साहित्यिक सोशल मीडिया पटल और हिंदी साहित्य // सुशील शर्मा

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साहित्यिक सोशल मीडिया पटल और हिंदी साहित्य

सुशील शर्मा

साहित्य सृजन के लिए वर्तमान में जब सोशल मीडिया उपयुक्त माध्यम है, तब भी रचनाकारों का पुस्तकों की छपाई के प्रति मुड़ना कुछ संशय में लाकर खड़ा कर देता हैंl पहले प्रकाशित पुस्तकें और अख़बारों में प्रकाशित रचनाएँ पाठक खोजती थी और जोड़ती थी, जबकि आज के दौर में यही काम-फेसबुक, व्हाट्सअप और ट्विटर के साथ ब्लॉग और निजी अंतरजाल कर रहे हैं।

सोशल मीडिया की आभासी दुनिया की साहित्य ने हमेशा बुराई की है उसके मूल में शायद एक पूर्वाग्रह ही था या नई तकनीकी से अपरिचित होने का एक बहाना। आज वह अपरिचय कम हुआ है। आज हिंदी में आलोचना की गिरती साख और सोशल साइट पर तेजी से फैलते आत्मप्रचार की आत्ममुग्ध कोशिशों के बीच कोई संबंध है क्या? हालांकि दोनों अलग चीजें हैं। मगर संबंध है तभी तो आलोचना सिकुड़ रही है और आत्मप्रचार को पंख लग गए हैं। हिंदी सोशल साइट पर नजर डालें तो आत्मप्रचार और आत्ममुग्धता का जो नजारा वहां दिखाई देता है वह हिंदी साहित्य समाज में घटती आलोचनात्मक प्रवृत्ति की दयनीय परिणति का मुखर उदाहरण है।

जब भी कोई नया माध्यम आता है, वह अपने साथ नया मिजाज और नई जमात लेकर आता है। वह पुराने सामाजिक-साहित्यिक संबंधों की जगह नए संबंधों को नया स्पेस देता है। हिंदी सोशल साइट पर अब ऐसे लोगों की बड़ी जमात है, जिसे इसी माध्यम के जरिए रचनात्मकता के पंख नसीब हुए हैं। इस माध्यम ने रचनात्मक स्पेस का विस्तार किया है और उसमें ऐसे लोग दाखिल हुए हैं, जिनके पास कोई मंच नहीं था। प्रकाशन के मंच से वंचित लोगों को इस माध्यम ने अभिव्यक्ति-सुख का अनंत आकाश दिया है।

सोशल साइट पर तेजी से फैलते आत्मप्रचार की आत्ममुग्ध कोशिशों के बीच रचनात्मकता कहीं खो सी गई है।

एक मिनिट में रचना लिख कर दूसरे ही मिनिट रेस्पोंसों का स्वाद लेना हमें अधीर बना देता है और जो अपने वालों की वाह वाह और जलने वालों की थू थू में पता ही नहीं चलता कि रचना का स्तर क्या है?

रचनाओं की बाढ़ में न तो ठीक से पठन पाठन होता है न ही समीक्षा।

सिर्फ आत्ममुग्धता और कोरी संतुष्टि कि साहित्य सेवा कर रहा हूँ।

इधर सोशल मीडिया के चलते चोरी की घटनाएं बढ़ी हैं जो कि विकृत मानसिकता को प्रदर्शित करती हैं।

सम्मानों की भूख तो पहले से ही थी है इन साहित्यिक पटलों ने उस भूख की आग में घी डाल दिया है।

धीरे-धीरे ही सही, सभी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं ने सोशल साईट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

इस लोकतांत्रिक स्पेस में बहुत सारा कचरा है, इसमें दो राय नहीं। इसकी बड़ी वजह यह है कि यहां कोई छन्नी नहीं है। गुणवत्ता के लिए कोई तंत्र विकसित नहीं हुआ है। इसलिए जो भी भावोच्छवास है वह साहित्य की शक्ल में परोसा जा रहा है। उसके अपने उपभोक्ता और दाद देने वाले भी हैं। लेकिन कचरा कहां नहीं है। खराब किताबें नहीं छपतीं क्या?

साहित्यिक पटलों पर रचनाशीलता से ज्यादा रचना पर मनमानी है। कोई कविता अच्छी लगी, शेयर कर ली। बस इतना ही। कूड़ा-कबाड़ा भी कम नहीं होता। लघु पत्रिका आंदोलन व्यावसायिक घरानों की पत्रिकाओं के लोप होते जाने का परिणाम था।

साहित्यिक पटल ऐसा नशा परोसते है कि चस्का लग जाता है। गंभीर विषयों पर सोचने वाला रचनाकार छोटी-मोटी, हल्की-पतली टिप्पणी करके खुश हो लेता है, क्योंकि वहां तत्काल लाइक मिलने लगता है। यह एक भ्रम में डालता है। रचनाकार को इससे बचना होगा। खासकर तब, जब उसकी रचनाशीलता प्रभावित होने लगे।

मगसम जैसे साहित्यिक पटल इस सोशल मीडिया का सही उपयोग करने में यूं कहें कि हिंदी साहित्य के संवर्धन को नई तकनीकी से जोड़ने में सक्षम सिद्ध हुए हैं।

और ये भी सच है कि भविष्य का साहित्य इलेक्ट्रानिक प्लेटफ़ार्म पर रचा जायेगा । जो दीवार पर लिखा नहीं पढ़ पा रहे उनके अंधेपन का कोई इलाज नहीं । हाँ, वे साहित्यिक बौद्धिकता की ठेकेदारी बंद कर दें, क्योंकि उनके रेत का क़िला उसी सोशल मीडिया ने ढहा दिया जिसकी आलोचना वे करते नहीं थकते ।

सोशल मीडिया जैसा प्रभावी माध्यम मिलने से अपनी भाषा मे भावों को व्यक्त कर भाषा का विस्तार भी हो रहा है और कहीं न कहीं हिन्दी और अँग्रेजी की प्रतिस्पर्धा भी कम होती दिख रही है जो की एक स्वस्थ प्रजातन्त्र के विकास मे सहभागी प्रयास का प्रतीक है। भाषाओं के लिए समान आदर भाव का विकास होना, भाषिक स्तर पर अपनी रोटियाँ सेंकने वालों पर कुठाराघात भी साबित हो सकता है।

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