही सब थू थू करने लगे। बोले यह तो कड़वा है। तुकाराम जी ने बताया कि उन्हें पता था कि यह कड़वा है और इसे तीर्थ कराने के लिए इसीलिए दिया गया था की शायद यह तीर्थ करने के बाद अपनी कड़वाहट से मुक्ति पा सके। लेकिन ऐसा न हुआ न हीं होना था। तीर्थ करने से किसी की बुराइयां दूर नहीं होतीं। उन्हें तो स्वयं ही प्रयत्न पूर्वक दूर किया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षा देने का तुकाराम जी का अपना ही तरीका था। इसमें भला किसे एतराज़ हो सकता है। पर मुझे आजतक यह समझ में नहीं आया कि आखिर इसके लिए उन्होंने कद्दू को ही क्यों चुना ? कद्दू बेचारे की रही-सही प्रतिष्ठा भी जाती रही।

कद्दू के साथ सचमुच बड़ी ज्यादती हुई है और आज तक हो रही है। किसी भी तंदुरुस्त आदमी की ज़रा सी भी तोंद निकली देखी नहीं कि उसे कद्दू की उपमा दे दी जाती है। “खाओ तो कद्दू से, न खाओ तो कद्दू से”। यह कद्दू और तोंद दोनों के लिए बड़ा अपमान जनक है। अफसर के तोंद न हो तो अपने मातहतों पर उसका रोब नहीं पड़ता। आफिस के बाहर छोटे मोटे दस्तक करना हो तो इसके लिए उसे मेज़ आदि की दरकार नही होती। झट से तोंद पर कागज़ रखा और हस्ताक्षर मार दिए। तोंद ही तो यह बताती है कि आदमी खाते-पीते घर का है। तोंद और कद्दू –ये दोनों ही, प्रकृति की विलक्षण देन हैं। भाग्यशाली हैं जिन्हें तोंद मिली हुई है और भाग्यशाली हैं जो पूरियों को कद्दू से खा सकते हैं, वरना पूरी किस काम की ! अगर तुलना ही करना है तो दोनों की सकारात्मक भूमिका की तारीफ़ करें। लेकिन नहीं, कद्दू को तोंद और तोंद को कद्दू कहकर दोनों की हंसी उड़ाना ही लोगों का अभीष्ट है !

तोंद के कारण ढूँढ़ते ढूँढ़ते विशेषज्ञों ने उसके कई प्रकार बताए हैं। अधिक शराब पीने से बढी हुई तोंद ‘वाइन टमी’ है; गैस के कारण पेट का तोंद सा फूलना, ‘ब्लास्टेड’ टमी है; तनाव से उत्पन्न तोंद, ‘स्ट्रेस टमी’ है; हारमोन के असंतुलन के कारण बढ़ी हुई टमी, ‘पीयर टमी’ कहलाती है; बच्चे के जन्म देने के बाद पेट का फैलाना ‘मम्मी टमी’ कही गई है। लेकिन शुक्र है, कद्दू के मोटापे और गोलाई के इतने आकार हैं कि उनकी पड़ताल अभी तक की ही नहीं जा सकी है।

मुझे कद्दू बेहद पसंद है। वाह ! खट्टी-मीठी कद्दू की सब्जी, बस मज़ा आ जाता है ! लेकिन मेरे तोंद नहीं है। बड़ा अफ़सोस है। काश, तोंद भी होती? कभी तो अपने उस कद्दू पर भी प्यार से हाथ सहला पाता।

कद्दू पर हंसो मत !

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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4 टिप्पणियाँ "हास्य-व्यंग्य // रम्य रचना : कद्दू पर हंसो मत // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. डा आशा चौधरी2:41 pm

    बहुत खूब! कद्दू को जाने क्यों हम भारतीयों ने अपनी पसंद में सबसे नीचे स्थान दिया है । बात बात में विदेशों के मुंह जोहने वाले हमें इतना पता होना चाहिए कि अमेरिका में कद्दू को सुखा कर पाउडर रूप में भी उपयोग में लाया जाता है । डॉ साहब मेरे गुरु हैं। मंदसौर में आप मेरे प्राचार्य थे, तब आदरणीया आंटी ने एक दिन मुझे कद्दू का रायता परोसा, जो कि मेरे गले से नीचे उतरने का नाम ही न ले। कैसा बना? मुझे अपनी आंटी की पाक कला से कोई शिकायत नहीं थी, कद्दू से थी । लेकिन ये बात उन्हें नहीं बता सकने के कारण उस दिन कद्दू का रायता डबल प्लेट खाना पङा था । आज भी हंसी आती है । कद्दू में दोनो ही गुण हैं- स्वस्थ भी रखता है और संसारा भी है !

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  2. डा आशा चौधरी7:12 pm

    सुधार कर देखें-कद्दू में दोनों ही गुण हैं --- भी रखता है और हँसाता भी है

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  3. पूरी सहानुभूति है, तुम्
    हारे साथ । कद्दू के बारे मे अबतक कुछ राय बदली या नहीं ?

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    1. डा आशा चौधरी11:51 am

      प्रणाम ,अब तो कद्दू पसंद है । बल्कि जिन्हें पसंद नहीं उनसे सहानुभूति है ।

      हटाएं

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