लघु व्यंग्य // निशाने अपने - अपने // डॉ प्रदीप उपाध्याय

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

निशाने अपने - अपने

किसी समय गायक भी दुखी हो जाते थे जब उनके सुर नहीं सजते थे और वे कह उठते थे- “सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं,सुर के बिना जीवन सूना।”किन्तु आजकल सुर सजे न सजे,सुर सधे न सधे, धमाल चौकड़ी तो मचाई ही जा सकती है और गायक इसे दिल पर भी नहीं लेता क्योंकि वह भी जानता है कि सुनने वाले भी मंच पर होने वाले शोर पर झूमने लगेंगे। वैसे मैं यहाँ सुर,ताल और लय की बात नहीं कर रहा हूँ क्योंकि सुर सजाने या सुर साधने पर न तो कोई चिन्तित होता है और न ही उसे कभी यह लगता है कि सुर के बिना जीवन सूना है। लोग समझदार हो गये हैं। कहाँ की रियाज और कहाँ की चिंता। कोई भी क्षेत्र हो सुर साधने से तो ज्यादा अच्छा निशाना साधना है! यह बेसुरा होकर भी किया जा सकता है और इसीलिए हर कोई निशाना साधने में लगा हुआ है। हर कोई बातों के तीर चलाकर अपने आप को अर्जुन या एकलव्य समझने लगा है लेकिन भाई गुरू दक्षिणा की बात नहीं करें तो अच्छा,क्योंकि गुरूवर तो सत्ता से चिपके ही रहते हैं। बात शायद नमक की आ जाती है और वे कहेंगे भी कि जनाब़ मैंने उनका नमक खाया है। इसीलिए एकलव्य आज भी सड़क नापने को मजबूर है।

चलिये,इस बात को भी छोड़ें क्योंकि बात निशाना साधने की करना है। लोग निशाना साध रहे हैं। हर कोई निशाने पर है और हर कोई निशाना साध रहा है। हर कोई निशानेबाज बनकर बैठा है। यहाँ तक कि लक्ष्य दुश्वारी भरा है, सामने कठिन चुनौती है तो मिलकर यानी गठजोड़ के साथ निशाना साध रहे हैं। किसी शायर ने कहा भी है-

“उलट गया है हर एक सिलसिला निशाने पर,

चराग घात में है और हवा निशाने पर।”

हाँ तो बात निशाने की हो रही है तो यह भी हो रहा है कि बातों के तीर चला कर भी निशाना साधा जा रहा है। कुछ स्पष्टवक्ता होते हैं तो उनकी बातों के बारे में भी एक शेर है-

“सबको गोली की तरह लगती है बातें मेरी

इसका मतलब है अच्छा है निशाना मेरा।”

वैसे तो ऐसे भी निशानेबाज हैं जो अँखियों से गोली मारने का काम करते हैं। लोग नजरों के तीर चलाकर घायल कर दें वहाँ तक तो ठीक है लेकिन अब जो चलन है,उसमें जुब़ान से निशाना साधकर गोली चलाई जाती है और लक्ष्य तक पहुँचा जाता है। दुनियाभर में यह निशानेबाजी का गेम चल रहा है। इस मामले में दो बड़े लोकतंत्र के कर्णधारों से बड़ा निशानेबाज कोई हो सकता है भला। देश की राजनीति के गलियारों में सभी एक-दूसरे पर निशाना साधे बैठे हैं। स्वयं को साधु घोषित करने और सामने वाले को शैतान सिद्ध करने पर आमादा हैं और इसीलिए निशाना साध कर तीर पर तीर चलाये जा रहे हैं। लक्ष्य तो 2019 है लेकिन ये पब्लिक है,सब जानती है। अन्दर क्या है,बाहर क्या है! आप किसी को भी निशाने पर ले लो,पब्लिक को जो सोचना है, वही सोचेगी और वही करेगी। फिर भी इन निशानेबाजों के चक्कर में जो गत बन रही है और परिस्थितियों की अनिश्चितता पर उसकी बानगी एक शायर के शब्दों में कुछ ऐसी हो सकती है-

“फ़लक के तीर का क्या निशाना था,

इधर मेरा घर,उधर उसका आशियाना था,

पहुँच रही थी किनारे पर कश्ती-ऐ-उम्मीद

उसी वक्त इस तूफ़ान को भी यहाँ आना था।”


डॉ प्रदीप उपाध्याय,

१६,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,

उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,

देवास,म.प्र.

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघु व्यंग्य // निशाने अपने - अपने // डॉ प्रदीप उपाध्याय"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.