वो छड़ी (संस्मरण ) // सुशील शर्मा

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कक्षा सातवीं के कक्षा शिक्षक श्रीमान रामेश्वर दयाल त्रिवेदी करीब साढे छह फ़ीट ऊँचे पहाड़ जैसा शरीर रौबदार चेहरा गुस्सा में भरा था। अंग्रेजी का कालखंड था पूरी कक्षा के छात्र खड़े थे। मैं कक्षा का कप्तान था सबसे आगे खड़ा सोच रहा था अब क्या होगा मुझे सर की गुस्सा का अंदाजा था।

"हाँ तो कल के लेसन को कितने छात्र याद करके आये हैं " 'रेज योर हैंड "उनकी गरजती आवाज़ गूंजी।

"याद रहे वही हाथ उठायें जो याद करके आए हों "उनकी धमकी भरी आवाज़ से हम सब अंदर से हिल गए।

करीब आधी कक्षा ने अपने हाथ ऊपर उठाये गुरूजी के चेहरे पर मुस्कान तैर गई बोले "जिन्होंने हाथ उठाये हैं वो बैठ जाएँ "हम सब के जान में जान आई हम सभी मुस्कुरा कर बैठ गए।

"जो खड़े हैं वो सभी पीछे जाकर नील डाउन हो जाएँ " सभी जो खड़े थे बड़े दुःख के साथ पीछे जाकर अपने घुटनों पर खड़े हो गए।

हम लोग हँसते हुए उनकी दशा का मज़ा लेने लगे वो लोग हमें बड़े गुस्से में देख रहे थे।

तभी त्रिवेदी जी की आवाज़ गूंजी "सुशील बेशरम की छड़ी लेकर आओ "

मैं मुस्कुराते हुए जो घुटने लगाए हुए थे उनकी पिटाई की कल्पना करते हुए बेशरम की अच्छी मोटी छड़ी लेकर कक्षा में दाखिल हुआ और पीछे घुटने लगाए सहपाठियों की ओर मुस्करा कर देखा।

"अब वो खड़े हो जाओ जो पाठ याद करके आये हैं " उनकी इस गरजती आवाज़ ने हम सबकी रूहें काँप गईं।

जिन्होंने हाथ उठाये थे वो सब खड़े हो गए।

'हाँ तो सब लोगों ने स्पेलिंग याद की होंगी " उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि से हम सबको देखा।

सब ने सहमति में सर हिलाया।

उस पाठ में एक शब्द साइकोलॉजी था उन्होंने सब से वही शब्द की स्पेलिंग पूछी।

वह स्पेलिंग किसी से नहीं बनी।

अब मेरी बारी थी उस शब्द की स्पेलिंग मुझ से भी नहीं बनी।

उनका तनावयुक्त चेहरा देखकर हम सब की सांसें फूल रहीं थी।

अच्छा सुशील को छोड़ कर बाकी सब बैठ जाओ।

अब मुझे तो काटो तो खून नहीं। सभी सहपाठी चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गए

उसके बाद वो बेशरम की छड़ी बिजली की तेजी से मुझ पर टूट पड़ी करीब साठ से सत्तर छड़ी मेरे उस नन्हे शरीर पर पड़ी दर्द से मैं बिलबिला रहा था किन्तु वो छड़ी रुकने का नाम नहीं ले रही थी आखिर जब छड़ी रुकी तो मेरा पूरा शरीर फूल चुका था।

हर पहुँचने पर जब पिताजी ने मुझे देखा जब उन्होंने कारण जानना चाहा तो मैंने पूरी कहानी उनको बताई कि एक स्पेलिंग सर ने पूछी थी वो किसी से नहीं बनी लेकिन सर ने सिर्फ मुझे मारा।

पिताजी ने उल्टा मुझे ही डांटा बोले नहीं पढोगे तो मार तो पड़ेगी।

अगले दिन मैं सूजा फूला कक्षा में जा रहा था सभी सहपाठी मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे और बेशरम की मोटी छड़ी कह कर चिढ़ा रहे थे।

त्रिवेदी सर कक्षा में आये उन्होंने मुझे देखा लेकिन मैं उदास सा चुपचाप नीची नजर करके बैठा था।

उन्होंने मेरे सर पर हाथ रख कर कहा "तुम्हें मालूम है तुम क्यों पिटे "

मेरी आँखों से अविरल धारा बह रही थी मैंने नहीं में सिर हिलाया और कातर निगाहों से प्रश्न किया कि आखिर पूरी कक्षा से प्रश्न नहीं बना लेकिन सजा सिर्फ मुझे ही क्यों।?

"क्योंकि मुझे पूरी अपेक्षा थी कि यह स्पेलिंग कक्षा में सिर्फ तुझ से बनेगी " उन्होंने प्यार से पुचकारते हुए कहा।

"हर शिक्षक का एक प्रिय शिष्य होता है जिस पर उसको पूरा भरोसा रहता है कि वह उसकी परम्परा को आगे बढ़ाएगा तुम मेरे वही शिष्य हो तुम्हारे अंदर में भविष्य का सुनहरा सपना देख रहा हूँ " उन्होंने पुचकारते हुए मेरे आंसू पोंछे।

"जब शिष्य से अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो गुरु को साम दंड भेद से उसे समझाना पड़ता है तुमसे वह स्पेलिंग नहीं बनी तो मेरा विश्वास गुस्से के रूप में फूट कर तुम्हारी पिटाई का कारण बना "

मुझे उस समय उनकी सारी बातें उस समय समझ में नहीं आईं लेकिन जब समझदार हुआ और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद मुझे उनकी उस पिटाई स्वरुप आशीर्वाद का अहसास हुआ। मैं आज जो भी हूँ वो उस बेशरम की छड़ी की बदौलत ही हूँ।

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