समीक्षा // प्रबोध कुमार गोविल और उन का उपन्यास ‘अकाब’

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प्रबोध कुमार गोविल और उन का उपन्यास ‘अकाब’

प्रबोध कुमार गोविल के उपन्यास अकाब को यहाँ पढ़ सकते हैं [ई-बुक लिंक]

पहली और शायद अंतिम सृष्टि तो एक यही है जिस से हमारा जीवन है। लेखक इस तरह की सृष्टि की रचना कर नहीं सकता, लेकिन जो सृष्टि रच गई है उस में लेखक अपना हस्तक्षेप कर सकता है। हस्तक्षेप के अनेक मायने हो सकते हैं। एक हस्तक्षेप ऐसा भी होता है ईश्वर ने मिथ्या रचना की है। ऐसे रचनाकार अपने मन के दायरे से होते हैं और इन के जाने के बाद इन की रचना एक तरह से इन्हीं के साथ चली जाती है। परंतु लेखक ऐसे तो निश्चित ही होते हैं जो अपनी रचना की छाप छोड़ते हैं। मैं श्री प्रबोध कुमार गोविल जी को इतनी बड़ी हस्ती बना कर प्रस्तुत करना तो न चाहूँगा। वास्तव में उन की श्रेष्ठ कृति तो अभी आने वाली है जिस की हमें प्रतीक्षा रहेगी। अभी प्रबोध जी की जो रचना आ गई है शायद वे स्वयं ढूँढ रहे होंगे कहाँ कुछ खामियाँ रह गई हों। परंतु उन्होंने मन और प्रतिभा से जो रच दिया इस का उन्हें विश्वास तो अवश्य रहेगा उन्होंने रचना - कर्म के साथ सही न्याय किया है। मैं उन के न्याय पक्ष के साथ अपना स्वर मिलाने की प्रक्रिया में अनुभव कर रहा हूँ स्वयं के साथ न्याय कर रहा हूँ।

‘अकाब’ उपन्यास पन्नों की दृष्टि से सुदीर्घ न हो कर मात्र एक सौ पचीस पन्नों में अपनी कहानी के साथ हम से साक्षात्कार करने पहुँचता है। पर इस की यात्रा बहुत ही सुदीर्घ है। हमें सोचना पड़ जाए यह हमें कहाँ - कहाँ ले कर जाने वाला है। मैं अपनी बात करता हूँ मैं लेखक के शब्दों को एक रेखा मान कर चलता गया और मेरे मन में विश्वास पुख्त होता गया भटकाव की आशंका के लिए कोई स्थान छूटा ही नहीं है। इसी बात पर इस कृति का ऊँचा स्थान होना जायज हो जाता है क्योंकि कहानी के अनुरूप नाप तौल से इस का कलेवर बुना गया है। लेखक की रचना - प्रक्रिया स्वयं रेखांकित कर देती है वे जितने देशों के नाम ले रहे हैं उन देशों की उन्हें पहचान है। ‘अकाब’ विश्व के विस्तार में से थोड़ा ही समेट कर अपने साथ लिये चला हो, फिर भी वर्तमान संसार का एक बहुत बड़ा परिचय हमारे सामने टाँकने में वह सक्षम है। बहुत संभव हो लेखक अमेरीका में हुऐ आतंकी हमले को केन्द्र में रख कर ‘अकाब’ के लिए संकल्पित हुए हों, लेकिन उपन्यास की आत्मा से साझा करना उन्हें आया है। यह इस कृति को विशेष बनाता है। मसरू ओसे जो तनिष्क के पिता के समान है उस की आँखों में एक दिन बरबस आँसू उतर आते हैं और वह स्वयं व्याख्या न कर पाता है ऐसा क्यों हो रहा है। अगले रोज़ ट्विन टॉवर्स में हवाई हमले होते हैं और मसरू का जीवन उस नर संहार की बलि चढ़ जाता है। इस एक आदमी के एक सांध्य पूर्व उस आँसू पर हम गौर करें। जितने लोग उस संहार की चपेट में आए एक दिन पहले वे रोए न हों तो अगले दिन के लिए अपनी सुनहरी हँसी का उन्हें विश्वास तो रहा ही होगा। प्रबोध जी ने पूरे ‘अकाब’ में यह मर्म बिछा दिया है नर संहार का वह हादसा एक स्कूल हो गया। आतंक जन जीवन का शत्रु हुआ तो इधर से भी उस के लिए शत्रुता ठानी गई। इस शत्रुता का मन मानवता का मन है इसलिए पूरे संसार में इस के प्रति पूज्य भाव रखा जा रहा है। जो देश मानवता के लिए अपने को समर्पित करने से कन्नी काट रहा है उस का हश्र ऐसा हो चला है मानो हम सब के सामने प्रत्यक्ष आग के भभके सुलग रहे हैं।

‘अकाब’ उपन्यास का मुख्य पात्र तनिष्क का जन्म एक गाँव से है और कालांतर में वह अपनी जन्मभूमि की सीमा लांघ कर अमेरीका पहुँचता है। यह उस की वास्तविक कर्म भूमि है। उसे पता तो न होगा उसे किस तरह से अपनी जीवन यात्रा में आगे बढ़ना पड़ रहा है, लेकिन उपन्यासकार को पता है उसे कहाँ - कहाँ पहुँचा रहा है। उपन्यासकार का प्रतिमान यही तो होता है वह बेहद सूक्ष्मता से अपने पात्र के हाथ में चला जाए और लगे कि जो लीला चल रही है उस में उपन्यासकार की उपस्थिति नदारद है, जो है वह पात्र ही है। प्रबोध जी ने तनिष्क को पिता तुल्य मसरू ओसे मिलाया तो इस उद्देश्य से कि प्रेम, स्नेह, दुलार, मानवता सर्वत्र व्याप्त हैं, आगे बढ़ें और अंजुरी में थाम लें। आसानिका माँ है,लेकिन पति न होने से असुरक्षा के भय से उस के पाँव डगमगाते हैं और वह पुरुष से अपनी सुरक्षा का तारतम्य मानती है। नर और नारी की ईश्वीय संरचना का यही विधान है तुम से मैं हूँ और मुझ से तुम हो। सेलिना नंदा एक शिखर गायिका है, लेकिन आवश्यकता से कहीं अधिक विश्वजनीन बनने के सपने में पड़ कर बहुत हद तक वह स्वयं अपने ही रास्ते के लिए अवरोध बन जाती है। जॉन अल्तमश व्यापार का बंदा है और वह इसी में अपने को खपाता चल रहा है। यह विश्वीय चरित्र है जहाँ दूसरों को लूटना पहले स्थान पर होता है। सेलिना के साथ अल्तमश की प्रवृत्ति इसी बात को चिन्हित करती है।

‘अकाब’ उपन्यास परिवार पर आ कर केन्द्रित होता है। इस की अनुगूँज शुरु से बनी होती है। तनिष्क अपनी माँ के साथ जीवन व्यतीत नहीं कर सकता, क्योंकि वह पुरुष की प्रकृति से संचालित होता है। देश से विदेश गमन के बीच उस में चिर पिपासा बनी रहती है अपना परिवार तो हो। तनिष्क न खास पढ़ा लिखा है और न उसे कोई खास हुनर आता है। बस मसाज़ से उस की रोटी है और इसी की बुनियाद पर उस का जीवन टिका हुआ है। पर मनुष्य के रूप में निश्चित ही वह बड़ा बन कर उभरता है। गैर कानूनी धंधों में उस के पगों की रेशा भर खनक नहीं। जितना उस के पास है वही उस का अपना है। कश्मीर के प्रति मन में आकर्षण बन आने से वह अपने जीवन की डोर यहाँ बांध लेता है। यहाँ से उसे कहीं जाना नहीं है। लेखक ने इस के लिए व्ववस्था बड़े ही प्रेमल तरीके से कर दी है। लेखक को पता हो क्यों कश्मीर से तनिष्क को जोड़ दिया है। मेरे मन में आता है कश्मीर को कभी ‘भूतल का स्वर्ग’ कहा जाता था। आज कश्मीर का रोयाँ रोयाँ बहुत दुखी है। पर तनिष्क को तो देखिये वह दूसरे देश से आ कर कश्मीर के दुखते रोएँ में अपना आशियाँ बनाता है और हर कोण से अपने को निर्बाधित पाता है। यह उस का हक बन जाता है और कश्मीर अपने दुखते रोएँ से भी उसे सुख का अभयदान देता है। पाँवों में शालीनता हो तो मिट्टी पहचान लेती है

प्रबोध जी ने ‘अकाब’ शब्द बहुत बचा कर रखा है और अंतिम पन्नों में ही उन्होंने इस नाम का रहस्य खोला है। अनन्या शिक्षिका होने से अमेरीका में एक पुस्तक खरीदती है जिस का शीर्षक ‘अकाब’ है। अब अमेरीका ही क्यों और वहाँ से ‘अकाब’ ही क्यों? मेरे लिए अभी यह समयोचित प्रसंग नहीं है इसलिए मैं उस में न जा कर उपन्यासकार प्रबोध की शब्दावली में लौट रहा हूँ। अनन्या माँ बनने वाली है और उपन्यासकार इस परिवार को वहाँ कश्मीर के दुखते रोएँ में ले जा रहे हैं जहाँ इन के बच्चे का जन्म होना निश्चित है। संभवत: प्रबोध जी का कश्मीर के प्रति यह एक सुखद आवाहन है।

बाकी, प्रबोध जी की भाषा पर मैं क्या कहूँ। मेरी दृष्टि में भाषा के वे अनन्य पुरोधा हैं। नतमस्तक हूँ।

रामदेव धुरंधर

मॉरिशस

25 / 05 / 2018

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