विज्ञान-कथा : जुलाई-सितम्बर - 2018 // संपादकीय // डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

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संपादकीय

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सम्पादकीय

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

बहुआयामी विज्ञान लेखन में पारंगत : श्री विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

श्री विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी से परिचय भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘‘विज्ञान कथा’’ के प्रकाशन के प्रारम्भिक दिनों से ही था। उनकी विज्ञान कथाएँ पत्रिका में प्रकाशित होती रहती थीं। प्रगाढ़ता का प्रारम्भ विज्ञान कथा के अजमेर एवं वाराणसी अधिवेशनों से हुआ जो आज तक बना है।

कुछ ही मास पूर्व आप शिक्षक संघ के अधिवेशन के प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या सपत्नीक आये थे। वहीं पर भेंट हुयी।

चतुर्वेदी जी की इच्छानुसार इन लोगों ने गुप्तारघाट देखा- श्री राम के मंदिर में पूजा की और सरयू के तट से उसका अवलोकन करने के उपरान्त गुलाब-बाड़ी को भी देखने गए। गुलाबबाड़ी जो मेरे आवास से अनुमानतः 500 मीटर की दूरी पर है, अवध के पहले नवाब शुजाउद्दौला का मकबरा है, जिसे उसकी बड़ी पत्नी जो बहू बेगम के नाम से विख्यात थीं, ने निर्माण कराया था। यह भारतीय-इरानी स्थापत्य का एक बेजोड़ नमूना है। इसका अवलोकन कर चतुर्वेदी दम्पत्ति मेरे आवास पर आये। मेरी पत्नी का उनकी अर्धांगनी से विज्ञान कथा के पूर्व अधिवेशनों से परिचय था। चाय पान और वार्तालाप के उपरान्त चतुर्वेदी दम्पत्ति की उनके अयोध्या आवास पर पहुँचा दिया। इसी भेंट के अवसर पर उनके कृतित्व पर केन्द्रित अंक निकालने का निश्चय हुआ था।

चतुर्वेदी जी की लेखनी विज्ञान लेखन के विविध आयामों पर चली है। उन्होंने विज्ञान लोकप्रिय करण हेतु अनेक लेख, विज्ञान कथाएँ, बाल विज्ञान कथाएँ आदि ही नहीं लिखी वरन वे सक्रियता से विज्ञान लोकप्रियकरण कार्य में लगे रहे। उनकी यह अभिरुचि आज तक बनी हुई है।

चतुर्वेदी जी की बाल विज्ञान कथाएँ इस विधा से संबंधित विविध पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रही हैं।

इस अंक में उनकी कुछ विज्ञान कथाएं पाठकों के मनोरंजन हेतु दी जा रही हैं। उनकी विज्ञान कथाओं में सहजता के साथ विज्ञान के तथ्यों का संपुट देखने को मिलता है, जो कथा को रोचकता प्रदान करता है। साथ ही साथ इन विज्ञान कथाओं में भारतीयता की झलक के साथ भारतीय मनीषा द्वारा निर्धारित जीवन दर्शन के बिम्ब भी विद्यमान रहते हैं। चतुर्वेदी जी और इनका परिवार भारतीयता की भावना से ओत प्रोत है।

इनका कथाओं की दूसरी विशेषता है, उनका मध्यम कलेवर, जिसमें कुशलता से विज्ञान के तथ्य निरूपित होते हैं।

कथाओं का प्रवाह सहजता और स्पष्टता से पाठक तक विज्ञान कथा के संदेश को सुगमता से पहुँचा देता है।

चतुर्वेदी जी संस्कृत भाषा में निपुण हैं, इसी कारण कथाओं में इन्होंने अपने पात्रों के नामों के चयन में कुशलता दिखायी है तथा इनके विज्ञान लेखों में यह संस्कृत का ज्ञान प्राचीन उद्धरणों के माध्यम से प्रकट होता है। चतुर्वेदी जी की अक्षर जननी इसी प्रकार विज्ञान लेखन की प्रत्येक विद्या को परिपूरित करती रहे यही कामना है।

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