सन्नी गुप्ता 'मदन' के दोहे

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दोहे

सन्नी गुप्ता 'मदन'

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नहीं जुड़े ज्यों टूटकर, शाखाओं से पात।
ऐसे ही होते यहाँ, रिश्तों में जज्बात।।

बूढ़ा बरगद कट गया, कटा पुराना आम।
लूटे मेरे गाँव को, दे विकास का नाम।।

चंगुल में कानून के, फँसी हुई है जान
बिकने तक को आ गये, खेत और खलिहान।।

मेरे दिल में प्रश्न इक, बनी हुई है आज।
नन्ही चिड़ियों को भला, क्यों खाते हैं बाज।।

मरी हुई संवेदना, कुण्ठित हुए विचार।
यही बढ़ाते जा रहे, धरती पर व्यभिचार।।

कौन यहाँ पर रंक है, कौन यहाँ पर भूप?
सबको मिलती एक सी, सर्दी वर्षा धूप।।

ख्यातिलब्ध होता सदा, बढ़े निरन्तर मान।
जिस जन पर करते कृपा, दुखहर्ता हनुमान।।

कल तक जो खामोश थी, आज चूमती गाल।
जाने कैसे ले लिया, यों सेंसेक्स उछाल।।

लगा बोलने आप ही, कोयल जैसे बोल।
कनपटियों पर रख दिए, जब हमने पिस्तोल।।

गोरी जब मुझको छुई, हुआ सुखद अहसास।
होंठों पर रख होंठ मैं, लिख डाला मधुमास।।

घर की तुलसी की भला, क्या समझेंगे मान।
जब डिब्बे का दूध पी, बच्चे हुए जवान।।

कीचड़ में पंकज खिले, कण्टक खिले गुलाब।
मृग सी तृष्णा हो अगर, मरु में दिखते आब।।

बर्गर जैसे गाल है,चाउमीन से बाल।
रोबोटों सी हो गयी,मैडम जी की चाल।।

स्कूटी जैसी लचक, ट्रक जैसी आवाज़।
मैडम जी सज-धज चली,नई कार सी आज।।

गेहूँ मक्का बाजरा,मटर चने की दाल।
प्रतिदिन मुझसे पूछते,मोबाइल पर हाल।।

गुड़ जब तक बँधकर रहे,मिले दाम भरपूर।
नहीं इसे जग पूछता, गर हो जाये चूर।।

रोज द्रौपदी हो रही, कौरव से निर्वस्त्र।
कान्हा मुरली त्यागकर, उठा लीजिये अस्त्र।।

ओ गरीब की बस्तियाँ, मत हो कभी उदास।
कीचड़ में पंकज खिले, सदा कहे इतिहास।।

डाल दिए हथियार सब, बैठ गया फिर मौन।
नर से गिरगिट पूछता, गुरुवर तुम हो कौन?

निश्चित होगी एक दिन, मानवता की हार।
नहीं मिटे यदि आपसी, झगड़े दंगे रार।।

बेटा चलता कार में, घर है आलीशान।
बूढ़ी माँ फुटपाथ पर, लगा रही दुकान।।

जब से बढ़ता जा रहा, दुर्जनता का दंस।
बगुलों के ही बीच में, काट रहे दिन हंस।।


एक साथ मिलती नहीं, सफल दिनों की भीड़।
तिनका-तिनका जोड़कर, बना लीजिए नीड़।।

पहले चूमि गाल को, फिर हो गयी निराश।
बचकर रहना साजना, शहर बड़ा बदमाश।।

लंब और आधार दो, झुके नहीं इक बार।
थोड़ी झुककर कर्ण ही, बड़ी हुई हर बार।।

बूढ़ा बरगद रो पड़ा, पकड़ हमारा पाँव।
बेटा आ जाया करो, कभी-कभी तुम गाँव।।

शासन जब करने लगे, दुशासनी आघात।
तो हँसकर कैसे कटे, जनमानस की रात।।

धरती पर बँटता रहा, नित्य खुदा का नूर।
जिस घर तक पहुँचा नहीं, उसमें था मज़दूर।।

बदहाली को देखकर, रह जाओगे दंग।
दो पग चलकर देख लो, मज़दूरों के संग।।

सन्नाटे को चीरकर, गूँजा एक सवाल।
कालेपन से क्या अभी, बची हुई कुछ दाल।।



सन्नी गुप्ता 'मदन'
पता-सेवागंज,पोस्ट-करमपुर बरसावां,जिला-अम्बेडकरनगर यूपी
पिनकोड-224234

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