पर्यावरण दिवस 5 जून विशेष // सुशील शर्मा

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पर्यावरण पर चिंतन के साथ आचरण जरुरी

सुशील शर्मा

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आज पांच जून है विश्व पर्यावरण दिवस ,आज के दिन हम सभी लेख कवितायेँ और समसामयिक रिपोर्ताज लिख कर अपने को संतुष्ट करने में लगे हुए हैं। हम प्रायः सभी जानतें हैं कि समूची सृष्टी पंचमहाभूत अर्थात् पंचतत्त्वों से विनिर्मित है। अग्नि , जल, पृथ्वी , वायु और आकाश यही किसी न किसी रूप में जीवन का निर्माण करते हैं, उसे पोषण देते हैं। इन सभी तत्वों का सम्मिलित , स्वरूप ही पर्यावरण है।हमारे पुराने ग्रंथों और वेदों में प्रकृति और सृष्टि को सबसे ऊपर रखा गया है ,ऋग्वेद में अग्नि के रूप, रूपांतर और उसके गुणों की व्याख्या की गई है। यजुर्वेद में वायु के गुणों , कार्य और उसके विभिन्न रूपों का आख्यान मिलता है। अथर्ववेद पृथ्वीतत्व का वर्णन सभी वेदों में हुआ है। वैदिक महर्षियों ने इन प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना इसीलिए उन दिनों जड़-चेतन , सभी रूपों की उपासना व अभ्यर्थना की जाती थी और इसीलिए निश्चित तौर पर समस्त सृष्टि में सुख-शाँति व समृद्धि का वातावरण था। आज तथाकथित विकास की प्रक्रिया में मनुष्य ने बहुत बर्बरता से प्रकृति का दोहन किया है।  हवा, पानी, जमीन, जंगल, पहाड़, नदियां आदि सबको विकास ने छेड़ रखा है।  भारत समेत दुनियाभर के जंगलों और पहाड़ों को काटा गया है. वैश्वीकरण की यह विशिष्टता है कि यह स्थानीय को विश्व के साथ जोड़ती है. इसी अनुरूप भूमंडल के साथ हमारा पर्यावरण जुड़ता है। पर्यावरण मात्र स्थूल प्रकृति तक सीमित नहीं है। "डीप इकॉलाजी" के प्रवर्तकों ने अब ऐसी धारणाएँ व्यक्त की हैं व सटीक वैज्ञानिक प्रतिपादन प्रस्तुत किए हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि यह प्रकृति समग्र इकोसिस्टम के रूप में एक विराट हृदय के समान धड़कती है-श्वास भी लेती है । समष्टि में व्यष्टि रूपी घटक की तरह हम भी उसके अंग हैं । यदि चैतन्यता के स्तर पर यह गहरा चिंतन किया जाए तो प्रकृति को पहुँचाई गई थोडी भी क्षति हमें-हमारे भविष्य की पीढ़ी के अंग-प्रत्यंगों को पहुँचाई गई क्षति है । सुप्रसिद्ध पुस्तक "वेब ऑफ लाइफ" में फिट्जॉफ काप्रा जैसे नोबुल पुरस्कार प्राप्त भौतिकविद् ने बड़ा विस्तृत वर्णन कर, मानवीय हृदय को-भाव संवेदनाओं को प्रकृति-पर्यावरण के साथ जोड़ उनका अविच्छिन्न संबंध स्थापित किया है। लेकिन आज हम विकास की अंधी और नंगी दौड़ में भूल रहें हैं कि हम मौत की और अग्रसर हैं। वैचारिक और सांस्कृतिक प्रदूषण हमारे आंतरिक पर्यावरण को और प्रकृति का दोहन हमारे वाह्य पर्यावरण को नष्ट कर रहा हैं।

प्रारम्भिक चरण में मनुष्य प्रकृति के साथ अनुकूलन करने का प्रयास करता है, और इसके पश्चात वह धीरे-धीरे प्रकृति में परिवर्तन करने का प्रयास करता है. परंतु, अपने विकास के क्रम में मानव की बढ़ती भौतिकतावादी महत्वाकांक्षाओं ने पर्यावरण में इतना अधिक परिवर्तन ला दिया है कि मानव और प्रकृति के बीच का संतुलन ही भयावह ढंग से बिगड़ गया है. इसके परिणामस्वरूप न सिर्फ जल, थल और वायु प्रदूषण बढ़ा बल्कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि जैसी समस्याएँ भी अपना विकराल रूप दिखा रही हैं. प्रकृति के दोहन, कूड़े-कचरे के प्रवाह, वनों की कटौती, जहरीली गैसों के प्रभाव आदि से पूरा परिस्थितिकी तंत्र ही संकट में आ गया है.सभी को बैठकर एकजुट हो चिंतन करना होगा कि इस वर्तमान की स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्यों प्रकृति असंतुलित हो रही है. मानवकृत विभीषिकाएँ क्यों बढ़ती जा रही हैं ' मनुष्य को अपनी गरिमा के अनुरूप अपना जीवन जीना सीखना ही होगा । पाश्चात्य सभ्यता का खोखलापन अब जग जाहिर होता जा रहा है । संस्कृति का इसने जमकर विनाश किया है । विज्ञान के नवीनतम आविष्कारों से लाभ तो कम उठाये गये, हानि अधिक दिखाई दे रही है । परमाणु बमों की विभीषिका, जर्मवार रासायनिक युद्ध न केवल मानव मात्र के लिए, अपितु समूचे पर्यावरण के लिये एक खतरा बने हुए हैं ।

आधुनिकता की आग ने भारी नुकसान पहुँचाया है। दोहन और शोषण , वैभव एवं विलास की रीति नीति से पर्यावरण को संकट में डाल दिया है, फलतः जीवन भी संकटग्रस्त है, सब ओर विपन्नता है, प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर ताँडव है। वैज्ञानिक हो या राजनेता ,सभी प्रकृति के क्रोधावेश से डरे-सहमे हैं। समाधान की खोज के इन पलों में सार्थक निदान के लिए जरूरी है कि हम अपनी विरासत को सँभाले। पर्यावरण संरक्षण की टूट-बिखर रही कड़ियों को पुनः जोड़े। हममें से प्रत्येक मन-वाणी-कर्म से इस सत्य का वेदकालीन महर्षियों के स्वर-में-स्वर मिलाकर सस्वर उद्घोष करें-ॐ द्यौ शाँतिः अंतरिक्ष शाँति पृथ्वी शाँतिः आपः शाँतिः।समष्टिगत स्तर पर आंदोलन जन्में एवं जनचेतना जागे, ताकि महाविनाश से पूर्व हम सँभल जाएँ । यह मानकर चलें कि स्कूल व सूक्ष्म पर्यावरण दोनों का ही प्रदूषण मानवी चिंतन को भी गड़बडाता है समाज मे हिंसा के पारस्परिक अंतर्विरोधों को बढ़ाता है । यह सद्भाव तभी उत्पन्न हो पायेगा, जब हम स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म प्रदूषण, सांस्कृतिक प्रदूषण पर भी रोकथाम लगा पायेंगे । क्योंकि प्रदूषण इसी से जन्मा है । आध्यात्मिक चिंतन ही, वैचारिक क्रांति ही इन समस्याओं का समाधान दे सकती है। आज विकास पतन पराभव और विनाश विग्रह की दिशा में हैं। हम पेड़ काट कर कई मंजिल ऊँची बिल्डिंगों के निर्माण को विकास समझ रहें हैं चौड़ी सड़कों के नीचे सूखती नदियों की चीखों को सुनो ,मरते वनों की कराहों को सुनो।


कविता

    एक पेड़ का अंतिम वचन

    सुशील शर्मा

    कल एक पेड़ से
            मुलाकात हो गई।
     चलते चलते आँखों में
             कुछ बात हो गई।

    बोला पेड़ लिखते हो
             जन संवेदनाओं को।
     उकेरते हो दर्द भरी
               भावनाओं को।

    क्या मेरी सूनी संवेदनाओं
          को छू सकोगे ?
     क्या मेरी कोरी भावनाओं
           को जी सकोगे ?

    मैंने कहा कोशिश करूँगा
            कि मैं तुम्हें पढ़ सकूँ।
     तुम्हारी भावनाओं को
              शब्दों में गढ़ सकूँ।

    बोला वो अगर लिखना जरूरी है
         तो मेरी संवेदनायें लिखना तुम।
     अगर लिखना जरूरी है तो
         मेरी दशा पर बिलखना तुम।

    क्यों नहीं रुक कर मेरे सूखे
               गले को तर करते हो ?
     क्यों नोंच कर मेरी सांसे
            ईश्वर को प्रसन्न करते हो ?

    क्यों मेरे बच्चों के शवों पर
          धर्म जगाते  हो ?
     क्यों हम पेड़ों के शरीरों
          पर धर्मयज्ञ करवाते हो ?

    क्यों तुम्हारे लोग मेरी
         टहनियां मोड़ देते हैं ?
     क्यों तुम्हारे सामने मेरे बच्चे
            दम तोड़ देते हैं ?

    हज़ारों लीटर पानी नालियों में
         तुम क्यों बहाते हो ?
     मेरे बच्चों को बूंद बूंद
         के लिए क्यों तरसाते हो ?

    क्या तुम सामाजिक सरोकारों
             से जुदा हो ?
     क्या तुम इस प्रदूषित धरती
              के खुदा हो  ?

    क्या तुम्हारी कलम हत्याओं एवं
           बलात्कारों को लिखती है ?
     क्या तुम्हारी लेखनी क्षणिक
            रोमांच पर ही बिकती है ?

    अगर तुम सचमुच सामाजिक
        सरोकारों से आबद्ध हो ।
     अगर तुम सचमुच पर्यावरण
           के लिए प्रतिबद्ध हो।

    तो लेखनी को चरितार्थ करने
          की कोशिश करो तुम ।
     पर्यावरण संरक्षण का
             आचरण बनो तुम।

    कोशिश करो कि कोई
            पौधा न मर जाए।
     कोशिश करो कि कोई
            पेड़ न कट पाये।

    कोशिश करो कि सारी
          नदियां शुद्ध हों।
     कोशिश करो कि अब
           न कोई युद्ध हो।

    कोशिश करो कि कोई
        भूखा न सो पाये।
     कोशिश करो कि कोई
        न अबला लुट पाये।

    हो सके तो लिखना की
         नदियाँ रो रहीं हैं।
     हो सके तो लिखना की
          सदियाँ सो रही हैं।

    हो सके तो लिखना की
          जंगल कट रहे हैं।
     हो सके तो लिखना की
           रिश्ते बंट रहें हैं।

    लिख सको तो लिखना
        हवा जहरीली हो रही है।
     लिख सको तो लिखना कि
          मौत पानी में बह रही है। 

    हिम्मत से लिखना की
          नर्मदा के आंसू भरे हैं।
     हिम्मत से लिखना की
              अपने सब डरे हैं।

    लिख सको तो लिखना की
           शहर की नदी मर रही है।
     लिख सको तो लिखना की
           वो तुम्हें याद कर रही है।

    क्या लिख सकोगे तुम
       प्यासी गौरैया की गाथा को?
     क्या लिख सकोगे तुम
          मरती गाय की भाषा को ?

    लिख सको तो लिखना की
             थाली में कितना जहर है ।
     लिख सको तो लिखना की
            ये अजनबी होता शहर है ।

    शिक्षक हो इसलिए लिखना
        की शिक्षा सड़ रही है।
     नौकरियों की जगह
         बेरोजगारी बढ़ रही है ।

    शिक्षक  हो इसलिए लिखना
         कि नैतिक मूल्य खो चुके हैं।
     शिक्षक हो इसलिए लिखना
          कि शिक्षक सब सो चुके हैं।

    मैं अवाक था उस पेड़ की
         बातों को सुनकर।
     मैं हैरान था उस पेड़  के
        इल्जामों को गुन कर।

    क्या ये दुनिया कभी
         मानवता युक्त होगी?
     क्या ये धरती कभी
         प्रदूषण मुक्त होगी ?

    मेरे मरने का मुझ को
           गम नहीं है।
     मेरी सूखती शाखाओं में
          अब दम नहीं है।

    याद रखना तुम्हारी सांसे
            मेरी जिंदगी पर निर्भर हैं।
     मेरे बिना तुम्हारी
               जिंदगानी दूभर है।

    हमारी मौत का पैगाम
             पेड़ का ये कथन है।
     यह एक मरते पेड़ का
                अंतिम वचन है।

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