फौलादी गुड़िया // विज्ञान-कथा // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी // विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर 2018

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फौलादी गुड़िया

विज्ञान-कथा

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विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

भा रतीय अन्तरिक्ष यात्री बचेन्द्री को अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन पर आए पाँचवा दिन था। कुछ वर्ष पूर्व तक भारत अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष योजना का सदस्य नहीं था। अमेरिका, रूस, जापान, कनाडा व यूरोपीय संघ के 11 देश इसके सदस्य थे। जब मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाने की योजना बनने लगी तो इस योजना जुड़े देशों ने अनुभव किया कि बड़े अन्तरिक्ष अभियान में भारत व चीन को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। चीन ने अपना अलग अन्तरिक्ष स्टेशन बनाने की शुरुआत कर अकेले चलते रहने का संकेत दे दिया। भारत विश्वबंधुत्व की नीति को आगे बढ़ाने तथा अन्तरिक्ष अभियान पर अपने खर्च को कम सीमित रखने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन की योजना में सम्मिलित हो गया था। इसी कारण अपने दो पुरुष साथियों के साथ बचेन्द्री अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन पर गई थी।

रविवार होने के कारण अवकाश का दिन था। वैसे तो अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन में भी सप्ताह में 5 दिन ही कार्य होता है मगर कोई न कोई ऐसी स्थिति बनती ही रहती है कि अन्तरिक्ष यात्रियों को शनिवार को भी कार्य करना पड़ जाता है।

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। भोजन, पानी व अन्य कुछ सामान लेकर अन्तरिक्ष शटल अन्तरिक्ष स्टेशन पहुँचा था। अन्य लोगों के साथ बचेन्द्री का भी पूरा दिन शटल को स्टेशन से जोड़ने, सामान उतारने तथा शटल को पुनः रवाना करने के कार्य में बीत गया था। शनिवार को सोने जाते समय ही बचेन्द्री ने तय कर लिया था कि रविवार को 8 बजे से पहले वह बिस्तर से बाहर नहीं आएगी।

अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन पर बचेन्द्री को बहुत ही नियमित दिनचर्या से गुजरना पड़ता था। वह सुबह छः बजते ही बिस्तर छोड़ देती थी। अपने दैनिक कार्यों से निवृत हो बचेन्द्री नाश्ता करती थी। नाश्ते की टेबल पर ही स्टेशन प्रभारी व अन्य साथियों के साथ दिन भर की कार्य योजना पर विचार करती। सुबह सवा आठ तक अन्य साथियों के साथ वह भी कार्य पर जुट जाती थी। सबसे पहला कार्य व्यायाम करना होता था। फिर कई प्रकार के प्रयोग, निर्माण कार्य आदि करने होते थे। दोपहर एक बजे खाने की छुट्टी होती थी। लगभग एक घन्टा तो भोजन करने में ही गुजर जाता था। अन्तरिक्ष में भोजन करना भी आसान काम नहीं होता। भोजन के बाद बचेन्द्री कुछ समय विश्राम करती कि फिर काम में जुटने का समय हो जाता था। दोपहर के बाद के कार्य में प्रमुख भाग कठिन व्यायाम ही होता था। अन्तरिक्ष में अपने आपको चुस्त-दुरस्त रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। रात्रि के भोजन के साथ दिन भर के कार्य की समीक्षा की जाती थी। रात्रि नौ बजे वह सोने चली जाती।

दिनभर के कार्य से इतनी थकान हो जाती थी कि कभी स्वप्न देखने का अवकाश भी उसे नहीं मिल पाया था। उस रविवार को बचेन्द्री के पास अवकाश ही अवकाश था।

बचेन्द्री का जन्म एक साधारण घर में हुआ था।

बचेन्द्री तीन वर्ष की भी नहीं हुई जब उसके पिता एक सड़क दुर्घटना में चल बसे थे। उसी दिन से माँ ने पिता की जिम्मेदारी भी निभाने लगी थी। बचेन्द्री ने कभी माँ को तकदीर को कोसते नहीं देखा। पिता की मृत्यु के बाद माँ घर में बैठ कर मुहल्ले भर के कपड़े सिलने लगी थी। उससे इतना मिल जाता कि उनके तीन सदस्यों के परिवार का काम चल जाता था। बचेन्द्री का एक भाई भी था। भाई ने तो पिता को कभी देखा ही नहीं था। पिता मृत्यु के एक माह बाद उसका जन्म हुआ था। बचेन्द्री मुहल्ले के सरकारी स्कूल में पढ़ने लगी थी। बचेन्द्री की पढ़ने में बहुत रुचि थी। माँ ने उसे एक ही बात सिखाई कि दृढ़ता से उद्देश्य पाने की कोशिश में लगे रहो। बचेन्द्री स्कूल में सदैव प्रथम स्थान प्राप्त करती रही थी।

बचेन्द्री बिस्तर छोड़ और चाय लेकर पृथ्वी की ओर खुलने वाली खिड़की के पास आ बैठी। पृथ्वी के अनेकों मनोरम दृष्य उसके सामने थे। पृथ्वी की ओर देखते हुए उसे माँ की याद आ गई। माँ ने कभी उसे कुछ बनने का लक्ष्य नहीं दिया था। माँ ने सदैव एक ही शिक्षा दी कि ईमानदारी व पूर्ण क्षमता से कार्य करो। तुम्हें कभी सफलता के पीछे नहीं दौड़ना पड़ेगा अपितु सफलता तुम्हारे पीछे दौड़ेगी। आज बचेन्द्री को लग रहा था कि माँ की बात कितनी सही निकली। बचेन्द्री लोगों के संघर्ष की कथाएं सुनती तो चकित रह जाती। क्योंकि बचेन्द्री को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा जिसे लोग संघर्ष कहते हैं। बचेन्द्री सोच रही थी कि खुलजा सिम सिम की कहानी उसके जीवन पर सही उतरी है। वह जिधर भी बढ़ी उधर उसे द्वार खुला मिला। उस दिन तो पूरा अन्तरिक्ष ही बचेन्द्री के लिए खुला था। वह एक दिन में दुनिया के 18 चक्कर लगा रही थी।

चाय का एक बड़ा घूंट भरने के बाद बचेन्द्री ने अपने अन्तरिक्ष कक्ष में दृष्टि डाली। सामने की दीवार पर प्रथम भारतीय अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा की तस्वीर टंगी थी।

तस्वीर को देखकर बचेन्द्री को भारत में हुई अन्तरिक्ष विज्ञान के विकास की कहानी याद आ गई। तेजी से हुए विकास को याद कर बचेन्द्री अभिभूत हो गई। बचेन्द्री को याद आया कि भारतीय वायुसेना का अधिकारी राकेश शर्मा अप्रैल 1984 में अन्तरिक्ष की ओर उड़ा था। लगभग 8 दिन अन्तरिक्ष में रह कर वह सकुशल पृथ्वी पर लौट आया था। बचेन्द्री की प्रसन्नता का कारण यह नहीं था कि वह भी राकेश शर्मा की तरह अन्तरिक्ष में चक्कर लगा रही थी। बचेन्द्री राकेश शर्मा व अपनी यात्रा के अन्तर के कारण प्रसन्न थी। राकेश शर्मा रूसी अन्तरिक्षयान सोयूज में बैठ कर रुसी कॉस्मोनॉट के साथ अन्तरिक्ष में गया था। अन्तरिक्ष में रुसी अन्तरिक्ष कक्ष सल्यूट-7 में रुसियों के मेहमान की तरह रहा था। बचेन्द्री भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन के यान आकाशदूत में बैठ कर अन्तरिक्ष में आई थी। अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन में उसे किसी अन्य देश के कक्ष में मेहमान नहीं बनना पड़ा था, बचेन्द्री भारत द्वारा स्थापित वायुयुक्त कक्ष त्रिशंकु में आराम कर रही थी। बचेन्द्री को गर्व था कि सबसे पीछे अन्तरिक्ष की ओर कदम बढ़ाने वाला भारत आज सबके बराबर चल रहा था।

पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर दूर, मानव द्वारा निर्मित अद्भुत आवास अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन में बैठ कर पृथ्वी को निहारना बचेन्द्री के लिए एक अद्भुत अनुभव था। पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से मुक्त क्षेत्र में विचरण करने में हर क्षण जीवन का खतरा बना रहता है मगर मानवता के उत्कर्ष के लिए उस खतरे को उठाने में बहुत आनन्द है। यही कारण है कि अन्तरिक्ष उड़ानों के दौरान दर्जनों लोगों को मारे जाने के बावजूद अन्तरिक्ष में जाने के इच्छुक नौजवानों की कतार कभी छोटी नहीं हुई थी।

राकेश शर्मा, कल्पना चावला व सुनिता विलयम्स के कारण भारत के अन्य बच्चों की तरह बचेन्द्री भी अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन से परिचित हुई थी। उस परिचय के समय बचेन्द्री ने यह कल्पना नहीं की थी कि बहुत जल्दी ही वह भी उन्हीं की तरह अन्तरिक्ष में विचरण करेगी। अमेरिकी महिला अन्तरिक्ष यात्री डॉ. मेरी एलन वेबर के अनुभव पढ़ कर बचेन्द्री को लगा कि वह भी अन्तरिक्ष में जा सकती है। दृढ़ निश्चय व ईमानदार प्रयास के कारण अवसर दौड़ कर बचेन्द्री के सामने आने लगे थे। बचेन्द्री ने ज्यो हीं इंजीनियर की उपाधि प्राप्त की भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अन्तरिक्ष में जाने के इच्छुक युवाओं से प्रार्थना पत्र आमंन्त्रित किए थे। बचेन्द्री ने आवेदन किया, कठोर चयन प्रक्रिया को बचेन्द्री ने पार कर लिया था। कठिन प्रशिक्षण को बचेन्द्री ने जिस सहजता से पूरा किया उसे देख प्रशिक्षक बचेन्द्री को ‘फौलादी गुड़िया’ कहने लगे थे।

उन पाँच दिनों में बचेन्द्री पृथ्वी की 90 परिक्रमा कर चुकी थी। कार्य में व्यस्त रहने के कारण बाहर के दृश्यों की सुन्दरता रस तब तक नहीं ले सकी थी। जब फुर्सत मिली तो उसे लगा कि जिस पृथ्वी को हम इतना बड़ा मानते हैं वह आकाश के अनन्त महासागर में एक छोटे द्वीप से अधिक महत्व नहीं रखती। वायुमण्डल व जीवन की उपस्थिति ने पृथ्वी के पृष्ठ पर जो रंग भरे हैं वैसे रंग अन्तरिक्ष में अन्यत्र दिखाई नहीं देते। बचेन्द्री जब बच्ची थी तब ऊपर से गुजरते बादलों के कारण उभरते धूप-छांव के दृश्य उसे बहुत रोमांचित करते थे।

कुछ वैसे ही दृश्य उस दिन बचेन्द्री के सामने बार-बार उपस्थित हो रहे थे। पृथ्वी की हर परिक्रमा के आधे भाग में उसे रात, आधे में दिन का दृश्य दिखाई दे रहा था। बचेन्द्री यह देख कर भी रोमांचित थी कि दिन वाले भाग से गुजरने पर जो पृथ्वी निर्जन दिखाई देती है, वही पृथ्वी रात वाले भाग में जगमगाते प्रकाश पुंजों के कारण मानवता की महानता का बखान करने लगती है।

माँ से बात करने का समय समीप आने के साथ ही बचेन्द्री की दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी। बचेन्द्री की पृथ्वी की 93 वीं परिक्रमा के समय अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन के भारत पर से गुजरते समय 10 मिनट के संयोजन समय के लिए एक स्वयं सेवी संस्था ने माँ व स्थानीय लोगों की बचेन्द्री के साथ विडियो कोन्फ्रेशिंग की व्यवस्था की थी।

‘‘हेलो हेलो पाली राजस्थान हियर... ‘‘.................................... ‘‘हेलो हेलो पाली राजस्थान हियर.... ................................... ‘‘मैं बचेन्द्री बोल रही हूँ, माँ आप कैसी है, स्क्रीन पर माँ का चेहरा देखते ही खुशी से चीख पड़ी बचेन्द्री।

‘‘मैं बहुत खुश हूँ। जब बहादुर बेटी अन्तरिक्ष में विचरण कर रही हो तब माँ खुश होने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है। तुम बताओ अन्तरिक्ष में कैसी गुजर रही है. ...... माँ ने पूछा। खुशी के कारण माँ के चेहरा गुलाबी आभा से दमकने लगा था।

‘‘माँ आज तो आप बहुत सुन्दर लग रही हो..... बचेन्द्री ने कहा।

‘‘अरे वहाँ अन्तरिक्ष में भी तुझे हंसी मजाक सूझ रहा है। देख नहीं रही यहाँ कितने लोग जमा है। क्या कहेंगे, चल बता अन्तरिक्ष से भारत कैसा दिखाई देता है.... माँ ने बात बदलने की दृष्टि से कहा।

‘‘माँ आप तो घबरा गई। आपने वही प्रश्न पूछ लिया जो इंदिरा जी ने राकेश शर्मा से पूछा था। जवाब में राकेश जी ने पहले से तय पंक्ति - सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा, सुनाई थी। माँ, भारत से मुझे भी बहुत प्रेम है, मगर सच कहूं तो यहाँ से किसी भी देश की सीमा दिखाई नहीं देती। पूरी पृथ्वी एक ईकाई दिखाई देती है।’’ बचेन्द्री ने कहा। इस पर उसे तालियों की आवाज सुनाई दी। बचेन्द्री को लगा उसका जवाब वहाँ उपस्थित कई लोगों को पसन्द आया था।

‘‘अच्छा बता तेरी जन्मतिथि क्या है।’’ माँ ने फिर विषय बदल दिया।

‘‘23 मई 1984, माँ इस समय यह प्रश्न क्यों पूछ रही हो,’’ बचेन्द्री ने आश्चर्य से पूछा।

‘‘इस प्रश्न को पूछने का सही समय आने का इन्तजार मैं इतने वर्षों से करती रही हूँ। आज वह समय आ गया है। इस तिथि को बचेन्द्री पाल ने हिमालय की चोटी पर चढ़ने में सफलता पाई थी। उसने हिमालय पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला का खिताब प्राप्त किया था। उसी दिन तू पैदा हुई तो मैंने तेरा नाम बचेन्द्री इस इच्छा से रखा कि तू भी कभी ऐसा ही कुछ कर दिखाएगी। तेरे पर मानसिक दबाव नहीं पड़े इस कारण यह बात मैंने तुझको कभी नहीं बताई। तूने अन्तरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला बन कर अपना मुकाम प्राप्त कर लिया है। तेरे पापा को यह बात पता थी।

आज मैं उनसे यह बात शेयर करने की स्थिति में नहीं हूँ, इसी कारण तुझसे कर रही हूँ।’’ माँ ने कुछ भावुक होते हुए कहा।

‘‘माँ तुम सचमुच महान हो,’’ माँ की बात सुन फौलादी गुड़िया की आँखे भीग गई थी। वह एक वाक्य भी बड़ी मुश्किल से बोल पाई थी। इतने में यान से सम्पर्क कट गया।

अन्तरिक्ष स्टेशन शायद सम्पर्क सीमा से आगे बढ़ गया था।

❒ ई मेल : vishnuprasadchaturvedi20@gmail.com

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