कहानी // केक // हरीश कुमार ‘अमित’

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केक

हरीश कुमार ‘अमित’

कॉलबेल बजने का इन्तज़ार करते हुए मैं बेचैनी से अख़बार पढ़ रहा था। रेखा और बच्चे कभी भी लौटकर आ सकते थे। दरअसल मुझे उन लोगों के, ख़ासतौर से अपनी बच्चियों-श्वेता और नेहा, के चेहरे पर दमकती खुशी देखने की उत्सुकता थी। खुशी की वजह थी - क्रिसमस केक का खरीदना। यूँ हम लोग कोई ईसाई नहीं हैं, पर आज सुबह अचानक मेरे दिमाग़ में आया था कि सर्दियों की इन छुट्टियों में बच्चों को इस तरह कम-से-कम एक बार तो खुश किया ही जा सकता है। छह महीने से टलती आ रही अप्पूघर दिखाने की बच्चों की फरमाइश को बड़ी मुश्किल से टाल पाया था। हालाँकि पैसों की हालत तो हर महीने की तरह पतली थी, ख़ासतौर से महीने के आखि़री हफ्ते में, मगर फिर भी जोड़-तोड़ करके एक छोटा-मोटा केक खरीद लेने की संभावना तो निकाली ही जा सकती थी। यह सोचा गया था कि इस हफ्ते की सब्ज़ी में काफी कटौती कर देंगे और ज़रूरत पड़ी तो एकाध दिन दूध की भी छुट्टी कर लेंगे।

एक-एक रुपए का हिसाब-किताब कर लेने के बाद यह नतीजा निकला था कि 40-50 रुपए तक का केक किसी तरह ख़रीदा जा सकता है। इसलिए मैंने रेखा को सुबह से कई बार हिदायत दी थी कि 50 रुपए से ज़्यादा का केक किसी भी हालत में न ख़रीदा जाए। हो सके तो 40 तक का ही ले लिया जाए। केक खरीदने के लिए घर से निकलते वक़्त भी मैं अपनी यह हिदायत दोहराना भूला नहीं था।

सोचा था कि दोपहर का खाना खाकर जब बच्चे सो रहे होंगे तो रेखा बाज़ार जाकर केक ले आएगी। मुझे हल्का-सा बुख़ार था, इसलिए मेरा न जाना ही ठीक था। पर शायद बच्चों को केक खाने की इतनी उत्सुकता थी कि वे तीन बजे के करीब ही उठ बैठे और केक-केक की रट लगाने लगे। आखि़र यही तय हुआ कि बच्चे भी रेखा के साथ ही बाजार जाएंगे। हालांकि इससे एक और समस्या यह पैदा हो सकती थी कि केक खरीदते समय बच्चे टॉफी या चॉकलेट वगैरह के लिए न मचल उठें। इसलिए रेखा को मैंने ख़ासतौर से यह कह दिया था कि केक के अलावा और कुछ नहीं खरीदना है। हालाँकि पैसों की हालत रेखा भी मुझसे कोई कम अच्छी तरह नहीं जानती थी।

अख़बार पढ़ते हुए यह दृश्य मेरी आँखों के आगे बार-बार कौंध जाता कि केक खाते हुए कि बच्चों के चेहरे से कैसी खुशी टपक रही है।

तभी कॉलबेल बज उठी। घंटी बजने के तरीके से ही मैं समझ गया था कि रेखा और बच्चे आ गए हैं। मैं झपटकर उठा और बाहर आकर मैंने जल्दी से दरवाजे की कुंडी खोल दी। मैं उम्मीद कर रहा था कि दरवाज़ा खेलने पर खुशी से दमकते हुए तीन चेहरों से मुलाकात होगी, पर ऐसा न हुआ। तीन चेहरे मेरे सामने थे तो सही, मगर तीनों के तीनों बुझे हुए थे। जहाँ बच्चों के चेहरे गुमसुम थे, रेखा के चेहरे से वेदना टपक रही थी।

‘‘क्या हुआ?’’ - मैंने अधीरता से पूछा।

जवाब में रेखा ने कुछ नहीं कहा और अन्दर कमरे की ओर चल दी।

मैंने अब श्वेता को लक्ष्य कर अपना सवाल दोहराया। पर वह भी रुआँसी शक्ल लिए दूसरी ओर मुँह फेरकर खड़ी हो गई। अब सिर्फ़ नेहा ही बची थी, जिससे कुछ पूछा जा सकता था, पर तीन साल की बच्ची मुझे किस हद तक सही जवाब दे सकेगी, इसमें शक था। लेकिन फिर भी मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘‘बताओ नेहा, क्या हुआ? केक नहीं लाए?’’

‘‘मम्मी ने लेतर (लेकर) ही नहीं दिया।’’ नेहा ने नाराजगी भरे स्वर में उत्तर दिया।

‘‘क्यों?’’ मेरे इस सवाल पर नेहा ने ‘‘पता नहीं’’ की मुद्रा में हाथ हिला दिए और फिर हल्की-हल्की सिसकियाँ लेने लगी।

अब घर के अंदर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। मैंने दरवाज़े की कुंडी बंद की और अन्दर बेडरूम की ओर चल पड़ा जिधर रेखा गई थी।

रेखा बेड पर दूसरी ओर मुँह किए लेटी थी। कमरे में मेरे आने की आहट सुनकर भी वह उसी तरह लेटी रही। मैं एक-दो पल चुपचाप खड़ा रहा। फिर मैंने रेखा से पूछा, ‘‘क्या हुआ? केक क्यों नहीं लाई?’’

रेखा एकदम झटके से उठ बैठी। फिर गुस्से और दुःख के मिले जुले स्वर में कहने लगी, ‘‘इन लोगों के साथ हाल है कोई बाहर जाने का? मोहन कन्फेक्शनरी की दुकान पर पहुँचने से पहले ही रास्ते की छह दुकानों के आगे रुककर तरह-तरह की फ़रमाइशें करने लगीं। किसी तरह घसीटकर मोहन कन्फैक्शनरी पर ले गई, तो वहाँ केक खरीदने से पहले ही दोनों और-और फरमाइशें करने लगीं। कोई चॉकलेट मांगे तो कोई वैफर्ज़ माँगे।’’

‘‘कोई छोटी-मोटी चीज़ ले देनी थी.....’’ अपने उदार दिल के वशीभूत हो मैं यह कह तो बैठा पर तभी अचानक यह याद आ जाने पर कि रेखा के पास गिने-चुने रुपए ही तो थे, मुझे अपने कहे पर पछतावा होने लगा।

‘‘पैसे ही कितने थे मेरे पास! पचास का नोट ही तो लेकर गई थी।’’

‘‘फिर केक लिया क्यों नहीं?’’

‘‘पचास क्या वहाँ तो डेढ़ सौ-दो सौ तक के केक मिल रहे थे। पैंतालीस रुपए का एक केक मैं खरीदने लगी थी, पर ये दोनों कोई दूसरा केक खरीदने की जिद करने लगीं। अब वह दूसरा केक साठ रुपए का था। अब क्या करती? वह केक भी छोड़कर आ गई।’’ कहते-कहते रेखा की आवाज़ नम हो आई।

मैं अच्छी तरह महसूस कर पा रहा था कि इस सारे प्रकरण में रेखा को कितनी जिल्लत बर्दाश्त करनी पड़ी होगी। मगर बच्चों के भोले-मासूम चेहरे याद आते ही मुझे लगने लगा कि मैं एक बहुत बड़ा गुनहगार हूँ जो अपने बच्चों को एक केक तक नहीं दिला सकता। अब एक ही चारा था कि घर में पड़े दो सौ रुपयों में से कुछ और रुपए रेखा को दे दूँ और कहूँ कि बच्चों की पसन्द वाला केक ले आए, पर तभी दिमाग़ ने चेतावनी दी कि ऐसा करके केक तो आ जाएगा, पर इकत्तीस तारीख़ को तनख़्वाह मिलने तक के बाकी खर्चे कैसे चलेंगे। दो सौ रुपए में एक हफ्ते तक के सब्ज़ी, दूध, बस के किराए वगैरह के खर्च कैसे निपट पाएंगे। उन खर्चों को, जहाँ तक हो सके, कम-से-कम मान कर ही तो आज केक खरीद पाने की हिम्मत जुटाई थी। यहाँ तक कि तनख़्वाह वाले दिन शाम को दफ़्तर से लौटने के लिए भी अगली तनख़्वाह में से बस का किराया निकालने की ज़रूरत थी।

तभी अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी। क्रिसमस तो खै़र सभी नहीं मनाते, पर एक हफ्ते बाद जो नया साल आने वाला है, उसे तो सभी मनाते हैं न। क्यों न आज के बदले 31 दिसम्बर की शाम को नया साल आने की खुशी में केक खरीदा जाए। उस दिन तो नई-नई तनख़्वाह मिली होने पर आराम से केक खरीदा जा सकेगा। तब तो साठ का क्या, सत्तर-अस्सी तक का केक ले लेंगे।

यही सोच मैंने श्वेता और नेहा को अपने पास बुलाया और समझा दिया कि अब हैप्पी न्यू ईयर पर अच्छा-सा केक लेंगे। बच्चे मेरी यह बात सुनकर खुश हो गए और फिर खेलने में मस्त हो गए।

उसके बाद तो केक हमारे लिए जैसे एक विशेष वस्तु हो गया। बच्चों को आपस में कई बार यह कहते सुना गया कि 31 तारीख़ की शाम को पापा आफिस से आते वक्त हैप्पी न्यू ईयर का केक लाएंगे। रेखा और मैं भी बच्चों को बहलाने के लिए कभी-कभी केक की बात याद दिलाया करते। कई बार केकवाली बात का इस्तेमाल हम बच्चों को धमकाने के लिए भी किया करते। जब कोई बच्चा किसी बात पर ज़िद करने लगता तो उसे कहा जाता कि अगर वह अपनी जिद पर अड़ा रहेगा तो 31 तारीख को केक नहीं लाएंगे। यह सुनते ही बच्चा अपनी ज़िद छोड़ देता।

एक-एक करके दिन सरक रहे थे। मैं खुद भी बड़ी बेसब्री से 31 तारीख़ की शाम का इन्तज़ार कर रहा था कि बच्चों के लिए केक लाकर उनके चेहरे पर छलकते प्रसन्नता के भाव को देख सकूं। मैंने तो यह भी सोच लिया था कि मैं पचास क्या सौ रुपए तक का केक लेता आऊंगा। कौन सा रोज़-रोज़ खरीदना है।

करते-करते आखि़र 31 तारीख़ आ ही गई। दफ़्तर में अपनी सीट पर बैठे-बैठे भी मेरा ध्यान बार-बार केक खरीदने की बात पर चला जाता। दोपहर के बाद तनख्वाह के नोट हाथ में आते ही मुझे केक का ध्यान आ गया।

लेकिन तनख़्वाह लेकर वापिस अपनी सीट पर आते-आते मेरे मन में जनवरी महीने के खर्चों की बात भी आने लगी। याद आया कि इस महीने तो बच्चों की त्रैमासिक फीस भी जमा करवानी है, जिसमें तनख़्वाह का एक बड़ा हिस्सा लग जाएगा। बिजली और पानी के बिल भी इसी महीने आने हैं! यह सब सोचते ही मुझे केक खरीदने का अपना विचार डोलता-सा लगने लगा। मगर इतनी जल्दी हिम्मत हारने की आदत मेरी है नहीं। सो मैं सीट पर बैठे-बैठे मन-ही-मन महीने के खर्चे का हिसाब लगाने लगा तभी यह बात भी मेरे दिमाग़ में कौंधी कि इस महीने की 22 तारीख़ को रेखा का जन्मदिन भी तो है। अपनी खस्ता आर्थिक स्थिति के कारण जन्मदिन पर उसे कोई उपहार वगैरह दे पाना तो हर साल की तरह सम्भव नहीं हो पाएगा, लेकिन बाज़ार से खाने-पीने का कुछ विशेष सामान तो मंगवाना ही पड़ेगा। करीब सौ-डेढ़ सौ रुपए तो इसमें खुल ही जाएंगे।

पैसों के इस ज़बानी जमाखर्च की उधेड़बुन में लगे-लगे ही मैंने शाम को दफ़्तर की अपनी सीट छोड़ी और फिर बाहर निकलकर घर जानेवाली बस में सवार हो लिया। सारी राह मेरे दिमाग़ में बस केक ही चक्कर काट रहा था। एक तरफ जी चाह रहा था कि बच्चों के लिए सौ नहीं तो पचास-साठ रुपए तक का कोई केक ले जाऊँ और उनके चेहरे पर आए प्रसन्नता के भाव को देखूँ। दूसरी तरफ इस महीने के खर्चों की बात याद आते ही यह लगने लगता था कि इस महीने जब रोटी खाना भी मुश्किल लग रहा है, तब केक की बात सोचना भी बेवकूफी है।

इसी उधेड़बुन में मैं बस से उतरा। घर तक पहुँचने के लिए करीब पाँच मिनट पैदल चलना पड़ता था। मोहन कनफेक्शरी की दुकान रास्ते में ही पड़ती थी। जैसे-जैसे वह दुकान पास आती जा रही थी, मेरे दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं।

कुछ देर बार मैंने घर की कालबेल दबाई। कालबेल की आवाज़ सुनते ही श्वेता की किलकारी गूँजी, ‘‘पापा आ गए!’’ तभी नेहा की आवाज़ भी सुनाई दी, ‘‘तेत (केक) आ दया (गया)!’’ कुछ पल बाद जैसे ही रेखा ने दरवाज़ा खोला, तीन जोड़ी आँखें उत्सुकता से मेरे हाथों की ओर देखने लगीं, मगर मेरे दोनों हाथ खाली थे, बिल्कुल खाली।

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परिचय


नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994, 2001, 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत


 
(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत


 
(झ) 'राष्ट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त


पता  - 304ए एम.एस.4ए केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56ए गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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