आरोप-प्रत्यारोप व अन्य लघुकथाएँ // डॉ. शैल चन्द्रा

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लघुकथाएँ

डॉ. शैल चन्द्रा

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आरोप - प्रत्यारोप

राजू जोर-जोर से पिंटू के बारे में अनाप-शनाप कह रहा था। पिंटू को बीच -बीच में गालियाँ भी दे रहा था।

अचानक किसी कार्य से राजू की मम्मी वहाँ आ गईं। सदैव शांत सा रहने वाला राजू का यह नया रूप देखकर वे हैरान रह गईं।

उन्होंने राजू से पूछा-"राजू बेटे, तुम और पिटूं तो बहुत अच्छे दोस्त हो । सगे भाई की तरह तुम लोग रहते हो ।फिर क्या हो गया कि तुम उसके बारे में अनाप- शनाप कह रहे हो?"

राजू ने हंस कर कहा,"ओह मम्मी, यह तो हमारा खेल चल रहा है। मैं और पिंटू बड़े होकर नेता -मंत्री बनना चाहते हैं। इसी की हम लोग अभी से प्रैक्टिस कर रहे हैं।"

पिंटू ने उत्साहित होकर कहा,"जी हां,आंटी जी,अब मैं राजू के बारे में अनाप-शनाप बोलने वाला था कि आप आ गईं। हम लोग रोज टी.वी.पर देखते हैं कि दो विरोधी पार्टी के नेता आपस में एक दूसरे को अनाप-शनाप कहते हैं। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। हम लोग भी आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रहे हैं।"

मम्मी जी यह सुनकर अवाक् रह गईं।

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"बिजूका"

       " आरती, मेरा मोजा कहाँ है?"

आरती रसोईघर से दौड़ती हुई आई और पति का मोजा ढूंढने लगी। तभी मुनिया की आवाज आई।

   "मम्मी, मेरी टाई कहाँ है?"

आरती मोजा ढूँढना छोड़ कर टाई ढूंढने लगी। तभी ससुर जी ने पुकारा-"आरती बेटा, मेरी छड़ी कहाँ है? मुझे टहलने जाना है। "

अब वह छड़ी ढूंढने लगी।

यह सब देखकर सास ने मुँह बनाते हुए बेटे से कहा,"देख लो बेटा, महारानी न जाने दिन भर क्या करती है?एक चीज भी सही जगह पर नहीं रखती है।"

बेटे ने आरती को डांटते हुए कहा," माँ सच ही तो कह रही है। आखिर तुम दिन भर घर में पड़े-पड़े क्या करती हो? घर का सारा काम अधूरा पड़ा रहता है।"

आरती यह सब चुपचाप सुनती हुई उन सबको उनकी चीजें यथावत देकर क्षण भर के लिए गहरी सांस लेकर बैठ गई।

सुबह- सुबह रोज यही भागमभाग घर में मची रहती है। सुबह पांच बजे से रात ग्यारह बजे तक वह घरेलू कार्यों में मसरूफ रहती है। फिर भी वह आखिर करती क्या है? यह प्रश्न चिन्ह उसके माथे लगा रहता है।

उसे याद आया कि उसके गांव में खेतों में बिजूका(काग भगौड़ा)रखा जाता था। उसे खेतों में खड़ा करके पशु - पक्षियों से फसल को बचाया जाता था। वह दिन-रात खेतों की देखभाल किया करता था। इसके बावजूद उसे केवल एक निर्जीव पुतला मात्र समझा जाता है। उसे अहमियत नहीं दी जाती । क्या वह भी अपने घर के लिए केवल एक बिजूका मात्र है?

उसने एक गहरी साँस ली और अपनी सासु माँ के लिए चाय बनाने लगी।

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फ्री स्टाइल

ट्रान्सफर से आये उस विभाग के उच्च अधिकारी ने ज्वाइन करते ही पहला काम शुरू किया कि उन सारे कर्मचारियों के ट्रान्सफर की लिस्ट बना दी जो कर्मचारी उनके पहले कार्यरत अधिकारी के कार्यशैली के प्रशंसक और समर्थक थे तथा उन्हीं के पदचिन्हों पर चलना चाहते थे।

उन सारे कर्मचारियों का तबादला हो गया। अब उस विभाग में कोई भी कर्तव्यनिष्ठ, और ईमानदार कर्मचारी नहीं है।

बड़े साहब अब बड़े खुश हैं। उनका विभाग अब फ्री स्टाइल में कार्य कर रहा है।

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      "फाइल चल रही है"

संस्कृति विभाग से उस लेखक ने अपनी एक किताब के प्रकाशन हेतु पच्चीस हजार रूपये की सहायता राशि हेतु आवेदन दिया था। उस लेखक ने उस राज्य की सांस्कृतिक धरोहर पर आधारित महत्वपूर्ण किताब लिखी थी।

आज उनकी फाईल को जमा हुए पूरे एक वर्ष हो चुके थे। लेखक महोदय हर महीने राजधानी आते और अपनी फाईल के बारे में जरूर पता लगाते।

आज वे उस विभाग के संचालक से कह रहे थे,"महोदय, मुझे पच्चीस हजार की सहायता राशि प्राप्त होगी की नहीं?अब तक तो मेरी किताब को छप जाना चाहिए था।"

संचालक महोदय ने कहा,"देखिये लेखक महोदय, आपकी फाइल चल रही है न।"

लेखक ने क्रोधित स्वर में कहा,"आज बारह महीने हो गए । यही सुन रहा हूँ की फाईल चल रही है। आखिर ये फाईल कब तक चलती रहेगी? ये कभी रुकेगी की नहीं ? थकेगी कि नहीं?"

यह सुनकर संचालक महोदय ने हँसते हुए कहा,"लेखक महोदय,आप तो इतने पढ़े-लिखे हैं। आप इतना जरूर जानते हैं कि सरकारी काम आज आवेदन दो और कल हो जाये । ये संभव ही नहीं है। अरे भई, कई बार हमारे देश के मुकदमे में कई पीढ़ियां मर-खप जातीं हैं । मुकदमा तब तक चलता ही रहता है। अब आपकी फाईल कितने वर्ष और चलेगी? ये मैं तो क्या भगवान भी नहीं बता सकता।"

यह सुनकर लेखक महोदय अपनी किस्मत को कोसते हुये वहाँ से निकल पड़े।

     "जवाब'

: गांव में अपनी बेटी के साथ रहने वाली माँ की तबीयत बिगड़ने पर शहर में रहने वाले बेटे को मजबूरन माँ के इलाज हेतु घर लाना पड़ा। चूंकि बीमारी गंभीर थी ।अतः माँ को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। बहु को सास की तीमारदारी करनी पड़ रही थी। जैसे -तैसे दो माह बीत गए। अब माँ अस्पताल से घर आ गईं थीं । अब तो बहु को सास की सेवा करने में अधिक अड़चन महसूस होने लगी।

एक दिन उसने अपने पति से कहा," जाने माँ जी यहाँ कब तक रहेंगी?मुझे तो उन्हीं की तीमारदारी से फुर्सत नहीं मिलती और माँजी पूरे समय खांसती रहती हैं। घर पर कोई आता है तो उनकी वजह से मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है। उन्हें वापस गांव क्यों नहीं भेज देते? ननद तो है ही । देखभाल वो कर लेगी।"

बेटे ने कहा, "अरे, धीरे बोलो, माँ सुन लेगी। कुछ दिन और सब्र करो। मैंने वकील को वसीयत के पेपर तैयार करने को कहा है। बस उसमें माँ के सिग्नेचर भर हो जाये फिर उन्हें गांव छोड़ आऊंगा।"

बहु ने यह सुना तो उसकी बांछें खिल गई।

अभी कुछ दिन ही बीते थे की माँ का स्वर्गवास हो गया। जैसे-तैसे तेरहवीं का कार्यक्रम हुआ ही था कि दूसरे दिन बहु खूब सज-धज कर कहीं जाने के लिए निकली। बेटी ने यह देखा तो उसने भाभी से पूछा,"भाभी जी

,अभी दुःख का यह पल ठीक से बिता भी नहीं है और आप ऐसे में इतना सज-धज कर कहाँ जा रहीं हैं?"

बहु ने कहा,"अरे, ऐसी बात नहीं है। मुझे तो माँजी के जाने का बहुत दुःख है इसलिए तो मैंने सोचा है कि माँजी को जो-जो पसन्द थे मैं वही सारे काम करुँगी।"

ननद ने आश्चर्य से पूछा,"परन्तु भाभी , माँ तो आपके पास मात्र डेढ़ महीने ही रही हैं फिर आप उनकी पसन्द-नापसन्द कैसे जानती हैं?"

बहु ने कहा," किसी की पसन्द जानने के लिये इतना समय काफी होता है। माँजी को मेरा सज संवर कर रहना पसंद था। वो खुद भी सुबह-शाम बालों में कंघी करवातीं थीं। उन्हें अच्छा -अच्छा खाना-पीना पसन्द था और

उन्हें बाहर घूमने का भी बड़ा शौक था। अब मैंने उनके सारे पसन्द अपना लिए हैं।'

ननद ने यह सुना तो दंग रह गईं। उसने कहा,"भाभी जी,आप एक चीज भूल रहीं हैं। माँ को बेटी भी बहुत पसंद थी। अब मैं हमेशा आपके साथ ही रहूंगी।"

बेटी का यह जवाब सुनकर बहु अवाक् रह गई।

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    "उसका पिता होना"

राकेश का विवाह हुए लगभग दो साल हो चुके थे।वह अभी भी गैर जिम्मेदार ,बेपरवाह और मनमौजी ही था। उसके पिता आये दिन उसे समझाते कि अब वह विवाहित है ।उसकी अपनी जिम्मेदारी है परन्तु राकेश पर पिता की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

गर्भवती पत्नी का ध्यान रखने उसे माँ हमेशा कहती पर वह टाल जाता। आज उसे खबर मिली कि वह पिता बन गया है। यह खबर सुनकर वह खुश तो हुआ पर दूसरे ही क्षण उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसे चिंतित और परेशान देखकर उसके मित्र ने पूछा,"क्या हुआ भई, बेटा हुआ है और तुम खुश होने की बजाय दुःखी दिख रहे हो?"

राकेश ने कहा,-" अरे नहीं यार, मैं तो बहुत खुश हूँ पर अब मुझे कोई ढंग का काम खोजना पड़ेगा। ताकि मैं अपने बेटे की अच्छी परवरिश कर सकूँ। उसकी हर जरूरतों को पूरा कर सकूँ। "यह कहते हुए वह किसी जिम्मेदार पिता की तरह घर की ओर चल पड़ा।

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   "आक्रोश"

पी.एस. सी.का रिजल्ट आ चुका था। राजेंद्र मिश्रा सिर पर हाथ रखे निराशा के गहरे गर्त में डूब रहा था।

उसका मित्र शोभाराम बड़ा ही प्रसन्न था। इस बार एस. टी.केटेगरी से उसका चयन पी. एस. सी. में हो गया था। उसका डिप्टी कलेक्टर बनना तय था। राजेंद्र मिश्रा क्या कहे ? शोभाराम उसका परम मित्र है ।उसे मित्र की सफलता पर हर्षित होना चाहिए पर--?

यह प्रश्न चिन्ह ही जैसे समाज के लिए खाई बन चुकी है। शोभाराम का रैंक 620 है और राजेंद्र मिश्रा का 110 है । शोभाराम कल डिप्टी कलेक्टर बन जायेगा और राजेंद्र मिश्रा शोभा राम से अधिक अंक लाने के बावजूद पांचवीं बार भी पी.एस. सी.की परीक्षा में असफल रहा।क्या पता कल डिप्टी कलेक्टर शोभाराम का चपरासी राजेंद्र मिश्रा हो।

यह सब सोचकर राजेंद्र मिश्रा आरक्षण की नीति और पद्धति पर आक्रोशित होने लगा।

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     "लिफाफा"

शुभदा और उनका परिवार एक विवाह समारोह में जाने के लिए तैयार था। शुभदा ने अपनी सासु माँ से पूछा,"मांजी, लिफाफे में कितना पैसा डालना है?"

मांजी ने कहा,"सौ रुपए डाल दो।"

        "बस केवल सौ रुपये ही?" शुभदा ने पुनः पूछा।

         "हाँ बाबा, हाँ, हम लोग एक क्लर्क के यहां शादी में जा रहे हैं। कोई कलेक्टर के यहां नहीं ? वे बेचारे तो जैसे-तैसे ही अपनी बेटी की शादी कर रहे हैं। वहाँ सौ रुपये ही पर्याप्त है।"

आज वे पुनः किसी विवाह समारोह में जाने हेतु तैयार थे। शुभदा ने मांजी से कहा,"मांजी मैं लिफाफे में सौ रूपये डाल रहीं हूँ । ठीक है न?"

मांजी ने झल्लाते हुए कहा," तुमसे किसने कहा सौ रुपये ही डालने को?"

शुभदा ने झेंपते हुए कहा,"मांजी, उस दिन आपने लिफाफे में सौ रुपए डालने के लिए कहा था। बस इसीलिए मैं कह रही थी।"

मांजी ने कहा,"हाँ, पर आज हम खन्ना साहब के यहाँ शादी में जा रहे हैं। जानती हो वे बहुत बड़े बिजनेस मेन हैं। उनका करोड़ों का कारोबार है। अब उनका और हमारा भी तो इमेज देखना है। ऐसा करो तुम लिफाफे में एक हजार रुपये डाल दो।"

शुभदा अपनी सास को भौंचक सी देखती रह गई ।

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डॉ.शैल चन्द्रा

रावण भाठा, नगरी

जिला- धमतरी


सम्प्रति

प्राचार्य

हाई स्कूल, टांगा पानी

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