विज्ञान-कथा चांद पर चार दिन // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी // विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर 2018

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

विज्ञान कथा

image

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

विज्ञान-कथा

चांद पर चार दिन

यु वा संयन्त्र वैज्ञानिक नव्य के दल को चाँद पर आए चार दिन हो गए थे। दल अमेरिका की सूसान कंपनी के साथ हुए एक कान्ट्रेक्ट पर चाँद पर गया था। चाँद पर उन्हें एक स्वचालित संयन्त्र को चार दिन में ठीक करना था। नव्य के दल ने अपना कार्य समय में पूरा कर लिया था। जब वे पृथ्वी पर लौटने को तैयार थे कि एक दुर्घटना घट गई।

अचानक आई नई परेशानी से दल के सभी सदस्य चिन्ता में पड गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे तय कार्यक्रम के अनुसार पृथ्वी पर लौट पाएगें या नहीं ?

खर्च कम करने के उद्देश्य से नव्य बहुत छोटा दल लेकर चाँद पर गया था। दल का एक सदस्य कम्प्यूटर विशेषज्ञ अर्णव था। अर्णव कम्प्यूटर की हर शाखा का विशेषज्ञ था।

कम्प्यूटर में आई खराबियों को पकड़ने में उसका दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज दौड़ता था। अर्णव को यात्राओं से बहुत डर लगता था। इस कारण अर्णव सामान्यतः अपने शहर में ही कार्य करना पसन्द करता था। नव्य की मित्रता के कारण अर्णव, लाखों किलोमीटर दूर बियावान चाँद पर, जाने के लिए तैयार हो गया था। अर्णव ने कोई खास पूछताछ भी नव्य से नहीं की थी।

नव्य का दूसरा साथी मेजर मयंक था। संयन्त्र ठीक करने के कार्य से मेजर मयंक का कोई सम्बन्ध नहीं था। नव्य को लगा था कि पृथ्वी की कोई प्रतिस्पर्धी कंपनी संयन्त्र को फेल करने का प्रयास कर सकती थी। ऐसे बदमाश चाँद पर नव्य के दल पर हमला कर सकते थे। किसी एलियन खतरे की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता था। मेजर मयंक को अन्तरिक्ष में सुरक्षा व्यवस्था का बहुत अनुभव था। मेजर मयंक पहले भी ऐसे अभियानों में सम्मिलित हो चुका था।

तीसरा साथी नव्य का असिस्टेण्ट सद्दाम था। नव्य अपने हर अभियान में सद्दाम को साथ रखता था। सद्दाम नव्य के हर इशारे को समझ कर तुरन्त कार्यवाही करता था। संयन्त्र की स्थापना के समय से ही नव्य सूसान कंपनी से जुड़ा रहा चचचचचाँद पर चार दिनाँद पर चार दिनाँद पर चार दिनाँद पर चार दिनाँद पर चार दिन था। इस कारण नव्य को संयन्त्र की बारीकियों का पूरा ज्ञान था।

पृथ्वी से चाँद की यात्रा की बोरियत कम करने हेतु यान में बहुत सारी व्यवस्थाएं थी। सद्दाम ने अधिकांश समय संगीत सुनते व नींद लेते बिताया। मेजर बाहर के नजारे देखने में मस्त रहा था। अर्णव बहुत समय तक कुछ सोचता रहा था, फिर बोला ‘‘हीलियम के विषय में तो पढ़ा है मगर हीलियम-3 क्या बला है? दुनिया उसकी इतनी दिवानी क्यों है?’’ ‘‘ठीक प्रश्न किया तुमने। अर्णव तुम्हें तो कम्प्यूटर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दीखता। बताओ बिना ऊर्जा के कम्प्यूटर कैसे चलेगा? तुम तो जानते हो कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुए जलवायु परिवर्तनों से हम पृथ्वीवासी त्रस्त हो गए थे।

हमें कार्बनयुक्त ईंधनों को छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था।

विकल्प के रूप में हमने आणविक ऊर्जा का सहारा लिया।

जापान व फ्रांस के परमाणु संयन्त्रों में हुई तबाही से डर कर लोग परमाणु ऊर्जा का विरोध करने लगे थे।’’ नव्य बोला।

‘‘ऐसे में हीलियम-3 से ऊर्जा उत्पादन एक वरदान बन कर आई। न प्रदूषण न अन्य कोई खतरा। पृथ्वी पर हीलियम-3 की मात्रा बहुत सीमित थी इस कारण चाँद से हीलियम-3 लाने के प्रयास किए जाने लगे। अमेरिका की सूसान कम्पनी इसमें सफल रही। कम्पनी ने एक स्वचालित संयन्त्र चाँद पर लगा रखा है। वहाँ से हिलियम-3 सिलेण्डरों में भर कर पृथ्वी पर पहुँचती है। कंपनी बहुत लाभ कमा रही है। चाँद पर लगे संयंत्र में अचानक अवरोध उत्पन्न हो गया है। चाँद से हिलियम-3 का आना बंद हो गया है’’ विशेषज्ञ नव्य ने स्पष्ट किया।

घटना के समय सूसान कंपनी का संयन्त्र चाँद के उत्तरी ध्रुव पर प्लेटों क्रेटर से हीलियम-3 एकत्रित कर रहा था। प्लेटो क्रेटर, हमें दिखाई देने वाली, चन्द्र सतह पर स्थित है। अन्तरिक्ष कार को संयन्त्र के समीप ही लैण्ड कराया था।

वहाँ पहुँचते ही स्पेस सूट पहनकर सभी काम पर जुट गए। कम गुरुत्वाकर्षण में चलने का अभ्यास नहीं होने के कारण सभी लुढ़क लुढ़क जा रहे थे। अर्णव को कुछ अधिक ही परेशानी हो रही थी।

दो दिन की कठिन मेहनत के बाद अर्णव ने घोषणा की कि संयंत्र की कम्प्यूटर प्रणाली में कोई दोष नहीं है। इस बीच मेजर मयंक एक ऊँचे स्थान पर चढ़कर आस-पास के स्थानों का बारीकी से अवलोकन करता रहा था। उसे कुछ भी ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया जिससे कोई खतरा पैदा हो सकता था।

नव्य व सद्दाम जाँच में अर्णव को मदद करते रहे थे।

अर्णव का कार्य पूरा होने पर वे दोनों संयंत्र के यान्त्रिक भागों की जाँच करने में लग गए। स्विच ऑन करने पर संयंत्र शुरु होता पर घर्र...घर्र की आवाज के साथ कुछ ही क्षणों में बन्द हो जाता था। निरन्तर परिश्रम करने पर भी कोई परिणाम सामने नहीं आ रहा था। नव्य अन्तरिक्ष कार में खाने-पीने का बहुत सा समान रख लाया था। कार्य में जुटे रहने के कारण उस ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। तीसरा दिन भी यूं ही बीत गया।

नव्य ने अनुभव किया कि कोई छोटी परेशानी है जिसे उसकी विशेषज्ञ आँखें नहीं देख पा रही थी। शायद सामान्य आँखों से वह खराबी पकड़ में आ जावे। चौथे दिन सुबह नव्य ने मेजर मयंक को भी अपनी मदद के लिए बुला लिया। मेजर मयंक ने अपनी जासूसी बुद्धि से जाँच प्रारम्भ की। मेजर पाईप लाइन के साथ क्रेटर में उतरने लगा। एक मोड़ पर उसने देखा कि एक बड़ा पत्थर लुढ़क कर पाइप पर आ गया था। मोड़ पर होने के कारण कैमरे उसे देख नहीं पा रहे थे। मेजर ने धक्का दे पत्थर को पाईप पर से दूर सरका दिया। मेजर ने नव्य को संयन्त्र प्रारम्भ करने का संकेत किया। स्विच ऑन करते ही संयंत्र ऐसे चलने लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

सब प्रसन्न हो गए। पृथ्वी केन्द्र से भी बधाई संदेश आ गया था। मेजर क्रेटर से बाहर आया तो वहां रखे वातानुकूलित चल-विश्रामघर में बैठ कर सभी ने मन भरकर नाश्ता किया। फिर कुछ समय विश्राम किया। जब जगे तो सद्दाम बोला अब मैं एक चुटकला सुना सकता हूँ। इस पर अर्णव हाथ जोड़ खड़ा हो गया। बोला मुश्किल से कुछ राहत मिली है, उसे भी तुम छीनना क्यों चाहते हो? अर्णव की उस मुद्रा पर सभी हँसने लगे। सद्दाम भी अपनी हँसी नहीं रोक पाया।

सभी अन्तरिक्ष कार के पास लौट आए तथा समान अन्दर रख दिया। उन्हें पृथ्वी केन्द्र से हरा संकेत आने का इन्तजार था। सभी इधर-उधर घूम कर चाँद का नजारा देख रहे थे कि वह हादसा हो गया। एक बड़ी उल्का अन्तरिक्ष कार पर आ गिरी थी। गनीमत थी कि उनमें से किसी को चोट नहीं आई। कार कुछ पिचक गई थी।

अन्तरिक्ष कार पूर्ण स्वचालित थी। कार का नियन्त्रण पृथ्वी से हो रहा था। नव्य के दल को इस विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं था। अन्तरिक्ष कार की शक्ल में आए बदलाव को देखकर उसका उड़ान भरना असंभव लग रहा था। पृथ्वी नियन्त्रण कक्ष में छाए सन्नाटे ने उनकी चिन्ता और बढ़ा दी थी। अर्णव बोला, ‘‘अब क्या होगा? मुझे तो डर लग रहा है।’’ ‘‘वाह भाई वाह, डर लगे तो गाना गा’’ सद्दाम ने कहा और स्वयं वाई दिस कोलावरी.... कोलावरी....डी....गाने लगा था।

तभी पृथ्वी केन्द्र से बताया गया कि घबराने की कोई बात नहीं है। अन्तरिक्ष कार उल्कारोधि है। धक्का देकर उल्का को एक ओर कर दो। उनके यान में बैठते ही कार पृथ्वी की बढ़ने लगी थी। अर्णव विचारों में खो गया था। मेजर बाहर का नजारा देखने में मस्त था। सद्दाम वाई दिस कोलावरी.... कोलावरी.. गुनगुना रहा था। नव्य मन ही मन हिसाब लगा रहा था कि इस कान्ट्रेक्ट की आय में से वह कितना धन गरीब बच्चों के लिए संचालित अपने स्कूल में लगा सकेगा?

❒ ई मेल : vishnuprasadchaturvedi20@gmail.com

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "विज्ञान-कथा चांद पर चार दिन // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी // विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर 2018"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.