सुनीता उपाध्याय"असीम" की काव्य रचनाएँ

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(1)
है नहीं तब सजा जिन्दगी।
जब हुई आशना जिन्दगी।
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सब खुशी मिल गई तब उसे।
हो गई जब फिदा जिन्दगी।
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रुठकर यूँ चले हो ....कहाँ।
अब नहीं है अना जिन्दगी।
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भूल से पाप जो हो.. गया।
फिर हुई है खता जिन्दगी।
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पालकर झूठ को क्या मिले।
सच का' ही दे पता जिन्दगी।
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दर्द ही फैलता...... जा रहा।
क्यूँ रही है सता ...जिन्दगी।
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मौत से सामना जब हुआ।
हो गई लापता ...जिन्दगी।
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(2)

2122   1122   1122   22

बेरूखी छोड़ मेरी जान ... अदावत कैसी।
सिर्फ तू ही है मेरे दिल में शिकायत कैसी।
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जब गिला मुझसे रहा तुझको नहीं कोई भी।
जान भी ले ली मेरी फिर ये खिलाफत कैसी।
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प्रिय मेरे तो रहे तुम ही........ जमाने में हो।
फिर जलाने की मुझे आज ये फितरत कैसी।
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छोड़कर देख मुझे जाना नहीं .....धोखे  से।
साथ रहने में मेरे तुझको है आफत कैसी।
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अब तो बेकाबू हुई जाती मेरी धड़कन हैं।
पास आके  ये जरा पूछ ले तबियत कैसी।
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(3)
: नाम मुझको देखलो वो तो दिवानी दे गया।
याद अपनी यूँ मुझे कुछ तो सुहानी दे गया।
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वो सरे बाजार मुझको जो मिला था शाम को।
सहर में था लाजमी अपनी ...निशानी दे गया।
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देखकर उसको मुझे अहसास जागा प्यार का।
हिज्र पर बरबाद करके ये .....जवानी दे गया।
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वस्ल का उससे मिला कैसा सिला है देखिए।
अनकही सी बस मुझे आधी कहानी दे गया।
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हीर कैसे मै बनूँ राँझा नहीं था .......वो बना।
वो कथा कहके नई मुझको ..पुरानी दे गया।
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(4)

दिल्लगी किससे कहूँ मैं।
बिन कहे कैसे.... रहूँ मैं।
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जो तड़प उठती जिया में।
चुप रहूँ उसको... सहूँ मैं।
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बोझ होती ...जिन्दगी है।
पी गरल अब तो जिऊँ मैं।
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शुष्क दरिया सी  बनी हूँ।
भाव में तो पर ....बहूँ मैं।
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कोइ कहता मनचली सी।
पर सरल सीधी सी'हूँ मैं।
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(5)
दम अपनों का कुछ भरते तुम।
नफरत पर तो मत चलते तुम।
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मिलती इज्जत औ आजादी।
मान बड़ों का जो रखते तुम।
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बातें बोलोकुछ तो .....मीठी।
क्यूँ कड़वे रस से घुलते तुम।
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काम करो जो जी में आए।
खार गुलों से हो चुनते तुम।
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सुख सारे अपने.. ही भीतर।
रस्ता बाहर पर ..तकते तुम।
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उजला तन पर काला मन है।
इस दुनिया पर हो. मरते तुम।
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शानो शौकत सब ....मिलते हैं।
जब भगवन को हो भजते तुम।
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प्यार बढ़ाओ सबसे... दिल का।
फिर सबको बस हो जचते तुम।
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(6)
खुदा के नाम से जीवन की' नैया पार होती है।
नहीं हो साथ वो तो ये' बिखरती धार होती है।
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रहेगा अन्त तक वो साथ रहता है नहीं कोई।
करो सुमिरन उसीका जिन्दगी दिन चार होती है।
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वही है बागबाँ गुलशन का' अपना बाग भी वो ही।
बिना उसके खुशी मिलती वो' मानो खार होती है।
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बुरा मत काम तुम करना सदा ही सत्य पर चलना।
सुनो आवाज बिन उसकी दुधारी मार होती है।
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कहे बिन बात सुनता है नहीं कहता किसी से कुछ।
बुराई फिर तुम्हीं पर तो तुम्हारी भार होती है।
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(7)
122  122  122  12

चली जो पिया के मैं आगोश में।
हुई तेज धड़कन मेरी रात भर।
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कभी हिज्र की रात में जागते।
शमा साथ मेरे जली रात भर।
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मिले बाद मुददत के मेरे सनम।
नहीं नज़र उनसे हटी रातभर।
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इशारों इशारों में नजरें मिलीं।
न फिर आँख अपनी लगी रातभर।
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घिरे काले बदरा गगन में कभी।
तो बिजली चमकती रही रातभर।
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(8)
  दूर जाकर हमें वो ......जलाने लगे।
अश्कों' से हम आग वो बुझाने लगे।
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प्यार देखा हमारा जहाँ हस दिया।
हम शरम से निगाहें ...चुराने लगे।
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हम दिवाने हुए आशिकी में सनम।
लोग पत्थर हमी पे.... लगाने लगे।
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फासले दूर करने लगे ..हम कभी।
रास्ता वो हमे तो .....दिखाने लगे।
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शग़ल उनका रहा रूठना ही सदा।
क्यूँ उन्हें हर दफा हम मनाने लगे।
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दिल धड़कता ही नहीं था जिन्हें देखकर।
रूह मे आज वो ही.... समाने लगे।
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जो हमारी हसी पर फिदा थे कभी।
देखिए वो ही हमको रूलाने लगे।
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(9)
बात दिल की कुछ हमें भी तो बता दो।
दर्द अपने सब हमे भी अब सुना दो।
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ले चलो अब चाँद के उस पार हमको।
आसमाँ की सैर भी हमको करा दो।
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जल उठे दुनिया हमें ऐसी खुशी दो।
दिल की'अपने आज तो मलिका बना दो।
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अब बहाना मत करो तुम रूठने का।
लो सभी शिकवे हमें अपने सुना दो।
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हिज्र देके दूर तो जाना ....नहीं यूँ।
हो सके तो वस्ल का मौका दिला दो।
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जो कभी चाहा नहीं हमको मिला वो।
अब हमारे भाग्य में खुद को लिखा दो।
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नींद गायब हो गई है इश्क में... अब।
राह पलकों की सितारों को दिखा दो।
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(10)
:गर्द यादों पे बस जमीं होगी।
खब्र किसको मेरी रही होगी।
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काम सबके हुआ करेंगे सब।
किसकी आँखों में फिर नमी होगी।
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होगा माहौल अफरा तफरी का।
कब जहाँ की जुबाँ थमी होगी।
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फिर उदासी मेरी गली में औ।
सुबकती कली कली ..होगी।
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कैसा दस्तूर है जहाँ का ....ये।
मौत किसकी कहाँ गमी होगी।
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उनका दिल भी दुखा कहीं होगा।
जिनके भीतर जगह मेरी होगी।
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आसमाँ तब बनेगा छत .. मेरी।
पर नहीं मेरी ये .....जमी होगी।
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फूटकर बेटा रोया होगा तब।
जब चिता सामने जली होगी।
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सुनीता उपाध्याय"असीम"

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