कहानी // नीम का पेड़ // सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’// प्राची - जून 2018

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कहानी

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नीम का पेड़

सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’

रकोटे की दीवाल के किनारे से सटा आंगन में स्थित सैकड़ों वर्ष पुराना नीम का हरा-भरा पेड़। चारों ओर फैली हुई डालियां। प्राणवायु लुटाती हुई हरी-हरी पत्तियां बरबस अपनी ओर सबको आकर्षित कर लेती।

कहते हैं, अनोखेलाल के दादा ने इसे स्वयं अपने हाथों से रोपा था। अनोखेलाल बिस्तर छोड़ने के उपरांत सर्वप्रथम सपरिवार इसे ही प्रणाम करते। पूर्वजों की यही तो निशानी थी उनके पास। सो उसको उन्हीं का प्रतिरूप मानकर सम्मान करते।

अनोखेलाल के पिता अजीत ने बताया था कि दादा इस पेड़ से बहुत अधिक प्यार करते थे। एक दिन किसी ग्वाले ने उसकी एक टहनी क्या तोड़ ली? वे लाठी लेकर उसे मारने झपट पड़े। आसपास खड़े लोग उन्हें दौड़कर न पकड़ते तो उस दिन न जाने क्या हो जाता। वे बहुधा कहा करते कि ये पेड़-पौधे परमात्मा ने जीवों के कल्याण के लिये उपहार स्वरूप संसार को भेंट किये हैं, किंतु मनुष्य स्वार्थवश इन्हें विनष्ट कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं और अपने अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करते हैं। पेड़ तो हमारे हितैषी और सच्चे मित्र हैं।

उन्होंने यह भी बताया था कि दादा ने इसी पेड़ के नीचे एक शिवालय भी बना रखा था जो आज भी विद्यमान है। भगवान शिव के पूजन के साथ ही वे इस पेड़ की जड़ों में भी जल ढारते और अक्षत चंदन चढ़ाकर उसका पूजन करते थे। तब से आज तक यह परंपरा निरंतर उनके घर में चली आ रही है।

शादी विवाह के शुभ अवसरों पर सभी को निमंत्रण देने के साथ इस पेड़ को भी आदरपूर्वक निमंत्रण दिया जाता है और पकवानों से पत्तल सजाकर उसके निकट रखी जाती। भले ही पक्षी और कौवे उसे चट कर जाते। सबकी मान्यता यही थी कि दादा ही इनके रूप में आकर भोजन ग्रहण करते हैं।

अनोखेलाल के मकान के सामने से ही नगर का मुख्य मार्ग था। जिसमें रात-दिन आने-जाने वालों के रेले चलते रहते। सड़क से सटकर ही उस पार लम्बा चौड़ा मैदान था। जिसमें रविवार के दिन बहुत बड़ा बाजार लगता था। रात में नगर के अधिकांश पक्षियों का रैन बसेरा यह वृक्ष ही बनता। भोर होते ही वे अपने
मधुर कलरव गान से भगवान भुवन भास्कर का स्वस्ति गायन करते। उनकी चहचहाहट सुनते ही अनोखेलाल के परिवार के सभी सदस्य जाग जाते और अपने-अपने दैनिक कार्यों में जुट जाते।

बाजार के दिन बाहर से आने वाले थके हारे लोग उसी पेड़ की शीतल छाया में घंटों बैठकर अपनी थकान दूर करते और शांति का अनुभव करते। हवा के हल्के झोकों के साथ ही उसकी डालियां लहराने लगतीं। पत्ते नाचना प्रारंभ कर देते। सर-सर की सुरीली ध्वनि से सर्वत्र संगीतमय वातावरण की निर्मिति हो जाती। जिससे लोगों को असीम आनन्द की अनुभूति होती।

अनोखेलाल के परिवार के सभी लोग प्रतिदिन नीम की ही दातौन करते। जिससे उनके दांत मोती से चमकते। उनको कभी कोई बीमारी न होती। किसी के भी शरीर में जरा सी पीड़ा नहीं हुई कि उसने नीम के पत्तों को उबालकर उस गर्म पानी से स्नान कर लिया। पीड़ा तुरंत रफूचक्कर। मलेरिया बुखार आने पर नीम की पत्ती, चिरायता और गिलोय को सम भाग में मिलाकर काढ़ा बना कर पी लिया। बस तीन दिन में ही बुखार हाथ जोड़ने लगता। चर्म रोग होने पर उसकी पत्तियां चबा ली जातीं। फिर वे ऐसे भागते कि दुबारा लौटने का नाम ही न लेते। इस प्रकार यह नीम का पेड़ न जाने कितनी बीमारियों का दुश्मन था। अनोखेलाल के घर का तो यह बिना पैसों का वैद्य ही था। पास-पड़ोस के लोग भी जब-तब उसका इसी प्रकार उपयोग करते।

अनोखेलाल की पत्नी सपनिया तो उस पर अपने प्राण ही देती थी। प्रतिदिन अनेक घड़े पानी डालकर उसकी जड़ों को सींचना उसी का काम था। उसका छोटा बेटा हीरा उसकी जड़ों में मिट्टी चढ़ाता। सूखी टहनियों को निकालकर अलग करता। जब तब खाद देता। उसे ऐसा अनुभव होता कि इस रूप में वह दादा की ही सेवा कर रहा है। गर्व से उसकी छाती फूली न समाती।

अनोखेलाल की दोनों बेटियां झुनियां और मुनियां सावन के महीने में उसकी निचली डाल में झूला बांध लेती। झूम-झूम कर मधुर गीत गाते हुये वे झूला झूलती। जिसे सुनकर मुहल्ले की सभी लड़कियों का वहां मेला सा लग जाता। अनोखेलाल और उसकी पत्नी सपनिया यह देख आनन्द विभोर हो जाते।

बसन्त ऋतु के आते ही नीम के पुराने सभी पत्ते पीले पड़कर झड़ जाते और उनके स्थान पर नई-नई हरे रंग की कोपलें सज जातीं। कुछ दिन के बाद ही पूरा पेड़ सफेद रंग के फूलों के गुच्छों से लद जाता। भौरों की भीड़ भी आ-आ उन पर मंडराने लगती। सभी ओर सुगन्ध फैल जाती। धीरे-
धीरे उनमें नन्हीं निबौरियां अठखेलियां करने लगतीं। ग्रीष्म ऋतु के आते-आते तक वे पककर पीली सुनहरी रंग की हो जातीं।

निबौरियों के पकते ही चिड़ियों और कौओं की भीड़ दिन भर उसी में अपना डेरा जमाये रहतीं। एक डाल से दूसरी डाल में फुदक-फुदक कर वे जी भर निबौरियां खाते और चहचहाकर समूचे वातावरण को गुंजायमान करते।

निबौरियों की गुठलियां अंदर आंगन में और परकोटे के बाहर बिछ जातीं। आंगन की तो प्रतिदिन साफ-सफाई कर दी जाती, किन्तु बाहर की ज्यों की त्यों ही पड़ी जातीं। बरसात लगते ही उनसे नन्हें-नन्हें नीम के पौधे बाहर झांकने लगते। तनिक बड़े होते ही शहर और आसपास के लोग उन्हें उखाड़कर ले जाते और अपने आंगन व बगीचों में सजाते।

आंगन में इस नीम रूपी वैद्य की सतत उपस्थिति के कारण अनोखेलाल का परिवार सदैव स्वस्थ रहता। उसके घर में धन धान्य की भी कभी कोई कमी न हो पाती। इसमें वह अपने दादा शुभाशीर्वाद एवं नीम की कृपा मानते।

अनोखेलाल का परिवारिक जीवन सुख और शान्ति से बीत रहा था। तभी एक दिन आकस्मिक रूप से उसे नगर-निगम की ओर से एक नोटिस प्राप्त हुआ।

नोटिस में लिखा था कि आवागमन के बढ़ते हुए दबाव को देखते हुए नगर के मुख्य मार्ग को चौड़ा किया जाना है, जिसमें किनारे के अन्य मकानों, दीवालों के साथ ही आपकी बाउंड्री वॉल भी तोड़ी जायेगी और नीम के पेड़ को काटा जायेगा। बदले में शासकीय नियमानुसार मुआवजा दिया जायेगा।

नोटिस पढ़ते ही अनोखेलाल सूखकर आधा हो गया। वह दौड़ा-दौड़ा नगर-निगम कार्यालय में पहुंचा। अधिकारियों से आरजू मिन्नत की, किन्तु किसी ने भी उसकी एक न सुनी।

अन्त में हांफता हुआ वह नगर के एक नामी वकील के पास परामर्श करने के लिए गया। वकील के पैर पकड़ कर उसने गिड़गिड़ाते हुए उनसे प्रार्थना की- साहब जैसे बने तैसे आप मेरे नीम के पेड़ को कटने से बचा लीजिए। आप जो भी फीस चाहेंगे मैं आपको दूंगा। वकील ने अपने पैर छुड़ाते हुए कहा- देखो दादा, जनहित में उस मार्ग का चौड़ीकरण किया जाना परमावश्यक है। जिसमें आपकी बाउंड्रीवॉल और नीम का पेड़ बाधक है। अतः आपकी बाउंड्री वॉल तोड़ने के साथ ही नीम का पेड़ काटा जाना भी जरूरी है। बदले में आपको मुआवजा भी दिया जा रहा है। अतः मैं निरूपाय हूं। आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।

मन मारकर अनोखेलाल अपने घर वापिस आ गये। उनका दिन का चैन और रात की नींद समाप्त हो गई। उनका मन रात दिन नीम के पेड़ में ही उलझा रहता। घरवालों एवं मुहल्ले पड़ोस के लोगों ने उन्हें बहुतेरा समझाया, किंतु उनके मन में किसी भी प्रकार का धैर्य न आ पाता। उनके पूर्वजों की धरोहर उनकी आंखों के सामने ही छीनी जाने वाली थी। पर करते क्या बेचारे? निरूपाय थे वे।

सातवें दिन प्रातः काल ही एक दैत्याकार दमकल के साथ ही नगर-निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों का अमला वहां आ धमका। देखते ही देखते आनन-फानन में मार्ग में अवरोध पैदा करने वाले मकानों, दीवारों आदि के साथ उनकी बाउंड्रीवॉल भी ध्वस्त होकर सपाट मैदान के रूप में परिवर्तित कर दी गई।

हाथों में कुल्हाड़ियां थामे दो मजदूर नीम के पेड़ में दनादन प्रहार करने लगे। अनोखेलाल अपना सिर थामे आंगन में बैठे अश्रुपात कर रहे थे। कुल्हाड़ों के प्रहारों की घिनौनी और कठोर आवाज से वे तिलमिला कर रह जाते। उन्हें ऐसा लगता कि उनके दादा को ही काटा जा रहा है। यह निष्ठुर दृश्य उनसे देखा नहीं जा रहा था। जब तब उनके मुंह से चीख सी निकल पड़ती। उनकी आंखें बंद हो गयीं।

जब आंखें खुली तो उन्होंने देखा कि नीम का पेड़ कट चुका है। उसके अंग-अंग काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये हैं। नगर-निगम का अमला ट्रक में भरकर उन्हें ले जा रहा है।

वे बदहवास से ट्रक के पीछे दौड़ते हुए कार्यालय के फाटक पर जाकर बेहोश होकर गिर पड़े।

घर पर सूचना दी गई। लड़के वाहन लेकर गये और उन्हें घर लिवा लाये। तीन दिन के लगातार उपचार के बाद ही वे होश में आ सके। लड़कों ने आंगन में एक दूसरा नया नीम का पौधा रोप दिया था। वह क्रमशः बड़ा हो रहा था। अनोखेलाल को आश्वस्त करते हुये उन्हें समझाया- पिताजी, यह पेड़ भी धीरे-धीरे बड़ा होकर उसी जैसा हो जायेगा। आप चिन्ता न करें।

लड़कों की बात सुनकर पहले तो उन्होंने एक लंबी सांस ली। फिर धीरे-धीरे पेड़ के निकट गये। हरे-भरे लहराते नये पौधे को देखकर उनका मन नई-नई संभावनाओं से भरकर नाचने लगा। वे उसकी नन्हीं-नन्हीं टहनियों को सहला रहे थे।

संपर्क : पुराना कछपुरा स्कूल, गढ़ा

जबलपुर-482003 (म.प्र.)

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