बाबूजी ,जीवन और कर्म की संघर्ष यात्रा ( श्री शिशुपाल सिंह यादव , १८ अप्रेल १८९८ - ४ अक्टूबर १९७६) // अरुण यादव

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बाबूजी ,जीवन और कर्म की संघर्ष यात्रा

( श्री शिशुपाल सिंह यादव , १८ अप्रेल १८९८ - ४ अक्टूबर १९७६)

अरुण यादव  | 

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पारिवारिक पृष्ठ भूमि

विप्पन्नता से घिरा एक छोटा परिवार था | दादी मालती थी | दो नन्हे बच्चे थे | पीला और बिलटू | बड़े पिताजी जिन्हें हम दद्दा कहते थे , जिनका नाम गोपाल था | खपरैल वाला सीलन भरा घर था | घर से लगा हुआ कोठा और उस कोठे पर दो -चार धेनु गायें थी |

तुलसी का चौरा था | जहां  प्रति शाम दीप प्रज्वलित होती थी | नन्हे दो बच्चों को पिता का आशीष मिला ही नहीं | बाबूजी अपने संस्मरणों की श्रुति से कभी कहा करते थे ,पिता बलदेव संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे और कद काठी पहलवान जैसी थी |

बाबूजी का नामकरण शिशुपाल उनके बड़े पिताजी बहोरन ने रखा था | शिशुपाल और हरपाल मालती की आंखों के दो तारे थे, और उनके दोनों पुत्रों ने अपने संघर्ष और सामर्थ्य से परिवार की विपन्नता  की श्रुति को संघर्ष के पुण्य श्लोकों का अनुवाद करते हुए सही यंत्रों में परिणित किया |

सचमुच वे अपनी पीढ़ी के जुझारू पुरुष थे | दद्दा गोपाल की शिक्षा प्रायमरी कक्षाओं तक थी मगर विद्यानुरागी होने की वजह से विद्या की महिमा और गरिमा को भलीभांति जानते थे | अक्सर उन्हें रामचरित मानस का पाठ करते हुए मैंने देखा | वे गाय चराने सुबह चार बजे निकल जाते थे | हाथ में चोंगी और चकमक पत्थर तथा सूखा हुआ सोल उनकी बंडी की जेब का हिस्सा हुआ करती थी| बारिश से बचने को खुमरी पास होती थी |

उस पीढ़ी की संघर्ष यात्रा का आदिपुरुष सौम्य और शांति की प्रतिमूर्ति थे | समय के थपेडों से लड़ाते और अपने नन्हे-नन्हे दो सौतेले भाइयों को पितृवत स्नेह -दुलार देते हुए समय के साथ ताल ठोककर लड़ने में वे सदा तत्पर रहे |

तेजपुंज लघु तापस : बाबूजी संस्मरण :

उस संस्मरण यात्रा की संघर्ष-गाथा लेकर निकला हूँ ,जिसमें आग है ,आंच है | आग कहने से जहां विध्वंस की भूमिका नजर आती है ,मगर यहां निर्माण की आहुति है ,स्वाहा है | पूरा का पूरा बाबूजी का जीवन एक होम -यज्ञ की तरह तो था |

राष्ट्रीय चेतना के कवि थे बाबूजी | उनका जन्म १८ अप्रेल १८९८ को हुआ था |वे महज दो साल के थे ,तब उनके पिता परलोक सिधार गए | माता मालती विदुषी महिला थी उन्होंने पाला ,पोसा ,सँवारा और पढ़ाया-लिखाया |

     घर में गरीबी का एक बिरवा था तुलसी चौरे पर ,विपन्नता की महक लिए ,मगर उसकी भी रोज पूजा होती थी , दिए की आरती उतारकर |

पिताजी प्राइमरी पास हुए और चार रूपये की मासिक छात्रवृत्ति मिली | ये चार रूपये, जिसकी लंबाई-चौड़ाई और आयतन ,समय के हिसाब से और विपन्नता के पासंग, बहुत बड़ा था |

लघु तापस की यह पहली फलीभूत साधना थी | उस साधना का तेज-पुंज दिव्य था | तब से लेकर जीवन पर्यन्त बाबूजी परिवार की लता को नैतिक संबल देते रहे | परिवार के सदस्यों से लिया कुछ भी नहीं | लघु तापस बना यह शिशु संघर्ष यात्रा में निकल पड़ा,अपने जीवन के की पडावों पर और समय के विलोम पक्षों पर ओरहार करते हुए सामर्थवान शिशुपाल बने |

विपन्नता के कारण रायपुर में जाकर हाईस्कूल में भर्ती नहीं हो सके | वे अपने छात्र जीवन में मेघावी थे | कक्षा में प्रथम उत्तीर्ण होते थे | समय और सामर्थ्य के बन्द दरवाजे को स्वयं खोलते हुए सन १९१६ में बाबूजी नार्मल स्कूल  में दाखिल हुए और वहां से थर्ड ईयर ट्रेंड शिक्षक होकर १९१९ में निकले और शिक्षक पदस्थ हो गए | १९१९ में ट्रेनिंग के बाद दुर्ग में वे हेडमास्टर हो गए तथा पढाने के साथ स्वयं भी अध्ययनशील रहे | वेदांत ,उपनिषद और पुराण सभी कुछ पढ़ डाला | मनन और चिंतन उनका नित्य का काम बन गया था | धर्म भाषा और राजनीति की गहरी पकड़ तथा अध्ययन का सुफल युवा शिशुपाल के मांस से कविता के रूप में प्रस्फुटित हुआ , वैसे भी कविता मनोविकारों की सजीव प्रतिमा ,होने के साथ लोकोत्तर आनन्द की जननी भी तो है |

साहित्योदय का प्रथम सूर्य बाबूजी ने १९१९ में देखा जब उनकी रचना का प्रकाशन 'सुकवि' जैसे तत्कालीन यशस्वी पत्रिका में हुआ |

समय के शिलालेख पर

वे गुरूजी बने | घर की विपन्नता कुछ थमी और सम्पन्नता की सुरभि भीनी-भीनी महकने लगी | साथ ही उस महक में साहित्यानुरागी की रागात्मकता छंदों  में,कवित्त में और घनाखारी में बिखरने लगी | बाबूजी कुशल कुशल वक्ता  ,कवि और लेखक थे |शिक्षक थे इसलिए छात्रोंपयोगी पुस्तकों की रचना की ,जिसमें दुर्ग जिले का भूगोल ,रचनादर्श और गणित की पुस्तक प्रकाशित हुई | ये पुस्तकें जिले के पाठ्यक्रम में शिक्षा विभाग द्वारा अनुशंसित  रही |

मूल रूप से मई बाबूजी को राष्ट्रीय चेतना का कवी मानता हूँ | आजादी के कुंकुमी भोर के पहले, चेतना  का अलाव जलाने वाले और जन-जीवन में जागरण -गीत गाकर सजग प्रहरी तैयार करने वाले कवियों की श्रेणी में बाबूजी दुर्ग जिले के अग्रगण्य कवियों की पंक्ति के सशक्त हस्ताक्षर थे |

सन १९३० में सेठ गोविन्ददास जी की अध्यक्षता में नमक कानून तोड़ने के सन्दर्भ में उनकी कविता प्रकाशित हुई और बाबूजी ने नमक कानून तोड़ने के इस राष्ट्रीय यज्ञ में भी भाग लिया | उनकी कविता लोकमत में प्रकाशित हुई |

स्वतन्त्रता संग्राम के दिनों में :

उनकी कविता की दो पंक्तियाँ पढ़ कर स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी जेल-यात्रा करते थे | बाबूजी की इन पंक्तियों को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अनुशंसित  किया था और स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों को इसके पाठ करने की अनुशंसा भी की थी ,कालजयी यशस्वी की वे पंक्तियाँ थी ,

ब्रिटिश युद्ध पर्यटन में ,जन-धन देना भूल है |

सकल युद्ध अवरोध कर ,स्तय अहिंसा मूल है ||

महात्मा की अनुशंसा के बाद मात्र ये पंक्तियाँ नहीं रह गई ,लोक-चेतना का आती=ग्रह करने वाली एक ज्योति शलाका साबित हुई |

बाबूजी दुर्ग नगर के ऐसे अक्षय -वैट थे जिसे शिवनाथ के पानी ने , यहां की उर्वर मिटटी ने ,यहां के स्वच्छंद आकाश ने अपने शब्दों की ऊर्जा देकर गढ़ा  था | आज भी नगर में जो साहित्यिक हरीतिमा दिखाई देती है ,उसके वे पुरखे थे | दुर्ग नगर में सर्वप्रथम श्री उदय प्रसाद जी उदय , श्री शिशुपाल सिह यादव एवं श्री पतिराम जी साव द्वारा हिंदी साहित्य समिति की स्थापना की गई |

इस भाव-परवान उर्वर धरती पर एवं पूण्य-सलिला शिवनाथ की करुणार्द्र धारा से यहां के काव्य क्षितिज में जिस हरीतिमा का निर्माण हुआ और उन पुरखे वट -वृक्षों की शाखाओ-प्रशाखाओं के संबल ने न जाने कितनी काव्य वल्लरियों को संबल मिला ,प्रोरसाहन मिला ,प्रेरणा मिली मार्ग-दर्शन प्राप्त हुआ ,पता नहीं  ...? मगर सच ये है की इन प्रयासों की वजह से यहां की काव्य-सलिला सदानीरा बनी रही |

साहित्य के प्रति बाबूजी की स्पष्ट स्वीकारोक्ति उनके एक लेख में यूँ झलकती है ,"मई अपने को साहित्यकार की श्रेणी में नहीं गिनता हूँ | कहि-कहि ऐसी इच्छा होती है कि जीतनी रचना मेरे द्वारा हुई हैं वे सब जला दी जाएँ | क्यों मैं लोगों को ठगूं की मैं कवि हूँ ,लेखक हूँ | मुझे वास्तव में कुछ नहीं आता ,सच पूछा जाय तो मैंने नकल नहीं की ,चोरी नहीं की | बस थोड़ा सा भाषा ज्ञान ठीक हो गया था ,उसके आधार पर चला था कवि और लेखक बनने पर यह कैसे संभव हो सकता है ..? इसके लिए संस्कार और प्रतिभा चाहिए मुझमें दोनों का अभाव था|"

"-हाँ ,मुझमे बड़ा ऐब है की मैं अपने को तीसमारखाँ समझता हूँ ,मैं अपने जीवन में किसी भी बड़े साहित्यकार से कभी साक्षात्कार न कर सका | मैं उनसे कभी नहीं मिला | यह मेरी कूप-मण्डूकता रही | या यूँ कहूँ अज्ञानता थी | मेरी सोच थी मिलकर भी करता क्या सिवा खुशामद के ....?"

"-जो कुछ होता है सब अच्छे के लिए होता है ', इस बात का मैं कायल हूँ ,इससे अधिक सन्तोष के लिए मैं क्या कहूँ " ? ( 'मैं और मेरा चेहरा', बाबूजी ले आलेख से ) बाबूजी अपने रचना संसार में कितने मौलिक हैं ,कितने उदात्त हैं | कवि  अपने सत्य के प्रति कितना आग्रह रखता है, अपनी क्षमता में विनम्रता और मानसी उदात्तता को व्यापक भाव से जन-मानस  के बीच परोसना किसी कला से कम नहीं ..| एक और ,वे अपने प्रति अधिक विनम्र से लगते हैं वहीं दूसरी तरफ स्वयं की ऊर्जा को पहचानने वाले दिनकर भी दिखाई देते हैं | वे कहते हैं ;-

"काव्य कला में भूषण सा, हो भाषा का विज्ञानी

मूछें ऐंठ उठे सुन जिसकी ,ओज भरी नव-वाणी  

जिसके काव्य-कलापों से हो ,झंकृत कोना-कोना

आज हमारे भारत खातिर ,ऐसा ही कवि होना "

बाबूजी दुर्ग नगर के भूषण थे | जो ओज कवि भूषण ने शिवा- क्षितिज में बोई थी वही ओज ,वही दीप्ति और वही काव्य-विभा का अनुशरण पिता ने दुर्ग की माटी में किया | उन्हें अपनी जन्म-भूमि से जो लगाव था उसके प्रति कहते हैं कि,मुझे मेरा दुर्ग अति प्रिय है ,परन्तु खेद है भगवान ने मुझे इतना छोटा और असमर्थ बनाया कि इसे बढाने और सँवारने में सहयोग दे न सका | स्वार्थी और समझदार तो दुर्ग में बहुत हैं ,मगर सही पहरा देने वाला

सैनिक एक नहीं  (बाबूजी-लेखनी  २.१०. ६८. )

वे दुर्ग के प्रहरी थे , उनकी रचनाओं में ललकार थी ,दृष्टव्य हैं ये पंक्तियाँ

अपनी बाहों में भर तुझको ,विहँस हिमालय तौल उठे |

सागर पड़-प्रक्षालन दौड़े ,उसमें अमृत घोल उठे ||

नभ के मूल निवासी भी तब ,गद-गद हो जय बोल उठे

ऐसी क्रांति मच दे कवि तू ,धरनी डगमग डोल उठे

       (कवि के प्रति कविता से )

स्थूल रूप से देखा जाए तो बाबूजी पर महात्मा गांधी जी के विचारों का सर्वाधिक  प्रभाव दृष्टिगोचर होता है | राष्ट्रीय स्वतन्त्रता  संग्राम के उस युग में सभी का ध्येय स्वतन्त्रता का सर्वोदय देखना ही था |

22 नवम्बर , १९३३ को दुर्ग में राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी जी का आगमन हुआ | मोती-तालाब मैदान में एक विशाल जन-सभा  का आयोजन किया गया था | गांधी जी के भाषण के पूर्व गांधी जी के स्वागत और अम्मान में दुर्ग के कवि श्री शिशुपाल सिह यादव एवं बोडग़ांव वाले श्री उदय प्रसाद उदय जी का कविता पाठ हुआ |

(आजादी के सिपाही -लेखक श्री जमुना प्रसाद कसार)

बापू के प्रति ,

बापू तुम आधार  सभी के ,इस युग के अवतार तुम्ही

हो गलहार गरीबो के तुम,सार तुम्ही संसार तुम्ही

अभिलाषा हो दीं दुखी की ,मूक जनो की भाषा हो

पराधीन आरत-भारत की , एक मात्र तुम आशा हो

निर्बल के बल तुम्ही जगत में ,तुम स्वातंत्र पुजारी हो

चर्खा-चक्र सुदर्शन धारी ,सेवाग्राम बिहारी हो

(लेखक : श्री अरुण यादव सुपुत्र श्री शिशुपाल सिंह यादव )

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