बालकहानी // कटखनी बिल्ली // सुधा भार्गव

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बालकहानी

सुधा भार्गव

कटखनी बिल्ली

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एक बिल्ली थी बड़ी मरखनी बड़ी कटखनी। किसी को देखते ही दाँत निकालकर घुर्राने लगती और किसी चूहे को देख लिया तो समझो उसकी खैर नहीं। चूहा भाग बिल्ली आई कहते ही बनता। उसमें एक खास बात थी। एक दिन में वह एक ही चूहा खाती और मजे से खर्राटे भर सो जाती । फिर तो चूहा उसकी कमर पर ही क्यों न फुदकने लगे उसे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।

बिल्ली के कारण चूहे बड़े परेशान! चाहे जब उनके परिवार से एक गायब हो जाता। कोई अपनी माँ को खोजता -सुबकता नजर आता तो कोई माँ बाबरी सी बच्चे को ढूंढती मिलती। सुबह उठते ही न राम -राम न श्याम- श्याम बस चेहरे पर दुख की काली परछाईं रहती --आज कौन कटखनी का शिकार हुआ!

एक दिन एक बुजुर्ग चूहे ने सब चूहों को बुलाया और कहा-“रोज बिल्ली हममें से किसी एक को न जाने कब -कब में चुपचाप गटक जाती है---- पता ही नहीं चलता । इससे तो अच्छा है हममे से कोई एक खुद ही उसके सामने हाजिर हो जाए। लेकिन पहले किसको भेजा जाए?”

नासमझ चूहे बच्चे फुदकते सामने आए –“हम, हम जाएँगे –हम जाएँगे।”

“अरे भागो यहाँ से। तुम्हारी तो खाने -खेलने की उम्र है। तुममें से कोई नहीं जा सकता। एक बड़ा चूहा चिल्लाया।

बच्चे डरकर पीछे हो गए। उनकी जगह जवान चूहों ने ले ली। बड़े जोश से चिल्लाए –“दादा चिंता न करो ,हम जाएँगे।”

“अरे चुप करो। तुममें से कोई चला गया तो तुम्हारी चुहिया रानी और बच्चों को कौन देखेगा?”आश्चर्य से जवान पीछे हट गए कि अब कौन जा सकता है।

बूढ़े चूहे दादा ने सिर खुजलाते हुआ कहा –“सोच रहा हूँ मैं ही पहले चला जाऊँ। मेरे बच्चे भी बड़े हो गए हैं । ज़िंदगी भी बहुत जी ली। बच्चे मेरे सामने कटखनी के पेट में चले जाएँ यह मैं नहीं सह सकता।”

“यह तुमने ठीक सोचा । पर तुमको अपने से पहले कैसे जाने दूंगा। तुमसे मैं बहुत प्यार करता हूँ दोस्त। तुम्हारे बिना कैसे रहूँगा!” दूसरा बुजुर्ग चूहा बोला।

“ठीक कह रहा है यह । लेकिन सबसे पहले मैं जाऊंगा। तुम लोग बाद में जाना।” अन्य मित्र आगे निकलकर बोला।

“यह कैसे हो सकता है? पहले मैं जाऊंगा—पहले मैं जाऊंगा।“ सारे वृद्ध चूहे दो पैरों के बल खड़े होकर पूंछ हवा में हिलाने लगे।

“उफ तुम समझते क्यों नहीं। एक बार में तो एक ही जाएगा। मैं तुम सब से बड़ा हूँ इस नाते मेरी बात भी माननी चाहिए। और हाँ तुममे से एक उस बिल्ली को खबर कर देना कि उसे कष्ट उठाने की जरूरत नहीं। हममें से एक चूहा खुद ही उसके पास पहुँच जाएगा।”

सबको दादा चूहे की बात माननी पड़ी पर उनकी आँखों के कोने गीले थे। बिल्ली को जब मालूम हुआ कि उसका शिकार खुद चलकर उसके पास आयेगा तो रात भर खुशी से इठलाती रही।

किसी भी वृद्ध चूहे को रात भर चैन न पड़ा। भोर होते ही वे अपने बिलों से निकल पड़े और एक लाइन में धीरे धीरे जंगल की ओर बढ़ने लगे। बिल्ली के पास आकर ही रुके। वहाँ बूढ़ा दादा पहले से ही मौजूद था। न ही बिल्ली समझ पाई कि यह मामला क्या है। न ही दादा की समझ में कुछ आया । बस दोनों अपलक उनकी ओर देख रहे थे। अंत में बिल्ली ने ही चुप्पी तोड़ी –“इतने सारे चूहे!तुम यहाँ क्या करने आए हो?मैं तो केवल एक खाऊँगी।”

“तुम हमारी जानी दुश्मन हो पर लगती तो बहन ही हो। अच्छा बहन बताओ –हम कैसे सहन कर सकते हैं कि हमारे रहते बड़ा भाई हमसे बिछुड़ जाए। हम इसके बिना नहीं रह सकते है। इससे तो अच्छा है इसको छोड़ मुझे खा लो। दूसरा चूहा बोला।”

“अरे तू कैसी बात कर रहा है। बहन इसकी बात न सुनो । इसकी तो मति मारी गई है। जब यह मेरे बिना नहीं रह सकता तो मैं इस छोटे के बिना कैसे रहूँगा। जल्दी से मुझ खाकर अपनी भूख मिटाओ। तुम्हें भूख भी लग रही होगी।”बूढ़े दादा बोले।

बिल्ली उनकी बातें सुन हैरत में रह गई। उसने न कभी किसी को इतना प्यार किया था और न ही किसी को इतना प्यार करते देखा था। वह तो सिर्फ अपने को प्यार करती थी और अपने लिए दूसरों की जान लेने को तैयार थी। वह उनके प्यार के झरने में ऐसी नहाई कि उसका कठोर दिल मोम की तरह पिघलने लगा ।

बोली-“जब तुमने मुझे बहन कहा है तो बहन का फर्ज भी पूरा करना ही पड़ेगा। मैं अब तुम्हें कैसे नुकसान पहुंचा सकती हूँ?”

वह बिना किसी को खाये चुपचाप वहाँ से ओझल हो गई।


समाप्त

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सुधा भार्गव

बैंगलोर

subharga@gmail॰com

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