असफल कवि और बेजोड़ नाटककार लक्ष्मीनारायण मिश्र // राकेश भ्रमर // प्राची - जून 2018

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पुस्तक समीक्षा

असफल कवि और बेजोड़ नाटककार लक्ष्मीनारायण मिश्र

राकेश भ्रमर

प्राचीन काशी (अब वाराणसी या बनारस) भगवान शिव की नगरी है। भगवान शिव का ताण्डव नृत्य जगख्यात है। संभवतः उनका यह नृत्य ही नाट्य की उत्पत्ति का स्रोत रहा हो। यह तुलसीदास का रामचरित मानस ही है, जिसने आधुनिक रामलीला को जन्म दिया है। काशी में धार्मिक नाटकों की परम्परा रही है, जिसने आधुनिक नाटकों को भारतेन्दु के रूप में जन्म दिया।

नाटक एक अनूठी साहित्यिक विधा है। इसका उद्भव नृत्य और गीत से होता है। कला का कोई दूसरा रूप अपने जीवंत प्रदर्शन से इतना प्रभावशाली नहीं होता है, जितना नाटक। यह सम्पूर्ण रूप से एक मंचीय विधा है। मंच से अलग होकर यह आत्माविहीन, अदृश्य और अमूर्त हो जाता है।

वाराणसी ने दो मूर्धन्य नाटककारों को जन्म दिया- जयशंकर प्रसाद और लक्ष्मीनारायण मिश्र। दोनों में विरोधाभास था तो आश्चर्यजनक समानतायें भी थीं। दोनों ही कवि थे और लगभग समकालीन, परन्तु यहां हम लक्ष्मीनारायण मिश्र की बात करेंगे, जयशंकर प्रसाद की नहीं। यह समीक्षा पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के ऊपर प्रकाशित खगेन्द्र ठाकुर की पुस्तक पर आधारित है। पुस्तक में लक्ष्मीनारायण के कवि और नाटककार- दोनों ही पक्षों को समग्रता के साथ विश्लेषित किया गया है। उनकी प्रथम दो काव्य कृतियों- अन्तर्जगत और कालजयी को लेखक ने अलग-अलग अध्याय देकर उनकी कृतियों के साथ पूर्ण न्याय किया है।

पुस्तक के प्रथम अध्याय ‘‘जीवन और व्यक्तित्च’’ में वर्णित घटनाओं से ज्ञात होता है कि लक्ष्मीनारायण मिश्र का जन्म 17 दिसंबर 1903 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई। आगे की शिक्षा के लिए वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय गये, परन्तु वहां उनका मन नहीं लगा। उनकी शिक्षा बहुत अनियमित रही। अंततः उन्होंने बनारस से बीए किया।

लेखन की प्रवृत्ति उनमें बचपन से ही थी। उनके बचपन की काव्य कृतियां उपलब्ध नहीं हैं। ‘रंभा शुकदेव’ नाम का महाकाव्य उन्होंने सातवीं कक्षा में लिखना आरंभ किया था। इसके बारे में नाम के अतिरिक्त कुछ भी ज्ञात नहीं है। इस महाकाव्य के बाद उन्होंने ‘अंतर्जगत’ के पदों की रचना आरंभ की। इसके पद आत्माभिव्यक्ति-प्रधान हैं। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘अशोक’ नामक नाटक भी लिखा जो पाठ्यक्रम में भी लग गया। वह एक लेखक के रूप में प्रसिद्ध हो गये।

पारिवारिक कारणों से कुछ वर्षां तक लक्ष्मीनारायण मिश्र लेखन से विरक्त रहे। 1945 में वे फिर साहित्य साधना की ओर प्रवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने ‘गरुड़ध्वज’ अरैर ‘नारद वीणा’ की रचना की। नाट्य लेखन में वे लगातार सक्रिय रहे। 1987 में चौरासी वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। वे तपस्वी रचनाकार थे। उनके स्वभाव में विरोधाभास था। परन्तु वे साहित्य को यथार्थ की वस्तु मानते थे।

‘काव्य-विवेचन’ अध्याय के अन्तर्गत लेखक ने लक्ष्मीनारायण मिश्र के काव्य रूप का गहराई से विश्लेषण किया है। लेखक के मतानुसार मिश्र जी ने दो काव्य रचनाएं की- अंतर्जगत् और कालजयी, परन्तु इस अध्याय में उन्होंने केवल ‘अंतर्जगत्’ की ही व्याख्या और चर्चा की है। यह कृति छायावाद युग की एक रोमांटिक रचना है। इसका प्रकाशन 1924 में हुआ था। लेखक ने जयशंकर प्रसाद की अमर कृति ‘आंसू’ का भी यहां पर तुलनात्मक अध्ययन किया है। उनके अनुसार ‘आसूं’ 1925 में प्रकाशित हुयी थी। और दोनों कृतियों में भावगत समानता अवश्य है, परन्तु तुलनात्मक अध्ययन से अनुसरण या अनुकरण प्रमाणित करना मुश्किल है। हालांकि लेखक ने कई पृष्ठों में मिश्र के ‘अंतर्जगत’ और जयशंकर प्रसाद के ‘आंसू’ का तुलनात्मक विश्लेषण किया है और कहा है, ‘‘दोनों एक ही समय में, लगभग एक ही मनोदशा को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दे रहे थे।’’ परन्तु दोनों काव्यों के छन्दों में अन्तर है। इतना होते हुए भी ‘अंतर्जगत’ और ‘आंसू’ का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए खगेन्द्र ठाकुर ने कई स्थानों पर यह संदेह या भ्रम पैदा करने का प्रयास किया है कि जयशंकर प्रसाद की कृति ‘आंसू’ में कहीं न कहीं ‘अंतर्जगत’ का प्रभाव है। इसके लिए उन्होंने प्रमाण स्वरूप लिखा है कि ‘अंतर्जगत’ की पाण्डुलिपि प्रकाशन के पूर्व लंबे समय तक प्रसाद जी के पास रखी थी। इस तरह आलोचक यह प्रमाणित करना चाहता है कि लक्ष्मीनारायण मिश्र प्रसाद से बड़े कवि हैं। जबकि साहित्य जगत में ‘अंतर्जगत’ की कोई पहचान नहीं है। ‘आंसू’ एक श्रेष्ठ कृति है। जो कृति साहित्य जगत में विस्मृत हो, उसे महान कैसे कहा जा सकता है।

अंतर्जगत् की भूमिका लेखक द्विज के अनुसार कवि ने बुद्धि के विषय को इस सुंदरता से हृदय के सांचे में ढाल दिया है कि इनकी रचना में अपर्वू मादकता आ गयी है। लेखक के अनुसार ‘अंतर्जगत्’ का सौंदर्य उसकी मानवीय और जागतिक संवेदनशीलता को व्यक्त करने में है। इसकी भाषा प्रारंभिक दौर की छायावादी कविताओं जैसी है। लेखक का मानना है कि छायावादी काव्य विवेचन प्रसंग में ‘अंतर्जगत्’ अवश्य चर्चा में आना चाहिए।

अगला अध्याय ‘काल की कसौटी पर कालजयी’ है, जिसमें लेखक ने मिश्र की काव्य कृति ‘कालजयी’ पर विस्तृत चर्चा की है। यह कृति महाभारत के पात्र कर्ण पर आधारित है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मिश्र जी एक सफल नाटककार होने के अतिरिक्त एक महान कवि भी थे, परन्तु उनके कवि रूप की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए। लेखक के अनुसार वह एक श्रेष्ठ कवि थे और यह बात समकालीन आलोचकों ने भी स्वीकार की है। खगेन्द्र ठाकुर ने इन शब्दों में ‘कालजयी’ रचना को समेटा है, ‘‘यद्यपि यह रचना छायावादी युग में खास तौर से रची गई, फिर भी यह भाव-प्रवण काव्य या सुख-दुखात्मक भावाभिव्यक्ति की रचना नहीं है। यह न्याय के लिए युद्ध का काव्य है, मुनष्यता की खोज का काव्य है।’’

लक्ष्मी नारायण मिश्र समस्यामूलक नाटककार के रूप में प्रसिद्ध हैं। कुछ ने उन्हें बुद्धिजीवी नाटककार भी कहा है। मिश्र जी की रचनात्मक प्रवृत्ति का विश्लेषण करने के लिए लेखक ने उनके कई नाटकों के चरित्रों का उल्लेख किया है, उनकी सामाजिक समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में नाटक के उद्देश्य की चर्चा की है। नाटक के कथासूत्र का संक्षिप्त विवरण अध्याय को रोचक बना देता है। इससे पता चलता है कि मिश्र के समय में समाज किस तरह की समस्याओं से जूझ रहा था। इस अध्याय में लेखक ने मिश्र के ऊपर किसी प्रकार की समीक्षात्मक टिप्पणी नहीं की है, बस नाटकों के चरित्रों पर चर्चा और नाटक में दिखाई गयी समस्याओं का उल्लेख करके लक्ष्मी नारायण मिश्र की रचनात्मक प्रवृत्ति की ओर इंगित कर दिया गया है। हां, अध्याय के आरंभ में कई समकालीन आलोचकों के मंतव्यों को अवश्य व्यक्त किया है। इसके अनुसार मिश्र के नाटकों में काव्य का अवयव कम है, खरी-खरी कहने का जोश अवश्य है।

पुस्तक में लक्ष्मी नारायण मिश्र के सामाजिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और एकांकी नाटकों को अलग-अलग खण्डों में रखकर उनका उल्लेख और चर्चा की गयी है। सामाजिक नाटकों में उनकी दृष्टि अपने समय पर थी। उस समय देश अंग्रेजों का गुलाम था। शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो रहा था। एक मध्य वर्ग का उदय हुआ। सामाजिक घटनाओं और समस्याओं के चित्रण के जरिए नाटकों में राजनीति भी आई। लेखक ने मिश्र जी के ‘सन्यासी’, ‘राक्षस का मंदिर’ नाटकों के माध्यम से उनके स्वरूप और समस्याओं पर विमर्श बहुत सुंदर ढंग से किया है। लेखक के अनुसार ‘‘लक्ष्मी नारायण मिश्र आधुनिक हिन्दी-नाटक को समकालीन अनुभवों और अनुभूतियों के आधार पर नाट्य कथा रचते हैं, इस दृष्टि से उनका स्थान हिंदी-नाटक-साहित्य के इतिहास में अद्वितीय है।’’ सामाजिक नाटकों के अलावा मिश्र जी ने छह पौराणिक नाटक लिखे हैं। लेखक के मंतत्व के अनुसार एक नाटक की कथा रामायण, एक की देवी भागवत और चार नाटकों की कथा महाभारत से ली गयी है। इस तरह पारिभाषिक दृष्टि से इनमें से कोई भी नाटक पौराणिक नहीं है, परन्तु इन्हें पौराणिक श्रेणी में रखा गया है। ये नाटक हैं- नारद की वीणा, चक्रव्यूह, चित्रकूट, अपराजित, अश्वमेध और प्रतिज्ञा का भोग। रामायण, महाभारत या अन्य पौराणिक स्रोतों से कथा-प्रसंग लेकर मिश्र जी ने जो नाटकों का स्वरूप रचा, उसका उद्देश्य मात्र भारत की प्राचीन-संस्कृति का ज्ञान हासिल करना था। लेखक ने प्रत्येक नाटक की अलग-अलग व्याख्या की है और अध्याय को इस टिप्पणी के साथ समाप्त किया है, ‘‘महाभारत कथा, उसके विविध प्रसंगों और चरित्रों के बारे में मिश्र जी की अपनी धारणा है, उसी के अनुसार वे कथा-सृजन करते हैं। मिश्र जी की भाषा तत्सम प्रधान है, लेकिन भाषा गतिशील और बोधिगम्य है।’’

ऐतिहासिक नाटक अध्याय मिश्र जी की अपने ही नाटकों पर टिप्पणी से आरंभ होता है, और प्रथम पृष्ठ पर ही लेखक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मिश्र जी के ऐतिहासिक नाटकों में बुद्धकालीन उदयन से लेकर मौर्य सम्राट अशोक, वितस्ता की लहरें, कवि भारतेंदु से महात्मा गांधी तक की कथा है। यहां पर लेखक ने एक गंभीर और महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि पौराणिक घटनाएं और पात्र कभी हुए नहीं और ऐतिहासिक घटनाएं हजारों वर्ष पूर्व घटीं, अतएव इन घटनाओं और पात्रों के ऊपर सृजनात्मक कार्य का क्या औचित्य है। फिर भी इससे हमारी धरोहर की महानता और विशालता का पता अवश्य चलता है। इस अध्याय में भी लेखक ने मिश्र जी के सभी नाटकों का अलग-अलग विश्लेषण किया है। अशोक उनका सबसे विस्तृत काया वाला नाटक है। ‘गरुणध्वज’ की कथा का समय अग्निमित्र का शासन काल है। ‘बलराज’ नाटक स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक है। ‘वत्सराज’ नाटक 1949 में लिखा गया था। प्राचीन भारत के नायक उदयन ही वत्सराज हैं। यह कई शीर्षस्थ कवियों और नाटककारों के प्रिय पात्र रहे हैं। इस नाटक में लक्ष्मी नारायण मिश्र ने कालिदास और भास के नाटकों से ग्रहीत प्रसंगों के इतर भी एक नया मोड़ दिया है। आधुनिक भारत के नायकों पर आधारित मिश्र का नाटक ‘भारतेंदु हरिश्चन्द्र’ 1950 में लिखा गया था। यह भारतेंदु का शतवार्षिकी वर्ष था। भारतेंदु पर आधारित यह नाटक एक सफल नाटक है। ‘दशाश्वमेध’ नाटक ‘भारशिव नागव’ क्षत्रियों पर आधारित है और यह 1950 में प्रकाशित हुआ था। इस नाटक के साथ बहुत समय बाद मिश्र जी फिर ऐतिहासिक और पौराणिक नाटकों के लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। ‘वितस्ता’ झेलम का पुराना नाम है। ‘वितस्ता की लहरें’ नामक नाटक में सिकंदर और पोरस के युद्ध की घटनाओं को दिखाया गया है। ‘मृत्युंजय’ नाटक महात्मा गांधी पर आधारित नाटक है और यह 1957 में लिखा गया था। लेखक का मत है, ‘‘गांधी स्वतंत्रता, शांति, अहिंसा, पे्रम, समानता आदि के प्रतीक-पुरुष हैं। नाटककार को इस प्रतीक-निर्माण में पूरी सफलता मिली है। गांधी के लिए ‘मृत्युंजय’ विशेषण का उपयोग और नाटक का नाम ‘मृत्युंजय’ देना भी बिलकुल तर्कसंगत है।’’

मिश्र जी के एकांकी नाटकों में ‘पत्थर में प्राण’, ‘देवगिरि में ग्रहण’, ‘कावेरी में कमल’, ‘नारी का रंग’, ‘एक दिन’, ‘विषपान’, ‘बलहीन’, ‘देश के शत्रु’, ‘भूमि का भोग’, ‘कौटिल्य’, ‘विधायक पराशर’, ‘याज्ञवल्क्य’, ‘अशोक-वन’, ‘आचार्य शंकर’ आदि हैं। मिश्र जी के कुछ और एकांकी नाटक हैं, जिनकी चर्चा पुस्तक में नहीं है। लेखक पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र के लेखन के संबंध में अपना मत इस प्रकार व्यक्त करता है, ‘‘लक्ष्मी नारायण मिश्र अपनी समस्त परंपरा का मंथन करते हुए, उसकी समीक्षा करते हुए, वर्तमान और भविष्य की प्रतिष्ठा के लिए, लोक और देश के हित में सजग रहते हैं। यह रचनाकार केवल कलात्मक कृतियों का नहीं, समाज और राष्ट्र का भी रचनाकार बनता दिखता है।’’

पुस्तक के अंतिम अध्याय में लेखक कहता है कि मिश्र जी मुख्यतः विचारक लेखक हैं। वह रूढ़िवादी नहीं थे। वह राष्ट्रीय ही नहीं, मानसिक स्वतंत्रता के पक्षधर थे। अंत में इतना कहना पर्याप्त है कि मिश्र जी एक सफल नाटककार थे, परन्तु काव्य क्षेत्र में वह उतने सफल नहीं हो सके, जितना जयशंकर प्रसाद या उनके समकालीन अन्य कवि।

पुस्तक की भाषा परिमार्जित, शुद्ध और शैली प्रवाहमयी है। लेखक खगेन्द्र ठाकुर ने लक्ष्मी नारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व को समग्रता के साथ पुस्तक में समेटा है। उनकी लगभग प्रत्येक कृति के पात्रों, काल और रचनात्मक उद्देश्य का विश्लेषण किया है। केवल ‘अंतर्जगत’ काव्य-कृति की चर्चा करते हुए वह पूर्वाग्रस्त दिखते हैं और मिश्र जी की इस कृति को एक श्रेष्ठ कृति सिद्ध करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। किसी कृति की श्रेष्ठता अपने आप में प्रमाणित होती है, न कि उसे किसी समकालीन कृति के समक्ष रखकर उसे सिद्ध किया जाता है।

कुल मिलाकर पुस्तक रोचक और पठनीय है। शोधार्थियों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण कृति साबित होगी, ऐसा मेरा मानना है।

कृति : पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व

लेखक : खगेन्द्र ठाकुर

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, लोधी रोड, नई दिल्ली- 110003

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