कहानी // तीसरा पिस्तौल // बृजमोहन स्वामी "बैरागी"

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कहानी

तीसरा पिस्तौल

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बृजमोहन स्वामी "बैरागी"


क्या यह जरूरी है कि पिस्तौल वाली सारी कहानियाँ मर्डर से शुरू करके लिखी जाएँ?

या फिर गर्दन पर हाथ मलते हुए किसी भौतिक विज्ञानी की शैली में लिखी जाएँ?

कुछ कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो छुपी हुई विचाराधाओं और मरी हुई लाशों से निकल आती हैं।

खैर....ये दोनों ही विषय मेरी समझ से बाहर थे और मैं लेखक के कहने पर सीधा जेल चला गया।

जेल की दीवारें हमेशा मज़बूत, ऊंची और रोने वाले पत्थरों की बनी होतीं हैं जिन पर एशियन पेंट्स का कोई सुंदर कवर नहीं होता।

जेल की दीवार के पीछे शायद रंग किया होगा और वहां पर सड़क भी होगी कोई, मुझे थोड़ा थोड़ा याद है, लालू प्रसाद जी ने एक जमाने में कहा था कि बिहार की सड़कें हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकनी बनेंगी।

मुझे इस जेल में यही सोचना होगा की वो कितनी चिकनी बन पाई?


वहां कोई छोटा धागा भी नहीं था जिसे नाक में लेकर छींका जा सके और कठोर शब्दों में खुद को कहा जा सके - ' मुझे कोई याद कर रहा है।"

वैसे जेल में धागा होता तो है, सिर्फ कागजों और फाइलों पर होता है।

समूचा कारागृह भवन भले ही वास्तुनियमों के अनुसार बना हो, लेकिन वहां दिवार पर सामने टँगी चाबियों की छोटी-सी गुच्छी

मेरी सारी आँतरिक संरचनात्मक सोच बिगाड़कर रख देती।

मुझे वहां सोलह नम्बर कैदी के साथ रखा गया, जो दिखने में सलमान खान न सही पर कम से कम् शाहिद कपूर जैसा जरूर था।

उसके माथे पर लगी पुरानी सी चोटें इस बात की गवाही देती थी की वह स्कूल टाइम में भी लड़ाई झगड़े में काफी एडवांस था।

उसने अपना नाम अनवर बताया और फ़रज़ाना नाम की एक लड़की से प्यार करता था- यह भी बताया।

दो तीन दिन के बाद हम काफी घुल मिल गए और उसने अपनी जिंदगी की महत्वपूर्ण बातें मुझे इस अंदाज़ में बताई जैसे स्टार न्यूज़ वाले हर बम विस्फोट के बाद बताया करते हैं।

तीसरे दिन रात को सोते वक़्त मुझे घर की याद आने लगी। और मुझे लगा की यह जेल ही ब्रह्माण्ड का आखिरी बिन्दु है, जो मुझ जैसे कई कैदियों को समेटे रखता है।

क्या आपको नहीं पता कि "जेल" एक शब्द है जिसका विलोम शब्द जल्दी से जुबान पर नहीं आता।

अनवर का मुँह मेरी तरफ था और वह अपने अंगूठे की सहायता से नाक में जमा मेल निकालने की कोशिश कर रहा था।

- तो तुम्हें यह जेल, जेल जैसी नहीं लगती?


- हाँ !! तुम्हें किसने कहा?

- तुम्हारे हाथों ने जो पिछले दो दिनों से सलाखों को पकड़े रहते हैं।

- म्मम्म! म्!!

(मैं कुछ कहना चाहता था लेकिन मुझे लगा की मेरे गले में मोम सा जम गया है , जो किसी मोमबत्ती में होना चाहिए)

- तुमने कोनसा जुर्म किया है ?

कितनों को मारा है ?

इसकी यह बात मुझे इस कदर ठोस कर गयी की मैं काफी देर तक मौत और क़ातिल के बारे में सोचता रहा।

उसने मुझे फिर पूछा वही, इस बार मेरी आँखों में पानी आ गया।

मेरी आँखों का पानी उस जेल की मटकी में रखे पानी से काफी साफ़ था।

मैं चाहता तो अनवर के सामने अपने हर बुरे वक़्त के अंडे फोड़ सकता था लेकिन मुझे लगा कि विचारों को दबाकर रखने जैसा सुख दुनियां में और कहीं नहीं है।

- मेरी अंगूरों की फैक्ट्री है और मैंने काफी पैसा कमाया था।

लेकिन एक दिन मैंने और ज्यादा पैसों के लिए मेरे पड़ोसी जगदीश कुमार को मार दिया जो कि बैंक मैनेजर था।

- अच्छा। तो ये माज़रा है।

- हाँ! ( मैंने हरे अंगूरों के बारे में सोचते हुए कहा। )

- लेकिन अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर तुम यहाँ कैसे लाये गए।

अनवर , जो कि यहाँ एक साल से था, उसने मुझे काफ़ी दिलचस्पी से बताया।

उसने बताया कि किसी से प्यार हो जाने के बाद ज्यादातर लड़कियां देर रात तक जगने लगती है , रात-रातभर फोन पर बातें करती हैं और लडक़ों पर मर मिटने लगती है। और फ़रज़ाना भी उन लड़कियों में से एक थी।

- थी मतलब ? अब नहीं है ?

- नहीं है।

(अनवर ने दुबारा से अंगूठा नाक में लेते हुए बताया। )


- करीना कपूर माँ बन गई क्या?

- हाँ। तुम्हें पर इस जेल में कौन बताता इस बारे में। लेकिन अब करीना की डिलीवरी हो गई है और पटौदी खानदान के नए वारिस को जन्म दिया है।

लेकिन तुम अपनी बात को दबा गए। करीना का तुम तुम्हारी फ़रज़ाना से क्या लेना?

- कुछ लेना देना नहीं।

कुछ दिन पहले ही एक नया कैदी आया था, वो पुराने कैदियों के लिए एलियन की तरह था। उसी ने बताया की जेल से बाहर एक और भी रंगीन दुनियां है वहां पर समोसे खायेगें तो साथ में एक रंगीन अख़बार का टुकड़ा दिया जायेगा, मेरे हिस्से आये टुकड़े पर लिखा था- "करीना कपूर माँ बनने वाली हैं।"

बस् इतना ही लेना देना है।

और जिस दिन फ़रज़ाना का क़त्ल हुआ उस रात मेरे टेलीविज़न में करीना की कोई फ़िल्म चल रही थी।

- तुम खामखा बात घुमा रहे हो।

घुमा क्या, मरोड़ ही रहे हो।

साफ़ साफ बताओ।

रात के दस बजने वाले थे और जेल के सारे कैदी सो रहे थे।

सलाखों से बाहर देखने पर

केवल दो चोकीदार और एक जेलर, गप्पें लड़ा रहे थे।


अनवर ने मुझे आगे बताया कि वह फ़रज़ाना को ग्याहरवीं क्लास से ही प्यार करता था और पिछले साल तक यानी अनवर के जेल आने तक इस लव स्टोरी को पांच साल हो लिये थे।

- आगे बताओ।

( सामने दीवार पर टँगी जेल की घड़ी टिक टिक की आवाज़ करती हुई कलैंडर को कुचल देना चाहती थी और मैं अनवर की कहानी सुनने के बाद दुनिया के हर आदमी को। )

- वह दुसरे शहर में अपने बचपन के दोस्त इलियास खान के यहां गर्मियां बिताने के लिए आया था।

वह एक मनहूस रात का पहला पहर था।

उस वक़्त हम दोनों बाल्कोनी में बैठे शराब पी रहे थे।

जिगरी दोस्त साथ हो, तो शराब का नशा काफी परवान जाता है। हम दोनों उसकी एक्स-गर्लफ्रेंड का फ़ोन पर मजा ले रहे थे। पर इलियास अचानक रोने लगा।

कुछ देर तो उसका कन्धा थपथपाते हुए मैंने सोचा कि आँसुओं से धो कर शराब का नशा पवित्र कर रहा होगा लेकिन जब मामला खुल कर सामने आया , तो मेरी आँखों में भी आँसुओं की तबाही मच गयी।

उसने बताया कि कल ही तेरे शहर की फ़रज़ाना नाम की लड़की से उसका ब्रेकअप हुआ है।

- तुम्हारी वाली फ़रज़ाना? हैं ?

(मैंने रात के सन्नाटे में उसकी मर्मराती आवाज़ को तोडा)

- हाँ। मेरी फ़रज़ाना से।

उसने बताया की कुछ महीने से उसका फ़रज़ाना के साथ लव मेटर चल रहा है और अब फ़रज़ाना ने अंतिम निर्णय लिया है कि दोनों को आत्महत्या कर ही लेनी चाहिए।

- तो....फ़रज़ाना और इलियास ???

- हाँ। तुम जिस बात से हैरान हो उसी बात से मैं आज तक हैरान हूँ।

- तुम इस जेल में कैसे आये ? और तुम्हारे परिवार में कौन कौन हैं।

- पूरा परिवार है।

(अनवर ने हाथों को फैलाकर पूरे परिवार की भूमिका प्रस्तुत करने की नाकाम कोशिश की, जबकि वास्तव में उसकी कोहनी दीवार से टकरा गयी और वह फिर से हाथों को सीने पर रख लिया)

- हाँ तो कहानी !! आगे क्या हुआ ?


- उसने शराब के नशे में बताया की वह जब मेरे घर कुछ दिन रहने आया था तो फ़रज़ाना ने उसकी तरफ अपनी फिलोसोफी फेंकनी की थी और जब वह अपने शहर वापिस जाने लगा तो सौ रूपए का पुराना नोट भी उसकी फेंक गया, जिस में तो एयरटेल वालों का रोल था और न ही बस कंडेक्टर का।

उसने उस नोट पर लिखे फ़रज़ाना के फोन नम्बर याद कर लिए थे और उन पर थूक से भर अंगूठा रगड़कर कंडक्टर को किराया भी दे दिया था।

इसके बाद तीन चार महीनों तक वो बात करते रहे और एक बार वो उस से मिलने भी गया।

उसने यह भी बताया की एक दिन जब वो ड्रॉइंग रूम फ़रज़ाना का रेशम का सा शरीर देख रहा था तब उसके पापा आ गए। उसने यह भी सिद्ध किया की वो जिस रास्ते से भागा, उस पर दुनिया का कोई व्यक्ति दुबारा नहीं जाना चाहता।

इतना बताने के बाद अनवर की आँखों में जहर जैसा पानी निकलने लगा और वह कुछ रुआँसा सा हो चला

- अच्छा। तो कुल मिलकर बात यह है की तुम्हारी फ़रज़ाना का दूसरा आशिक इलियास था ?

- कुल न मिलाएं तो भी वही था।

मैंने अगली सुबह भी उससे बहुत कुछ पूछा। उसने ज़बरदस्ती से पूछने पर वो सब भी बता दिया जो की किसी लेखक या साहित्यकार को "मसाले" के तौर पर मिलता है।

मैंने फिर फ़रज़ाना से पूछा तो वह साफ़ मन कर गयी

और जबकि उसे पता चल चूका था की इलियास मेरा ही दोस्त है, उसने काफी लड़ाई झगड़े के बाद रिश्तों की सारी तहें खोल दी।

मैंने वहाँ से आकर फ़रज़ाना से लड़ाई की और काफी वक़्त तक हम अलग अलग रहे।

इतनी आपबीती सुनकर मैंने अनवर को कहा की अब देर रात हो चुकी है हमें सोना चाहिए।

रात के 2 बजे तक मेरी आँखें नींद से दूर थी लेकिन मेरा कलेजा जेल से निकल कर कहीं दूर भाग जाने की फ़िराक में था। उस वक़्त मैं "दूर" उस शब्द को कहता था जो वास्तव् में एक शब्द नहीं उपन्यास सा था।

मैंने अनवर को कितनी सफाई से झूठ बोल दिया की हमारे बाग़ है वो भी अंगूरों का, जबकि मैंने आज तक अंगूर खाकर भी नहीं देखा।

और यह भी बताया की मैंने बैंक कर्मचारी की हत्या कर दी , जबकि बैंक शब्द मुझ से उतना ही दूर है जितना उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव।

हालाँकि मुझे अनवर की कहानी में काफी इंट्रेस्ट आने लगा और यह टाइम अस एक जरिया सा भी बन गया, मानो धरती से करोड़ों मील दूर चार दीवारों में कैद हम दो कैदी इतिहास के काले पन्ने हों।

उस पूरी रात मैंने सपने जैसा कुछ देखा

उसमें इलियास नहीं था और न ही फ़रज़ाना।

अकेला अनवर भीग रहा था, खून की किसी नदी में।

पूरे सपने में मैं चुप रहा।


"काश तुम ये समझ सकते की,चुप रहने वालों को भी किसी से प्यार होता है..!!"

अगली सुबह भी मुझसे कोई मिलने नहीं आया। मैं उस वक़्त मिलने को "मिलने" की तरह सोचता था और जेल की दिवार से सटककर दोनों हाथों से सर पकड़कर अनवर को प्यार से घूरता रहता।

मुझे दिन में दोपहर तक सोना और फिर कुछ काम करना पड़ता ,जो कैदियों को दिए जाने वाले कामों में से एक थे,

फिर देर रात को अनवर की कहानी सुनता। बाकी समय अनवर को रोते तड़पते हुए देखता रहता।

मेरे हिसाब से हम सभी आदमी बौने होते जा रहे थे हमारी भावनाएं कब्र से ऊपर इकट्ठी होंगी या नीचे होगी या बीच में , ये कहने की ज़रूरत ही नहीं। ब्रह्मांड में ऊपर या नीचे का ख़्याल कहीं ठहरता ही नहीं है।

हम जेल के अंदर कई कैदी थे और कुछ लोग ऐसे भी थे जो सफेद बालों को लिए घूमते रहते थे। मेरे हिसाब से वो इस जेल दुनिया के छोटे मोटे ग्रह-नक्षत्र जैसा काम करते होंगे। इसलिए वो बड़ी आसानी से कैदियों वाले काम भी करते थे। हम लोग सुबह जल्दी उठकर व्यायाम भी करते थे (उस दौरान मुझे घर के टीवी में रहने वाले रामदेव बाबा की कोई याद नहीं आई) ।

यहाँ हर दीवार की ईंटें आपके स्वागत के लिए तैयार है और एक क़त्ल का भी आपके लिए सुनहरा अवसर है , आप किसी भी इंसान की चौथे पिस्तौल से हत्या कर सकते हो। जेल में कैदी की तरह कुछ दिन बिताने के लिए आपको अनवर की कहानी सुननी होगी।

साथ ही इस जेल के सारे नियम-कायदे एक कैदी की तरह फॉलो करने होंगे।

उस दिन नशामुक्ति और धूम्रपान पर जेल परिसर में शिविर लगा

, एक लाल कपड़ों में लिपटा ज्ञानी आदमी कुछ बोल रहा था उसके प्रवचन से प्रभावित कैदियों ने धूम्र-पान से दूर रहने की कसम खाई।

उस दिन शाम को जेलर हमारे पास से गुज़रा उसके मुँह से बीड़ी की दुर्गन्ध आई, शायद उसने वह प्रवचन नहीं सुना होगा।

(जेलर का बदसूरत मुँह उसकी और भी बदसूरत नाक से अच्छा था, उसकी नाक काली और लम्बी थी। मुझे उस पर अंदर ही अंदर बहुत गुस्सा आने लगा)

जेलर काफी आगे निकल गया मुझे उसको बस यही कहना था-

-"बीड़ी जलाईले ज़िगर से पिया...ज़िगर मा बड़ी आग है।"

अगले दिन दोपहर जेल का मीठा खाना खाकर अनवर ने मुझे फिर से कहानी सुनाना शुरू किया...

- ये जेल की रोटी तुम्हारे गले में नहीं अड़ती ?


- अडती तो है अनवर !

- कितनी ?

- जितनी भारत की सीमा पाकिस्तान से अडती है !

( यह सुनकर अनवर एक भद्दी सी हंसी हंसा और मैंने कुई पुराने लोगों की लाशें अपनी आंखों के आगे गुज़रती देखीं)

- तुम हर बार बात को घुमा देते हो, साफ़ साफ़ बताया करो।

- तो सुनो,

उस दिन हमारी बहुत लड़ाई हुई और हम दोनों बिलकुल अलग हो गए।

मुझे पता नहीं इलियास के साथ उसने कितनी रातें बिताईं होंगी और कितनी सर्द रातों को उन्होंने गर्म किया होगा, लेकिन मैंने इलियास को कुछ नहीं बताया और मेरे हिसाब से बेवफा फ़रज़ाना ने भी नहीं।

पर मैं फ़रज़ाना को इस हद तक चाहने लगा की मैं उसके बिना एक पल भी इस धरती पर नहीं रहना चाहता था।

मुझे मेरे शरीर के हर हिस्से में फ़रज़ाना दिखाई देती और वह हंसने से पहले गायब हो जाती।

बहुत सी रातें मैंने फ़रज़ाना के सपनों में बिताई और बहुत से दिन दारू के नशे में बाथरूम में बन्द होकर बिताये।

तुम नहीं समझ सकते दोस्त! मेरा कलेजा किस कदर रोता रहा ,

मैंने हर वक़्त हर पल इंसान के रूप में लेकिन "जिन्दा घाव" की तरह बिताया और उस पर फ़रज़ाना की यादें मक्खियों की तरह भिनभिनाती रही।

(अनवर रोने लगता है, घड़ी ने दोपहर के 2 बजा दिए और अभी भी जेलर पूड़ियाँ खा रहा था, मुझे पूड़ियों से याद आया कि मैं एक "आदमी" हूँ। )

- वो सब एक वक़्त था, एक हादसा कह सकते हो अनवर, मेरे मित्र।


अब रोने का कोई फायदा नहीं।

अब तुम रोना बन्द कर दो, इस से तुम्हारे शरीर का बाकी बचा दर्द भी फिर से उग सकता है।

मैं भी कुछ इस तरह से गुज़रा हूँ लेकिन वो मैं किसी को नहीं बता सकता।

मुझे सपने आते हैं डरावने प्यार वाले।

बचपन में मेरी दादी एक राजकुमारी की कहानियां सुनाती थीं,

जिसके दो प्रेमी थे और उसे दोनों में से एक को चुनना था।

और दादी की कहानी सुनकर मैं सोचता था

कि राजकुमारी को आख़िर एक को ही क्यों चुनना है? वो दोनों प्रेमियों के साथ राज़ी-ख़ुशी क्यों नहीं रह लेती?

अनवर खून के आँसू पीकर बताना शुरू करता है।

- फ़रज़ाना का घर मेरे घर से कुछ ही दूर था। और उसकी बेवफाई की कड़ियाँ खुलने के बाद मैंने कभी उसकी घर की तरफ नहीं झाँका।

जितना मैं उस से प्यार करता था उस से ज्यादा दर्द होने लगा। एक दिन एक महेश जलोटा नाम के आदमी ने मुझे फ़रज़ाना के एक और आशिक के बारे में भी बताया, वह भी फ़रज़ाना का पुराना आशिक निकला जबकि फ़रज़ाना ने मुझे चार साल तक कोई बात का अहसास नहीं होने दिया।

इसके बाद मैंने फ़रज़ाना की जिंदगी की फाइलें ढूंढनी शुरू की।


उन्हीं दिनों एक रात करीब दो बजे के आसपास फ़रज़ाना के घर के पास एक बंगले में पति पत्नि के बीच अवैध संबंधों को लेकर झगड़ा हुआ।

इस आपाधापी में रतन शूलपाणी नाम के आदमी की पत्नी ने उस पर चाकू से कई वार किए जिससे वह बेसुध होकर मर गया।

रात को ही मोहल्ला वहां इकट्ठा हो गया और मैं मौके का फायदा उठाकर फ़रज़ाना के घर की दीवार से उसके आँगन में कूद गया।

वो अपने कमरे में सोई हुई थी और उसके पापा मम्मी को शायद मोहल्ले की वारदात का चश्मदीद गवाह बनना था इसलिए वो वहां चले गए।

मैंने फ़रज़ाना को जगाने से पहले उसकी होंठों की गहराइयों को जी भर कर देखा।

- तुमने ऐसा किया ?

(मैंने उसकी बात को काटकर कहा।

अनवर जो अभी खून के आंसू रो रहा था, अब फ़रज़ाना के प्यार की यादों में फिर से उतरने लगा)

- हाँ ! मैंने उसे कुछ पल जी बहकर देखा और फिर उसका हाथ पकड़ कर उसे उठाया।

वो कुछ बोलती उस से पहले मैंने उसे बाँहों में भर लिया और उसके होंठों पर काट लिया , वो काफी घबराई शायद कुछ समझ ही नहीं पाई।

मैंने उस को कहा की "मैं तेरे बिना नहीं रह सकता और इसे सिद्ध तो नहीं कर सकता लेकिन तुम बेवफा हो, तुमने मुझे धोखा दिया है।

फ़रज़ाना कुछ नहीं बोली और दीवार के सहारे सटककर मोनालिसा की तरह निर्जीव बुत सी बन गयी, उसकी आँखों में आंसू थे और मैंने सोचा कि ये दिखावटी आंसू हैं।

गली में अचानक से हल्ला हुआ और मैं उलटे कदम दौड़कर फ़रज़ाना के घर से बाहर कूद गया और अँधेरे में बदहवास दौड़ता रहा जब तक मुझे मेरा घर नहीं मिला।

सुबह अख़बार पता चला कि देर रात तीन बजे

रतन शूलपाणी की पत्नी ने

उसके दोनों बच्चों की भी निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी। उस वक़्त मैं फ़रज़ाना की पत्थर की बाँहों में सिकुड़ रहा था।

- और फिर, उस दिन के बाद क्या हुआ ?

- मैंने उसको कसम दी की फ़रज़ाना चाहे बेवफा हो या न हो, मैंने जिस दिन उसके आस पास किसी चिरमिटीए आशिक़ को देख लिया तो गोली मार दूंगा।

और उस रात की अगली रात को मैंने शराब के नशे में इलियास को फोन किया और कई भद्दी गालियाँ दी।

इलियास को यह भी कहा की अबकी बार फ़रज़ाना के आस पास बॉबी देओल की तरह मंडराता दिखाई दिया तो तुझे गोली मार दूंगा।

- तो इस तरह तुम्हारी इलियास से दोस्ती टूट गई ? वो क्या बोला?


- इलियास काफी समझदार आदमियों में से एक था और वह सारा माज़रा समझ गया , इसके बावज़ूद भी मैंने उसको मेरे और फ़रज़ाना के बारे में सारी बातें बता दी।

गलियां सुनने के बाद इलियास ने भी वही बोला जो मैंने उसको बोला। उसने बताया की वो भी मुझे गोली मारना चाहता है।

इसके कुछ दिन बाद मैं सलीम चावली नाम के एक पुराने दोस्त से मिला, उसने बताया की वह ब्लैक वाले पिस्तौल रखता है और उसके पास अभी तीन पिस्तौल है।

उसके द्वारा पिस्तौल की जो कीमत बताई गई वह इतनी सी थी की मुझे बस फ़रज़ाना के घर एक बार और घुसना था। और यह सब मैंने गुस्से में आकर किया।

आधी रात को फ़रज़ाना के घर से ही बिजली को मोटर चुरा लाया। यह काफी भारी थी, लेकिन मेरे दर्द के आगे कुछ हल्की भी। सुबह पौ फटते ही बाजार में बेच दी और कुछ पैसे जेब में डालकर सीधा सलीम चावली के घर चला गया।

उसने मुझे तीन पिस्तौल दिखाए, सब की मारक क्षमता अलग अलग बताई गई और रेट भी अलग अलग।

मैंने बारी बारी सबको देखा, हालाँकि आज तक मैंने ये सब टेलिविज़न में देखे थे।

मुझे मेरे पैसों के मुताबिक दूसरा पिस्तौल अच्छा लगा।

दूसरा पिस्तौल दिखने में अच्छा था।

मैंने पांच सौ सत्तर रूपए देकर वह खरीद लिया , और मेरे वापिस मुड़ने तक सलीम ने कुछ नहीं पूछा यह भी नहीं कि मुझे यह क्यों चाहिए या मैं चाय पानी लूँगा या नहीं।

बाकी बचे पैसों से मैंने गोलगप्पे खाये और एक फ़िल्म कैसेट खरीद ली।


दूसरे दिन शाम को मेरे किसी ख़ुफ़िया दोस्त का फोन आया कि आज रात इलियास और फ़रज़ाना उसके घर के पीछे मिलने वाले है।

यह सूचना ज़ुल्फेन के आशिक़ ने दी। ज़ुल्फ़ेन फ़रज़ाना की एकमात्र दोस्त थी। वह लड़का मुझे काफी खबर देता था। इस बार वो सीरियस नहीं हुआ कि मैं उसकी सूचना पर आज रात क़त्ल करने वाला हूँ।

- तो फिर अनवर ने , यानी तुमने उसको मारने की साजिश रच ली ?

- हाँ दोस्त। मुझे उस वक़्त कुछ भी होश नहीं था और मैं इलियास को उसके साथ देखते ही मार देना चाहता था, उधर इलियास भी ऐसा ही कुछ कह रहा रहा।

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आठवें दिन शाम के वक़्त लेखक आया।

वह शायद मेरी जमानत के पेपर्स लाया था।

उसके शरीर पर एक चादर थी जो वह हमेशा ओढ़े रखता है।

वो काफी बदसूरत सा लग रहा था और उसके बाल भी बे-नहाये रूप से उलझे हुए थे, उसकी दाढ़ी पर बाल भी उलझे हुए थे।

फिर भी वैज्ञानिक आधार पर कोई ये नहीं कह सकता था कि लेखक पागल है।

लेखक ने मेरी जमानत की बात और मेरा हाल चाल पूछा।

जेलर और बाकी कई कैदी भी थे वहां और मुझे बताया गया कि लेखक ने मेरा केस जीत लिया है और मेरी जमानती करवा दी है।

लेखक ने मेरा हाल चाल पूछकर अनवर की तरफ देखा और आँखों से उसका भी हाल चाल पूछ लिया।

वह जेल में मेरी आखिरी शाम थी और मेरी रात कहाँ बीतेगी- यह न मुझे पता था और न ही प्रकृति को।


मैंने जेलर से गुहार लगाई की मुझे अनवर के साथ बात करने का एक घण्टा और दिया जाये।

जेलर ने लेखक के आग्रह करने पर हामी भर ली और मैंने इच्छा जताई कि इसी कोठरी में हम दोनों को एक घण्टा छोड़ दिया जाये।

बात करे उस अँधेरे को मिटाती हुई मोमबत्ती की जो जेलर की मेज़ पर जल रही थी या उन ख़ामोशियों को चीरती हुई मेरी भावनाओं की, जो अनवर के साथ जुड़ गई थी।

दर्द और प्यार की झाँकियाँ ऐसे आदमी के अंदर ही देखने को मिली जो जज़्बातों के गड्ढे से निकलकर भी साज़िश के कुएं में गिर गया , उन्हें शायद हम कही और नहीं देख पाते है।

मैंने आखिरी दिन अनवर को बताया कि मेरा अंगूरों का बाग़ है और मैंने बहुत अंगूर खाये थे , कुछ खट्टे कुछ मीठे।

मैंने बैंक कर्मचारी को मार दिया और मेरी जमानत भी हो गई।

तुम्हारी कहानी आगे सुनने का मन है अनवर, तुमने बात वहीं छोड़ दी थी जब फ़रज़ाना से इलियास मिलने आया। उस वक़्त तुम कहाँ थे।

- मैं उस बरसती रात में घर से निकला, और सूचना की मुताबिक फ़रज़ाना के घर के पीछे की पुरानी दुकानों के पास छिप गया।

कुछ ही देर में इलियास और फ़रज़ाना दिखे।

उस बरसते मौसम वाली काली सी रात में बार बार बिजली चमकती और मुझे उसके चेहरे पर आज भी बारहवीं क्लास की तरह प्यार नज़र आया।

लेकिन मेरी बेवफा फ़रज़ाना को इलियास के आने की ख़ुशी थी..


दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया और बरसात की काली रात में दोनों इस कदर गले से मिले, मुझे शबीर कुमार का एक गाना याद आ गया-

"जिहाल-ए -मिस्कीन मकुन बरंजिश , बेहाल-ए -हिजरा बेचारा दिल है..

सुनाई देती है जिसकी धड़कन , तुम्हारा दिल या हमारा दिल है.."

(अनवर गाकर सुनाता है और रोने लगता है। )

...क्योंकि

यही वे लम्हे हैं जिन्हें वे खुलकर जीते हैं..

जश्न मानते है नाचते गाते हैं,

एक दूसरे साथ निभाते हैं....

शायद इसीलिए किसी शायर ने खूब कहा है-

एक बार जी भर के देख लो इस चेहरे को,

क्योंकि बार बार कफ़न उठाया नहीं जाता।

...और मैंने पॉलीथिन में लिपटा वह दूसरा पिस्तौल निकालकर इलियास को निशाना बनाया।

धाँय...... की आवाज़ के साथ गोली उसकी खोपड़ी में लगी। काली रात के सन्नाटे में चमकती बिजली काफ़ी देर तक इलियास की खून से भरी लाश दिखाती रही।

मैं फ़रज़ाना को लेकर वहां से भागने ही वाला था, तभी दो तीन गोलियां और चली, जो मेरी पिस्तौल से नहीं चलाई गई थी।

मैं दोनों दुकानों के बीच कचरे के ढेर पर बैठा फ़रज़ाना की लाश को चूमता रहा।


यह कैसी आवाज़ थी गोली की?

कौन था हम तीनों के अलावा उस सर्द मौसम में?

मेरी कसक कसक रोने की सिसकियों के बीच फ़रज़ाना मौत के पालने में सो गई। (अनवर रोता है)(मैं भी..)

- ठीक है अनवर, सम्भालना खुद को।

मैं जा रहा हूँ, जहाँ रास्ता ले जायेगा।

इतनी बात होने के बाद मैंने अनवर से विदाई ली।

लेखक और मैं जेल से बाहर निकल कर कुछ देर साथ चले

गली के अगले मोड़ पर लेखक अलग हो गया। और दूर कहीं

क्षितिज़ में केवल उसकी हरी चादर दिखाई दे रही थी..तब तक मैं देखता रहा।

अनवर मुझे फिर कभी नहीं मिला।

मेरा अंगूरों का कोई बाग नहीं था और मुझे अंगूर के बारे में इतना ही पता है की वे होते हैं।

मैंने किसी बैंक कर्मचारी को नहीं मारा था और मुझे मोमबत्ती बनाना आता है।


मैंने अभी अपने तेरह साल के भतीजे को यह कहानी पूरी सुनाई है।

वह कहता है, तुम बहुत बुरे हो काका!

तुम तीसरा पिस्तौल कितने रूपए में लाये?

और तुमने उस रात गोलियां क्यों चलाई?

तुम्हारा अंगूरों का बाग़ क्यों नहीं हैं...

मेरा भतीजा चिल्लाता है।

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- बृजमोहन स्वामी "बैरागी"

[जिलाअध्यक्ष- राजस्थानी भाषा संघर्ष सेना, इकाई -हनुमानगढ़]

स्थाई पता- बरवाळी नोहर , हनुमानगढ़ (राज०)

पिन- 335504

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

संपर्क: birjosyami@gmail.com

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1 टिप्पणी "कहानी // तीसरा पिस्तौल // बृजमोहन स्वामी "बैरागी""

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