कल्पना मिश्रा की लघुकथाएँ

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लघुकथाएँ

कल्पना मिश्रा

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सुरक्षित

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बेटियों के साथ हो रहे दुष्कर्म देख-सुनकर मैं भगवान को धन्यवाद करता कि अच्छा हुआ जो मुझे बेटी नहीं दी।

निश्चिंत रहता था मैं। पर आज " छह वर्षीय बालक की दुष्कर्म के बाद हत्या.." अख़बार में ख़बर पढ़कर मन काँप उठा। अब बेटे भी सुरक्षित नहीं हैं।

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डकैत

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बेटा बहू शहर गये थे। सब काम से फारिग होकर आजी भी सोने का उपक्रम कर रही थीं ...पर नींद थी कि आने का नाम नहीं ले रही थी। "ये मुई बुढ़ापे मा नींदौ जल्दी नाही आवत.." बड़बड़ा उठीं वो। अचानक छत पर धम्म,धम्म की आवाज़ से उनका कलेजा धड़कने लगा.."कोउ कूदा सायद..डकैत तो नाहीं?" जब तक कुछ सोचती ,समझतीं..."ऐ बुढ़िया जो गहना-गुरिया पहने हो उतार दो। और बता ,बाकी सब कहाँ हैं?" ऊपर जीने के दरवाज़े का साँकल तोड़कर कुछ लोग उनके सामने खड़े थे।

"कउन हो बच्चा? हम तुमका पहिचान नहीं पायन?"

"चुप बुढ़िया! नौटंकी करती है..जितना पूछ रहे हैं उतना बता...और ये कौन है?"  नौ वर्षीय पोती को सोते देख बंदूक की नोंक से उसकी चद्दर उघाड़ते एक डाकू बोल पड़ा।

"हमरे बेटवा, बहुरिया तो सहर गये हैं ..बीमार हैं तो डाक्टर का दिखाय खातिन। अब चीज सामान तो वही जाने कि कहाँ रक्खे हैं... ई लेयो हमरी ऊंगरी का छल्ला...हमरे बुढ़ऊ की एक यही निसानी रहि गई रहै... अउर ई हमरी पोती है। बच्चा तुम हमका चाहे तो मार पीट लेओ...पर हमरी बिटिया का हाथ ना लगायेव(हाथ नहीं लगाना).." पोती के ऊपर चादर डालते हुए उनके हाथ जुड़ गए। शहर में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ हो रहे दुष्कर्म की बात अक्सर बेटे से सुनती ; वही याद करके शायद डर गईं वो।

सरदार ने हाथ जोड़े हुए आजी की दयनीय सूरत को मद्धिम रोशनी में ध्यान से देखा;बोला कुछ नहीं। फिर वो सब सारा सामान उधेड़-उधेड़कर देखने लगे,पूरा घर खंगाल डाला। गेहूं के डिब्बे में बहुरिया द्वारा जोड़-बचाकर रखे रुपये, दाल के डिब्बे में छोटे मोटे गहने,पीतल के बर्तन भड़वा...सब उठा-उठाकर बाँध रहे थे और पूरे समय आजी का दिल धुकधुकी करता रहा।

"इस बुढ़िया और लड़की का क्या करें  सरदार..मार दें ? कहीं पहचान लिया तो?"... जाते-जाते कोई साथी बोला।

"नहीं! बच्ची है..छोड़ दे। छूना भी नहीं इसे..। और ये बुढ़िया तो कब्र में पैर लटकाये बैठी है ..क्या बिगाड़ेगी हमारा ? दिखता भी तो नहीं है इसे ठीक से"।

सब सामान लुट जाने के बाद भी,पोती को निहारते हुए आजी ने चैन की साँस ली... "बहुतै भलेमानुस थे ई डकैत।"

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दुपट्टा

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मेरी आदत थी कि जब भी किसी के घर काम करने जाती.. सबसे पहले अपना दुपट्टा उतारकर टाँग देती।

एक हफ्ते से अब नया घर पकड़ा था। घर में चार सदस्य थे । आँटी, अंकल और उनके दो बेटे। ज़्यादा काम भी नहीं होता..।

"तू हर जगह ऐसे ही काम करती है ..बगैर दुपट्टे के?" आज पोंछा लगा रही थी तो आँटी ने पूछा।

"हाँ जी आँटी जी..मुझसे दुपट्टा लेकर काम नहीं होता"..हाथ चलाते हुए मैंने जवाब दिया।

"बुरा ना मानना.. तू मेरी बेटी समान है..ज़रा अभी अपने कुर्ते के गले की ओर देख"

आँटी ने कहा तो मैंने गले के नीचे की तरफ देखा... कुर्ते का गला बड़ा था और बहुत कुछ दिख रहा था; यहाँ तक कि थोड़ी सी शमीज़ भी..।

देखते ही खिसिया गई मैं।

"देखा? जब औरत होकर बार-बार मेरी निगाह पड़ जाती है;तो अगर मर्दों की निगाहें पड़ जायें ..तो तुम लोग ही कहोगी कि फलाँ घर के आदमी बहुत ख़राब हैं..कामवालियों को देखते हैं। पर जब सामने दिख रहा हो.. तो नज़र पड़ ही जाती है। अब कोई आँख बंद करके तो नहीं चल सकता? इसीलिये खुद ही कायदे से रहना चाहिए।  "देखो ऐसे".. आँटी ने बड़े प्रेम से खुद पल्लू से ढककर बताया..और मुझे लग रहा था कि जैसे मेरी माई बोल रही हैं ;जो बहुत पहले इस दुनिया से चली गई थी..जब शायद मैं नौ-दस वर्ष की थी।

"चुप क्यों हो गई तू?"उनकी आवाज सुनकर मैं मुस्कुराई..."थैंक्यू आँटी ! सही कह रही हैं आप ! आज तक किसी ने मुझसे कुछ कहा नहीं ; शायद इसीलिये इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया.." कहते हुए मैंने दुपट्टा सामने से ढककर कमर में बाँध लिया।

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आलू टमाटर की सब्ज़ी

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आज बाबूजी की तेरहवीं है। नाते-रिश्तेदार इकट्ठे हो रहे हैं। उनकी बातचीत, हंसी मज़ाक,,ये सब उसे उद्दिग्न कर रहीं थी।

वह चुपचाप उनकी तस्वीर के सामने जाकर आँख बंद करके बैठ गई।

अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है। वह रक्षाबंधन पर आई थी। बाबूजी बहुत कमजोर लग रहे थे ! सबके बीच उसे लगा कि जैसे वो  कुछ कहना चाहते हों। मौका मिलते ही फुसफुसा कर धीरे से बोले .."बिट्टू... रमा(भाभी) हमें भूखा मार देगी !"

"आधा पेट खाना देती है,, कहती है ,ज़्यादा खाओगे तो नुकसान करेगा "! भरे गले से वो बोले।

"आपने कभी बताया क्यों नहीं?"

वह सन्न रह गई। अपने साथ लाई मिठाई से चार पीस बर्फी निकाल कर बाबूजी को दे दिया। वह लगभग झपट पड़े..ऐसा लग रहा था कि बरसों से उन्होंने खाया ना हो।

"अरे,अरे ..इतना मत खिलाओ ! अभी पेट ख़राब हो जायेगा तो हमहीं को भुगतना पड़ेगा"। तभी भाभी आकर उलाहना भरे लहजे में बोलीं।

वह मन मसोस कर रह गई। चलते समय उसने दबे शब्दों में बाबूजी को, कुछ दिन अपने साथ ले जाने की बात कही।

"सारी उम्र किया है..तो अब भी कर लेंगें"! "क्यों ? तुमसे कुछ कहा क्या बाबूजी ने ?" कुछ तल्ख़ी से भइया ने कहा।

"नहीं, नहीं..!" इसके आगे वह कुछ भी नहीं बोल पाई ।

फिर जाते-जाते एक बार पलटकर देखा,तो उसके जन्मदाता कातर निगाहों से उसे ही देख रहे थे।

इसके पाँच दिन बाद ही खब़र मिली ,कि बाबूजी की हालत ठीक नहीं है,  अस्पताल में हैं।

वह छटपटा उठी और दूसरे दिन ही हॉस्पिटल पहुंच गई।

बाबूजी अर्धमूर्छित से थे।

""बाबूजी मैं... आपकी बिट्टू""!

आवाज़ सुनकर उनकी आंखें हिली। "बिट्टू.. भूख..."" अस्फुट सी आवाज़ में बोले।

"क्या खाना है बाबूजी..?" उसका कलेजा मानो बाहर आ गया हो।

"आलू टमाटर की सब्ज़ी, रोटी .."! बमुश्किल बोल निकले।

जल्दी से उसने इंतज़ाम किया..पर बाबूजी बगैर खाये पिये,भूखे ही इस संसार से चले गए।

"बिट्टू"! चलो..खाना खा लो"!

भइया की आवाज़ सुनकर उसने उन्हें देखा।

"पहले मान्य खाना खायेंगे ना.. तो.."! वो बोले।

वह चुपचाप बैठ गई। सामने तरह तरह के पकवान देखकर उसकी आँखों से आँसू बह निकले। कानों में बाबूजी के आखिरी शब्द गूंज रहे थे..."आलू टमाटर की सब्जी,रोटी...।"

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कल्पना मिश्रा

15/74-75,

सिविल लाइंस

कानपुर-208001

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