शिक्षा में सतत तथा व्यापक मूल्यांकन-एक व्यापक दृष्टिकोण // सुशील शर्मा

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सतत तथा व्यापक मूल्यांकन-एक व्यापक दृष्टिकोण

सुशील शर्मा


सतत तथा व्यापक मूल्यांकन का अर्थ है छात्रों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की प्रणाली जिसमें छात्र के विकास के सभी पक्ष शामिल हैं।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के उद्देश्य के रूप में जिन मुख्य बातों का सबसे ज़्यादा ख्याल रखा गया वो हैं :

1. बाल केन्द्रित, नियमित, व्यापक और प्रभावशाली आकलन व्यवस्था को अपनाना।

2. बच्चों में तनाव को कम करते हुए  उन्हें रचनात्मक रूप से सीखने के अवसर उपलब्ध कराना।

3. कक्षा-कक्ष में आकलन की प्रक्रिया को बेहतर बनाने और सीखने का वातावरण निर्मित करने के साथ-साथ आकलन को एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाना।

4. सीखे गए की बजाए सीखने के लिए आकलन पर ध्यान केन्द्रित करना।

यह निर्धारण के विकास की प्रक्रिया है जिसमें दोहरे उद्देश्यों पर बल दिया जाता है। ये उद्देश्य व्यापक आधारित अधिगम और दूसरी ओर व्यवहारगत परिणामों के मूल्यांकन तथा निर्धारण की सततता में हैं। इस योजना में शब्द ‘‘सतत’’ का अर्थ छात्रों की ‘‘वृद्धि और विकास’’ के अभिज्ञात पक्षों का मूल्यांकन करने पर बल देना है, जो एक घटना के बजाय एक सतत प्रक्रिया है, जो संपूर्ण अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया में निर्मित हैं और शैक्षिक सत्र के पूरे विस्तार में फैली हुई है। इसका अर्थ है निर्धारण की नियमितता, यूनिट परीक्षा की आवृत्ति, अधिगम के अंतरालों का निदान, सुधारात्मक उपायों का उपयोग, पुनः परीक्षा और स्वयं मूल्यांकन।

दूसरे शब्द ‘‘व्यापक’’ का अर्थ है कि इस योजना में छात्रों की वृद्धि और विकास के शैक्षिक तथा सह-शैक्षिक दोनों ही पक्षों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। चूंकि क्षमताएं, मनोवृत्तियां और अभिरूचियां अपने आप को लिखित शब्दों के अलावा अन्य रूपों में प्रकट करती हैं अतः यह शब्द विभिन्न साधनों और तकनीकों के अनुप्रयोग के लिए उपयोग किया जाता है (परीक्षा और गैर-परीक्षा दोनों) तथा इसका लक्ष्य निम्नलिखित अधिगम क्षेत्रों में छात्र के विकास का निर्धारण करना हैः

1 ज्ञान

2 समझ / व्यापकता

3 लागू करना

4 विश्लेषण करना

5 मूल्यांकन करना

6 सृजन करना


योजना के उद्देश्य

1 बोधात्मक, साइकोमोटर और भावात्मक कौशलों के विकास में सहायता करना

2 विचार प्रक्रिया पर जोर देना और याद करने पर नहीं

3 मूल्यांकन को अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया का अविभाज्य अंग बनाना

4 नियमित निदान और उसके बाद सुधारात्मक अनुदेश के आधार पर छात्रों की उपलब्धि और अध्यापन-अधिगम कार्यनीतियों के सुधार हेतु मूल्यांकन का उपयोग करना

5 निष्पादन का वांछित स्तर बनाए रखने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण के रूप में मूल्यांकन का उपयोग करना

6 एक कार्यक्रम की सामाजिक उपयोगिता, वांछनीयता या प्रभावशीलता का निर्धारण करना और छात्र, सीखने की प्रक्रिया और सीखने के परिवेश के बारे में उपयुक्त निर्णय लेना

7 अध्यापन और अधिगम की प्रक्रिया को छात्र केंद्रित गतिविधि बनाना।

इस प्रकार यह योजना एक पाठ्यचर्या संबंधी पहल शक्ति है, जो परीक्षा को समग्र अधिगम की ओर विस्थापित करने का प्रयास करती है। इसका लक्ष्य अच्छे नागरिक बनाना है जिनका स्वास्थ्य अच्छा हो, उनके पास उपयुक्त कौशल तथा वांछित गुणों के साथ शैक्षिक उत्कृष्टता हो।


राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005

1. यह विद्यालयी शिक्षा का अब तक का नवीनतम राष्ट्रीय दस्तावेज है ।

2. इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के के शिक्षाविदों,वैज्ञानिकों,विषय विशेषज्ञों व अध्यापकों ने मिलकर तैयार किया है ।

3. मानव विकास संसाधन मंत्रालय की पहल पर प्रो0 यशपाल की अध्यक्षता में देश के चुने हुए विद्वानों ने शिक्षा को नई राष्ट्रीय चुनौतियों के रूप में देखा ।


मार्गदर्शी सिद्धान्त---

1. ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ा जाए।

2. पढाई को रटन्त प्रणाली से मुक्त किया जाए।

3. पाठ्यचर्या पाठ्यपुस्तक केन्द्रित न रह जाए।

4. कक्षाकक्ष को गतिविधियों से जोड़ा जाए।

5. राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति आस्थावान विद्यार्थी तैयार हो।


प्रमुख सुझाव---

1. शिक्षण सूत्रों जैसे-ज्ञात से अज्ञात की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर आदि का अधिकतम प्रयोग हो।

2. सूचना को ज्ञान मानने से बचा जाए।

3. विशाल पाठ्यक्रम व मोटी किताबें शिक्षा प्रणाली की असफलता का प्रतीक है।

4. मूल्यों को उपदेश देकर नहीं वातावरण देकर स्थापित किया जाए।

5. अच्छे विद्यार्थी की धारणा में बदलाव आवश्यक है अर्थात् अच्छा विद्यार्थी वह है जो तर्क पूर्ण बहस के द्वारा अपने मौलिक विचार शिक्षक के सामने प्रस्तुत करता है।

6. अभिभावकों को सख्त सन्देश दिया जाए कि बच्चों को छोटी उम्र में निपुण बनाने की आकांक्षा रखना गलत है।

7. बच्चों को स्कूल से बाहरी जीवन में तनावमुक्त वातावरण प्रदान करना।

8. “कक्षा में शान्ति” का नियम बार-बार ठीक नहीं अर्थात् जीवन्त कक्षागत वातावरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

9. सहशैक्षिक गतिविधियों में बच्चों के अभिभावकों को भी जोड़ा जाए।

10. समुदाय को मानवीय संसाधन के रूप में प्रयुक्त होने का अवसर दें।

11. खेल आनन्द व सामूहिकता की भावना के लिए है, रिकार्ड बनाने व तोड़ने की भावना को प्रश्रय न दे।

12. बच्चों की अभिव्यक्ति में मातृ भाषा महत्वपूर्ण स्थान रखती है। शिक्षक अधिगम परिस्थितियों में इसका उपयोग करें।

13. पुस्तकालय में बच्चों को स्वयं पुस्तक चुनने का अवसर दें।

14. वे पाठ्यपुस्तकें महत्वपूर्ण होती है जो अन्तःक्रिया का मौका दें।

15. कल्पना व मौलिक लेखन के अधिकाधिक अवसर प्रदान करावें।

16. सजा व पुरस्कार की भावना को सीमित रूप में प्रयोग करना चाहिए।

17. बच्चों के अनुभव और स्वर को प्राथमिकता देते हुए बाल केन्द्रित शिक्षा प्रदान की जाए।

18. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मनोरंजन के स्थान पर सौन्दर्यबोध को प्रश्रय दे।

19. शिक्षक प्रशिक्षण व विद्यार्थियों के मूल्यांकन को सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाए।

20. शिक्षकों को अकादमिक संसाधन व नवाचार आदि समय पर पहुँचाएँ जाएँ।

पाठ्यक्रम बच्चों के सर्वांगीण विकास करने वाला हो। स्कूल और कक्षाओं में पढ़ने-पढ़ाने के तरीके बच्चों की अंतर्निहित क्षमताओं को उभारे और उनमें अपना ज्ञान निर्माण स्वयं करने की क्षमता विकसित हो। बच्चों ने जो सीखा है उसका मूल्यांकन उनके पढ़ने के दौरान लगातार होता रहे और उन्हें परीक्षा का भय नहीं लगे। परीक्षाएं बच्चों का मूल्यांकन भी बताने वाली हो साथ ही उससे शिक्षक को अपनी शिक्षण योजना में बदलाव करने का आधार एवं मौका भी मिले।

इस प्रकार सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन की प्रक्रिया वास्तव में व्यापक गुणवत्तासुधार प्रक्रिया ही है। इसे सीखने-सिखाने की विधा एवं विद्यार्थी के स्कूल-आधारित मूल्यांकन व्यवस्था के रूप में ही समझा जाये जिसमें विद्यार्थी के सीखने के सभी पक्षों पर ध्यान दिया जाता है।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में सततता जहां एक ओर कक्षा प्रक्रिया के रूप में होगी वहीं सावधिक मूल्यांकन के रूप में भी होगी। व्यापकता उन मुद्दों को प्रमुख रूप से रेखांकित करेगी जो बच्चों के विभिन्न कौशल, भावात्मक और क्रियात्मक पक्ष को उजागर करेगी। सतत और व्यापक मूल्यांकन पर काम करते हुए यह समझ बनी कि यह साल के अन्त में या पाठ के अन्त में होने वाला आकलन नहीं है वरन् इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण यह है कि कैसे बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में शामिल कर सीखने के वातावरण को रचनात्मक बनाया जाए ताकि सीखना पहले की अपेक्षा सुलभ हो सके।

सतत तथा व्यापक मूल्यांकन की कुछ कमियां 

सतत का अर्थ लिया गया परीक्षाओं की बारम्‍बारता बढ़ाने से जिसके चलते मासिक परीक्षाओं के स्थान पर अब हर हफ्ते टेस्‍ट लिए जाने लगे। अब टेस्ट होंगे तो पाठ्यक्रम भी होगा ही और शिक्षकों पर उसे पूरा करवाने का दबाव भी होगा। और बात केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करवाने की ही नहीं, पाठों का कार्य पूर्ण करवाकर उसे जाँचने की, बच्चों को गृहकार्य देने और वह पूरा हुआ कि नहीं इसे सुनिश्चित करवाने की भी थी। लिहाजा बच्चों पर दबाव कम होने की बजाय बढ़ता ही चला गया। पहले कम से कम शाम को घर से बाहर खेलने का मौका भी मिल जाता था, मगर सी.सी.ई. के आने के बाद तो जीवन ट्यूशन, किताबों और गृहकार्य में ही सिमटकर रह गया। किसी स्कूल में सोमवार को सी.सी.ई. डे बना लिया गया तो किसी स्कूल में शुक्रवार को। एक विषय खत्म और दूसरा विषय चालू। शिक्षक भी नियमों के आगे मजबूर थे, यदि कक्षा में कोई नवाचार करवाना भी चाहते या बच्चों की कठिनाइयों का निदान करने हेतु कोई उपाय सोचना भी चाहते तो सी.सी.ई. मोहलत ही नहीं देता। स्कूलों के परीक्षा विभाग का काम और बढ़ गया। हर हफ्ते नया प्रश्नपत्र छपवाना, उसे व्यवस्थित और गोपनीय तरीके से सुरक्षित रखवाना और तय समय पर बँटवाना, समय पर उत्तर पुस्तिकाएँ जँचवाना,अंकों को ग्रेड में बदलवाना, उन्हें संधारित करना जैसे तमाम कार्य थे, जो अतिभार के रूप में परीक्षा विभाग पर आन पड़े थे। मजे की बात यह कि प्रश्नपत्र अब भी पारम्‍परिक पद्धति से ही बनाए जा रहे थे।

सततता का हश्र सतत चलने वाली परीक्षाओं के रूप में हुआ तो व्यापकता केवल गतिविधियों में सिमटकर रह गई। हर सोमवार कथा-कथन, मंगलवार कविता पाठ, बुधवार भाषण प्रतियोगिता, गुरुवार खेलकूद आदि के लिए आवंटित कर दिए गए और इनमें बच्चों के प्रदर्शन के अनुरूप शिक्षकों द्वारा ग्रेड दिए जाने की प्रक्रिया की जाने लगी। व्यक्तिगत–सामाजिक गुणों के मूल्यांकन हेतु कुछ गुण छाँट लिए गए और बच्चों में उन गुणों को देखकर उन्हें श्रेणीबद्ध करने की कवायद शुरू हो गई। क्लब, बालसभा, सर्वे, प्रकल्प आदि तो थे ही। 

सरकारी स्कूली तंत्र में शिक्षक सबसे बंधनयुक्त प्राणी है जिसे ऊपर से आए हर आदेश का पालन करना है। चुनाव से लेकर जनगणना तक के हर कार्यक्रम में उसकी उपस्थिति ज़रूरी है, भले ही इससे उसकी कक्षाएँ प्रभावित हो रही हों, काम बाधित हो रहा हो। 

निजी स्कूलों में भी हाल कुछ ज्यादा अच्छे नहीं हैं। शायद पाँच प्रतिशत स्कूल वास्तव में इन सारी अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं।

NCF और RTE अपनी अनुशंसाओं में एक और बड़ी ही महत्वपूर्ण बात कहते हैं। वे इन सुधारों को क्रम से लागू करने की बात भी कहते हैं अर्थात नीचे से ऊपर के क्रम में यानी स्कूल का ढाँचा सुधारें, शिक्षकों का स्तर सुधारें, मानसिकता बदलें, पाठ्यपुस्तकें बदलें, प्रशिक्षणों का स्वरूप बदलें, शिक्षक सशक्त हों क्योंकि यह सब हो चुकने के बाद परीक्षा प्रणाली में सुधार स्वयंमेव ही आएगा।  पाठ्यपुस्तकों के क्षेत्र में तो NCERT ने कुछ प्रयास किया भी है मगर राज्य अभी भी इससे अछूते हैं।

(यह आलेख शिक्षा से सम्बंधित अन्य आलेखों से प्रभावित हैं )

सुशील शर्मा

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