समान आयु के बालकों में विभिन्नतायें // शशांक मिश्र भारती

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जल्दी रही लेखक की बालमनोविज्ञानपरक कृति क्यों बोलते हैं बच्चे झूठ से.

समान आयु के बालकों में विभिन्नतायें

शशांक मिश्र भारती

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बालक को अनिश्चय की स्थिति में न छोड़ें। उस पर किसी प्रकार का कहीं पर भय का वातावरण थोपने का प्रयास न करें और न ही अपनी महत्वाकांक्षा के लिए उसकी इच्छा आकांक्षाओं की उपेक्षा करें। ,

एक समान आयु वर्ग के बालकों के विकास में अनेक विभिन्नताएं देखी जा सकती हैं। फिर यह आवश्यक भी नहीं कि समान आयु के बालकों का विकास भी एक समान हो। उनका विकास अनेक कारणों शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य बुद्धि समाजीकरण पोषण आदि पर निर्भर करता है जिसमें भिन्नता होने पर उनके विकास में अन्तर हो जाता है।

चाहे आप एक अध्यापक हों अभिभावक अथवा एक जागरूक माता- पिता आपको बालकों की विभिन्नताओं को सुलझाने के लिए उनके उपचार हेतु मेरी दृष्टि में निम्न उपायों को अपनाना पड़ेगा-

... बालकों को अपने विकास के लिए पूर्ण अवसर प्राप्त हों इसके लिए आवश्यक है कि उनके जन्मों के मध्य कम से कम दो साल का अन्तर अवश्य हो।

.... चूंकि अनुवंशिक विशेषताओं से बालकों का विकास प्रभावित होता है इसलिए उनको अपने स्वास्थ्य सामाजिक व आर्थिक पहलुओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

.... आनुवंशिक रोगों से परिचित होना चाहिए ताकि बालक की विकास की स्थिति को दुष्प्रभावित होने से रोका जा सके।

.... अगले बालक से पहले तथा बाद तक पौष्टिक भोजन व स्वास्थ्य की अच्छी देखभाल की है अन्यथा जन्मने वाले बच्चे का विकास प्रभावित हो सकता है।

.... विकास की विभिन्नता वाले बालकों को बहुत अधिक प्यार समय व स्नेह की आवश्यकता होती है। इसलिए अतिरिक्त समय निकालकर उनसे बातचीत करनी चाहिए तथा अपने आपको उनके सामने आदर्श रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।

.... बच्चों में बढ़ती आयु के साथ-साथ होने वाली जिज्ञासा को शान्त करना चाहिए। ताकि उनमें संवेदना रचनाशीलता और बुद्धि कौशलों का पर्याप्त विकास हो सके। उन्हें सुरक्षित भौतिक वातावरण उपलब्ध हो जाये तथा वे आस-पास की वस्तुओं का अपनी इच्छानुसार प्रयोग कर सकें।

.... बालक जो कार्य कर लेते हैं वह तो सही है किन्तु जो नहीं कर पाते हैं उसके लिए मार्गदर्शन व प्रोत्साहन देना चाहिए। समय-समय पर प्रशंसा करनी चाहिए ताकि वह कुण्ठाग्रस्त न हो सके। उनमें निरन्तर आगे बढ़ने के लिए उत्साह बना रहे वह हतोत्साहित न हों।

.... बालकों को कुछ जिम्मेदारी पूर्ण कार्य सौंपे जाने चाहिए ताकि वह अपने को उपेक्षित न समझें तथा उन्हें अपनी जिम्मेदारी स्वयं संभालने का अभ्यास हो जाये। वह किसी दूसरे पर कार्य टालने की न सोंचें और न ही वैसी आदत डालें। विशेष रूप से हमें बालकों को भोजन बनाने नहाने कपड़े धोने अपना कमरा साफ करने पेड़-पौधों की रक्षा घर व आस-पड़ोस की स्वच्छता का दायित्व सौंपना चाहिए।

.... हमें उनके विकास की विभिन्नताओं को दृष्टिगत रख उनकी दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। समय पर भोजन करने सोने जागने उठने-बैठने बोलने व पढ़ने की प्रेरणा देनी चाहिए ।जिससे उनको विविध शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों का शिकार न होना पड़े। उनमें समय से अपनी दिनचर्या निपटाने का अभ्यास पड़ जायेगा।

.... मौसम के परिवर्तन कीटपतंगों से होने वाली बीमारियों आदि के गुण-दोषों से अवगत कराकर उनसे बचाव के उपाय समझाने चाहिए।

.... एक ही स्थान पर घिरे रहने वाले बालकों को बाहर मैदान में ले जाकर विविध प्रकार के खेलकूदों से अवगत कराते हुए उनमें उनकी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। खेलों के प्रति रूचि बढ़ाने के लिए प्रत्येक सम्भव प्रयत्न करना चाहिए।

..... हमें बालकों में समरूपता लाने के लिए तर्क क्षमता रचनाशीलता के विकास हेतु विशेष प्रयास करना चाहिए। उनको विविध महापुरुषों घटनाओं रेखाचित्रों संस्मरणों सौन्दर्य चित्रों प्राकृतिक दृश्यों से परिचित कराकर उन पर कहानी कविता लेख लिखने को कहना चाहिए। उनमें वाद-विवाद सुलेख बस्ता स्वच्छता गीत-कहानी आदि पर प्रोत्साहनपरक प्रतियोगिता करानी चाहिए।

.... हमें बालकों के विकास में श्रेष्ठ पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं का महत्व समझाते हुए उन्हें पढ़ने के लिए उपलब्ध करवानी चाहिए।

.... बालकों की बढ़ती आयु के साथ-साथ बदलती अपेक्षाओं आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए। इनके स्तर व पूर्ति में बालकोचित सन्तुलन बनाये रखें। जिससे न केवल बालक आगे बढ़ेगा बल्कि उसका सर्वांगीण विकास भी होगा।

.... बालक को अनिश्चय की स्थिति में न छोड़ें। उस पर किसी प्रकार का कहीं पर भ्रम का वातावरण थोपने का प्रयास न करें और न ही अपनी महत्वाकांक्षा के लिए उसकी इच्छा आकांक्षाओं की उपेक्षा करें। बालक छोटा हो या बड़ा। सभी की कुछ इच्छायें ऐसी होती हैं जिनकी पूर्ति न होने पर बालक अपने आपको तो उपेक्षित मानते ही हैं वह अपनी मित्र मण्डली साथी-समूह में भी अपमानित होने सा अनुभव करने लगते हैं। अतः इस तरह की परिस्थितियों से बचना चाहिए।

इस प्रकार निश्चित मानदण्डों विधानों के तहत सम आयु के बालकों के विकास में पायी जाने वाली विभिन्नताओं पर विजय पा सकते हैं। उन पर अपना ध्यान केंन्द्रित कर अपने परामर्श मार्गदर्शन व अनुभव के द्वारा उनको उज्ज्वल भविष्य की ओर प्रशस्त कर सकते हैं।

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शशांक मिश्र भारती सम्पादक देवसुधा हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ0प्र0

ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com/devsudha2008@gmail.com

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