लघुकथा // जन्म - दिन // डॉ सुरिंदर कौर नीलम

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

लघुकथा

जन्म - दिन

डॉ सुरिंदर कौर नीलम

image

--

क्यों रूला रही हो बच्चे को ?

घरों में काम करने वाली बाई से दादा जी ने पूछा।

का करें मालिक! जहां हम काम करते हैं न, वहां कल उनके बचवा का जनम दिन था,दूर से खड़े हो कर उसे केक काटते हुए देखता रहा, तभी से ज़िद पकड़े है कि हम भी केक काटेंगे।

पांच बरस का हो गया है न,अब सब बूझता है।

चेहरे पर उदासी एवं लाचारी के भाव लिए वह बोलती गयी।.

हम ठहरीं गरीब मालिक! दो जून के रोटी नाही चलत है तो ई सब चोंचले कहां से करीं।..

हमरा बस्ती ईहां से जरी दूर है, आने-जाने का गाड़ी भाड़ा भी नाहीं जुटत है, तो सबेरे ही बचवा को यहीं पास के इसकूल पंहुचा कर, सभी घरन में काम कर दोपहर में बचवा को इसकूल से ला कर यहीं पार्क में एक- आध घंटा सुस्तात लेत हैं, फिर दूसर बेला के सारा काम निपटा कर ही घर लौटत हैं।..

आप को तो मालिक हम रोज़ देखत हैं, यहीं पार्क में।

दादा जी को मौका मिला तो बोले--

अच्छा! तुम हमारी बिल्डिंग में भी मिश्रा जी के घर काम करती हो न?

जी मालिक!

ठीक है,कल रविवार दोपहर को तुम अपने बच्चे को लेकर मेरे घर आ सकती हो क्या?

हां हां मालिक! वैसे भी हम काम के वास्ते एक घर और ढूंढत रहे।

डिनर पर दादा जी ने बेटे और बहू से कहा-

मेरे जन्म- दिन पर तुम सब यही चाहते हो तो ठीक है,कल मंदिर से लौट कर दिन में ही केक ले आना।

मैंने अपने दो- तीन दोस्तों को भी बुला लिया है, उन्हें रात में आने - जाने की परेशानी होती है, आखिर हम परिवार के लोग ही तो हैं!

समय परिवर्तन से कोई फर्क तो पड़ेगा नहीं।

आज सबेरे से ही दादा जी के चेहरे पर अलग सी रहस्यमयी मुस्कान थी।

पापा आए नहीं आपके दोस्त?

केक सजा दिया है, बहू ने पूछा।

तभी दस्तक सुन दादा जी ने अपनी उमंग का दरवाजा खोला।

बाई को बच्चे के साथ अंदर बुलाया।

सामने केक रखा देख बाई ने झट बच्चे को अपने पीछे कर लिया और" बेबसी" के घेरे में खड़ी हो बुदबुदाई--

लो! अब फिर ये रोने लागीं।

अपार संतुष्टि के भाव लिए दादा जी ने बच्चे की बांह पकड़ी और प्यार से बोले--

चलो आओ बेटा! आगे बढ़ो केक काटो।

---

IMG-20170801-WA0013

डॉ सुरिंदर कौर नीलम

पता- सी डी 755, सेक्टर-2,साइट-5,एच.ई.सी.कालोनी,

रांची-834004, झारखंड,


संक्षिप्त परिचय

झारखंड सरकार द्वारा साहित्य सम्मान,

लोक सेवा समिति द्वारा झारखंड रत्न,

दूरदर्शन केन्द्र रांची द्वारा साहित्य सेवा सम्मान

काव्य संग्रह एवं काव्य संकलन प्रकाशित

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघुकथा // जन्म - दिन // डॉ सुरिंदर कौर नीलम"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.