प्रसाद के नाटकों में अभिव्यक्त राष्ट्रवादी चेतना // डॉ. भावना शुक्ल // प्राची - जून 2018

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आलेख

प्रसाद के नाटकों में अभिव्यक्त राष्ट्रवादी चेतना

डॉ. भावना शुक्ल

धुनिक हिंदी-साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों में जयशंकर प्रसाद अग्रगण्य है, मूर्धन्य कवि होने के साथ प्रसादजी ने गद्य में भी लेखनी चलाकर नाटकों के क्षेत्र में युगांतर स्थापित कर दिया। अभी तक जो भी नाटक लिखे गये उनमें राष्ट्रीयता तो थी, किन्तु प्रसाद जी के नाटकों में अधिक परिमाण में है। सबसे पहले हिंदी साहित्य में भारतेंदु जी ने और बाद में प्रसाद जी ने नवीन प्रयोग किये। उन्होंने राष्ट्रीयता को नाटक का मुख्य तत्व मानते हुए भारतीय इतिहास के गौरवमय अतीत से कथानक लेकर नाटकों का प्रणयन किया जो हर दृष्टि से अद्भुत है।

राष्ट्र एक ऐसी चेतना है जो मनुष्य में इच्छा शक्ति और संवेदना उत्पन्न होती है।

चेतना अवलोकन ही नहीं उनकी परख तथा मूल्यांकन भी करती है। राष्ट्रीयता के निर्माण में मुख्य रूप से भौगोलिक एवं सांस्कृतिक एकता विद्यमान रहती है और इसका स्थूल और सुदृढ़ आधार देश की भूमि ही है। हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का जो स्वरूप हमारे सामने है। वह आधुनिक युग की देन है।

राष्ट्रीय चेतना मनुष्य के मन का परिष्कार करती है।

प्रसाद जी ने अपने नाटकों में प्रेम-भावना के साथ-साथ अतीत के गौरवगान द्वारा देशवासियों के प्रति प्रेम उत्पन्न करके लगातार संघर्ष की भूमिका बाँध दी है।

जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक ‘चन्द्रगुप्त’ के प्रसिद्ध गीत ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ में देश के प्रति आत्मभाव को ही अभिव्यक्ति मिली है।

राष्ट्रीयता का एक पक्ष है अपने अतीत की स्मृति। अतीत की स्मृति आत्मस्मृति है। आत्मस्मरण जीवन है और आत्मविस्मृति मृत्यु। निर्मल वर्मा ठीक ही लिखते हैं कि कोई भी जाति संकट की घड़ी में अपने अतीत, अपनी जड़ों को टटोलती है। संकट की घड़ी आत्ममंथन की घड़ी है और सही आत्ममंथन हमेशा अतीत में लिये गये फैसलों के आसपास होता है...। जिस तरह एक व्यक्ति अपनी स्मृति में दुनिया को परखता है, उसी तरह एक जाति अपनी परम्परा की आंखों से यथार्थ को छानती है। जो लोग अतीत की स्मृति या अतीत के मूल्यांकन को अतीत के प्रति सम्मोहन का दर्जा देते हैं, निर्मल वर्मा उसका प्रत्याख्यान करते हैं- ‘अतीत का बोध अतीत के प्रति सम्मोहन से बहुत भिन्न है। विगत के प्रति सम्मोहन उसी समय होता है जब हम परम्परा से विगलित हो जाते हैं... परम्परा का रिश्ता स्मृति से है सम्मोहन से नहीं।’

जयशंकर प्रसाद ने ‘चन्द्रगुप्त’ और ‘स्कंदगुप्त’ नाटक में स्वर्णिम अतीत को वर्तमान के लिए प्रेरणाप्रद बताया है। प्रसाद की निम्नांकित पंक्तियां गौरवपूर्ण अतीत की याद दिलाती हैं और वर्तमान में प्रेरणा भी देती हैं-

वही है रक्त वही है देह वही साहस वैसा ही ज्ञान।

वही है शांति वही है शक्ति वही हम दिव्य आर्य संतान।।

जियें तो सदा उसी के लिए यही अभिमान रहे यह हर्ष।

निछावर कर दें हम सर्वस्व हमारा प्यारा भारतवर्ष।।

अपनी संस्कृति के प्रति गौरवबोध वस्तुतः राष्ट्रीय अस्मिता का हिस्सा है और राष्ट्रीय अस्मिता राष्ट्रबोध का अभिन्न हिस्सा है।

जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक ‘चन्द्रगुप्त’ के प्रसिद्ध गीत ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ में देश के प्रति आत्मभाव को ही अभिव्यक्ति मिली है।

इसी प्रकार... हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती

अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,

प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी

सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!

अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,

प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

कवि द्वारा स्वर्णिम अतीत को सामने रखकर मानों एक सोये हुए देश को जागने की प्रेरणा दी जा रही थी।

वैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द का प्रयोग होता रहा है। राष्ट्र की परिभाषायें समय-समय पर बदलती रही हैं, किन्तु राष्ट्र और राष्ट्रीयता का भाव गुलामी के दौरान अधिक पनपा। जो साहित्य के माध्यम से हमारे समक्ष आया जिसके द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ।

साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है। साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है। समाज का राष्ट्र से बहुत गहरा और सीधा संबंध है। संस्कारित समाज की अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली होती है। जिसका संबंध सीधा राष्ट्र से होता है जो इस रूप में सीधे समाज को प्रभावित करती है.

प्रसाद जी ने देशवासियों में आत्मगौरव और राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भारत के स्वर्णिम अतीत को नाटकों का विषय बनाया। प्रसाद जी ने एक दर्जन नाटक लिखकर हिंदी नाटक साहित्य को समृद्ध किया। ‘सज्जन’,‘कल्याणी परिणय’, ‘करुणालय’, ‘प्रायश्चित’, ‘राज्यश्री’, ‘विशाख’, ‘अजातशत्रु’, ‘जनमेजय का नाग यज्ञ’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘एक घूँट’, ‘कामना’, ‘चन्द्रगुप्त’, तथा ‘ध्रुवस्वामिनी’ जैसे नाटक लिखकर हिंदी साहित्य का गौरव बढाया। इनके नाटकों में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक चेतना, इतिहास और कल्पना का सुंदर सामंजस्य दार्शनिक गंभीरता और साथ ही काव्यात्मक सरसता, वीरता और साहस व प्रेम का रोमानी संघर्षपूर्ण वातावरण, देशकाल का सजीव चित्रण आदि विशेषतायें इनके नाटकों में दृष्टव्य होती है।

प्रसाद जी के नाटकों की प्रशंसा अनेक विद्वानों ने की। डॉ. नगेन्द्र ने लिखा है कि प्रसाद की ट्रेजडी की भावना, उनकी सांस्कृतिक पुनरुथान की चेतना, उनके महान कोमल चरित्र, उनके विराट मधुर दृश्य, उनका काव्य स्पर्श हिंदी में तो अद्वितीय है ही, अन्य भाषाओं और नाटकों की तुलना में भी उसकी ज्योति मलिन नहीं पड़ सकती है।’

बच्चन सिंह की धारणा है कि प्रसाद जी को इतिहास की अप्रतिहत परिवर्तन शीलता में अटूट विश्वास था। अपनी मर्मस्पर्शिनी प्रतिभा द्वारा प्रसाद जी ने समझ लिया कि अंतर्विरोधी राजकीय सत्ता, सामन्तीय परिपाटी एवं सम्राज्यवाद की दीवारें टूट रही हैं। नवीन मानवतावादी भावना उग रही है। प्रसाद जी ने अपने नाटकों की अन्य विशेषताओं के साथ उनके नाटकों में अपने युग की समस्या का प्रतिबिम्ब भी है। प्रसाद जी की राष्ट्रीयता के सन्दर्भ में बच्चन सिंह जी कहते हैं कि इनकी राष्ट्रीयता राजाओं और सरदारों तक सीमित नहीं हैं, वह ऐसी राष्ट्रव्यापी चेतना है जो देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपने में समाहित कर लेती है । दूसरी, इनकी राष्ट्रीयता में विश्वमैत्री समन्वित है । यही कारण है कि स्थान-स्थान पर मानव मैत्री का उद्घोष हुआ है।

अतः हम कह सकते है की भारतेंदु युग में जो नाटक रूप था, प्रसाद ने उसे परिष्कृत और प्रौढ़ता प्रदान की, प्रसाद के नाटकों में जो भावुकता, जो राष्ट्रीयता का पक्ष था और ऐतिहासिक परिवेश का जो जीवंत और व्यवस्थित निरूपण रहा वह प्रसादोत्तर सृजन में भी रहा। अध्येताओं का मत है कि प्रसाद के बाद जो नाटककार हुए, उनपर प्रसाद जी का प्रभाव भिन्न भिन्न रूप में परिलक्षित होता है।

प्रसाद जी ने अपने नाटकों के द्वारा भारत के गौरवशाली युगों को सजीव प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है, जिससे कि भारतवासियों में आत्मगौरव की भावना का संचार हो सके।

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में नारियों की सहभागिता सुनिश्चित करने और राजनीतिक सक्रियता लाने हेतु महात्मा गांधी की भांति नाटककार जयशंकर प्रसाद ने यह स्पष्ट किया है कि नारियों को घर की चार दीवारी से बाहर लाना आवश्यक हैं। उन्होंने अपने नाटकों में आग से खेलने वाली राजनीतिक सूझबूझ से सम्पन्न अनेक नारियों का चित्रण किया है। चन्द्रगुप्त नाटक की ‘अलका‘ वीर क्षत्राणी बनकर अपने स्वतंत्र नारी व्यक्तित्व का परिचय देती हैं। चन्द्रगुप्त और चाणक्य के साथ मिलकर देश की रक्षा के लिये वह नटी का रूप धारण करती है, पर्वतेश्वर के बंदीगृह में चाणक्य से संकेत पाकर वह पर्वतेश्वर की प्रणयिनी बनने की राजनीति खेलती है।

नाटककार प्रसाद के नाटकों का मूल उद्देश्य सांस्कृतिक चेतना जागृत करना, नारी अस्मिता को स्थापित करना और राष्ट्रीय भावनाओं को जन-जन तक पहुँचाना रहा है ।

उन्होंने पारंपरिक मान्यताओं से पृथक राष्ट्रवादी सिद्धांतों की व्याख्या की हैं। नाटकों के नारी पात्रों के माध्यम से उन्होंने व्यापक रूप में राष्ट्रीय चेतना का संदेश दिया हैं। उनके सभी प्रमुख नाटकों में नारी के गौरवमय राष्ट्रीय स्वरूप के भव्य दर्शन होते हैं। ‘चन्द्रगुप्त‘ नाटक की नारी पात्र ‘अलका’ सिल्यूकस के समक्ष अपने राष्ट्र प्रेम का परिचय देती हुई कहती है कि ‘मेरा देश है, मेरे पहाड़ हैं, मेरी नदियाँ और जंगल हैं, इस भूमि के एक-एक परमाणु मेरे हैं और मेरे शरीर के एक-एक क्षुद्र अंश उन्हीं परमाणुओं से बने हैं।’ ‘स्कंदगुप्त’ की जयमाला ‘अजातशत्रु‘ की मल्लिका, ‘चन्द्रगुप्त’ की मालविका, ‘स्कंदगुप्त’ की रामा, देवसेना आदि में राष्ट्रीयता की भावना नस-नस में व्याप्त हैं। जातीय गौरव, राष्ट्रीय प्रेम और विश्व कल्याण की कामना को स्थापित करने में प्रसाद के नाटकों की नारियाँ उल्लेखनीय हैं।

अतः कह सकते हैं कि प्रसाद के नाटकों में आदर्श और मर्यादा के साथ-साथ देश भक्ति की डोर पकड़कर गतिमान होने वाली गौण नारी पात्रों में भी आम जनमानस को प्रभावित करने की विशेष क्षमता हैं।

भारतेंदु और प्रसाद युगीन मुख्य नाटकाकारों ने देशवासियों को प्रेरित करके नवजागरण के लिए जगाया। अपने नाटकों के पात्रों एवं संवादों से जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। प्रायः इन नाटकों के चरित्र देश की आन, बान और शान की खातिर अपने प्राणों का बलिदान देते हुए नजर आते हैं। व्यक्ति बड़ा नहीं है, महान नहीं है बल्कि राष्ट्र महान है, का संदेश देते हुए इनके नाटकों में अतीत गौरव एवं व्यंग्य के चित्रण में राष्ट्रीय चेतना एवं देश भक्ति का स्वर प्रधान हैं।

अन्ततोगत्वा हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते है कि प्रसादजी तथा उनके समकालीन नाटककारों ने जिस राष्ट्रीय चेतना को अपनी कृतियों में समाहित और प्रकाशित किया है, वह आदि कवि बाल्मीकि के जननी जन्म भूमिश्च.... स्वर्गादपि गरियसी .... का ही विस्तार है।

सन्दर्भ

1. साहित्यिक निबंध.. डॉ. गणपति ‘चंद्रगुप्त... पृष्ठ... 737 और 738

2. समीक्षात्मक निबंध... हरिचरण शर्मा....पृष्ठ... 297 और 298

3. शोधगंगा.. भारतेंदु और प्रसाद युगीन सहोटी में राष्ट्रीय चेतना

4. भारत के शक्ति के स्रोत

5. वृहत निबंध साहित्य

6. हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा.

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