व्यंग्य // पतंगबाजी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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पतंगबाजी

डा. सुरेन्द्र वर्मा

मुझे ये कतई पता नहीं था की हमारे प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी पतंगबाजी के भी शौकीन हैं। यह तो उन्होंने अपनी इंडोनेशिया की यात्रा के समापन पर वहां के राष्ट्रपति के साथ जब जकार्ता में पतंग उडाई तो दोनों का (इंडोनेशिया के राष्ट्रपति और भारत के प्रधान-मंत्री का) पतंग-प्रेम जग ज़ाहिर हो सका। दोनों ही मजे हुए राजनेता हैं और अब पता चला दोनों ही पक्के पतंगबाज़ भी हैं। मुझे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति के बारे में तो ज्यादह पता नहीं लेकिन मोदी जी मूलत: गुजरात के हैं और गुजरात पूरे भारत में पतंगबाजी के लिए विख्यात है। यहाँ १४ जनवरी मकर संक्रांति पर अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव होता है। देश विदेश के लोग – यू.के., दक्षिण कोरिया, चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया, आदि देशों से - यहाँ आते हैं और अपनी अपनी पतंगबाजी का हुनर दिखाते हैं। अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे नीले आकाश पर इन्द्रधनुषी पतंगे अपनी आभा बिखेरती हुई छा जाती हैं। स्थानीय दर्शकों और महमान पतंगबाजों को अभिभूत कर देती हैं।

प्राचीन काल से ही इंसान की इच्छा रही है कि वह मुक्त आकाश में उड़े। शायद इसी इच्छा में पतंग की उत्पत्ति का राज़ छिपा है। धरती और आकाश को जोड़ने वाली ये पतंगें भारत में हज़ारों साल से उडाई जा रही हैं। यक्ष दूत की तरह पृथ्वी निवासियों की कामनाएं इन पतंगों द्वारा आकाश तक पहुंचाई जाती हैं। राम चरित मानस में तुलसीदास एक प्रसंग में राम को पतंग उड़ाते हुए चित्रित करते है। कहते हैं,

राम इक दिन चंग उडाई / इन्द्रलोक में पहुंची जाई !

तुलसीदास का यह काव्यात्मक कथन स्पष्ट ही इतिहासेतर है। लेकिन इतिहास हमें बताता है कि पतंगों का मूल स्रोत चीन है। चीन के बौद्ध तीर्थ-यात्रियों द्वारा ही पतंगबाज़ी भारत में आई। लेकिन पतंगबाजी में भारत आज तक चीन का मुकाबला नहीं कर पाया है। हमारे प्रधान मंत्री कई बार चीन गए लेकिन वहां के किसी राजनेता के साथ उन्होंने पतंग उड़ाने की हिम्मत नहीं की और न ही इसके लिए उन्हें आमंत्रित किया गया। इंडोनेशिया शायद पहला ऐसा देश है जिसने अपने मेहमान एक प्रधान मंत्री को अपने राष्ट्रपति के साथ पतंग उड़ाने के लिए आमंत्रित किया हो। इससे दोनों ही देशों का ज़बरदस्त पतंग-प्रेम ज़ाहिर होता है।

राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर, हमारे एक मित्र, पतंग उड़ाने में बड़े माहिर हैं। कहते हैं अगर आपको एक प्रोफ़ेसर नहीं, बल्कि एक राजनीतिज्ञ बनना है तो पतंगबाज़ी से आप बहुत-कुछ सीख सकते हैं। जिस तरह हम पतंग को हवा में उड़ाते हैं, ठीक उसी तरह राजनेता अपनी बात हवा में उछाल देते हैं तथा सामने वाले की बात को हवा में उड़ा देते हैं। अपनी पतंग आगे बढाओ और दूसरे की पतंग की डोर को अपने मांजे से रगड़ कर उसकी पतंग काट दो – यह भी पतंगबाजी का ही एक हुनर है जिसे राजनेताओं को आना बहुत ज़रूरी है। खुला आसमान मिल जाए तो बेधड़क डोर ढीली करके अपनी पतंग आगे लहराते चलो। अगर आपका रास्ता कोई काटने की हिम्मत करे तो इससे पहले कि वह कुछ कर पाए अपनी पतंग उससे लड़ा दो। इंशा-अल्लाह जीत आपकी ही होगी। पहले मारे वो मीर। पतंग उड़ाते समय अपने आसपास अपने कुछ दोस्तों को बना कर ज़रूर रखो। वे दूसरे की कटी पतंग की लूट में आपके मददगार होंगे। एक शब्द में काटने की बात हो या उड़ाने की, ढील देने की बात हो या लूटने की – पतंगबाजी के ये सारे हुनर राजनीति के हुनर भी हैं।

कलाबाजी, गलेबाजी, दगाबाजी, नशेबाजी, जुएबाजी, पटेबाज़ी, कबूतर-बाजी, यारबाजी, गप्पबाजी न जाने कितने खेल हैं जो आदमी खेलता है, बाजी लगाता है, जीतता और हारता है। पर इनमें पतंगबाजी ख़ास है। इसका जीवन के लगभग हर पहलू में दखल है। इसकी महारत राजनीति में तो काम आती ही है संगीत और सिनेमा में भी इसकी खासी शिरकत है। ‘कटी पतंग’ और ‘पतंग’ नाम के चलचित्र तो बन ही चुके हैं पतंग को लेकर कई सिनेमा के गाने भी लोकप्रिय हुए हैं। “ न कोई उमंग है न कोई तरंग है / मेरी ज़िन्दगी एक कटी पतंग है “, “अरे छोड़ दे सजनिया छोड़ दे, पतंग मेरी छोड़ दे “, “चजी चली रे पतंग मेरी चली रे”, इत्यादि ऐसे ही गानें हैं। लेकिन राजनीति में पतंगबाजी पहली बार आई और खूब आई। इसका सारा श्रेय इडोनेशिया को जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पतंगबाजी अब कितना आगे बढ़ पाती है यह तो समय ही बताएगा।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी /१, सर्कुलर रोड, इल्लाहाबाद -२११००१

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