हास्य नाटक - “दबिस्तान-ए-सियासत” - अंक 8 - राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

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हास्य नाटक

“दबिस्तान-ए-सियासत”

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

दबिस्तान-ए-सियासत का अंक ८


मंज़र एक


 फ़ोन हमारे पीछे नहीं..हम, फ़ोन के पीछे लगे हैं !

[मंच रोशन होता है, आयशा अपने कमरे में बैठी है ! तभी मेज़ पर रखे फ़ोन पर घंटी आती है ! आयशा क्रेडिल से चोगा उठाकर, अपने कान के पास ले जाती है !]

आयशा – [चोगा कान के पास ले आकर, कहती है] – हल्लो, कौन साहब ?

चोगे से झल्लाई हुई आवाज़ सुनायी देती है – कौन क्या ? तुम्हारा शौहर रशीद और कौन होगा, इस वक़्त फ़ोन करने वाला ? [तेज़ आवाज़ में] क्या कर रही हो ?

आयशा – [फ़ोन पर] – चौंकती हुई] – अच्छा...आप ? [मुंह बिगाड़कर] बहुत काम है जी, अब आप अकेले चले जाना घर. .मैं बाद में टेक्सी से आ जाऊंगी, काम निपट जाने के बाद..समझ गए, आप ?

रशीद मियां – [फ़ोन पर] – फिर कहना मत बेग़म कि, मैं तुम्हें लेने आया नहीं ! [खिसियानी आवाज़ में] वैसे ऐसा शौहर कौन होगा, जो बीबी के दफ़्तर में आकर..अपनी आबरू रेज़ी करवाना चाहेगा ? [चोगा रखने की आवाज़ आती है]

[आयशा चोगा क्रेडिल पर रहती है, फिर घंटी का बटन दबाती है ! घंटी की आवाज़ सुनकर, शमशाद बेग़म पानी से भरा लोटा लिए हाज़िर होती है ! बेवक्त अपने शौहर रशीद मियां का फ़ोन आ जाने से, आयशा उकता जाती है ! ज़ब्हा पर छाये पसीने के एक-एक कतरे को रुमाल से साफ़ करती हुई, शमशाद बेग़म से कहती है !]

आयशा – [ललाट से छलक रहे पसीने के एक-एक कतरे को, साफ़ करती हुई] – हाय अल्लाह, इतनी गर्मी ? इधर यह कमबख्त बिजली चली गयी...हाय..कितना पसीना [एक बार और चेहरे पर छाये पसीने को रुमाल से साफ़ करती है, फिर उसे वापस अपने पर्स में रख देती है !]

शमशाद बेग़म – [पानी का लोटा थमाकर, कहती है] – आबेजुलाल से अपने हलक को तर कीजिये, जनाब ! इस गर्मी से कुछ रहत मिलेगी, हुज़ूर ! [अपनी ज़ब्हा पर छलक रहे पसीने को रिदके के पल्लू से साफ़ करती है] बाहर बरामदे में बैठ जाइए, ठंडी हवा लगने से हुज़ूर की तबीयत खुश हो जायेगी ! ज़रा इस बदन को, ताज़गी भी मिल जायेगी !

आयशा – [पानी पीकर, लोटा वापस थमाती है] – वल्लाह ! कैसे ताज़ी हवा का, लुत्फ़ उठायें ? जानती नहीं, ख़ाला..कितने फ़ोन आते रहते हैं ? आपको लगता है, यहाँ हम आरा से बैठे हैं ?

शमशाद बेग़म – [अपने सर पर हाथ रखती हुई, कहती है] – क्या फ़रमाया हजूर ? [हाथ झटककर] अजी, फ़ोन को मारो गोली ! फ़ोन के आते ही, मैं ख़ुद आपके पास चोगा लेकर आ जाउंगी ! एक दफ़े आप तसल्ली से बैठिये तो सही, इस बरामदे में !

आयशा – क्या कहा, ख़ाला तुमने....फ़ोन को मारो गोली ? अरे ख़ाला, तुम तो बहुत भोली रह गयी ? मगर, मैं जानती हूं, तुम भोली नहीं हो...गज़ब की गोली हो ! अब ऐसा बोलकर, तुम किसी को देना मत गोली ! इतना भी नहीं समझती तुम, यह फ़ोन हमारे पीछे नहीं..हम, फ़ोन के पीछे लगे हैं !

शमशाद बेग़म – समझ में नहीं आया, मेडम...आपके आगे-पीछे बड़े-बड़े ओहदेदार आपकी एक झलक पाने के लिए तरसते हैं, और आप इस नाचीज़ फ़ोन के पीछे...

आयशा – इसके बिना, हमारा काम नहीं चलता ! [भोली बनती हुई] देख लें...कब, क्या ख़बर आ जाए ? कोई ख़बर, सीरियस हो या सीक्रेट ? क्या करें, ख़ाला ? हमने तो, यह आफ़त पाल रखी है...इस फ़ोन की ! और इसे, किसी के पास रख भी नहीं सकते !

[फ़ोन पर घंटी आती है, चोगा उठाकर वह उसे अपने कान के पास ले जाती है ! उसे मजीद मियां की आवाज़ सुनायी देती है, अब वह फ़ोन पर चहकती हुई कहती है !]

आयशा – [फ़ोन पर, चहकती हुई कहती है] – अजी, कब से ये आंखें आपके दीदार पाने को तरस रही है ? [फिर शमशाद बेग़म को घूरती हुई तल्खी से कहती है] आपको कोई काम नहीं है, क्या ?

मजीद मियां – [फ़ोन पर खिसियानी आवाज़ में] – मोहतरमा, हमारे पास तो ढेरों काम है ! आपको क्या पता, सुबह से शाम तक सर ऊंचा नहीं उठता....आप, जानती क्या हैं, हमारे बारे में ? हुजूरे आलिया कभी आपने पाली शहर के सर्व-शिक्षा दफ़्तर में बैठकर देखा है, कितने काम होते हैं यहाँ ? अजी हम तो ऐसे आदमी हैं, इतना काम होने के बाद भी हम आपके हर फ़ोन का माक़ूल ज़वाब देते हैं ! आप भी जानती हैं, यहां किसे फ़ुर्सत पड़ी है..जो किसी दूसरे के फटे में अपना पाँव फंसाए ?

[शमशाद बेग़म कोई ज़वाब नहीं देती, बस वह धीट की तरह वहां खड़ी रहती है ! इससे आयशा झल्लाती हुई उसे कहती है !]

आयशा – [गुस्से में शमशाद बेग़म को देखती हुई] – जाओ, अपना काम देखो ! यहाँ कोई लड्डू मिल रहे हैं ?

मजीद मियां – [फ़ोन पर, झुंझलाते हुए] – मैं क्यों चला जाऊं, अपनी सीट छोड़कर ? [गुस्से से] सुन लीजिये मोहतरमा, हम कोई मंगते-फ़क़ीर नहीं हैं, जो लड्डू लेने आयें आपके पास ?

[शाशाद बेग़म लोटा लिए चल देती है !]

आयशा – [फ़ोन पर, ज़राफ़त से कहती है] - नाराज़ मत हो, मजीद मियां ! हमने आपको कुछ नहीं कहा, बस हम तो ज़रा अपनी अपनी महिला चपरासी पर गरज़ रहे थे ! न जाने क्यों, यहाँ खड़ी-खड़ी हम-दोनों के आपस की बातें सुनने में दिलचस्पी दिखला रही थी ?

मजीद मियां – [फ़ोन पर] - अच्छा किया, मोहतरमा आपने ! अल्लाह जाने कहीं रशीद मियां उसके भोलेपन का फ़ायदा उठाकर, उस महिला चपरासी से पूछ-ताछ करने न बैठ जाए ?

आयशा – अब छोड़िये इस महिला चपरासी को, आप कहाँ आ गए ग़लत मुद्दे पर ? हम तो कह रहे थे कि, बात कुछ ऐसी ही है...आपसे अकेले में, गुफ़्तगू हो जाती तो...

[तभी ठहाकों की आवाज़ सुनायी देती है, खिड़की के बाहर उनकी गुफ़्तगू सुन रहे दाऊद मियां ठहाके लगाते जा रहे हैं ! तभी शमशाद बेग़म उनके पास आती है, और धीरे से उन्हें वहां से हटने को कहती है !]

शमशाद बेग़म - [धीमी आवाज़ में] – हेड साहेब, हटिये यहाँ से ! क्या कर रहे हैं आप, यहाँ खड़े-खड़े ? यह आपको शोभा नहीं देता, हुज़ूर !

दाऊद मियां – [धीमी आवाज़ में] – अरे ख़ाला, आप भी यहाँ खड़े होकर खिड़की के सुराख से ज़रा देख लीजिएगा ! बातें बड़ी दिलचस्प है, कान लगाकर सुन लीजिये आप..फ़ोन पर क्या गुफ़्तगू हो रही है ?

शमशाद बेग़म – रहने दीजिये, मैं तो ख़ुद वहीँ खड़ी थी ! मुझे सब ख़बर है !

[फिर क्या ? दोनों खिड़की से सटकर खड़े हो जाते हैं ! और फिर, बारी-बारी से खिड़की के उस सुराख से अन्दर झांकते हैं ! उनको आयशा अभी भी, फ़ोन पर बातें करती हुई नज़र आती है !]

आयशा – [फ़ोन पर बात करती हुई] – जनाब ! हम तो हंड्रेड परसेंट फ्री हैं, आ जाइए ! मगर, कार लाना भूलना मत !

मजीद मियां – [फ़ोन पर] – आपको यह जानकर खुशी होगी कि, अब हमने छोटे-छोटे फिएट जैसे घोड़े पालने बंद कर डाले, बस आप जैसी ख़ूबसूरत मोहतरमा की ख़िदमत के लिए मारुती कार ख़रीद ली है ! मेरा मफ़हूम है, हाथी पाल लिया है...

[खिड़की के पास कान लगाए दाऊद मियां मजीद मियां की बात सुनकर अपनी हंसी किसी तरह दबा लेते हैं, मगर मुख खोलकर कह बैठते हैं !]

दाऊद मियां – [हंसी को दबाये हुए, कहते हैं] – वाह, अल्लाह का शुक्र है ! एक हथनी के लिए, हाथी का इंतज़ाम हो गया !

शमशाद बेग़म – [चुप रहने का इशारा करती हुई] – अरे हेड साहब, चुप रहिये ! कहीं, बड़ी बी को मालुम न हो जाय..आप यहाँ खड़े उनकी गुफ़्तगू सुन रहे हैं ?

[शमशाद बेग़म की बात मनाकर, दाऊद मियां चुप हो जाते हैं और चुप-चाप खड़े-खड़े उस सुराख से कमरे के अन्दर की हलचल जानने का प्रयास करते हैं ! उनको अब भी, मजीद मियां की आवाज़ सुनाई दे रही है !]

मजीद मियां – [फ़ोन पर] – हजूरे आलिया ज़रा ध्यान दें, मुझे इस वक़्त आपके आस-पास चल रही फुसफुसाहट सुनायी दे रही है ! चलिए, छोड़िये इस बात को ! हम कह रहे थे कि, ‘हमारी मारुती, आपकी ख़िदमत के लिए आप जब चाहें हाज़िर है ! बस, आप ऐसा समझ लीजिये...यह मारुती, आपके सैर-सपाटे के लिए ही ख़रीदी गयी है ! आपका हुक्म है तो, आज कहीं घूमने चलें...?

आयशा – [खिन्नता से, फ़ोन पर] – क्या, घूमने चलना ? मियां, घर बैठा वह लंगूर चिल्लाएगा ना ? उसे, क्या ज़वाब दूंगी ?

मजीद मियां – [हंसते हुए, फ़ोन पर कहते हैं] – हा..हा..हा ! वाह, शेर-ए-दिल मोहतरमा ! उनके खौफ़ से आप, इतना डरती हैं ? बस, आप तो उस लंगूर को खिला देना केला..दिन-भर केला चबाता जाएगा, और आप अपना काम करती रहना ! पहले भेजे गए केले ख़त्म हो गए, क्या ? और, भिजवा दूं केले ?

आयशा – [फ़ोन पर] - रहने दीजिये, ऐसे तो हम भी बहाने गढ़ने में माहिर हो गए हैं ! अब आपको, केले भेजने की कोई ज़रूरत नहीं ! [मुस्कराती है] अब आप जाइए, दिल-ए-आज़म !

[चोगा क्रेडिल पर रखकर, उठती है ! फिर जाकर खिड़की खोलती है, खिड़की के बाहर दाऊद मियां और शमशाद बेग़म खड़े-खड़े हंसते जा रहे हैं ! उन दोनों को को वहां खड़े पाकर, उसका दिल जलभुन जाता है ! फिर क्या ? खून का घूंट पीकर, वह खिड़की को वापस बंद कर देती है ! थोड़ी देर बाद, उसे कार के होरन की आवाज़ सुनायी देती है ! आवाज़ सुनकर वह खुश हो जाती है, फिर सीट पर आराम से बैठकर तसल्ली से लम्बी-लम्बी सांस लेती है ! अब वह पर्स से लिपस्टिक और आइना निकालकर, लबों पर लगी लाली को सही करती है ! मेक-अप सही हो जाने के बाद, वापस लिपस्टिक और आईने को पर्स में रख देती है ! मंच की रोशनी, लुप्त हो जाती है !]

अंक आठ

मंज़र दो

“सैर-ओ-तफ़रीह” में जाओ, चाहो किसी के साथ जाओ...

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

[मंच रोशन होता है, बड़ी बी आयशा के कमरे में मजीद मियां तशरीफ़ रखते हैं ! आते ही वे धम्म से ख़ाली कुर्सी पर बैठ जाते हैं, बेचारी कुर्सी उनका वज़न पाकर चरमरा जाती है ! अब वे कुर्सी को आयशा के नज़दीक खिसकाकर, बैठ जाते हैं ! फिर वे आयशा की मद-भरी आँखों में, झाँककर कहते हैं !]

मजीद मियां – [आयशा की मद भरी आँखों में झांकते हुए, कहते हैं] – आदाब, खैरियत है ?

आयशा – [लबों पर, मुस्कान बिखेरती हुई कहती है] – यह आपका हुस्ने समाअत है..ज़रा आपको ज़हमत दी, क़िब्ला जानती हूं, आप मेरी किसी बात की ताईद नहीं करेंगे ! वैसे आप अक्लेकुल ठहरे...हम तो ठहरे कोदन ! ले लिया, सर पर इस डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट का भार ! मतला यह है, जबीं है...फाइनेंस कौन कराएगा, अब ?

मजीद मियां – [हंसकर] – अफ़सोसनाक ज़हालत ना करें...फाइनेंस लाने की कुव्वत कोई परवाज़े तख़य्यूल नहीं, वसूक करो ज़रा ! आपके हुस्ने रसूक हुस्न को देखकर बाईसेरश्क है हमें...काश, हम भी ऐसे ख़ूबसूरत होते...?

आयशा – [हंसती है] – वल्लाह, क्या कहना है आपका ? कलाग़ [कौआ] चला हंस की चाल, क्या कीजिएगा ख़ूबसूरती पाकर ? पास होनी चाहिए...[हाथ के अंगूठे व उंगली का इस्तेमाल कर के चुटकी बजाती है] पैसा, दौलत ! बाकी तो, सब बाज़ार में...

मजीद मियां – मगर ऐसी बात नहीं, हम तो यह ताल ठोककर कहेंगे कि, हुजूरे आला तसलीमात चंदे के लिए किसी से अर्ज़ कर दें, तो हुज़ूर मुसाहिबों की भीड़ लग जायेगी आपके दर पर ! फिर झोली क्या, किश्तियां भी भर जायेगी नोटों से !

आयशा – गालिबन आपको याद होगा, दफ़्तरे सर्व शिक्षा के प्रोग्रामों में हमारी हासिले तरह तकरीरों को सुनने के लिए कैसे अवाम उमड़ पड़ती थी...क़िब्ला, क्या तकरीर मुरस्सा होती थी ?

मजीद मियां – [हाथ में कार की चाबी का छल्ला लेकर, उसे उंगली में डालकर गोल-गोल घुमाते हैं] – इसलिए अर्ज़ करता हूं, मोहतरमा आप बेकैफ़ न हो...आप जहां भी जायेगी, मुसाहिब आपके कुदूम से अपनी पलकें बिछा देंगे ! अब चलें ? सामने उम्दा खीर-बिरयानी है, बस आप तो बिसमिल्लाह कीजिये !

[आयशा हंसने लगती है, तभी जमाल मियां कमरे में दाख़िल होते हैं ! उन्हें देखते ही, वह रुमाल से अपना मुंह ढांप लेती है ! मगर, फिर भी उसकी हंसी रुकती नहीं !]

जमाल मियां – [रूखेपन से] – आप चली जाती है, मेडम ! फ़साना छोड़ जाती है, पीछे ! हमने ढेर सारे ख़त इस टूर्नामेंट में मदद माँगने बाबत दानदाताओं को लिखे हैं ! बस आप इन ख़तों पर, अपने दस्तख़त करके जाइए ! मैं जानता हूं, आप तो इन दानदाताओं से मिलने से रही, कहीं इन खतों को पढ़कर दानदाता चंदा दे दें टूर्नामेंट के लिए ?

आयशा – अंदाज़े बयान कुछ गंजलक है, मियां ! बिना पढ़े मैं अपने दस्तख़त करने वाली नहीं ! आप ख़ुदा के लिए बेकैफ़ न होना, अल्लाह का शुक्र मनाओ ! हम अच्छे काम के लिए निकल रहे हैं ! जाते वक़्त, यह आपका टोकना मुनासिब नहीं !

जमाल मियां – फिर भी बताकर जाइए मेडम, आप कहाँ तशरीफ़ ले जा रही हैं ? मुझे कोई पूछे, तो पीछे मैं क्या ज़वाब दूंगा ?

आयशा – गारत न करो, काम को ! कह देना, कोई पूछे तो “हम टूर्नामेंट का चंदा लेने गयी हैं ! [धीमी आवाज़ में] चलिए मजीद मियां, इस कोदन इंसान ने फिर हमें हमारे शक्की शौहर-ए-नामदार की याद दिलाकर हमारा सारा मूड ऑफ कर डाला ! अब हमसे यहाँ, एक पल ठहरा नहीं जाता ! चलिए...चलिए !

[आयशा पर्स उठाकर, कमरे से निकलकर बाहर आती है ! फिर क्या ? मजीद मियां भी, आयशा के साथ बाहर निकल पड़ते हैं ! बाहर उनको बरामदे में शमशाद बेग़म नज़र आ जाती है, अब वह उसे हिदायत देती हुई उससे कहती है !]

आयशा – [शमशाद बेग़म को हिदायत देती हुई] – आप स्कूल का, पूरा ध्यान रखना ! आपको एक बार कह देती हूं, किसी से यह मत कहना कि, “मेडम वापस स्कूल नहीं लौटेगी !” बस ख़ाला आपको ही यह मालुम है कि, काम के ख़त्म होते ही हमें सीधे घर चली जायेंगी ! आप समझ गयी, ख़ाला ? क्या, एक बार वापस कहूं आपसे ?

[सुनकर, शमशाद बेग़म के लबों पर कुटिल मुस्कान छा जाती है ! उन दोनों को स्कूल के मेन गेट की तरफ़ बढ़ते देखकर, शमशाद बेग़म बड़बड़ाने लगती है !]

शमशाद बेग़म – [बड़बड़ाती है] – “सैर-ओ-तफ़रीह” में जाओ, चाहो किसी के साथ जाओ...हमें क्या करना, मेडम ? ऐसे काम करके आग से खेल रही हैं, आप ! इस तरह आप लोगों को मुंह खोलने के लिए मज़बूर करती हैं, फिर ये डवलपमेंट कमेटी के मेम्बरान कुछ कहते हैं...तो, आप नाराज़ हो जाती हैं !

दाऊद मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – नाराज़ होना ? हा...हा.. हा ! [उनकी हंसी, बरामदे में गूंज उठती है ! अब वे हंसी को दबाकर, आगे कहते हैं] साबू भाई तो ज़रूर कहेंगे, ‘यह जा रही है, मोहतरमा...जब यह वापस आयेगी, तब इसके रुख़सारों को देखना, लाल-सुर्ख हो जायेंगे..मानों किसी ने इसके गालों को मसल डाला हो ?

[मेन-गेट के बाहर कार के स्टार्ट होने की आवाज़ सुनायी देती है, आयशा मजीद मियां के बगल में बैठ जाती है ! थोड़ी देर में, कार रवाना हो जाती है ! उधर बरामदे में शेरखान मियां दाऊद के पास रखी कुर्सी को खींचकर, उस पर बैठ जाते हैं ! जाली पर छाई खम्स [पांच] पत्तियों की बेल को स्पर्श करके ठंडी हवा चल रही है, जो शेरखान साहब और दाऊद मियां को नींद के आगोश में डाल जाती है ! थोड़ी देर में, दोनों महापुरुषों के खर्राटे बरामदे में गूंज उठते हैं ! मंच की रोशनी, लुप्त हो जाती है !]

अंक आठ

मंज़र तीन

टप-टप वाला फ़ोन

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

[मंच रोशन होता है, बरामदे का मंज़र सामने आता है ! स्कूल के इस बरामदे में ही क्लास-रूम के दरवाजे खुलते हैं ! क्लासों में मेडमों के न होने से, बच्चियों का शोरगुल बढ़ जाता है ! मगर इस शोरगुल का कोई असर, नींद ले रहे इन दोनों महापुरुषों के खर्राटों पर नहीं पड़ता है ! बड़ी बी के स्कूल में हाज़र न होने से दोनों बेफिक्र होकर, नींद के आगोश में पड़े हैं ! इनको नींद लेते देखकर, शमशाद बेग़म की हर्ज़-बुर्ज़ [समस्या] बढ़ जाती है ! वक़्त काटने के लिए,अब वह किससे गुफ़्तगू करे ? आख़िर, बेचारी वक़्त काटने के लिए थैली से ज़र्दा और चूना निकालती है ! फिर अपनी हथेली पर थोड़ा ज़र्दा रखती है, उसमें चूना मिलाकर उस मिश्रण को अंगूठे से, ज़ोर से ऐसे मसलती है ‘मानों वह ज़र्दा और चूने का मिश्रण न होकर, आयशा की गरदन हो ?’ वह भूल न पा रही है, बड़ी बी आयशा की फटकार ! बार-बार उसके कानों में गूंज़ते जा रहे हैं उसके ये अल्फ़ाज़, “जाओ, अपना काम करो ! यहाँ कोई लड्डू मिल रहे हैं ?” इस जुमले का एक-एक हर्फ़ में, कितना ज़हर भरा है ? जिसे, वह कैसे बर्दाश्त करे..? क्योंकि यह जुमला ऐसे मजीद मियां जैसे रसिक इंसान को सुनाते हुए, उसने कहा था..जो उसके लिए नाक़ाबिले बर्दाश्त ठहरा ! अगर आयशा उसे अकेले में बुलाकर कुछ भी कह देती तो कोई बड़ी बात नहीं, उसे बर्दाश्त हो जाता ! मगर अब तो मजीद मियां भी जान गए कि, वह कितनी बदतमीज़ है ? जो दूसरों की भेद-भरी बातें सुनने की आदी है ! अब ज़र्दा और चूना अच्छी तरह से मसला जा चुका है, अब वह दूसरे हाथ से उस पर फटकारा लगाती है, जिससे उस मिश्रण की डस्ट उड़कर दोनों मुअज्ज़मों के नासा छिद्रों में चली जाती है ! नासाछिद्रों में, यह डस्ट क्या चली गयी ? उस डस्ट ने, कमाल कर डाला ! जो बच्चियों का शोरगुल, उनको नींद से जगा न पाया..वह काम इन छींकों की झड़ी ने करके दिखला दिया ! अब दोनों मुअज्ज़मों लगा देते हैं, छींकों की झड़ी ! फिर दोनों भोले इंसान आँखें मसलते हुए, ख़्यालों की दुनिया से बाहर निकल आते हैं ! उनको जगे हुए पाकर, शमशाद बेग़म सुर्ती रखी हथेली शेरखान के सामने लाती है ! उनकी मनुआर करती हुई, वह उनसे कहती है !]

शमशाद बेग़म – [सुर्ती की मनुआर करती हुई] – नोश फरमाए, बाबाजी ! अब आप उठ जाइए, समाधि से ! और इस जन्नती सुर्ती को चखकर, तरो-ताज़ा हो जाइए !

[शेरखान साहब उसकी हथेली से सुर्ती उठाकर, अपने होठों के नीचे दबाते हैं ! अब बची हुई सुर्ती, शमशाद बेग़म ख़ुद अपने होंठों के नीचे दबा देती है ! शेरखान साहब ठहरे, पागल बाबा के मुजाविर ! एक तरह से कहा जाय, तो वे हररूने फ़न हैं ! यही कारण है, स्कूल के सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इन्हें बाबाजी कहकर पुकारते हैं ! इधर अभी दाऊद मियां को सुर्ती मिली नहीं है, और अब मिलने की आशा भी न रही...क्योंकि, शमशाद बेग़म बची हुई सारी सुर्ती अपने होंठों के नीचे दबा चुकी है ! नशा-पत्ता न होने से अब दाऊद मियां की तलब भी बढ़ जाती है ! दाऊद मिया बेचारे ऐसे बदनसीब ठहरे, उन्होंने कभी सपने में भी ऐसा नहीं सोचा कि, शमशाद बेग़म जैसी सादिक़ महिला चपरासी हेड साहब को ज़र्दा चखना भूल सकती है ? फिर क्या ? ये साहब बहादुर, अब शमशाद बेग़म को उलाहना देने के लिए तैयार हो जाते हैं !]

दाऊद मियां – [उलाहना देते हुए] – वल्लाह ! सुर्ती बनायी, हमारे लिए ! गोया, और कोई चख गया सुर्ती..?

शमशाद बेग़म – लाहौल-विला कुव्वत ! ख्वाहमख्वाह यह हमने क्या कर डाला ? हाय अल्लाह ! ख़ता माफ़ करना ख़ुदा, मैं ठहरी ज़ाहिल...क्या जानू ? तकलीफ़ दी...शरे ओ अदब ! माफ़ करें, अब भी कुछ न बिगड़ा..अभी एक बार और बना देती हूं सुर्ती, और क्या ? आपकी ख़िदमत करना ही, मेरा फ़र्ज़ है !

[शमशाद बेग़म सुर्ती बनाने बैठती है, तभी फ़ोन पर घंटी बजती है ! अब दाऊद मियां के हाथ में ज़र्दा और चूना रखकर, ख़ुद चली जाती है फ़ोन सुनने ! बेचारे दाऊद मियां बैठे-बैठे हथेली में रखे मिश्रण को दूसरे हाथ के अंगूठे से मसलते हैं ! बेचारे बदनसीब रहे, क्योंकि आज़ उनको शमशाद बेग़म के हाथ की बनी सुर्ती चखने का अवसर मिलना नामुमकिन हो गया है...? उधर फ़ोन से चोगा उठाकर, शमशाद बेग़म कहती है !]

शमशाद बेग़म – [चोगा उठाकर, कहती है] – हल्लू, कौण बोल रिया है, साहब ?

फ़ोन पर आवाज़ आती है – मैं रशीद बोल रिया हूं, जी ! अब तुम अपनी बड़ी बी से बात कराओ...जी !

शमशाद बेग़म – [फ़ोन पर] – साहब, बड़ी बी बाहर गयी हुई है !

रशीद मियां – [फ़ोन पर झुंझलाते हुए, कहते हैं] – कब ? किनके साथ ?

शमशाद बेग़म – [अपने-आप] – हाय अल्लाह ! अब क्या कहूं, इनसे ? सच्च कहूं, या बन जाऊं खर्रास [झूठ बोलने वाली] ? अब क्या कहूं...? इतनी देर कैंची की तरह चल रही नातिका, कमबख्त अब पूरी बंद हो गयी ..? कमबख्त इस बड़ी बी में तो, दुनिया ज़हान के एब भरे पड़े हैं ! अब झूठ बोलने से तो अच्छा है, मैं ख़ुदा का नाम लूं ! [वह बिना ज़वाब दिए, चोगा क्रेडिल पर रख देती है !]

शेरखान – [शमशाद बेग़म को, आते देखकर] – तख़रीब ही बुनियाद है, तख़रीब ही तामीर ! समझी, ख़ाला ? आपने फ़ोन रखकर, बहुत अच्छा काम किया ! हम तो कहते हैं,”कुत्ता जानें चमडा जानें !” बस हम तो खुश हैं, ख़ाला आपने लफ्ज़ी इतख़्तिलाफ़ को बढ़ने न दिया !

[संतोष धारण करके, आख़िर शमशाद बेग़म टेबल के पास रखे स्टूल पर बैठ जाती है ! और थैली से टिफिन बाहर निकालकर टेबल पर रखती है ! फिर, टिफिन खोलकर दस्तरख़वान सज़ा देती है ! अब वह एक निवाला रोटी से तोड़कर, उसे खीर में डूबाकर कहती है !]

शमशाद बेग़म – [रोटी का निवाला खीर में डूबाती है] – कहने को मियां, बहुत कुछ है ! [निवाले को मुंह में रखती है] क़िब्ला कौन ख़ुदा का बन्दा ख़ुदा की दी गयी शीरी ज़बान को गंदी करेगा ? इससे तो अच्छा है, ख़ुदा का पाक कलाम पढ़ा जाय !

दाऊद मियां – ख़ाला ! इंसानी फ़ितरत कुछ ऐसी है, इससे अल्लाह मियां को उज्र कैसा ? वल्लाह नेकबख्त के इश्क को, उसके लक्खन से क्या जोड़ना ?

[रोटी से खीर खाते-खाते रोटी ख़त्म हो गयी है, अब वह बची हुई खीर गटा-गट पि जाती है ! खीर पीकर, वह सट का खण टेबल पर रखती है ! फिर, वह कहती है !]

शमशाद बेग़म – तसलीमात अर्ज़ करती हूं, मैं बदहवाश में तकरीर नहीं करती...क्योंकि मुझे ख़ुदा पर पूरा भरोसा है ! [अब वह सट के दूसरे खण को खोलकर परामठा बाहर निकालती है, अब वह उसके निवाले तोड़कर आम के अचार के साथ खाती है ! निवाला गिटकर, वह कहती है !]

शमशाद बेग़म – मैं अक्सर सोजत जाती हूं, वहां नूर मियां की दरगाह पर जाकर मत्था टेकती हूं !

शेरखान – तभी हम आपकी आस्तीन पर, नूर मियां का ताबीज बंधा देखते हैं ! आपको इसे २४ घंटें अपनी आस्तीन पर, बांधे रखना चाहिए ! एक बार कह देता हूं, इस शीरी ज़बान पर ख़ुदा का नाम हो ! वाहियात गुन्हागारों का नाम आने से, इन्सान को दोज़ख़ नसीब होता है ! बस, आप बुरा न देखो बुरा न बोलो और बुरा न सुनों ! ख़ाला जब भी वक़्त मिले, तब हमें ख़ुदा का पाक कलाम पढ़ना चाहिए ! और, उसके शुक्रगुज़ार होना चाहिए !

[खाते-खाते अब आम का आचार ख़त्म हो गया है, शमशाद बेग़म नमक-मिर्च के परमठे बाहर निकालकर भिन्डी की सब्जी से खाने लगती है ! निवाले को गिटकर, वह आगे कहती है !]

शमशाद बेग़म – आप दोनों, दानिश मोमीन यहाँ बैठे हैं....अब आप दोनों को जिस्मफ़रोशी के धंधे में लिप्त एक औरत का किस्सा सुनाती हूं, सुनिए ! सुनने के बाद आप यह सोचना कि, मैंने ऐसा क्यों कहा ? उसके कोठे पर, कई दौलतमंद बिगड़े नवाब आते रहते थे !

शेरखान – आगे क्या हुआ, ख़ाला ?

शमशाद बेग़म – एक फ़क़ीर जिसका मकान, बिलकुल उसकी कोठी के सामने था ! उस फ़क़ीर की मति मारी गयी, वह ख़ुदा की इबादत करने की जगह, उसकी कोठी पर आने-जाने वाले रईसजादों की गिनती करने लगा ! मगर उसके विपिरित, वह औरत उस फ़क़ीर को देखकर...

दाऊद मियां – अरी ख़ाला ! फ़क़ीर में कुव्वते जाज़बा ही ऐसा होता है, इंसान क्या उसके पास पशु-पक्षी भी खींचे चले आती हैं ! यह तो बेचारी, एक समाज से ठुकराई हुई मोहतरमा ठहरी ! आगे कहो ख़ाला, क्या हुआ ?

शमशाद बेग़म – फ़क़ीर व ख़ुदा के इश्क को, वह अपना तक़दीर बनाने लगी ! मगर, जब इन दोनों का इन्तिकाल हुआ, तब उस औरत की रूह को ले जाने के लिए ख़ुदा के भेजे गए जन्नत के फ़रिश्ते आये ! मगर, ख़ुदा के हुक्म से उस फ़क़ीर की रुह को जाना पड़ा दोज़ख़ में ! अब आप-दोनों समझ गए, ना ?

[अब शमशाद बेग़म खाना खा चुकी है, पानी पीते के बाद उसको ज़ोर की डकार आती है ! फिर वह जम्हाई लेती हुई, आगे कहती है !]

शमशाद बेग़म – [जम्हाई लेकर, आगे कहती है] – मैं यह समझाना चाहती हूं “बार-बार इस ज़बान पर नेकबख्ती आये, ख़ुदा का नाम आये ! इंशाअल्लाह, यह आपका हुस्ने-समाअत होगा !”

[टेलिफ़ोन पर घंटी आती है, मगर शमशाद बेग़म जन-बूझकर नहीं उठती ! वह बैठी-बैठी सट के खणो को सेट करके, थैली में रखती है ! और इधर, दाऊद मां ठहरे अलहदी ! उनके उठने का सवाल ही पैदा नहीं होता ! दूसरी बात यह भी है, ये दोनों महापुरुष किस्सा सुनकर अब ख़्यालों की दुनिया में खो चुके हैं ! अब इन दोनों के खर्राटे गूंजते जा रहे हैं ! चोगा न उठाने से, टेलिफ़ोन की घंटी बराबर बजती जा रही है ! तभी, पी.टी.आई. मेडम आयशा खान यहाँ पानी पीने चली आती है ! उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि, फ़ोन की घंटी लगातार बजती जा रही है...मगर कोई महानुभव उठकर, फ़ोन का चोगा क्यों नहीं उठा रहा है ? किसी को उठते न देखकर, वह पानी पीकर शमशाद बेग़म से कहती है !]

आयशा खान – [शमशाद बेग़म से, कहती है] - ख़ाला आप बैठी रहिये, शायद आपकी तबीयत नासाज़ होगी ? चलिए, फ़ोन मैं उठा लेती हूं !

शमशाद बेग़म – [चिढ़ती हुई, कहती है] – यहाँ फ़ोन उठाने जाने वाला है, कौन ? किसको ज़रूरत पड़ी है, फ़ोन पर बेकार की हफ्वात हांकते रहने की ?

[मगर, आयशा खान उसकी बात अनसुनी करती हुई...जाकर फ़ोन का चोगा उठा लेती है ! उसे अपने कान के पास ले जाकर, कहती है !]

आयशा खान – [चोगा कान के पास ले जाकर] – हेल्लो कौन ?

फ़ोन से आवाज़ आती है – मैं तुम्हारी हेड मिस्ट्रेस आयशा अंसारी बोल रही हूं, ज़रा आक़िल मियां को फ़ोन देना !

आयशा खान – [वहीँ से, ज़ोर से आवाज़ लगा देती है] – अरे ओ...बड़े बाबूजी ! ज़रा इधर आइये...आयशा अंसारी का फ़ोन है, आपके लिए !

[आयशा खान की आवाज़ सुनकर, आक़िल मियां अपने कमरे से निकलकर बरामदे में आते हैं ! और टेबल पर रखे फ़ोन के चोगे को उठाकर, अपने कान के पास ले जाकर कहते हैं !]

आक़िल मियां – [फ़ोन पर] – हेल्लो, मेडम ! मैं आक़िल बोल रहा हूं, फ़रमाइए हुज़ूर !

आयशा – [फ़ोन पर] – एक बार सुन लीजिये, अच्छी तरह से कि, “इस आयशा खान को समझा दें, अच्छी तरह से हिदायत देकर कि...बड़ी बी का नाम, इज़्ज़त से लिया करें ! इस तरह बदतमिज़ों की बदसलूकी, इस स्कूल में नहीं चलेगी !

आक़िल मियां – ठीक है, मेडम ! खान मेडम से गुस्ताख़ी हो गयी, हुज़ूर आप अपना दिल बड़ा रखिये....माफ़ कर दीजिये उन्हें, और छोड़ दीजिये इन मोहमल बातों को ! हुज़ूर, आप अपना हुक्म सुनाइये, आख़िर आपने इस नाचीज़ को क्यों याद किया ?

आयशा – हमारे जाने के बाद, किसी का फ़ोन आया क्या ?

आक़िल मियां – हो सकता है, आपके शौहर रशीद मियां का फ़ोन आया हो ? घंटी हमने भी सुनी, और वह जल्द बंद हो गयी !

आयशा – [फ़ोन पर] – आप अक्लमंद हैं, जनाब ! बेदिली न दिखाया करें ! वल्लाह फ़ोन कर देते हमें, आपको हमने अपना मोबाइल नंबर दे रखा है !

आक़िल मियां – [फ़ोन पर] – कैसे करता, फ़ोन ? कमरे के बाहर आपने इनकमिंग फ़ोन रख छोड़ा है, आउट गोइंग फ़ोन आपने अपनी अलमारी में रखा है..लोक में ! आप जानती ही हैं, मेरे पास मोबाइल नहीं..वल्लाह, फिर कैसे लगाता आपको फ़ोन ? आपके बाहर रखे फ़ोन से केवल बाहर से आये फ़ोन ही सुने जा सकते हैं, मगर किसी को फ़ोन लगाये नहीं जा सकते ! हुज़ूर, यह तो टप-टप वाला फ़ोन है !

आयशा – [नाराज़ होकर] – इसे आप टप-टप वाला फ़ोन कहना बंद कीजिये, अलमारी में रखा फ़ोन मैं आपके पज़ेशन में दे देती हूं ! मगर...

आक़िल मियां – मगर-तगर कहना छोड़िये हुज़ूर, हर्ज़-मुर्ज़ यह है...रूल के मुताबिक़, यह फ़ोन किसके पास रखा जाय ? शरई के तहत, यह फ़ोन दाऊद मियां के पास रहना चाहिए ! आख़िर दाऊद मियां ठहरे, दफ़्तरे निज़ाम ! फिर क्यों हमें अफ़सोसनाक ज़हालत में डालती हैं, आप ?

[अनचाही बात सुनकर,आयशा गुस्से में अपना मोबाइल बंद कर देती है ! अब फ़ोन में आवाज़ आनी बंद हो गयी है, फिर क्या ? आक़िल मियां भी, चोगा क्रेडिल पर रख देते हैं ! खर्राटे ले रहे दाऊद मियां, अपने काम की बात अवश्य सुन लिया करते हैं ! इस वक़्त, पूरी गुफ़्तगू पर कान दिए बैठे दाऊद मियां व आयशा खान सहसा हंसी के ठहाके लगा बैठते हैं ! फिर दोनों एक साथ, आक़िल मियां को कह बैठते हैं !]

दाऊद मियां और आयशा खान – [एक साथ] – फिर क्या हुआ, जनाब ?

आक़िल मियां – [बिफ़रते हुए] - होना क्या ? फिर वही टप-टप..! अब चलते हैं, यहाँ कौन बैठा है निक्कमा ? यहाँ तो काम के मारे, हमारा सर ऊपर नहीं होता ! और, यहाँ है क्या..? ख़ाली हरज़ा बातें, और क्या ?

[आक़िल मियां अपने कमरे की ओर जाने के लिए, क़दम बढ़ा देते हैं ! तभी जाफ़री का दरवाज़ा खोलकर, डाकिया बरामदे में दाख़िल होता है ! फिर, दाऊद मियां को स्कूल की डाक थमाकर वह रुख़्सत हो जाता है ! अब दाऊद मियां डाक खोलकर, डाक देखते हैं ! डाक में उन्हें टेलिफ़ोन का बिल नज़र आता है ! वे उस बिल की बकाया राशि पर निग़ाह डालकर, जाते हुए आक़िल मियां को रोकते हैं !

दाऊद मियां – [आक़िल मियां से] – रुकिए...रुकिए, आक़िल मियां ! अभी इस टप-टप वाले फ़ोन की, तख़रीब [इतिहास] सुननी बाकी है ! देखिये, इस बिल को ! जनाब, इस बार दो हज़ार का बिल आया है !

आक़िल मियां – [रुकते हुए] – छोड़िये, हेड साहब ! अब करना क्या, क्यों मेरा मुंह खुलवाना चाहते हैं आप ? उनके स्कूल से बाहर जाने के बाद, इनकमिंग फ़ोन रहता है हमारे पास ! बस, बैठे-बैठे आये फ़ोन का ज़वाब देते रहिये ! और वह दिल-ए-अज़ीज़ टप-टप वाला फ़ोन, रहता है उनके पास ! जहां ना फटके, स्टाफ़ का बन्दा !

आयशा खान – लीजिये, इस पर एक नग़मा पेश करती हूं ! सुनिए, बेकैफ़ होकर ! “बड़ी बी को हो गया इश्क, टप-टप से रब्त अमीक ! अक्लेकुल नातिका बंद, कोदन बेचारा हो बेकैफ़ ! डी.डी., डी,ई.ओ. एम.पी., एम.एल.ए., सबसे करती मेडम बात ! किस-किस का तबादला अब, लिस्ट पड़ी है उनके लब पर ! जब से दिल आया टप-टप पर, तबसे टप टप बना तख़रीब ! बड़ी को हो गया इश्क, टप-टप से रब्त अमीक !”

[आयशा खान का नग़मा सुनकर, सभी ठहाके लगाकर हंसने लगे ! अब-तक, शमशाद बेग़म खाना खा चुकी है ! अब तक, शमशाद बेग़म खाना खाना खाने के बाद अपने झूठे हाथ धो चुकी है ! वह दीवार पर टंगी घड़ी को देखती है, रिसेस का वक़्त हो गया है ! वह झट उठकर घंटी लगाकर आ जाती है ! घंटी की टन-टन की आवाज़, ज़ोर से गूंज उठती है ! अब मंच की रोशनी, लुप्त हो जाती है !]

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1 टिप्पणी "हास्य नाटक - “दबिस्तान-ए-सियासत” - अंक 8 - राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित"

  1. पाठकों, आपको "टप-टप वाला फोन" का मंजर बहुत पसंद आया होगा ? अधिकारी अधिकतर फोन का उपयोग खुद के लिए करते हैं और बेचारे स्टाफ के लिए छोड़ देते हैं, इनकमिंग फोन । जिसे सुना जा सकता है मगर किसी को ज़रूरी मेसेज कहने के लिए काम में नहीं लाया जा सकता । ये सरकारी दफ्तर अफसरों के लिए ऐश की ठौड़ है । बाहर जाने के लिए सरकारी गाड़ी, और लोगों से हफवात हांकने लिए सरकारी टप-टप वाला फोन हाज़िर है ।

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