उत्तरी अमेरिका की लोककथाएँ // ईकटोमी और कछुआ // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — उत्तरी अमेरिका–ईकटोमी :

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चालाक ईकटोमी


संकलनकर्ता


सुषमा गुप्ता


13 ईकटोमी और कछुआ[1]

एक बार एक शिकारी पटकासा[2] कछुआ अपने नये मारे हुए शिकार हिरन के पास खड़ा था। उसने उसमें से एक लाल नोक वाला तीर बाहर निकाला।

उसका यह तीर उसके अपने तरकस में रखे हुए दूसरे तीरों से बहुत अलग था जो उसके अपने थे। इसका मतलब यह हुआ कि यह तीर किसी और का था उसका था ही नहीं। किसी दूसरे के भटके हुए तीर ने उसको मार दिया था।

पटकासा सारी सुबह शिकार की तलाश करता रहा था पर वह केवल एक काली चिड़िया के ऊपर निगाह रखने के अलावा और कुछ कर ही नहीं सका था।

थक हार कर वह घर लौट रहा था। उसका दिल भारी था और वह नीची निगाह किये सोचता जा रहा था कि आज उसके घर में उसके भूखे परिवार को मांस खाने को नहीं मिलेगा।

उसको लगा कि दयालु भूत उसके ऊपर मेहरबान हुए और उसको इस नये मारे हुए हिरन की तरफ ले गये ताकि उसके बच्चे भूखे न रहें।

जब पटकासा रास्ते में इस हिरन से टकराया तो उसके मुंह से निकला — “ऐसा लगता है कि भली आत्माओं ने मुझे इधर भेज दिया है। ” और यह कहते हुए वह उस शिकार पर झुक गया।

तभी उसको एक आवाज सुनायी दी — “कैसे हो मेरे दोस्त?” और किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रखा।

यह कोई आत्मा नहीं थी बल्कि यह तो बूढ़ा ईकटोमी था। पटकासा ने हिरन पर झुके झुके ही जवाब दिया — “कैसे हो ईकटोमी?”

ईकटोमी उसकी तरफ मुस्कुराते हुए बोला — “अरे वाह तुम तो बड़े होशियार शिकारी हो। ”

अचानक पटकासा की काली आंखें चमकीं और उसने उससे कहा — “क्या सचमुच तुम ऐसा सोचते हो?”

“हां तुम तो सचमुच में बहुत ही होशियार शिकारी हो। चलो एक छोटा सा मुकाबला रखते हैं। देखते हैं कि कौन इस हिरन के एक भी बाल को छुए बिना इसके ऊपर से कूद जाता है। ”

अपने हाथ की मोटी मोटी हथेलियों को मलते हुए पटकासा बोला — “ओह मैं तो इस तरह से इसके ऊपर से नहीं कूद सकता। ”

“कायरों की तरह से शक मत करो। तुम तो एक बहुत ही होशियार आदमी हो जिसको कोई भी काम करने में मुश्किल नहीं होती। ”

यह कहते हुए वह पटकासा को कुछ दूरी पर ले गया। पटकासा यह देख कर कुछ परेशान सा हो गया और हंसने लगा।

ईकटोमी बोला — “अब पहले तुम कूदो। ”

पटकासा ने अपने होंठ काटते हुए अपने दोनों हाथों की मुठ्ठी भींची फिर दोनों हाथ हिलाये और फिर जैसे ही वह कूदने के लिये भागा कि ईकटोमी बीच में आ गया और बोला — “जो भी जीतेगा यह हिरन वही खायेगा। ”

अब ना कहने का तो समय ही नहीं था उसके लिये तो बहुत देर हो चुकी थी। और पटकासा को भी हिरन हारना मंजूर था पर अपने आपको कायर कहलवाना नहीं सो वह अभी भी अपने छोटे छोटे हाथ हिलाता हुआ बोला “ठीक”।

आखिर उसने कूदने के लिये भागना शुरू किया। उसके कदम उतने छोटे और इतने तेज़ थे कि ऐसा लग रहा था कि वह तो केवल जमीन में ही ठोकर मार रहा हो। और वह कूदा पर वह एक डंडी के ऊपर से ठोकर खा गया और हिरन के बगल में जा कर गिर गया।

उसको गिरता देख कर ईकटोमी यह बहाना करते हुए बड़ी ज़ोर से बोला जैसे उसको उसके गिरने पर बहुत ही दुख हुआ हो “अरे रे रे। ”

फिर उसको उसके पैरों पर खड़ा करते हुए वह बोला — “अब कूदने की बारी मेरी है। ”

जैसे ही ईकटोमी ने यह कहा वैसे ही वह उस हिरन के ऊपर से कूद गया। पटकासा की पीठ पर हाथ मार कर वह हंस कर बोला — “अब यह शिकार मेरा है। जरा तुम इसको देखते रहना तब तक मैं अपने बच्चों को ले कर आता हूं। :

यह कह कर वह लम्बी लम्बी घास के बीच में से हो कर भाग गया। पटकासा उन लोगों के कहे पर यकीन कर लेता था जो योजनाएँ बनाते थे और जो कोई उससे कोई भी काम करने के लिये कहता था उसका काम करने के लिये हमेशा तैयार हो जाता था।

पर इस बार उसने उसको यह जवाब नहीं दिया “हां मेरे दोस्त। ” उसको लगा कि ईकटोमी ने उसकी तारीफ करने वाले शब्दों से उसका बेवकूफ बनाया है।

उसने अपनी नाक ईकटोमी की तरफ यह कहने के लिये घुमायी “ओह नहीं ईकटो। मैंने तुम्हारी बात ही नहीं सुनी। ” पर तब तक तो ईकटोमी उसकी नजरों से काफी दूर जा चुका था।

पर जल्दी ही उसे कुछ आवाजों की फुसफुसाहट सुनायी दी। उसको लगा कुछ लोग हंस रहे थे और यह हंसी तेज़ और और तेज़ होती जा रही थी। जल्दी ही वहाँ बहुत सारे लोग इकठ्ठा हो गये।

वह बूढ़ा ईकटोमी अपने बच्चों को लिये वहाँ आ पहुंचा था जहां वह पटकासा कछुए को छोड़ कर गया था पर वहाँ तो कुछ भी नहीं था। वह सारी जगह खाली पड़ी थी। न तो वहाँ पटकासा था और ना ही हिरन। यह देख कर बच्चे तो चिल्लाने लगे।

पिता ईकटोमी ने अपने बच्चों से कहा — “शान्त हो जाओ मेरे बच्चों। मुझे पता है कि यह पटकासा कहां रहता है। तुम लोग मेरे पीछे पीछे आओ और मैं तुमको उस कछुए के घर ले चलता हूं। ”

कह कर वह एक तंग सड़क पर एक नदी की तरफ भाग गया। उसके पीछे पीछे रोते हुए उसके बच्चे भी भागे।

कुछ दूर जाने पर ईकटोमी ज़ोर से फुसफुसाया — “देखो वह वह रहा। वह देखो वह हिरन का मांस भून रहा है। वहीं उसका घर[3] है। और यह आग उसके सामने वाले आंगन में जल रही है। ”

बच्चे ईकटोमियों ने अपनी अपनी गरदनें आगे को निकालीं और चिड़ियों के नये पैदा हुए बच्चों की तरह से अपनी गोल गोल काली काली आंखें घुमायीं और वे पानी में घुस गये।

“अब तुम देखना मैं पटकासा की आग ठंडी कर दूंगा। और हिरन का मांस ला कर तुमको दूंगा। बस तुम देखते रहना। जब तुम काले कोयले पानी के ऊपर तैरते देखो तो ज़ोर से ताली पीटना और चिल्लाना। बस उसी के बाद मैं तुम्हारे लिये उसका रसीला मांस ले कर वापस आ जाऊंगा। ”

ऐसा कह कर ईकटोमी उस नदी में कूद गया और नदी का पानी छपाछप पानी ऊपर उछल गया।

जैसे ही वह पानी शान्त हुआ उसकी सतह पर बहुत सारे काले काले धब्बे दिखायी दिये। वे सब उस नदी में नाच रहे थे। किनारे पर खड़े बच्चे ईकटोमी हँसे और बोले “लगता है कि आग बुझ गयी। ”

अपने छोटे छोटे हाथों से ताली बजाते हुए वे नदी के किनारे किनारे भागे। वे खुशी में भर कर चिल्ला रहे थे।

पानी में से एक आवाज आयी “आह”। यह पटकासा कछुए की आवाज थी। वह नदी में उगे हुए एक ऊँचे से विलो के पेड़ पर उसकी एक शाख पर पानी की तरफ देखता बैठा हुआ था। उसी शाख पर आग जल रही थी जिस पर पटकासा हिरन का मांस भून रहा था।

अब तक पानी फिर से शान्त हो गया था। उसकी सतह पर अब कोई काला धब्बा नहीं नाच रहा था क्योंकि वे तो ईकटोमी के पैरों की उँगलियाँ थी। ईकटोमी तो अब तक पानी में कब का डूब चुका था।

ईकटोमी के बच्चे अपने पिता को पानी में डूबा देख कर वहाँ से तुरन्त ही भाग गये।


[1] Iktomi and the Turtle (Story No 9) – a folktale from Native Americans of North America.

Adapted from the Web Site : http://www.worldoftales.com/Native_American_folktales/Native_American_Folktale_45.html

Here is given the book “Old Indian Legends”, by Zitkala-Sa. Boston, Jinn and Company. 1901

[2] Patkasa is the name of the turtle

[3] Translated for the word “Tepee” – see its picture above. Tepee is the conical hut built for living by Native Indians.


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,इथियोपिया व इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

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