डॉ. शैल चन्द्रा की 11 लघुकथाएँ

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जिंदा सबूत

सेवानिवृत हो चुके चन्द्राकर जी पेंशन लेने बैंक में लंबी लाइन में खड़े हुए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। उनके जैसे उम्र दराज़ जर जर काया से थके- हारे वृद्ध विवशता में खड़े हुए थे।

उन सबको देखकर चन्द्राकर जी को लगा , अभी तो उन्हें रिटायर्ड हुए साल भर ही हुए हैं। अभी तो हर महीने यह सब उन्हें झेलना पड़ेगा। पेंशन लेने के लिए लाइन में लगना उन्हें अभी से टेढ़ी- खीर लगने लगी थी। तभी उनकी बारी आ गई । बैंक के क्लर्क ने उनका पास बुक देखते हुए कहा, "जीवित प्रमाण पत्र दिखाइए।"

वे भौंचक से देखते रहे और कहा,  "भई, मैं तो जिन्दा हूँ तभी तो पेंशन लेने आया हूँ। देखो बैंक के खाते में मेरी फोटो भी लगी हुई है। मिलान कर लीजिए।"

बैंक के क्लर्क ने बेरुखी से कहा, " बाबा जी, यह सरकारी नियम है। हर वर्ष आपको अपने जीवित होने का प्रमाण -पत्र प्रस्तुत करना होगा।"

वे थके -हारे से लाइन से हट गए। यह देख पीछे खड़े वृद्ध का चेहरा खिल गया। पीछे खड़े वृद्ध ने लाठी टेकते हुए मुस्कुराते हुए कहा,"भइया जी, जब तक जीते रहोगे। हर वर्ष अपने जीवित होने का प्रमाण-पत्र बनवाते रहना और प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए अपने पेंशन का कुछ हिस्सा अधिकारियों को भेंट करते रहना। इस बैंक में आपका सशरीर आना ही काफी नहीं है? समझे न?"

यह सुनकर चन्द्राकर जी का झुर्रियों से भरा चेहरा मलिन हो गया। वे थके क़दमों से घर लौट आये।

  ' संवेदन शीलता'

       "  बड़े बाबू का एक्सीडेंट हो गया है। वे आई. सी.यू. में हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उनका बचना मुश्किल है।"

सरकारी दफ्तर के बड़े अफसर को वहाँ का एक कर्मचारी बता रहा था।

बड़े अफसर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा,"यह तो बहुत ही बुरा हुआ।"यह कहते हुए वे किसी चिंता में डूब गए।

दोपहर में शर्मा बाबू एक फाइल में उनका हस्ताक्षर लेने पहुँचे ,तब भी बड़े अफसर ने बड़े बाबू के स्वास्थ्य के बारे में पूछा । शर्मा बाबू बड़े अफसर के कक्ष से निकले तो चपरासी से कह रहे थे -"हमारे बॉस कितने दयालु हैं। अपने ऑफिस के कर्मचारियों का कितना ध्यान रखते हैं। आज दिन भर वे बड़े बाबू के बारे में पूछते रहे हैं।"

चपरासी ने तम्बाकू फांकते हुए कहा,"खाक दयालू हैं? शर्मा जी ,आप इस ऑफिस में नए हो न?अरे हमारे बॉस बार-बार बड़े बाबू को इसलिए पूछ रहे हैं कि उनके मरने के बाद उनके परिवार में किसी न किसी को अनुकम्पा नियुक्ति तो मिलेगी ही और हमारे बॉस का अनुकम्पा नियुक्ति के लिए कमीशन बंधा हुआ है।

विकास -1

उस गांव में सड़क चौड़ीकरण का कार्य तेजी से चल रहा था। फोर लेन सड़क के लिए नाप-जोख किया जा रहा था। नाप-जोख के मानक पर घर-दुकान या पेड़ जो भी आता उसे सरकारी कर्मचारी जेसीबी मशीन से तोड़ने में जुट जाते।

सड़क किनारे रहने वाले लोगों को सरकारी नोटिस दिया जा चुका था कि वे कहीं और अपना आशियाना ढूंढ लें। सारे लोग हैरान - परेशान और बेहद दुःखी थे। उनके सपनों का घर उनकी आँखों के सामने ही तोडा जा रहा था। कई लोग दिसम्बर की कड़कड़ाती ठंड में घर से बेघर होकर सड़क किनारे ही अपना गुजर -बसर करने के लिए मजबूर थे।

ऐसे में वृद्धा पार्वती अपना घर छोड़ने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। सरकारी कर्मचारी उसे समझा-समझा कर थक चुके थे।

एक कर्मचारी कह रहा था-"माता जी, आप के चाहने न चाहने से कुछ नहीं हो सकता। सरकारी फरमान है। घर तो तोड़ना ही पड़ेगा। फिर आपको सरकारी मुआवजा आपके घर के मूल्य से दुगना मिल रहा है। इससे कहीं और दूसरा घर लेकर आप सुखपूर्वक रह सकतीं हैं।"

उस सरकारी कर्मचारी की बात सुनकर रोती हुई पार्वती ने कहा,"जानते हो बेटा, इस घर में दुल्हन बनकर मैंने अपने पति के साथ कितने दुःख-सुख के पल व्यतीत किये हैं। अपने प्यारे बच्चों का बचपन देखा है । ये मेरा बगीचा देख रहे हो न?ये आम, अमरुद, केला, कटहल और जामुन के पेड़ ये मेरे एकाकी जीवन के सुख-दुःख के साथी हैं और मेरे जीवकोपार्जन के साधन भी हैं। इस घर में मेरे पति ने अंतिम साँसे ली थीं। समझ लो यह घर नहीं मेरा हृदय है जिसे तुम लोग तोड़ना चाहते हो। यह घर मेरे अतीत का स्मारक है। मेरे जीवन के अमूल्य क्षणों का धरोहर है। क्या तुम्हारी सरकार इस घर से जुड़े उन सभी एहसासों का भी मुआवजा दे सकती है क्या ?"

यह कहती हुई वह वृद्धा और भी सिसक-सिसक कर रोने लगी।

काम वाली बाई

मिसेज शर्मा का आज सुबह से ही पारा सातवें आसमान पर था कारण कि आज उनके घर काम वाली बाई नहीं आई थी। वे बड़बड़ाये जा रहीं थीं,-"देखो इन आलसी निकम्मी काम वाली बाईयों को। कितना भी उनको दो, पर महीने में सात दिन नागा कर ही देती हैं। अब कल ही तो उसको कटोरा भर कर पनीर की सब्जी दिया था और बाई जी आज नदारद।"

उनका बड़बड़ाना सुनकर उनके पतिदेव ने चौंक कर कहा,"अरे, रमा तुमने तो पनीर की सब्जी चार- पांच दिन पहले बनाई थी। क्या वही सब्जी कल तुमने काम वाली को दी थी"

      "हाँ, तो क्या ताजा-ताजा बनाकर देती। वो तो मेहमान आने वाले थे पर किसी कारणवश नहीं आ पाए तो सारी सब्जी बच गई । अब बचा-खुचा ही तो काम वालियों को सब लोग देते हैं।"

पत्नी का पारा देखकर पतिदेव ने चुप्पी लगा ली।

जब दूसरे दिन भी कामवाली नहीं आई तो मिसेज शर्मा ने अपने ड्राइवर को उसके घर भेजा तो पता चला वह अस्पताल में भर्ती है।

ड्राइवर कह रहा था, "मालकिन , कामवाली बाई की हालत बहुत गंभीर है। डॉक्टर कह रहे थे कि उसको फ़ूड पायजनिंग हो गई है।"

यह सुनकर मिसेज शर्मा अपने पति से अब आँखें चुरा रही थी।

चुनावी सभा

नेता जी की चुनावी सभा का आयोजन होने वाला था। पार्टी के नेता सभा में भीड़ बढ़ाने हेतु पसीना बहा रहे थे पर देश की जनता अब थोड़ी समझदार हो गई है।वे नेताओं के लच्छेदार भाषण और झूठे वादों से अब सतर्क हो गई है। पार्टी के कार्य कर्ता घर -घर जाकर जनता को सभा में आने का न्योता दे चुके थे। गली -गली में लाउडस्पीकर पर प्रचार-प्रसार कर चुके थे पर लाख कोशिशों के बावजूद पार्टी के कार्य कर्ता भीड़ नहीं जुटा पा रहे थे।

उन्होंने नेता जी को फोन लगाया और सभा में भीड़ नहीं जुटने की बात बताई। नेता जी यह सुनकर आग बबूला हो गए। नेता जी ने कहा,"मुफ्तखोरों, तुम लोगों को इतना पैसा दे चुका हूँ फिर भी एक भीड़ नहीं जुटा पा रहे हो? जानते हो न, जितनी बड़ी भीड़ होती है उतना ही कार्यक्रम सफल समझा जाता है। पार्टी का रुतबा बढ़ जाता है। जाओ, भीड़ खरीद कर बढ़ाओ।"

अब पार्टी के कार्यकर्ता भीड़ की खरीद-फ़रोख्त में जुट गए।

साम्प्रदायिकता

" यार, ऐ राम मंदिर और बाबरी मस्जिद वाला विवाद कब तक चलेगा ?  मेरा जन्म उसी समय हुआ था। मेरी माँ बता रही थी भोपाल में साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई थी। लूटमार , कत्लेआम आगजनी तो आम थे। ऐसी स्थिति में अस्पताल जाना जोखिम भरा था। तुझे आश्चर्य होगा ।हमारे मोहल्ले में रहने वाली फातिमा आपा ने मेरी माँ की मदद की थी। वो भी मुस्लिम सम्प्रदाय से थीं पर इससे बढ़ कर वो एक इंसान भी थीं । उन्होंने इंसानियत का फर्ज निभाया था। लगता है लोग अब इंसान न रहकर धर्म के पुतले बन गए हैं। यार, मैं यही सब देखते - सुनते थक गया हूं ।"

वह अपने प्रिय मित्र आबिद शेख को अपना दर्द बता रहा था।

आबिद ने कहा ,"हाँ यार, अब इस साम्प्रदायिकता धर्म वाद का खात्मा करना होगा । आज हम हर क्षेत्र में हाईटेक हो चुके हैं पर हमारी मानसिकता सड़ी- गली पिछड़ी है। हम लोगों को ही साम्प्रदायिकता को दूर करना होगा।

पर कैसे? उसने पूछा ।

उसने सपाट स्वर से कहा, " एक दूसरे की बहन से विवाह करके।"

ये कैसी बेतुकी बात है? वह गुस्से से भर उठा।

     "यह सही है। "आबिद ने कहा।

      " मेरी बहन तुझ जैसे विधर्मी से कभी विवाह नहीं करेगी।" वह क्रोध से तमतमा उठा ।

वे आपस में झगड़ने लगे। देखते ही देखते वहां भीड़ इकठ्ठी हो गई । फिर क्या था , सारा मोहल्ला सारा शहर दो भागों में बंट गया ।

अब पूरे शहर में साम्प्रदायिकता की आग धधक रही थी।

भूखे का धर्म

जावेद के हाथों में खिचड़ी का दोना देखकर अम्मी का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा। नन्हा जावेद अपने प्रिय मित्र आशुतोष मिश्रा के साथ किसी मंदिर से खिचड़ी का प्रसाद हाथ में लिए प्रसन्नमुद्रा में आ रहा था। कई दिनों से उसके अब्बा बीमारी के कारण काम पर नहीं जा रहे थे। घर में भूखहाली छाई थी।

अम्मी ने जावेद के हाथों से खिचड़ी का दोना लगभग झपटते हुए कहा, "ले आया मंदिर का प्रसाद। तुझे कितनी बार समझाया है कि हम लोगों का धर्म अलग है। हमें दूसरों के धर्म का प्रसाद वगैरह नहीं खाना चाहिए।"

जावेद ने बड़ी ही धीमी आवाज़ में कहा, "अम्मी,बड़ी जोर की भूख लगी है। घर में तो कुछ खाने को भी नहीं है और तुम तो पैसे देती नहीं हो।"

तभी उनकी बात सुन रहे एक बुजुर्ग ने कहा, "बिटिया, बच्चे को खाने दो। वह कल से भूखा है। भूखे का कोई धर्म नहीं होता ।"

यह सुनते ही अम्मी के हाथ खिचड़ी के दोने पर ठिठक गये।

विकास - 2

ग्राम सुराज योजना के तहत उस गांव में पहली बार कोई मंत्री का आगमन हुआ था। मंत्री जी को अपने सामने पाकर गांव के लोग स्वयं को धन्य मान रहे थे।

मंत्री जी मंच पर देश की योजना और उसके क्रियान्वयन पर जोरदार भाषण दे रहे थे। गांव के लोग आश्चर्य से उन योजनाओं के बारे में सुन रहे थे जिनका लाभ उन्हें अब तक नहीं मिला था।

गांव का एक व्यक्ति कह रहा था," आज सत्तर बरस हो गए देश को आजाद हुए । गरीबों के लिए न जाने कितनी योजनाएं कागजों पर बनी पर कितनों को इन योजनाओं का लाभ मिला यह भगवान जाने।"

दूसरा कह रहा था, सरकार "इन योजनाओं का लालच हमें वोट बटोरने के लिए देती है। गांव में बिजली तो है पर कभी रहती नहीं। अस्पताल तो है पर डॉक्टर नहीं, स्कूल है पर शिक्षक नहीं । अब बताओ भैया हमारे देश का क्या होगा?"

मंत्री जी उन लोगों की बातें सुन कर भी अनसुनी करते हुए सरकारी विकास के आंकड़ों को और भी बढ़ा-चढ़ा कर बताने लगे। तभी एक बुजुर्ग ने व्यंग्यात्मक शैली में कहा, " अरे भाइयों, मंत्री जी कभी झूठ बोलेंगे क्या? नहीं न ,जरा गौर से देखो गांव का विकास हुआ है । सारे खेत अब इमारतों में बदल गए हैं। गांव के सारे पेड़ काट कर पक्की सड़क बना दिए गए हैं। कुएं तालाब पाट कर बोर कर दिया गया है। गाय-बैल बेच कर घर में टी.वी., खरीद लिया गया है। अब और कितना विकास होगा भई?

उस बुजुर्ग की बात सुनकर वहाँ सन्नाटा छा गया ।

शोर इन द सिटी

गंभीर बीमारी से थके हुए पिताजी अभी-अभी अस्पताल से घर लौटे थे। डॉक्टर ने उन्हें आराम करने को कहा था।

अभी वे बिस्तर पर लेटे ही थे कि पड़ोसी के घर से तेज संगीत का शोर गूँजने लगा। मालूम हुआ कि मिसेज भाटिया म्यूजिक में ही एक्सरसाइज करती हैं। कोई एकाध घण्टा ऐसा ही तेज शोर होता रहा। इस बीच पिताजी बेचैनी से करवट लेते रहे। म्यूजिक बंद हुआ तो पिताजी से कहीं ज्यादा मुझे प्रसन्नता हुई की चलो अब पिताजी दवाई खाकर थोड़ी देर आराम कर सकेंगे।

पिताजी झपकी लेते की बाहर बाइक के हार्न का तेज आवाज गूंजा। मैं दौड़ कर बाहर भागा। मैंने देखा कि एक युवक बाइक पर बैठकर हार्न पर हार्न बजाये जा रहा है। मैंने उस युवक से आग्रह किया - प्लीज, यहाँ पर हार्न न बजाएं। मेरे पिताजी गंभीर रूप से बीमार हैं। मेरे इस कथन का उस युवक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह तब तक हार्न बजाता रहा जब तक कि सामने की बिल्डिंग की ऊपरी मंजिल में रहने वाली युवती ने उसे बॉय बॉय कहकर हवाई चुंबन नहीं फेंका।

अब वह युवक वहाँ से चला गया था। मैं पुनः प्रसन्न हो उठा कि चलो अब शांति रहेगी । अब आराम से मेरे पिताजी सो पाएंगे पर ये क्या? कहीं लाउडस्पीकर पर भजन-कीर्तन का तेज स्वर लहरा उठा। शायद मोहल्ले के किसी मंदिर में अखण्ड रामायण के पाठ का आयोजन था।

मैंने देखा कि मेरे पिताजी बेचैनी से उठकर बैठ गए थे।

अमीर का नमक

टी.व्ही. पर एक नामचीन ब्रांड के नमक का विज्ञापन आ रहा था। कोई एक्टर कह रहा था, "आयोडीन, विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर यही है असली नमक की पहचान। --यही नमक खाइये। एक किलो नमक का मूल्य मात्र सौ रुपए ।"

यह विज्ञापन देख रहे दादा जी उस ब्रांडेड नमक का मूल्य सुनकर चौंक पड़े।

उन्होंने पास बैठे मुन्नू से कहा, " क्या जमाना आ गया है बेटा, अब सौ रुपये किलो में नमक बिक रहा है। इस देश का क्या होगा? हमारे ज़माने में हम लोग कोई भी नमक खा लेते थे। तब एक पैसे में पांच किलो नमक मिल जाता था । हम नमक खड़ा लेकर घर में पीसते थे। तब किसी को कोई भी बीमारी नहीं होती थी। नमक के लिए महात्मा गांधी जी ने दांडी यात्रा की थी । तब हमारे नमक पर अंग्रेज बेतहाशा टैक्स लगाते थे पर आज तो एक किलो नमक पर इतना ज्यादा टैक्स? मुझे लगता है कि स्थिति ऐसी रही तो गरीबों को अब नमक का स्वाद मजबूरन भूलना पड़ेगा। "

यह कहते हुए दादा जी आक्रोशित हो गए।

यह सुनकर चुन्नू ने कहा, "दादा जी , यह नमक का जो आपने विज्ञापन देखा है न?  ये ब्रांडेड है। आज के ज़माने में ब्रांडेड का बड़ा क्रेज है और रईस लोग ही ब्रांडेड यूज़ करते हैं। यह नमक गरीबों के लिए थोड़े ही है।"

चुन्नू की बात सुनकर दादा जी सकते में आ गए। वे अब अमीर और गरीब नमक के मोल का अंदाजा लगाते रहे।

माँ का कमरा

राजेश जी के नए मकान का उदघाटन था। उन्होंने पॉश कालोनी में जमीन खरीदकर शानदार बंगला बनवाया था। उनके बंगले में चारों तरफ महंगे मार्बल्स और ग्रेनाइट लगे हुए थे जो संगमरमरी अहसास दिला रहे थे।

वे बड़े उत्साहित होकर अपने मकान के एक-एक कमरे को दिखा रहे थे-,"देखिये इन सब कमरों की लाइटिंग भी मार्डन है। बाथरूम में फौव्हारे सभी ऐसेसिरिज इण्डिया के बाहर के हैं।"

वाकई उनके बंगले की सजावट मन को मुग्ध करने वाली थी। मैंने कहा, वाह बहुत खूब है आपका बंगला।

तभी मैंने देखा कि उनके बंगले से सटा हुआ दो कमरों का एक घर अलग सा दिखाई दे रहा था। वहाँ से एक वृद्धा लाठी टेकती हुई हमारे पास आई और कहने लगी-" राजेश बेटा, खांसी की दवाई कल रात से खत्म हो गई है। जरा मंगवा देना।"

मैंने प्रश्नसूचक नज़रों से राजेश जी की ओर देखा तो उन्होंने चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कान ओढ़ते हुए कहा, इनसे मिलो ,ये मेरी माता जी हैं। "

मैंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया

मैंने राजेश जी से सीधे पूछ लिया। राजेश जी, क्या आपकी माता जी आपके इस शानदार बंगले में आप लोगों के साथ नहीं रहतीं?

उत्तर में उन्होंने कहा, "हाँ जी, मज़बूरी है। क्या है, पहले माता जी गांव में रहती थीं। मैंने गांव का खेत मकान और वहां का सारा ज़ायदाद बेचकर यह बंगला बनवा लिया है। अब तो गांव से माता जी यहाँ आ गईं हैं। मेरी पत्नी को डर है कि माता जी अगर ऐसे मार्बल वाले कमरे में रहेंगी तो बुढ़ापे के कारण कहीं फिसल कर गिर न जाये फिर बेवजह हमें परेशानी झेलनी पड़ेगी। बस इसीलिए उन्हें हमने सर्वेन्ट क्वार्टर में रखा हुआ है।"

मैंने कहा-राजेश जी, क्या आप जब बूढ़े हो जायेंगे तो इस मार्बल्स वाले बंगले में नहीं रहेंगे?

उन्होंने पूछा,"क्यों?"

कहीं आप भी फिसल कर गिर न जाएं। इसलिए।

यह सुनकर उनका चेहरा बुझ सा गया।


डॉ. शैल चन्द्रा

रावण भाठा, नगरी

जिला- धमतरी

छत्तीसगढ़


सम्प्रति

प्राचार्य

हाई स्कूल, टांगा पानी

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