यात्रा संस्मरण // सीमाओं के अदृश्य प्रहरी को सलाम! // रोली मिश्रा

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यात्रा संस्मरण

सीमाओं के अदृश्य प्रहरी को सलाम!

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रोली मिश्रा

न तो हमारी सेना का और न मेरा कभी भूत-प्रेतों या आत्माओं पर यकीन रहा है। पर 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए और मरणोपरांत महावीर चक्र प्राप्त सैनिक जसवंत सिंह ऐसे इकलौते सैनिक हैँ, जिन्हें आज भी भारतीय सेना एक जीवित और कार्यरत आर्मी ऑफिसर मानती है। और उन्हें वही वेतन और सुविधाएँ दी जाती हैं जो अन्य किसी भी सामान्य अधिकारी को मिलती हैं। उन्हें अरुणांचल के तवांग एरिया का guardian ghost माना जाता है। समय समय पर भारतीय सेना को खतरों और आपदाओं के बारे में स्वप्न में आकर आगाह करने वाले जसवंत सिंह की ख्याति अन्तर्राष्ट्रीय है। और 1962 में खुद चीन की सेना ने भारत को उनके अविश्वसनीय बहादुरी के कारनामों से अवगत कराया था।

उनका सिर काटकर ले जाने वाली चीनी सेना के अफसर भी उनकी जांबाज़ी से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने युद्ध के बाद न सिर्फ ससम्मान उनका सिर लौटाया बल्कि उनकी एक काँसे की प्रतिमा(bust) भी बनवाकर भेंट की जो अब तवांग(अरूणांचल प्रदेश) से लगभग 25 किलोमीटर दूर नौराङ्ग ज़िले में उनके स्मारक जसवंतगढ़ में स्थापित है। यह स्थान एक बड़ा टूरिस्ट आकर्षण तो है ही, इधर से गुज़रने वाले आर्मी के सभी लोग यहां अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने अवश्य रुकते हैं। ये माना जाता है कि आर्मी के जिस भी व्यक्ति ने इस परंपरा की अवहेलना करने की कोशिश की, उसके साथ आगे रास्ते में कोई न कोई हादसा अवश्य हुआ।


1962 में 4 गढ़वाल राइफल्स की यूनिट को नौराङ्ग पोस्ट से हट जाने का आदेश आर्मी हाइकमान ने दिया था पर जसवंत सिंह ने पीठ दिखाकर वापस होने के बजाय अकेले वहीं रुक कर चीनी सेना का मुकाबला करने की ठानी। उन्होंने इस कुशलता से हथियारों को तीन भिन्न भिन्न जगहों पर सेट करके चीनी सेना का मुक़ाबला किया कि वे 72 घंटों तक ये नहीं समझ पाए कि मोर्चे पर भारतीय सेना के कितने लोग तैनात हैं। बहादुरी की यह अविश्वसनीय दास्तान तो उनका कोर्ट मार्शल करने वाले अधिकारियों ने बाद में जानी कि उन्होंने अकेले ही लगभग 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था।


यह स्मारक शान्त, सुंदर, प्रेरक और 10,000फुट की बुलन्दी पर सिर उठाकर खड़ा एक शक्तिपुंज है। छह army personnels यहां जसवंत सिंह जी की देखरेख में तैनात रहते हैं। उन्हें उनके कमरे में 4-30 पर चाय से लेकर तय समय पर खाना दिया जाता है, रोज़ उनके कपड़े प्रेस किये जाते हैं और जूते पोलिश किये जाते हैं..उनके शुभचिंतकों के पत्र और शुभकामनाएं उन्हें रोज़ पढ़ने के लिए दी जाती हैं। और उन्हें निश्चित छुट्टियां और अपने गाँव जाने के लिए AC 1st क्लास का रिजर्वेशन भी हर साल दिया जाता है। मृत्यु के वक़्त वे एक राइफलमैन थे। मरणोपरांत उन्हें जो प्रमोशन मिले, उस से वे अब मेजर जनरल हैं। उनकी सेवा में लगे आर्मी के लोग बताते हैं कि रात में वे पहाड़ों की चौकसी करते हैं जिस से सुबह उनके जूते गंदे और कपड़े भी पहने हुए से मिलते हैं।


इसी युद्ध के दौरान सूबेदार जोगिंदर सिंह को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था, पर जनमानस और सेना में जो रुतबा जसवंत सिंह का है, वो किसी सैनिक को हासिल न हो सका। एक लीजेंड के तौर पर उन्हें चीन ही नहीं, अमेरिका में भी जाना जाता है। 2002 में बाबा जसवंत सिंह रिटायर हो चुके हैं पर सेना में उन्हें अस्तित्व को चुनौती कोई नहीं देता क्योंकि ये सच है कि---
      

   "नायकों को याद रक्खा जाता है लेकिन महानायक कभी मरते नहीं.."
                                           ------रोली मिश्रा

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