दोहे // रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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दोहे

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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1

अपने आँगन में चला , कैसा यह अभियान।

बन्द आँखें पढ़ने लगीं,गीता वेद,कुरान ॥

2

टूट चुके इस गाँव के, अब सारे दस्तूर ।

दर्पण में देखें नहीं, चेहरों के नासूर ॥

3

छाया दी जिस पेड़ ने, काटी उसकी डाल ।

बार-बार फिर पूछते, ‘अब तो हो खुशहाल

4

पता नहीं कितने भरे , हमने मन में खोट।

मरहम जब तक ढूँढते, फिर लग जाती चोट ॥

5

प्यार किया हमने कभी, चलकर नंगे पाँव।

बिना बात वे जल उठे, जिनको बाँटी छाँव ॥

6

हम तो झरते पात हैं, मंजिल अपनी पास ।

जिस दिन हम होंगे नहीं, होना नहीं उदास ॥

7

मूरख बनकर देखते , हम तो सारे खेल।

अंगारों से सींचते , वे रिश्तों की बेल ॥

8

बीच प्रेम जलधार है,हम नदिया के कूल।

मन पर लेना ना कभी,कुछ शब्दों की भूल।।

9

मन में उमड़ें भाव जब,शब्द मानते हार।

प्रेम भाव अतिरेक में,भटकें बारम्बार ।।

10

मुझको कुछ ना चाहिए,आकर तेरे द्वार।

अपने सब दुख दान दो,मेरी यही पुकार।।

11

मिलते हैं संसार में,सबको लाखों लोग।

तुमसे मिल जाएँ जिसे,यह केवल संयोग।

12

कौन बड़ा छोटा वहाँ,जहाँ प्रेम सञ्चार।

मिला नीर से नीर जब,उमगे भाव,विचार।

13

वक़्त नहीं, लम्बा सफ़र, मत खोना पल एक।

तुझ पर ही विश्वास है, तुझ पर अपनी टेक।

14

कैसे बीते पल ,घड़ी, जब तुम होते मौन।

आहट पर ही कान थे,आई थी बस पौन।।

15

अपने तो बनते रहे, पथ में बस अवरोध।

हमसे कुछ भी भूल हो,तुम मत करना क्रोध।।

16

शुभ कर्मों का है मिला, बदले यह उपहार।

टिका दिए हैं ओक में,कुछ काँटे, अंगार।

17

जिन अधरों से थे झरे,हरदम हरसिंगार।

अपने चुन चुन ले गए, होते ही भिनसार।।

18

मेरे भी मन में रही,आऊँ तेरे द्वार।

पग के छाले रोकते, चलने से हर बार।

19

अनजानी राहें सभी,साया ही था साथ।

जीवन अंधा मोड़ था,थामा तुमने हाथ।।

20

उदासी भरी रात है, हम कर दे उजियार।

चन्दा अपने साथ तो ,मिट जाए अँधियार

21

जीवन में तुमको मिले, सारा सुख संसार ।

यश फैले चारों दिशा,बरसे पावन प्यार।।

22

राजा जनता का रहा, युगों युगों से खेल

कोल्हू में पेरे गए,खींचा सारा तेल।।

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3 टिप्पणियाँ "दोहे // रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’"

  1. ढेर दोहे एक साथ पढने क़ मिले । तबीयत खुश हो गई। बधाई काम्बोज जी । सुरेंद्र वर्मा।

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  2. लघुकथा के लेखन,सम्पादन,प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने वाले आदरणीय काम्बोज जी ने इन दोहों में बड़ी आत्मीयता से अपनी उम्र के संवेदन सत्य को पिरोया है. आज के सामाजिक-पारिवारिक सम्बंधों के संवेदन में आ रही स्वार्थपरता को इंगित कर दोहाकार ने उनका भी भला चाहा है जो अपने हैं

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