बर्लिन से बब्बू को - बालकवि बैरागी के पत्र विष्णु बैरागी को - 5

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पाँचवा पत्र

बालकवि बैरागी बर्लिन से

22 सितम्बर 76

बड़ी सुबह

प्रिय बब्बू

मेरे भाई !

किसे आ सकती है नींद? गई रात बड़ी देर तक मैं तुझे लिखता रहा। भाई लोग कॉकटेल पार्टी से लौटे तब तक मुझे पता है। वे अपने कमरों में आ जा रहे थे और मैं बराबर पत्र लिख रहा था। सोचा था के कुछ देर आराम से सोकर सबेरा कर लूँगा पर लग रहा है आज नींद परदेस चली गई है। इस गुदगुदे बिस्तर पर अब मुझे कुछ ही घण्टे और बिताने हैं। सबेरे ग्यारह, साढ़े ग्यारह तक हम लोग यहाँ से चल देंगे, और भारत के लिये चल देंगे, इतनी सी बात की नींद को काफूर कर देने के लिये पर्याप्त है। अभी आठ बजे सुबह नाश्ता के लिये जाना है उससे पहले मैं तुझे कुछ और लिख दूँ, यह सोचकर मैं अपनी नींद को धन्यवाद दे रहा हूँ कि उसने मुझे यह मौका दे दिया।

भारत की छवि जर्मन महिलाओं के मन में

”भाग्य” और ”ईश्वर” ये दो शब्द मुझे इस देश में सुनने को नहीं मिले पर उसी देश में रात को कॉकटेल पार्टी में जब मेरे आसपास बैठी दो सन्नारियों ने मेरी अँगूठी में जड़े लाल मूँगे के बारे में तरह-तरह के कौतूहलपूर्ण प्रश्न किये तो मेरी दिलचस्पी अधिक बढ़ गई। वे ज्यों-ज्यों व्हिस्की के खुमार में डूबती जाती थी, त्यों-त्यों इस मूँगे में उनकी जिज्ञासा गहरी होती जाती थी। और अन्ततः बात वहीं जा पहुँची जहाँ का मुझे शक था। वही, अपनी हथैली फैलाना और कहना कि ”आप भारत से आये हैं, बताईये मेरे हाथ की रेखाएँ क्या कहती हैं।” तू जानता है कि मैं यह हाथ-वात देखना नहीं जानता। पर दिनेश भाई ने यह काम बखूबी अंजाम दिया। व्यवस्था चाहे जैसी ही हो मनुष्य अपने और अपने भविष्य के बारे में जानने को हर जगह एक ही जैसा आतुर रहता है।

इन महिलाओं ने मुझसे बहुत ही वैयक्तिक प्रश्न किये। श्रीमती रुथ भी साथ थीं और श्री क्लेफर तो थे ही। जो प्रश्न मुझसे किये गये थे कुछ इस तरह हैं- ”क्या भारत में आपका खुद का मकान है? यदि है तो कितने कमरे हैं? आपके बच्चे कितने हैं? क्या आप अपनी पत्नी के प्रति वफादार हैं? यह कैसे सम्भव हो सकता है कि आप इतने बड़े और रोमांटिक देश में अपनी पत्नी के प्रति वफादार रह सकते होंगे?” उनका तात्पर्य भारत से था। मेरे उत्तर भी बिलकुल बेझिझक और सही थे। चूँकि यह हमारा नितान्त वैयक्तिक क्षण था और सारे औपचारिक कार्यक्रम सम्पन्न हो चुके थे इसलिये ही ऐसे प्रश्न इस अन्तिम रात्रि में उछल आये होंगे। मैंने उत्तर दिया ”मेरे पास मेरा अपना खुद का मकान है। मकान में ग्यारह कमरे हैं। मेरा परिवार संयुक्त परिवार है। दो बच्चे हैं। बड़ा 21 बरस का और छोटा 17 बरस का है। मैं अपनी पत्नी के प्रति वफादार हूँ या नहीं इसका प्रमाण तो स्वयं आप ही दे सकती हैं। गये अठारह-उन्नीस दिनों से मैं आप लोगों के बीच हँसता गाता चल रहा हूँ। आपके देश की कई महिलाएँ मेरे आसपास रही हैं। आपको, किसी को कोई ऐसा क्षण मेरे कारण मिला हो जिसमें कि....” और फिर सब कुछ श्री क्लोफर के ठहाकों से डूब गया। बात का सिलसिला फिर दिनेश भाई ने सम्हाल लिया। दिनेश भाई शायद हस्तरेखा पढ़ना भी समझते थे। वे कुछ बताते रहे। मैं एक क्लब के लिये वहीं कुछ कविताएँ लिख कर देता रहा।

देश के भविष्य का सुरक्षित वर्तमान

बात नींद से शुरु की थी मैंने। मैंने हर पत्र में मैंने बच्चों के बारे में कुछ न कुछ लिखा है। पर एक विशेष बात मैं यहाँ बच्चों के लिये लिखना चाहता हूँ। इस देश में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि बच्चा साढ़े सात से आठ बजे के बीच में सो गया या नहीं। यदि वह रात आठ बजे तक नहीं सोता है तो उसके लिये बीमारी का फार्म तक भर देने की नौबत आ जाती है। इस आधे घण्टे के समय में टेलीविजन पर एक कार्यक्रम प्रति दिन इस तरह का होता है कि उस कार्यक्रम को देखते देखते बच्चे अपने आप ही सो जाते हैं। जिन घरों में टी. वी. नहीं है वहाँ के लोग इस तरह का एक अलग से कार्यक्रम रेडियो पर अपने बच्चों को सुनाते हैं। प्रायः हर घर में रेडियो तो है ही। इस स्थिति का चरम एक घटना से पता लग जाएगा। इसी सप्ताह में हमारे होटल के निचले रेस्तराँ में श्री सेठ अपने मित्र ”रामू दादा” से बातें कर रहे थे। रामू दादा के साथ उनका बच्चा ”असीम” भी था। चाय काफी की चुस्कियाँ चल रही थीं और सारा रेस्तराँ बीयर और काफी की मिली जुली गन्ध में डूबा हुआ था। कोई पौने आठ बजे रामू दादा के पास होटल का एक जिम्मेदार आदमी आया और उसने जर्मन भाषा में रामू दादा से कुछ कहा। उस बात को सुनते ही रामू दादा ने असीम का हाथ पकड़ा। काफी का प्याला वहीं रखा और नमस्ते करके चल दिये। श्री सेठ इस अनायास जावक को देखकर हतप्रभ हो गये। रामू दादा के साथ वे चलते गये और पूछते गये कि बात क्या हो गई है। रामू दादा ने जो कहा वह श्री सेठ ने इस तरह बताया- ”होटल वाले ने रामू दादा से पूरी संजीदगी के साथ कहा श्रीमान्! आठ बजने वाले हैं। आपका बच्चा आपके साथ है। यह उसके सोने का समय है। आपको फौरन अपने घर चले जाना चाहिये।” रामू दादा का कहना था कि अगर मैं इसी समय नहीं उठा तो पाँच मिनिट के भीतर-भीतर कोई पुलिस वाला आकर भी मुझे यही बात कह सकता है और अगर कहीं पुलिस वाला आ गया तो फिर मुझे शायद वह अपने तरीके से घर भेजेगा।” बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति इस देश की चिन्ता का यह बिन्दु कितना मानवीय और मनोहारी है?

बच्चों के लिये हर शहर में अपने-अपने स्तर पर बेहतर गुड़िया-घर और खिलौनों के बाजार के बाजार भरे पड़े होते हैं। बच्चे उन्मुक्त इन गुड़िया-घरों और खिलौना घरों में किलोलें करते रहते हैं। यहाँ भी समाजवाद का पाठ पढ़ना वे नहीं भूलते। जब मैंने बच्चों के एक दल में से एक बच्चे को चुन कर पूछा कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहेगा? तो उस बच्चे ने पूरे आत्म विश्वास से कहा ”कवि महोदय! मैं जो कुछ बन सकता हूँ उसका ब्यौरा तो मेरे शिक्षकों के पास है। मेरी संस्था के मुख्याध्यापक आपको यह बता देंगे कि मैं क्या बनूँगा पर मैं अपनी ओर से आपसे इतना कहूँगा कि मैं एक अच्छा सोशलिस्ट बनना चाहता हूँ। आगे जाकर भी मैं एक अच्छा समाजवादी ही बनूँगा।” बब्बू! इस बच्चे की उम्र मात्र 12 साल की रही होगी। बेशक यह उत्तर रटवाया गया या सिखाया गया हो सकता है। पर जिस देश के बच्चे किसी भी कारण से ऐसे उत्तर दे सकते हों उस देश के स्वर्णिम भविष्य पर किसे सन्देह हो सकता है?

12 बरस से ही वे बच्चे जो राजनीति में रुझान रखते हों, यहाँ के युवक और किशोर संगठनों में काम करना शुरु कर देते हैं। ऐसे बच्चे गिने चुने हो सकते हैं। उनकी बाँहों पर अपने संगठनों की सूचक पट्टियाँ लगी होती हैं। राजनीतिक दलों के बिल्ले लगाकर स्कूलों और कालेजों में किशोर और युवा, निर्भय अपना काम करते होते हैं। अपने युवा संगठन के प्रति वे बहुत ही समर्पित और प्रतिबद्ध पाये जाते हैं।

भारत के प्रति भ्रम यहाँ भी

भारत के प्रति जिज्ञासाएँ और सवाल प्रायः सभी दूर एक जैसे ही हैं। कोई न कोई ऐसा प्रचारतन्त्र भारत के विरोध में हर जगह काम कर रहा है। जी. डी. आर. हमारा ”मित्र देश” ही नहीं एक ”बन्धु देश” है। पर यहाँ भी भारत के बारे में किस-कस तरह की धारणाएँ पहुँच गईं, इसका अनुमान ये सवाल करा देते हैं। ”भारत में एक कमरे में बीस-बीस आदमी रहते हैं। भारत में आधी से अधिक आबादी खुले आसमान के नीचे ही दम तोड़ देती है। भारत के लोग अक्सर भूख के मारे मर जाते हैं। भारत में हर गाँव में साँप कभी भी निकल कर मनुष्य को काट खाता है। भारत में केवल राजा और सन्यासी ही रहते हैं आदि-आदि।” इन सारे सवालों का उत्तर हमको जगह अपनी चेतना के अनुरूप देना पड़ा है।

इसी सप्ताह में हम फिर एक ”बैले” देखने गये। इससे पहिले जो कार्यक्रम हमने देखा था वह था ”ऑपेरा”। ऑपेरा और बैले का फर्क समझाना यहाँ समय नष्ट करना होगा। पर जो ”बैले” हम लोगों ने देखा उसका नाम था ”ब्लैक बर्ड”। यह क्रिश्चियन समाज की कोई पाँच सौ साल पुरानी सुधारवादी संघर्ष-कथा का एक आख्यान था। इसमें मंच पर काम करने वालों की संख्या रही होगी कोई 80 कलाकारों की। पर सम्वाद एक भी नहीं था। समूचा बैले संगीत पर आधारित था। संगीत के साथ ही लयात्मय अभिनय और फिर वे ही दो घण्टे कि किस तरह बीत गये पता नहीं। और समाप्ति पर तालियों का वो हंगामा कि इस बार तो पूरे आधे घण्टे तक सारा थियेटर तालियों से डूबा रहा। कलाकारों का अभिनय कहीं-कहीं जिमनास्टिक जैसा अवश्य हो जाता था, पर सधा हुआ इतना था और प्रकाश तथा ध्वनि संयोजन इतना अद्भुत था कि क्या कहा जाये? आधा घण्टा और भी तालियाँ बजतीं तो भी कम था। समाप्ति के बाद हर कलाकार और कलाकारों के समूह के समूह जब मंच पर जनता का अभिवादन स्वीकार करने के लिये आते तो बस तालियाँ ही तालियाँ लेकर जाते। कभी-कभी तो ऐसा लगता था मानो तालियों की गाड़ी गियर में पड़ गई है या फिर भगवान ने हाथ केवल ताली बजाने के लिए बनाये हैं।

विश्व श्रेष्ठ- भारत की डाक व्यवस्था

लिख तो मैं रहा हूँ, पर एक आशंका मन ही मन बहुत खाये जा रही है। अब तक मेरे लिखे पत्र तुझे मिले भी हैं या नहीं? एक आश्चर्यजनक बात लिख रहा हूँ। सारे संसार में डाक और तार के मामले में भारत सर्वश्रेष्ठ देश माना जाता है। यूरोप के देश डाक वितरण में विश्वास नहीं करते वे ”संचार” में विश्वास करते हैं। यों उनका सारा जोर टेलीफोन पर है। यहाँ मुझे डाक का अनुभव बहुत कड़वा हुआ। जगह-जगह हम पोस्ट आफिसों पर भारत के लिये टिकिट की दरें पूछते रहे और हर जगह हर आदमी ने हमें डाक की अलग-अलग दरें बताईं। जिस-जिस तरह हमें बताया गया वैसा-वैसा हम पोस्ट करते गये और अन्त तक पाते रहे कि हमारे पहिले वाले टिकिट गलत लग गये हैं। सारे दल में दस-पाँच मिनिट रोज डाक का अधिवेशन होता ही था। मेरी डाक का तामझाम सबसे अधिक था। सो हमारी गुहा दीदी रोज मुझे डाँटती थी- ‘क्या छुकपुक-छुकपुक कोरता है। जोब घोर जायगा तो सब कोछ अच्छा मिल जायगा। डाक-टिकिट, डाक-टिकिट, कारट, लिफाफा शुनते-शुनते होम तंग हो गया। बन्द कोर यह छुकपुक।’ और फिर खुद ही हँस देती। कभी-कभी तो मैं उनको तंग करने के लिये भी यह वार्ता चला देता था। जब वे तंग होकर खीज पड़तीं तो फिर माफी माँग कर अध्याय समाप्त किया जाता था। पर होता यह रोज था।

मिलावट : भीषण दण्डनीय अपराध

नाश्ते की टेबल पर जाने से पहले फिर मैं वही सब सोच रहा हूँ। इस होटल में आज आठ दिन होने आये पर हम अभी तक होटल के वेटरों को यह नहीं समझा पाये कि आलू शाकाहारी भोजन है और अण्डा गैर शाकाहारी। ये रोजाना आलू उनको दे देते हैं जो कि शाकाहारी नहीं है, और अण्डा हम लोगों की प्लेट में परोस देते हैं। जब हम आलू और अण्डे आपस में बदलते हैं तो वे आँखों ही आँखों में हँसते हैं। मानो कह रहे हों कितने बुद्धू हैं ये लोग! कहीं आलू भी शाकाहारी भोजन होता है? इस देश में यह समस्या प्रतिदिन कम से कम तीन बार हमारे सामने आई और हमने अपने-अपने ढंग से ही इसे निपटा है। बड़ी सुबह नाश्ता के समय, फिर दोपहर के भोजन के समय और रात में फिर भोजन के वक्त। सबसे बड़ा धोखा देते थे मछली के अण्डे। काली मिर्च की तरह के छोटे-छोटे ये अण्डे अचार के तौर पर परोसे जाते थे। जब हम इनको नहीं खाते थे तो परोसने वाली कन्याएँ उनके स्वाद का काव्यात्मक वर्णन करतीं और हमारे भाग्य पर लानत मारतीं। कितने प्यार से इन लोगों ने हमें खाना खिलाया है? कितना स्नेह ये लोग हमें परोसते रहे? कितनी चिन्ता करते रहे ये हमारे स्वाद और स्वास्थ्य की?

भोजन में लाल मिर्च और हल्दी का उपयोग मैंने यहाँ नहीं देखा। लिख चुका हूँ कि घी यहाँ नहीं खाया जाता और सारी तलाई मक्खन में ही की जाती है। यह पूछना कि क्या यह वस्तु शुद्ध है, यहाँ बेवकूफी मानी जाती है। खाने में मिलावट की कल्पना भी यह देश नहीं करता। भीषण दण्डनीय अपराध है यहाँ मिलावट।

भारतीय मनोबल की परीक्षा

समाजवादी और साम्यवादी देशों ने जिस तरह अपने उत्पादन का बँटवारा किया है यह समझने लायक बात है। इन देशों ने वितरण का बँटवारा नहीं किया। बँटवारा किया उत्पादन का। अमूक चीज अमुक देश पैदा करेगा और फलाँ वस्तु फलाँ देश ही। इससे अनावश्यक प्रतिद्वन्द्विता समाप्त हो गई। जी. डी. आर. अपने लिये प्रमुख तौर पर अपार खाद्य सामग्री पैदा करता है। यद्यपि मैं यह नहीं पूछ पाया कि प्रति एकड़ यहाँ उत्पादन कितना होता है पर कमी यहाँ किसी चीज की नहीं है। अभाव हर देश में अपने-अपने तौर पर किसी न किसी वस्तु का होता ही है। यहाँ भी होगा। पर उसका कोई प्रत्यक्ष दर्शन मैं नहीं कर पाया।

भोजन के मामले पर मुझे एक घटना याद आ गई। आज यह इसलिये लिख रहा हूँ कि आते ही पहिले ही, दिन नाश्ते की टेबल पर इस घटना से मेरा रोम-रोम सिहर उठा था। 4 सितम्बर को हम होटल ”बर्लिन स्ताद” में नाश्ता करने के लिये बैठे ही थे और शाकाहारी और गैरशाकाहारी की जाँच-पड़ताल कर ही रहे थे कि एक सज्जन ने मुझसे कहा ”भरपेट खाईये। हमारे यहाँ खाने की कोई कमी नहीं है।” कोई किसी को नहीं जानता था। हमारा परिचय मात्र श्रीमती रुथ, श्रीमती इमी और डॉ. श्री गुन्थर से हुआ था। मैं नहीं जानता हूँ कि वे सज्जन कौन थे पर जब मैंने बार-बार उनको यह कहते सुना तो मैं इस बात को समझ गया कि यह बात क्यों कही जा रही है। मैंने अपने कमरे से नमकीन सेव का पैकेट मँगवाया और उन सज्जन को देते हुए कहा ”श्रीमान! यह लीजिये! मेरी माताजी ने आपके लिये भेजा है। यह भारतीय है और इसमें लगी हुई हर चीज भारत में पैदा हुई है।” डॉ. गुन्थर पूरे प्रसंग को समझ गये। कटुता का तो कोई सवाल ही नहीं था पर डॉ. गुन्थर ने उन महाशय की अपनी भाषा में निपटा दिया।

एक और घटना इसी दिन शाम की है। यह घटना बहुत समझने वाली बात है। हमारे बाहर जाने वाले समस्त शिष्ट मण्डलों को शायद हर जगह इस तरह की किसी न किसी घटना का सामना करना पड़ता होगा। पर पता नहीं वे लोग इन बातों का समुचित नोटिस लेते भी हैं या नहीं। मेरा कवि और सम्वेदनशील मन ऐसी बातों का नोटिस तत्काल ले लेता है। हुआ इस तरह कि हम लोग रोस्तोक पहुँच कर रात का खाना खाने की तैयारी कर रहे थे। तुझे याद रहा होगा कि 4 सितम्बर को ही हम लोग शाम तक रोस्तोक पहुँच गये थे। भोजन के पहिले एक सज्जन ने, शायद वह पहिला ही दिन था और दूसरे दिन से हम लोग अपना भ्रमण शुरू करने वाले थे इसलिये, हमारा मनोबल टटोलने के लिये एक किस्सा सुनाया। किस्सा बहुत महत्वपूर्ण है। वे बोले-

सज्जनों! जवाहरलालजी नेहरू के समकालीन एक और प्रधानमन्त्री होते थे। नाम आपने सुना होगा। वे थे डॉ. मिलान और उनका देश था दक्षिणी अफ्रीका। सो डॉ. मिलान एक बार लन्दन गये। वहाँ उन्होंने अपने सूट के लिये कपड़ा खरीदा। डॉ. मिलान किसी संगोष्ठी या वार्ता के सिलसिले में इंग्लैण्ड घूम रहे थे। जब कपड़ा खरीदा तो कपड़े के स्टोअर के दर्जी ने उनका नाप लिया और कपड़ा दे दिया। डॉ. मिलान ने तय किया कि वे सूट अपने देश दक्षिणी अफ्रीका में ही सिलवायेंगे। जब वे अपने देश पहुँचे और अपने दर्जी को कपड़ा दिया तो दर्जी ने नापने के बाद कपड़ा लौटाते हुए कहा श्रीमान! यह कपड़ा कम है। आपका सूट नहीं बन सकेगा। आश्चर्यचकित होकर डॉ. मिलान ने निर्णय किया कि वे अगली कान्फ्रेन्स के लिये शीघ्र ही लन्दन जाने वाले हैं, सो कुछ कपड़ा उसी स्टोअर से और लेते आयेंगे। खैर, अगली लन्दन यात्रा में डॉ. मिलान वापस उसी स्टोअर पर गये और सारी स्थिति स्टोअर के मालिक के समान रखी। स्टोअर का मालिक इस घटना से चकरा गया। उसने अपने उसी दर्जी को फिर से नाप लेने के लिये कहा। हक्के-बक्के दर्जी ने फिर से नाप लिया और आश्वस्त होकर कहा - ‘महोदय! कपड़ा बराबर है और आप चाहें तो आपका सूट तत्काल सी दिया जा सकता है।’ अब डॉ. मिलान की बारी थी कि वे चक्कर में पड़ें। बड़ी देर सोचने विचारते रहे डॉ. मिलान। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनका सूट उन्हीं का टेलर सिये। पर उन्होंने समाधान के लिये पूछा आखिर यह कपड़ा वहाँ जाकर कम और यहाँ आकर बराबर क्यों हो जाता है? दुकान का मालिक कुछ बोले उससे पहिले टेलर ने कहा श्रीमान! आपके देश में आपका यह सूट कभी नहीं सिल सकेगा। वहाँ कपड़ा छोटा ही पड़ेगा। यहाँ वैसा नहीं हो सकता है। अब डॉ. मिलान चकराये से कुछ सोच रहे थे। तभी दर्जी ने पता लगा लिया था कि डॉ. मिलान दक्षिणी अफ्रीका के प्रधानमन्त्री हैं। दर्जी ने कारण समझाते हुए कहा ”श्रीमान! आप आपके देश में बहुत बड़े आदमी हैं इसलिये सूट नहीं बनेगा। यहाँ आप एक सामान्य व्यक्ति हैं। आपका सूट बन जायेगा।”

कहानी दिलचस्प है। बात ठहाकों में उड़ गई। पर मुझे कहानी अच्छी लगने के बावजूद अप्रासंगिक और व्यंग्य भरी लगी। मैंने डॉ. गुन्थर से कहा- ”भाई साहब! इन सज्जन को समझा दो कि हम एक महान् देश से आये हैं और एक महान् देश के निमन्त्रण पर ही आये हैं। रहा सवाल सूट का सो मेरा निवेदन मात्र यही है कि भारत अपना कपड़ा खुद बनाता है। मेरी यह मान्यता है कि वो सज्जन यह कहानी सुना रहे थे वे दर्जी नहीं होंगे। और यदि वे दर्जी भी हों तो उनसे मेरा विनम्र निवेदन कीजियेगा कि जो टाई वे बाँधे हुए हैं वह शायद भारत में बनी हुई है।” डा. गुन्थर बहुत विनोद के मूड में थे। उन्होंने कहा- ”निश्चय ही वे सज्जन टेलर नहीं हैं और वह टाई भारत की भी हो सकती है। पर आप इसे मात्र उनका विनोद मानें, व्यंग्य नहीं। वे सज्जन आस्ट्रिया के निवासी हैं। जर्मन नहीं हैं। आपको इनके साथ 22 सितम्बर तक रहना है। वे हमारे दुभाषिये हैं श्री क्लोफर।” पर मेरी इस पकड़ से फिर डॉ. गुन्थर ने शायद पूरे व्यवस्थापक दल को सचेत कर दिया लगता था। श्री क्लोफर मेरे अभिन्न मित्र बन गये हैं और मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। डॉ. गुन्थर ने मेरी सम्वेदनशीलता को तत्काल समझ लिया होगा।

उपरोक्त दो घटनाएँ यदि अनुत्तरित रह जातीं तो शायद है आगे कहीं न कहीं, किसी न किसी पक्ष की असावधानी से कोई प्रसंग स्निग्धता शून्य हो जाता। अस्तु।

आस्ट्रिया में ही श्री शर्माजी के सुपुत्र श्री अरुणकुमार शर्मा रहते हैं। वे हमारा समाचार सुनकर बाल बच्चों सहित कोई चार-पाँच दिनों के लिए बर्लिन आ गये थे। वे ठहरे थे अपने किसी मित्र के यहाँ पश्चिमी बर्लिन में। पर दिये हुए समय पर उनकी तीनों बिटियाएँ और उनकी रूपसी पत्नी रोज हमारे पास आ जाते थे। अरुण भाई के कारण हमारी यात्रा एक यादगार बन गई। उन्होंने हमारी हर समस्या को आसान बनाने के रास्ते सुझाये और हमको विदेश में किस तरह व्यवहार करना चाहिए इसका निर्देश दिया। मैं कह सकता हूँ कि अरुण भाई और श्रीमती अरुण अगर हमें वहाँ नहीं मिले होते तो हमारी यह यात्रा किसी न किसी तौर पर अधूरी ही रह जाती। उनका बहुत आभार मानने वाले हम तीन लोग हैं- भाई श्री मूलचन्द गुप्ता, श्री कैलाशनाथजी सेठ और मैं। हम लोगों के लिये उनकी जबान पल पल सूखी जाती थी।

इस यात्रा का खर्च किसने दिया?

बहुत दिनों बाद आज फिर बर्लिन में सूरज उगने के आसार लग रहे हैं। कमरे की खिड़की से मैं देख रहा हूँ कि आकाश साफ है और शायद सूरज अपनी ढेर सारी धूप बर्लिन के आँगन में लीप देगा। मुझे नहाना है, नाश्ते के लिए तैयार होना है और सबेरे 9 बजे से लेकर 11 या साढ़े ग्यारह तक का समय बहुत कठिनाई और ऊब से बिताना है। मेरा सामान बिलकुल तैयार है। मैं अपना बटुआ सम्हाल रहा हूँ। मेरी जेब में जर्मनी याने जी. डी. आर. का एक पैसा भी नहीं है। बिलकुल रीता है मेरा जेब। मनासा से चला था तो जिस समय बस में बैठा मेरा जेब में कुल 106 (एक सौ छह) भारतीय रुपये थे। वापस दिल्ली उतरूँगा तब मेरे पास फिर भी 29 रुपये बचेंगे। याने कुल मिलाकर 77 रुपया मेरा इस यात्रा में खर्च हुआ है। मेरे हिसाब से यह राशि फिर भी अधिक है। यह सारा खर्च भारत में ही हुआ। दिल्ली में टैक्सी और चाय-कॉफी आदि का। भारतीय मुद्रा तो पालम हवाई अड्डे के भीतर घुसते ही अन्दर वाले रेस्तराँ में भी स्वीकार नहीं की जाती है। हम वहीं से पंगु हो जाते हैं। पालम में ही हम लोग विदेशी भूमि पर मान लिये जाते हैं। चाय-कॉफी या कोकाकोला के लिए भी भीतर वाला, डालर या पौण्ड ही लेता है। खैर फिर भी 29 रुपया मुझे दिल्ली में बहुत लग रहा है। मेरा काम चल जायेगा। फिर वहाँ सुरेन्द्र मिल ही जायेगा।

शायद तू भी नहीं जानता है कि मेरी इस जी. डी. आर. और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिये मारीशस वाली इसी अगस्त की विदेश यात्रा का सारा व्यय किसने किया? यह सवाल अवश्य ही उत्तर चाहता है। मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि इन दोनों यात्राओं के लिए मैंने भारत सरकार या किसी भी प्रान्त की किसी सरकार से एक पाई का भी खर्च नहीं करवाया है। मैं मारीशस गया तो वहाँ की सरकार के खर्च से और यहाँ आया हूं तो भी सारा व्यय भारत-जर्मन गणवादी मैत्री संघ तथा जी. डी. आर. के खर्च से ही।

मेरी ये यात्राएँ कितनी उपयोगी होंगी यह तो भारत आकर ही ज्ञात हो सकेगा। बड़ा कठिन होगा इस देश को छोड़ना। एक भावनात्मक रिश्ता जो हो गया है यहाँ से। पर हर यात्रा का अपना एक समापन होता है। यह वापसी भी इस यात्रा की एक आवश्यक शर्त थी। मैं भारत आने के पूर्व एक बार पूर्व में मुँह करके इस देश के लिये अपनी मंगल कामना और सारे दल की यात्रा के लिये शुभकामना हेतु प्रार्थना करने के लिये कलम रख रहा हूँ।

सब को मेरा आदर देना।

भाई

बालकवि बैरागी

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