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विज्ञान कथा मरणोपरान्त // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी // विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर 2018

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विज्ञान-कथा विज्ञान कथा मरणोपरान्त विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी ”जॉनसन“ ”जी सर“ ”श्रीमती रामगोपाल को फोन करो कि वह तुरन्त अस्पताल चली आएं। रामगोप...

विज्ञान-कथा

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विज्ञान कथा

मरणोपरान्त

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी


”जॉनसन“

”जी सर“

”श्रीमती रामगोपाल को फोन करो कि वह तुरन्त अस्पताल चली आएं। रामगोपाल जी को निपटाने के बाद ही हम किसी अन्य रोगी को ऑपरेशन थिएटर में ले सकेंगे“ डॉ. सम्पत ने अपने सहायक जॉनसन से फोन पर कहा।

”सर श्रीमती रामगोपाल तो आ चुकी हैं“ जॉनसन ने अत्यन्त नम्रता से प्रत्युत्तर दिया।

”यह तो अच्छी बात है। उन्हें तुरन्त मेरे कक्ष में भेज दो“ यह निर्देश दे कर डॉ. सम्पत ने फोन रख दिया। सेठ रामगोपाल कई दिन से परमार्थ चेरिटेबल ट्रस्ट अस्पताल में भर्ती थे। सेठ रामगोपाल डॉ. सम्पत के नियमित पेशेन्ट थे। सेठ रामगोपाल को इतने बड़े अस्पताल में केवल डॉ. सम्पत पर ही भरोसा था। डॉ. सम्पत शहर के माने हुए सर्जन थे पर सेठ रामगोपाल के लिए वे ऑल इन वन थे। सेठ जी को किसी भी प्रकार की परेशानी हो वे सीधे डॉ. सम्पत के पास ही पहुँचते थे। आवश्यकता होती तो डॉ. सम्पत किसी अन्य डॉक्टर से सलाह ले लेते थे। कुछ दिन पूर्व सेठ रामगोपाल को सीने में दर्द की शिकायत हुई थी। बाई-पास कराने के बाद सेठ रामगोपाल स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे।

”अब कैसे हैं मेरे राम“ श्रीमती रामगोपाल ने डॉ. सम्पत के कक्ष में प्रवेश करते हुए प्रश्न किया।

”आइए श्रीमती गोपाल, बैठिए। आपके प्रश्न का अब मेरे पास कोई जबाव नहीं है। रात में सेठ रामगोपाल को हृदयाघात हुआ और.... “ डॉ. सम्पत बता रहे थे।

”मैं समझी नहीं डॉ. सम्पत“ डॉ. सम्पत की बात पूरी होने से पूर्व ही श्रीमती रामगोपाल ने फिर प्रश्न किया।

”मेरे कहने का यह अर्थ है कि जब सेठ रामगोपाल ही नहीं रहे तो उनके स्वास्थ्य के विषय में चर्चा कैसे की जा सकती है“ डॉ. सम्पत ने गम्भीरता से उत्तर दिया।

”यह कैसे हो सकता है डॉ. सम्पत, कल रात तक तो वे पूर्ण स्वस्थ थे। उन्होने मुझसे बहुत बातें की थी। अब अचानक यह समाचार....“ अपनी रुलाई को रोकने हेतु श्रीमती रामगोपाल ने साड़ी के पल्लू को मुँह में ठूस लिया था।

”लिजिए जल पीजिए“ पास खड़ी नर्स ने जल्दी से पानी का गिलास श्रीमती रामगोपाल की ओर बढ़ाते हुए कहा।

”यह सब कुछ इतना तेजी से हुआ कि हम कुछ भी नहीं कर पाए। हमारे सभी उपकरण तथा चमत्कारी औषधियां धरी ही रह गईं। कभी-कभी मुझे लगता है कि चिकित्सा शास्त्र कितना भी आगे बढ़ जावे जीवन की डोर तो उस ऊपर वाले के हाथ में ही रहेगी“ डॉ. सम्पत ने बहुत धीमी आवाज में कहा। भावुकता के कारण डॉ. सम्पत का गला कुछ रुंध गया था। श्रीमती रामगोपाल कुछ नहीं बोली और खाली-खाली नेत्रों से डॉ. सम्पत को निहारती रही।

”देखिए जो होना था सो हो गया। रोने से आपको कुछ नहीं मिलने वाला। यह समय रोने का नहीं है तेजी से काम करने का है। अभी आपको बहुत से निर्णय लेने हैं। मुझे भी बहुत ऑपरेशन करने हैं आज। इसलिए आपको पहले अस्पताल व फिर अन्तिम संस्कार की औचारिकताएं पूरी करने में लग जाना चाहिए“ भावुकता के दौर से उभरते हुए डॉ. सम्पत ने कहा।

”आप ठीक कह रहे हैं डॉ सम्पत। सब कुछ मुझे ही तो करना है। मैं रोने बैठ गई तो मेरी परेशानियाँ बहुत बढ़ जाएंगी। बताएं अभी मुझे क्या करना है“ श्रीमती रामगोपाल ने सदमें से उभरते हुए कहा।

”यहाँ अपना नाम पता लिखकर हस्ताक्षर कर दीजिए“ पास खड़ी नर्स ने एक प्रपत्र श्रीमती रामगोपाल की ओर बढ़ाते हुए कहा।

”क्या है यह“ श्रीमती रामगोपाल ने प्रश्न किया ”केन्द्र सरकार के नियम 2030 के अनुसार सेठ रामगोपाल के शरीर से गुर्दें व यकृत निकाल कर हमें सरकारी अंग बैंक में जमा कराने होंगे। इनका उपयोग किसी अन्य की जिन्दगी को खुशहाल बनाने में किया जाएगा। उसी स्वीकृति के लिए हस्ताक्षर करा रहे हैं। आप अनुमति नहीं देंगी तो हमें सरकार को सूचित करना होगा। इससे आपकी परेशानियाँ बढ़ जाएंगी श्रीमती सेठ। सेठ रामगोपाल एक उदार विचारों के व्यक्ति थे। अपने अंग किसी दूसरे के उपयोग में आने से तो उन्हें प्रसन्नता ही होगी“ डॉ. सम्पत ने कहा।

”आप सही कह रहे हैं डॉ. सम्पत। मेरे राम को इससे कोई आपत्ति नहीं हो सकती“ श्रीमती रामगोपाल ने नर्स के हाथ से प्रपत्र लेकर उन पर हस्ताक्षर कर दिए।

”लीजिए यह अस्पताल का बिल है। इसका भुगतान आप करा दीजिए तब तक में सेठ रामगोपाल के शरीर से गुर्दें व यकृत निकलवाने की व्यवस्था करता हूँ“ डॉ.सम्पत ने कुर्सी से उठते हुए कहा।

”कुछ देर और बैठिए डॉक्टर सम्पत, मुझे आपसे कुछ आवश्यक बातें करनी है“ श्रीमती रामगोपाल ने कहा।

यह सुनकर डॉक्टर सम्पत पुनः कुर्सी पर बैठ गए तथा पास खड़ी नर्स की ओर देखा। संकेत समझ कर नर्स कक्ष से बाहर चली गई और बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया जिससे अन्य कोई अन्दर नहीं जावे।

”कहिए श्रीमती रामगोपाल, अब आप विश्वास कर सकती हैं कि आपकी बात मुझ तक ही सीमित रहेगी“ डॉक्टर सम्पत ने श्रीमती रामगोपाल के चेहरे पर उभर रहे परेशानी के भावों को पढ़ते हुए कहा।

”आपके अस्पताल का बिल 53 लाख से अधिक का है। अन्तिम संस्कार पर भी बहुत कुछ खर्च करना होगा। अब तक तो राम ही सब कुछ करते रहे हैं। मुझे किसी बात का कोई अभाव नहीं रहा। राम मुझसे हिसाब-किताब की बातें करते भी नहीं थे। केवल कल ही उन्होंने मुझे कुछ बताया था।

राम की अधिकांश सम्पति पर उनकी पहली पत्नी के पुत्र ने आधिपत्य कर लिया था। जैसा कि राम ने मुझे कल रात बताया उनकी आर्थिक स्थिति इन दिनों ठीक नहीं चल रही थी। मैंने कभी बैंक बैंलेन्स बनाने का नहीं सोचा। ऐसे में आपके अस्पताल का इतने बड़े बिल का भुगतान करना मेरे लिए कैसे सम्भव होगा। उनका बेटा कुछ करेगा ऐसा मुझे नहीं लगता“ इतना कह कर श्रीमती रामगोपाल डॉ. सम्पत की ओर देखने लगी।

श्रीमती रामगोपाल की बात सुन कर डॉ. सम्पत को कुछ विस्मय हुआ। एक बार तो उनके मन में विचार आया कि श्रीमती रामगोपाल शायद भुगतान से बचने का प्रयास कर रही है। दूसरे ही क्षण उनके मन में विचार आया कि नहीं श्रीमती रामगोपाल झूठ नहीं बोल रही। सेठ रामगोपाल अस्पताल का उधार नहीं रखते थे। इस बार ही बिल इतना चढ़ गया। सेठ जी की विश्वसनीयता के कारण ही अस्पताल प्रशासन ने कभी तकाजा नहीं किया। डॉ. सम्पत को लगा कि आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण ही सेठ रामगोपाल भुगतान नहीं कर पाए होगें। डॉ. सम्पत धर्म-संकट अनुभव कर रहे थे।

”मुझे आपसे पूर्ण सहानुभूति है श्रीमती रामगोपाल, मगर समझ नहीं पा रहा कि मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ। पूर्ण भुगतान के बाद ही अस्पताल से मृत शरीर ले जाने दिया जा सकेगा। इस विषय में नियम बहुत ही कठोर है।

सरकार या न्यायालय भी आपकी कोई मदद नहीं कर पाएगा“ डॉ. सम्पत ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा।

”ऐसा करिए डॉ. सम्पत, राम के मृत शरीर को कुछ दिन छुपा कर रखिए। तक तक मैं अपना मकान बेच कर धन की व्यवस्था कर लूंगी“ श्रीमती रामगोपाल ने कहा।

”हाँ, ऐसा किया जा सकता है। अगर आप बुरा नहीं माने तो मेरे पास एक अन्य विकल्प है। इसके अनुसार चलने पर आपको मकान भी नहीं बेचना होगा और किसी से उधार नहीं लेना होगा। ऐसा सुझाव मैंने अभी तक किसी को नहीं दिया। मैं डरता हूँ कि कोई मेरे सुझाव का बुरा भी मान सकता है। कोई यह भी सोच सकता कि सुझाव के पीछे मेरा कोई स्वार्थ होगा। समझ नहीं पा रहा कि आपको भी सुझाव दूँ या नहीं, आपको बुरा भी लग सकता है श्रीमती सेठ“ डॉ सम्पत ने झिझकते हुए कहा।

”आप पर मेरे पति पूर्ण भरोसा करते थे। इस कारण मैं भी यह मानती हूँ कि आप कोई ऐसी बात कह ही नहीं सकते जिसका बुरा माना जा सके। आप मुझे कुछ बताएंगे तभी तो मैं कुछ बता सकूंगी डॉ. सम्पत“ श्रीमती सेठ ने कहा।

”बात ऐसी है श्रीमती सेठ कि सरकार ने मृत व्यक्तियों के अंगों की बिक्री को कानूनन वैध कर दिया है।

मानव प्रजाति को बचाने हेतु यह आवश्यक भी है। आप के पति के शरीर के कुछ अंग निकालने की अनुमति दे दें तो मुझे विश्वास है कि आपको इतनी आय हो सकती है कि आप अस्पताल की फीस चुकाने के बाद भी आपके खाते में अच्छी रकम जमा हो जाएगी“ डॉ सम्पत ने कहा।

”आश्चर्य ऐसा मैंने पहले तो नहीं सुना“ श्रीमती सेठ ने कहा।

”सुनती भी कैसे, अभी लोग इतने प्रगतिशील नहीं हुए कि ऐसे विषय पर खुल कर चर्चा करें। उनके संस्कार उन्हें प्रियजनों के अंग निकालने की अनुमति देने रोकते हैं“ डॉ. सम्पत ने कहा।

”फिर मैं ऐसा किस प्रकार कर पाऊंगी“ डॉ. सम्पत? श्रीमती सेठ ने झिझकते हुए कहा।

”इसमें अनैतिकता जैसी कोई बात नहीं है श्रीमती सेठ। ऐसा करके आप अपनी समस्या सुलझाने के साथ मानवता का भला ही कर रही हैं। मेरा काम सलाह देना था।

निर्णय आपको ही लेना है। मैं चलता हूँ“ इतना कह डॉ.सम्पत कुर्सी से उठ कर जाने लगे।

”कुछ देर और रुकिए डॉ. सम्पत, मुझे यह भी बताएं कि कैसे कुछ होगा“ श्रीमती सेठ ने डॉ. सम्पत को बैठने का संकेत करते हुए कहा।

”सब कुछ एकदम वस्तुनिष्ठ है श्रीमती सेठ। खून से लेकर चमड़ी तक हर अंग का उसके आकार व स्थिति अनुसार भाव तय है। आप हमारे साथ ऑपरेशन थिएटर में बैठ कर सम्पूर्ण प्रक्रिया का अवलोकन कर सकेंगी“ डॉ. सम्पत ने खड़े-खड़े ही जबाव दिया।

”क्या आजकल हर अंग का प्रत्यारोपण होता है“ श्रीमती सेठ ने जानना चाहा।

”नहीं हर अंग का प्रत्यारोपण नहीं होता। कुछ अंग औद्योगिक उपयोग हेतु भी निकाले जाते हैं“ यह बता कर डॉ. सम्पत वहाँ से चले गए।

श्रीमती सेठ के पति का शव जब आपरेशन थिएटर के बाहर निकाला जा रहा था तब तक अस्पताल प्रशासन उनके खाते में 74 लाख रुपए स्थानान्तरित कर चुका था। श्रीमती सेठ सोच रही थी कि उनका राम मरणोपरान्त भी उनके साथ ही था।

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रचनाकार: विज्ञान कथा मरणोपरान्त // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी // विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर 2018
विज्ञान कथा मरणोपरान्त // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी // विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर 2018
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