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मरण समारोह

विज्ञान-कथा

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विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

मृ तक के विभिन्न संस्कार करने की प्रथा विश्व के सभी भागों में पाई जाती है, मगर किसी जीवित व्यक्ति द्वारा समारोह पूर्वक निश्चित समय पर प्राण त्यागने की घटना अत्यंत विस्मय कारक थी। मैंने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि विज्ञान मृत्यु को इस तरह नियंत्रित कर लेगा।

मैं अपने एक मित्र के निमंत्रण पर शनि के एक उपग्रह पर बसे एक अन्य विश्व की यात्रा पर गया था। ठीक एक लाख की जनसंख्या वाले उस विश्व के लोग मूलरूप से तो पृथ्वीवासी ही हैं मगर कई सदियों पूर्व उन्होंने पृथ्वीवासियों की अधीनता को अस्वीकार कर अपने आपको एक नया विश्व घोषित कर दिया था। भारत से उनके सम्बन्ध मित्रवत थे तथा व्यापार भी चलता रहता था। यात्रा कुछ लम्बी तथा जोखिम भरी होने के कारण अधिकांश लेन देन मानव रहित अन्तरिक्ष यानों के माध्यम से ही होता था। यदाकदा कुछ लोग वहाँ आते जाते रहते थे। मित्र के बहुत आग्रह पर इस बार मैं वहाँ गया था।

स्वर्ग लोक का नाम तो बहुत सुना मगर देखा नहीं है।

जब मैं उस विश्व में पहुँचा तो लगा कि मैं सशरीर स्वर्ग में पहुँच गया हूँ। अमीर-गरीब जात-पात का कोई नामों निशान नहीं था। सभी के लिए जीवन यापन की सभी सुविधाएं उपलब्ध थी। प्राकृतिक छटा की रमणीयता का वर्णन करना तो सम्भव ही नहीं। सभी व्यक्ति एकदम स्वस्थ तथा कार्य की दृष्टि से सक्षम थे। देवताओं के विषय में सुना था कि वे कभी अस्वस्थ व वृद्ध नहीं होते। मगर वहाँ आम व्यक्ति पर यह बात लागू थी। उस मुल्क के लोग न तो गंभीर रूप से बीमार होते हैं न ही कभी वृद्ध। वहाँ के वैज्ञानिकों ने बुढ़ापे तथा रोगों पर पूर्णतः नियंत्रण पा लिया है।

साधनों के मामले में भी वह देश पूर्णतः आत्मनिर्भर है। ब्रह्माण्ड के दूसरे विश्वों के साथ उसका संबंध भी बहुत कम है। उपग्रहवासी के बहुत कम लोग ही अन्तरिक्ष यात्रा पर जाते हैं। कुछ चयनित व्यक्तियों को ही अपनी दुनिया में आने देते हैं। मुझे उस दुनिया की यात्रा का अवसर उस मित्र के कारण ही उपलब्ध हुआ था। मित्र एक बार जब भारत आया था तब मेरा उससे संपर्क हुआ था। हमने एक दूसरे को बहुत पसन्द किया था। इसी कारण मित्र के अपने देश पँहुचने के कुछ दिनों बाद वंहाँ की विश्व सरकार से निमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ था।

यात्रा का पूरा वृत्तांत प्रस्तुत करने का मेरा कोई विचार नहीं है।

मैं तो मात्र एक घटना विशेष का उल्लेख ही आपके समक्ष करना चाहता हूँ। यह उसी दिन की घटना है, जिस दिन मैं अपने मित्र के यहाँ पँहुचा था। सायं पाँच बजे उसने मुझसे कहा तैयार हो जाओ हमें एक समारोह में जाना है। जब मैंने जानना चाहा कि किस प्रकार के समारोह में जाना है तो उसने जो उत्तर दिया, उससे मैं चौंक गया था। उसने बताया कि हमें एक व्यक्ति के ‘‘मरण समारोह’’ (डेथ सरेमनी) में जाना है।

मरण समारोह का वास्तविक अर्थ उस समय मैं निकाल नहीं पाया था, मगर अनावश्यक प्रश्न पूछ कर अपनी अधीरता का प्रदर्शन भी मैंने नहीं किया। मैंने सोचा कि मैं समारोह में प्रत्यक्षतः भाग लेने जा ही रहा हूँ तो सब पता चल ही जाएगा। मैंने सुन रखा था कि वहाँ के लोग बहुत ही मितभाषी होते हैं। आवश्यकता के अनुरूप नपे तुले शब्दों में बात करके ही खुश रहते हैं। अनावश्यक गपशप करने में उन्हें आनन्द नहीं आता, अपितु कष्ट अनुभव करते हैं।

हम ठीक समय पर समारोह स्थल पर पहुँच गए।

समारोह एक सभागार में आयोजित किया गया था। वहाँ की व्यवस्थाएँ देखकर लगता था कि उसका निर्माण ऐसे समारोहों को ध्यान में रखकर ही किया गया होगा। मंच पर पाँच कुर्सियाँ रखी गई थीं, जिन पर पाँच विशिष्ट व्यक्ति बैठे थे। इन पाँच कुर्सियों के पीछे एक ऊँचा स्टेज था। स्टेज पर श्वेत चादर बिछी थी। स्टेज पर एक व्यक्ति बिना सिला श्वेत वस्त्र बदन पर लपेटे शांत मुद्रा में बैठा था। उसके गले में गुलाब के ताजे फूलों की माला पड़ी थी। उसके ठीक पीछे एक कंप्यूटर स्क्रीन थी, जिस पर उस व्यक्ति का संक्षिप्त जीवन वृत्तांत प्रदर्शित हो रहा था।

समारोह ठीक 5.30 बजे प्रारंभ हो गया। समारोह का अधिकांश भाग ऐसा था जैसा हमारे यहाँ किसी कर्मचारी के सेवानिवृत्ति या स्थानान्तरण पर होने वाले विदाई समारोह का होता है। मंच पर बैठे व्यक्तियों ने बारी-बारी से उस व्यक्ति के सामाजिक योगदान की प्रशंसा की। अंत में उस व्यक्ति ने उससे जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना की तथा समाज द्वारा उसे दिए गए सहयोग व सम्मान हेतु आभार प्रदर्शित किया। ठीक 6.30 बजे ये औपचारिकताएँ पूरी हो गई।

अपनी बात पूरी करने के बाद वह व्यक्ति स्टेज पर सीधा लेट गया। उसके साथ ही सभागार में लाल बत्तियाँ जल गईं। सभागार की धवल पृष्ठभूमि के साथ मिलकर लाल प्रकाश विशेष प्रभाव उत्पन्न कर रहा था। एक विशेष प्रकार की स्वर लहरी वातावरण को अद्भुत रूप प्रदान कर रही थी। सब लोग अपने स्थान पर सिर झुकाए शान्त मुद्रा में खड़े थे।

कुछ मिनट सब कुछ ऐसी ही रहा। इसके बाद संगीत थम गया। सभागार में लाल की जगह नीला प्रकाश फैल गया।

इस परिवर्तन के साथ ही सभी लोग अपने स्थान पर बैठ गए।

वातावरण में पूर्ण शान्ति का साम्राज्य था। तभी दो व्यक्ति स्टेज पर लेटे व्यक्ति की ओर बढ़े। उनके हाथ में जो उपकरण थे उनसे पता चल रहा था कि वे डॉक्टर थे। दोनों ने डाक्टरों ने मिलकर गहनता से उस व्यक्ति की जाँच की और उसे मृत घोषित किया। उसके बाद एक अन्य व्यक्ति आगे आया तथा लयरूप में कुछ मंत्रो का पाठ किया। क्या कहा मैं समझ नहीं पाया क्योंकि उसने किसी अति प्राचीन भाषा का प्रयोग किया था। मेरा अनुमान है कि वह व्यक्ति धर्मगुरु था तथा उसने मृतक की आत्मा की शांति के लिए पाठ किया था।

वहाँ सब कुछ यंत्रवत चल रहा था। अब चार व्यक्ति स्ट्रेचर ट्रॉली को घसीट कर शव के निकट लाए। उन्होंने शव को बहुत ही सावधानी से उठा कर स्ट्रेचर पर रखा। इसके बाद स्ट्रेचर को ले मंच के पीछे बने एक संकरे मार्ग की ओर बढ़ चले। वहाँ उपस्थित सभी व्यक्ति उनके पीछे चल दिए। कुछ ही दूरी के बाद वह संकरा मार्ग एक बड़े उपवन में खुल गया।

उपवन के ठीक मध्य में एक विशेष कक्ष बना था। मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि वह विद्युत शव-दाहगृह था।

शव-दाहगृह के चारों ओर छायादार वृक्ष लगे थे। क्यारियों में पुष्प खिले थे।

वहाँ पहुँच कर लोग वृक्षों के नीचे बैठ गए। बिलकुल शान्त। मैंने किसी को बात करते नहीं देखा। शव को धकेल कर लाने वाले व्यक्ति शवदाह-गृह के कर्मचारियों के साथ मिल कर शवदाह का प्रबन्ध करने में जुट गए थे। शवदाह की सम्पूर्ण प्रक्रिया में मात्र 15 मिनिट का समय लगा। शवदाह होने की सूचना एक विशिष्ट ध्वनि के माध्यम से दी गई। इसके साथ ही सभी लोग अपने स्थान पर खड़े हो गए। इसके बाद एक व्यक्ति वहाँ बने मंच पर चढ़ गया। उस व्यक्ति ने विशिष्ट मुद्रा में सभी का अभिवादन किया तथा वहाँ उपस्थित होने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके बाद सभी विसर्जित हो गए।

मैं भी अपने मित्र के साथ उसके घर लौट आया।

मार्ग में मैंने कोई प्रश्न नहीं किया। उसने भी कुछ स्पष्ट नहीं किया। मरण समारोह में जाने से पूर्व मेरा अनुमान था कि वहाँ सब कुछ समझ में आ जाएगा। सच पूछा जावे तो कुछ मात्रा में ऐसा हुआ भी। मगर समस्याएं सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझ गई। मुख्य प्रश्न तो यहीं था कि किसी व्यक्ति की मृत्यु निश्चित तिथि को निश्चित समय पर कैसे सम्भव है? ‘‘यह सब आनुवंशिक अभियान्त्रिकी के कारण सम्भव हो पाया है’’ उस मित्र ने बताया। हमारे देश के वैज्ञानिकों ने मानव आनुवंशिक पदार्थ का विश्लेषण पृथ्वी पर मानव जिनोम परियोजना प्रारम्भ होने से बहुत पूर्व ही कर लिया था। जल्दी ही डिजाइनर मानव उत्पन्न करने में महारत प्राप्त कर ली।

वैज्ञानिकों ने मानव डीएनए से उन जीनों को हटा दिया जिनके कारण मानव बूढ़ा होता है। परिणाम स्वरूप हमारे यहाँ बूढ़ाने की दर बहुत कम हो गई थी। हर व्यक्ति 250 से 300 वर्ष तक जीने लगा था। इससे देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी। इससे घबराकर सरकार ने सन्तानोत्पति पर रोक लगा दी। आवश्यकतानुसार कुछ चयनित दम्पतियों को ही संतान उत्पन्न करने का निर्देश दिया जाता था। इतना कह उस मित्र ने गहरी श्वांस ली। उसकी उस भंगिमा से मैंने अनुमान लगाया कि सन्तानोत्पति पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण के परिणाम अच्छे नहीं रहे होंगे। मगर मैंने कोई प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की।

कुछ समय बात मित्र स्वतः ही बोला ‘‘कुछ सदियों तक तो व्यवस्था ठीक चली मगर लम्बी जिन्दगी से लोग ऊबने लगे।

बिना जनम मरण के मानव जीवन में रोमांच ही नहीं रहा था।

तभी एक नई जीन की खोज हुई। उस जीन का यह गुण था कि वह अचानक सक्रिय होकर जीव की दर्द रहित आकस्मिक मौत का कारण बनती है। वह जीन टाइमबोम्ब के नाम से प्रसिद्ध हो गई। जीन टाइमबोम्ब को मानव जिनोम में स्थानान्तरित करा लोग मौत का स्वतः वरण करने लगे। इससे समाज में अनिश्चितता उत्पन्न होने लगी’’ मित्र ने बताया। मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

‘‘फिर क्या हुआ’’ मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया।

‘‘उस स्थिति ने समाज शास्त्रियों को चिन्तित कर दिया। सरकार सक्रिय हुई और मानव की उम्र 100 वर्ष पर स्थिर करने का निर्णय किया गया। वैज्ञानिकों ने जल्दी ही निर्णय को क्रियान्वित करना प्रारम्भ कर दिया। अब जन्म के पूर्व ही ठीक 100 वर्ष बाद सक्रिय होने वाली टाइम बोम्ब जीन की एक-एक प्रति शुक्राणु व अण्डाणु के गुणसूत्र क्रमांक 5 पर स्थानान्तरित कर दी जाती है। प्रत्येक बच्चे का जन्म परखनली शिशु के रूप में होता है। जन्म के साथ ही उसकी मृत्यु का समय निर्धारित होता है। हमारे यहाँ के परिचय पत्र पर जन्मतिथि के साथ ही मृत्यु की तिथि भी अंकित होती है’’ मित्र ने बताया। मैं मन्त्रमुग्ध उसकी बाते सुन रहा था।

‘‘हमारे यहाँ प्रत्येक दम्पति को दो संतान एक लड़का व एक लड़की पैदा करने का अधिकार है। इस तरह प्रत्येक परिवार में 100 वर्ष में दो जनम व दो मरण समारोह आयोजित होते हैं। 25-25 वर्ष के चार आश्रमों का पालन लोग स्वेच्छा से कर रहे हैं। 25 वर्ष अध्ययन व 25 वर्ष सेवा के बाद 50 वर्ष वानप्रस्थ व सन्यास का मिलाजुला रूप होता है’’ मित्र ने बात स्पष्ट की।

मेरा मन तो उस देश में ही बस जाने का हो गया था।

मगर यह सम्भव नहीं था। कोई भी विदेशी उस दुनियां में एक सप्ताह से अधिक नहीं रुक सकता। मुझे भी और रुकने की अनुमति नहीं मिली और मैं लौट आया मगर उस यात्रा की यादें भुला नहीं पा रहा हूँ। अपने चारों ओर की स्थिति देखता हूँ तो मुझे शंका होने लगती है कि क्या मैं सचमुच उस दुनिया की यात्रा पर गया था कि कोई सपना देखा था।

❒ ई मेल : vishnuprasadchaturvedi20@gmail.com

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