सरदार जो बेवकूफ नहीं था // पश्चिमी अफ्रीका की लोककथाएँ // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — पश्चिमी अफ्रीका–1 :

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पश्चिमी अफ्रीका की लोक कथाएँ–1

बिनीन, बुरकीना फासो, केप वरडे, गाम्बिया, गिनी, गिनी बिसाऔ, आइवरी कोस्ट, लाइबेरिया,


संकलनकर्ता

सुषमा गुप्ता


10 सरदार जो बेवकूफ नहीं था[1]

यह लोक कथा भी पश्चिमी अफ्रीका के लाइबेरिया देश की लोक कथाओं से ली गयी है। यह होशियारी की एक बहुत सुन्दर कथा है।

एक बार एक बूढ़ा गाँव के सरदार के पास आया और बोला — “मेहरबानी करके मेरी सहायता कीजिये सरदार। मेरे पड़ोसी ने मेरी बकरियाँ चुरा ली हैं। ”

सरदार ने उसकी बातें ध्यान से सुनी। उसको इस बात से खुशी होती थी कि लोग उसकी अक्लमन्दी को पहचानते थे और मानते भी थे। सरदार ने फिर पूछा — “पर तुम्हारी परेशानी क्या है?”

बूढ़ा बोला — “मेरी परेशानी यह है सरकार कि मेरे पड़ोसी ने मेरी बकरियाँ चुरा ली हैं। मैं एक गरीब आदमी हूँ और इतना गरीब हूँ कि मैं उनके बदले में और बकरियाँ नहीं खरीद सकता। ”

सरदार ने पड़ोसी से पूछा — “और तुमको इस बारे में क्या कहना है। ”

पड़ोसी ने जवाब दिया — “मुझे नहीं मालूम कि यह आदमी क्या कह रहा है। मेरे पास बहुत सारी बकरियाँ हैं पर उनमें से कोई भी बकरी इसकी नहीं है। ”

इस बात का फैसला करना आसान नहीं था। सरदार को अपनी अक्ल इस्तेमाल करनी थी। सरदार को ऐसे मामले सुलझाने में बहुत अच्छा लगता था।

सरदार ने घोषणा की — “मैं तुम लोगों का एक इम्तिहान लेता हूँ। जो भी वह इम्तिहान पास कर लेगा वही बकरियों का मालिक होगा। जब तक तुम इस सवाल का जवाब दो तब तक तुम लोग अपने अपने घर जा सकते हो।

मैं जानना चाहता हूँ कि इस दुनिया में सबसे ज़्यादा तेज़ चीज़ क्या है? जब तक तुम लोग इस सवाल का जवाब न ढूँढ लो यहाँ वापस मत आना। ”


दोनों लोग सिर हिलाते हुए अपने अपने घर चले गये। अब इस बात का जवाब कौन दे सकता था?

इस बूढ़े के एक बेटी थी ज़िया। वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही अक्लमन्द भी थी। बूढ़ा जब घर वापस आया तो सरदार का सवाल उसने अपनी बेटी से पूछा। तुरन्त ही उसने अपने पिता के कान में कुछ फुसफुसाया जो उस सरदार को खुश कर देता।

अगली सुबह ही वह बूढ़ा सरदार के घर की तरफ रवाना हुआ। सरदार ने जब बूढ़े को देखा तो वह तो आश्चर्य में पड़ गया और बोला — “अरे क्या तुमको मेरे सवाल का जवाब मिल गया?”

बूढ़ा बोला — “जी सरदार, यह कोई ज़्यादा मुश्किल सवाल नहीं था। ”

सरदार ने फिर पूछा — “तो बताओ कि फिर दुनिया में सबसे ज़्यादा तेज़ चीज़ क्या है?”

बूढ़ा बोला — “समय। वह हमारे पास कभी काफी नहीं होता। यह हमेशा ही बहुत जल्दी चला जाता है और हमारी पकड़ में ही नहीं आता। जो हम करना चाहते हैं उसके लिये हमारे पास कभी भी समय काफी नहीं होता। ”

बूढ़े के इस जवाब से तो सरदार भौंचक्का रह गया क्योंकि उसको तो अपने आप पर भी यकीन नहीं था कि वह खुद भी इस सवाल का जवाब दे सकता था।

उसने बूढ़े से पूछा — “इस सवाल के जवाब में तुमको किसने सहायता की? किसने बताया यह तुमको?”

बूढ़ा झूठ बोला — “किसी ने नहीं जनाब। ये मेरे अपने शब्द हैं। मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया। ”

सरदार ने कहा — “तुम मुझे सच नहीं बता रहे हो इसके लिये क्या तुम जानते हो कि मैं तुम्हें सजा भी दे सकता हूँ?”

यह सुन कर बूढ़ा डर गया। वह और आगे झूठ नहीं बोल सका। बोला — “यह मेरी बेटी ज़िया ने मुझे बताया। वह एक बहुत ही अक्लमन्द लड़की है। ”

सरदार बोला — “लगता है कि वह बहुत अक्लमन्द लड़की है। मैं उससे मिलना चाहूँगा। ”


कुछ देर बाद ही वह बूढ़ा अपनी बेटी को सरदार के पास ले आया। सरदार तो पहले ही उसकी अक्लमन्दी का सिक्का मान गया था और उसको देख कर तो वह उसकी सुन्दरता का भी सिक्का मान गया।

सरदार उसको देख कर बोला — “तुम बहुत अक्लमन्द हो और साथ में सुन्दर भी। यह मेरे लिये बड़ी इज़्ज़त की बात होगी अगर तुम मेरे साथ शादी करोगी। क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”

ज़िया ने जवाब दिया — “सरदार, यह तो आप मेरी इज़्ज़त बढ़ा रहे हैं। ”

हालाँकि सरदार इस बात से बहुत खुश था कि उसको इतनी सुन्दर और अक्लमन्द पत्नी मिल जायेगी पर वह उससे डरा हुआ भी बहुत था क्योंकि वह वाकई बहुत अक्लमन्द थी।

वह नहीं चाहता था कि वह उसके पास आने वाले मामलों में दखल दे। वह अपनी इज़्ज़त को जो उसको अपनी अक्लमन्दी की वजह से मिली हुई थी किसी से बाँटना नहीं चाहता था। अपनी पत्नी से भी नहीं।

सो सरदार ने उससे कहा — “जो कुछ भी मेरे घर में है वह सब तुम्हारा है। पर तुम्हारे लिये इस घर में बस केवल एक नियम है। और वह यह कि तुम मेरे सामने आये हुए मामलों में कोई दखल नहीं दोगी। बस यही एक नियम है तुम्हारे लिये। अगर तुमने यह नियम तोड़ा तो मैं तुमको तुम्हारे पिता के घर भेज दूँगा। ”

सरदार की नयी पत्नी इसके जवाब में केवल मुस्कुरा दी।

कुछ समय तक तो सब ठीक चलता रहा। सरदार के पास लोग अपने मामले ले कर आते थे और वह उनको सुलझाता था और ज़िया अपने घर के काम में लगी रहती थी। अक्सर वह सरदार के फैसलों को ठीक ही मानती थी।

एक दिन सरदार ने दो लड़कों को एक पहेली दी जो अपनी भेड़ों पर लड़ रहे थे। ज़िया को मालूम था कि उसको उस लड़के की सहायता नहीं करनी थी जो सचमुच में भेड़ का मालिक था लेकिन वह लड़का उस पहेली ले कर बहुत परेशान था।

यह सब देख कर ज़िया से रहा नहीं गया। उसने उस लड़के से पूछा कि वह इतना परेशान क्यों है।

वह लड़का बोला — “सरदार ने मुझे बिल्कुल ही नामुमकिन काम दे रखा है। उसने हमें एक एक अंडा दिया है और कहा है कि जो कोई इस अंडे के बच्चे को मुझे सुबह ला कर दिखायेगा भेड़ें उसी की होंगी। ”

ज़िया जानती थी कि उसको उस लड़के की सहायता नहीं करनी चाहिये पर इसका हल बहुत ही साफ था और वह लड़का उस काम को ले कर वाकई बहुत परेशान था सो वह उसको उसके काम का हल बताये बिना न रह सकी।

उसने लड़के से कहा — “सरदार के पास थोड़ा सा चावल ले जाओ और उससे कहो कि वह उस चावल को आज ही बो दे ताकि तुम कल सुबह उस अंडे में से निकले बच्चे को वह मुलायम ताजा चावल खिला सको।

उसको भी पता चल जायेगा कि एक दिन में चावल उगाना उतना ही नामुमकिन है जितना आज के अंडे में से सुबह चूज़े का निकलना। ”

लड़का यह सुन कर बहुत खुश हुआ। वह तुरन्त ही सरदार के पास चावल ले कर भागा गया। और जो शब्द ज़िया ने उससे कहे थे उसने वही शब्द जा कर सरदार से कह दिये। पर सरदार यह सुन कर खुश नहीं हुआ। वह बहुत गुस्सा हुआ।


उसने गुस्से से पूछा — “किसने कहा तुमसे यह सब? किसने दिये तुम्हें चावल? तुम्हारे जितने बड़े बच्चे के लिये ये शब्द बहुत ज़्यादा अक्लमन्दी के हैं। ”

लड़का डर के मारे सच बोलने में घबरा रहा था इसलिये वह बोला — “ये मेरे ही शब्द हैं ये मेरे ही विचार हैं। किसी और ने इसमें मेरी कोई सहायता नहीं की है। ”

सरदार ने उसको डराया — “देख लो अगर तुम सच नहीं बोल रहे हो तो मैं तुमको सज़ा दूँगा। ”

इस पर वह लड़का चिल्ला पड़ा — “सरदार वह ज़िया थी। उसने सोचा कि तुम अक्लमन्दी की कदर करोगे। ”

इस पर सरदार ज़िया पर बहुत गुस्सा हुआ क्योंकि उसने उसको एक ही तो नियम मानने को बताया था और वही उसने तोड़ दिया था। उसने ज़िया को अपने सामने बुलाया और उसे बहुत डाँटा।

उसने कहा — “क्या तुमको मालूम नहीं है कि जो कुछ मेरा है वह तुम्हारा है? मैंने तुमको केवल एक ही नियम मानने के लिये कहा था और वह भी तुमसे माना नहीं गया। जाओ अब तुम अपने पिता के घर चली जाओ। ”

पर यह सब सुन कर भी ज़िया घबरायी नहीं। वह शान्ति से बोली — “ठीक है। पर जाने से पहले मैं आपके लिये एक आखिरी खाना बनाना चाहती हूँ। फिर जो कुछ मेरा है मैं उसको अपने साथ ले कर अपने घर चली जाऊँगी। ”

सरदार ने गुस्से में ही जवाब दिया — “ठीक है ठीक है। जो तुम्हें बनाना हो बनाओ, जो तुम्हें करना हो करो पर देखना यहाँ रात को नहीं ठहरना। ”

ज़िया ने उस शाम सरदार का प्रिय खाना बनाया और उसे काफी सारी पाम की शराब के साथ उसको खिलाया। खाना खत्म होने से पहले ही सरदार शराब में धुत हो चुका था और थोड़ी ही देर में वह सो गया।

फिर ज़िया ने जैसा सोचा था वैसा ही किया। अपने परिवार की सहायता से वह सरदार को अपने पिता के घर ले आयी।


उन्होंने सरदार को एक आरामदेह बिस्तर पर सुला दिया जहाँ सरदार सारी रात आराम से सोता रहा। पर सुबह जैसे ही सरदार जगा तो उसकी कड़कती हुई आवाज सारे घर में गूँज गयी — “मैं कहाँ हूँ? और मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?”

ज़िया तुरन्त ही कमरे में आयी और मुस्कुराते हुए बोली — “आप मेरे पिता के घर में हैं। याद है आपने कहा था कि मुझे रात आपके घर में नहीं बितानी थी। सो मैं अपने पिता के घर में हूँ।

दूसरे आपने कहा था कि अपनी पसन्द की मैं जो कोई भी एक चीज़ चाहूँ वह आपके घर से ला सकती हूँ तो मुझे आप चाहिये थे सो मैं आपको ले आयी। ”

सरदार यह सुन कर न चाहते हुए भी मुस्कुरा दिया और बोला — “यकीनन तुम बहुत ही होशियार लड़की हो। चलो मेरे साथ घर वापस चलो। कोई बेवकूफ ही होगा जो ऐसी अक्लमन्द लड़की को अपने घर से निकालेगा। ”

अक्लमन्द पत्नी ने सरदार के कान में फुसफुसाया — “और तुम भी तो कोई बेवकूफ नहीं हो।


[1] The Chief Who Was No Fool – a folktale from Kush, Liberia, West Africa, Africa.

Adapted from the Web Site : http://www.phillipmartin.info/liberia/text_folktales_chief.htm

By Phillip Martin.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ों लोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के  लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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