आशुतोष मिश्र की कविताएँ

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image


अपना आज का भारत


यह भारतीय  देश  है ऐसा
जो अपने बेटों पर रोता है।
कुछ शहीद यहाँ तो बाकी
व्यक्ति भ्रष्टाचारी  होता हैं।।

भ्रष्टाचार बढ़ा यहाँ पर इतना
लोग कहते विकास न होने देंगे।
करना कार्य आदत नहीं हमारी
सरकारी अनुदान दौड़ के लेंगे।

लाइट लगेगी जो राहों पर
उसको भी हम ही चुराएंगे।
घर के सामने ग्राम समाज
को हम अपना बतलाएंगे।।

बड़े बड़े पदों पर भारत में
अब श्री टोंटी चोर बैठते हैं।
जो खा खिला लैट्रिन गुर्गों को
भारत को दिन रात लूटते हैं।।

कभी कभी कोई सुपर एक्टिव
डिटेक्टिव कर दिया जाता है।
तत्पश्चात आतंकवादी अनेक
राष्ट्रीय   शहीद  कहलाता  है।।

कुछ ऐसे भी थे वीर यहां जो
खोज अनशन की कर गए।
भूख हड़ताल में भी कईयों के
वजन यहाँ पर बढ़ गए।।

भ्रष्टाचार से मन मेरा अब
यारों बहुत घबराता है।
हमेशा न सही कभी-कभी
मन मुझको बैमान कह जाता है।

----

यूंही

लब खामोश हैं तो क्या हुआ
इन में प्यास अभी बाकी है।
हो गई निगाहें कमजोर मेरी
तेरी  आस  अभी  बाकी है।।

रहूँगा  करता ताउम्र  तुमसे
मेरे    प्रियतम    मैं    प्यार।
जाओ दूर लाख तुम  हमसे
ताउम्र करूंगा तेरा इंतजार।।

होगा इंतजार भी थोड़ा मेरा
बदला सा पर खुश मिजाज।
बनकर रहूँगा बादशाह तेरा
तू बन रहेगी सपनों की ताज।।

प्रियतम मेरी मासूम सीमा
ताउम्र रहेगा मुझे इंतजार।
तब ही खिलेगा मुख मेरा
जब करोगी तुम इजहार।।

हूं मैं प्रेमी अलग तरह का
मानो न मानो तुम सरकार।
पर मैं न भीगूंगा बारिश में
आए  चाहे   लाख   बहार।।

----

बस यूंही

देख रही हो का तिरछी नजरों से
क्या तुमको हम पर एतबार नहीं।
या फिर तुमको  शक   है मुझपर
तुमको या  फिर मुझसे प्यार नहीं।।

प्यार को देख न  शक्की नजरों से
मुझमें भी इक नादाँ दिल रहता है।
जा रही दूर कहीं जाने क्यूँ मुझसे
बारम्बार मेरा दिल मुझसे कहता है।।

नहीं चाहती संग तुम मेरे रहना जो
तो कह दो मुझको तुमसे प्यार नहीं।
पर गली-गली  काहे कहती फिरती
तीरथ  पर है  मुझको  एतबार नहीं।

हां एतबार भी होगा कैसे मुझपर
ठहरा   मैं सीधा-सादा  देसी  जो।
होवे राम से  शुरू दिनचर्या  मेरी
चौबीस  घंटे तुम  हैलो हाय कहो।।

मिलेंगे जो तुमको कई और प्रिये
मेरे लिए भी है आपातकाल नहीं।
फंसाए रखो तुम अपने चक्कर में
बना ऐसा कोई प्रियतम जाल नहीं।।

करूं भविष्यवाणी में जाते  वक्त
मुड़कर तीरथ गली तुम आओगी।
हो चुकी होगी प्रिये तब देर बहुत
रो  रो  कर  तुम  मुझे मनाओगी।।

---


स्त्री रूप तेरे


हे स्त्री वह भी तुम्हीं हो
जब धरातल पर मैं आया
सर्वप्रथम तुम्हीं ने वात्सल्य
प्रेम से मुझको सहलाया

हां वह भी तुम्हीं हो
बड़ा होते ही जिसका स्नेह मिला
तुम से लड़कर भी डरता
और जिसे मैंने दीदी कहा

है इसमें भी को शक नहीं
कि स्त्री ने मुझे मजबूत बनाया
सलाह से दादी के मुझको
गया था काजल बुकवा लगाया

हे स्त्री वह भी तुम्ही हो
जो मुझे मारकर पढ़ाती थी
मेरी कमियों को छुपा अक्सर
खूबी को ही बताती थी
हे स्त्री तेरा सम्बन्ध सलोना
बुआजी कहलाती थी।।

जरा और बड़ा होने पर
इक परी बन तुम आई
अधिक कहीं तुम मुझसे
परिवार को थी भाई

होने लगी थी अब मुझे
तुमसे छुटकी बहुत जलन
क्योंकि सबकी प्यारी अब तुम
गई थी घर में बन

हे स्त्री सम्बन्ध है एक और अनमोल
जिसे हम मित्र कहते हैं
होवे जो कुछ मन में अपने
आगे उसके विचार रखते हैं

है पवित्र सबसे सम्बन्ध यह
इस मायावी जग में
प्रेम सहयोग की भावना होती
मित्र के प्रिये रग - रग में

हे स्त्री वह भी तुम्ही हो
जब जीवन लेता मोड़ नया
जब जीवन साथी बन तुम आती हो
इस लालची संसार में भी
अर्धांगिनी कहलाती हो

हे स्त्री प्रिये पावन
रूप तेरे अनेक सुहावन
चाची ताई मामी मौसी भी हैं रूप तेरे
हे स्त्री तुमने
बनकर के नानी
सुनाई थी जो मुझे कहानी
है वह आज भी याद मेरे

हे स्त्री बारम्बार तुम्हें
तीरथ करे प्रणाम है
दुर्गा काली चण्डिका
भी तुम्हारा नाम है।।

----

एक रचना


इन नेक हाथों से आप पुष्पों को न तोड़िए।
लिख  कविता  बस दिलों को  ही  जोड़िए।।

मिलेंगे इस जहां में तोड़ने वाले अनेक यहां।
दिलों को जोड़ने का मिलता है कोई - कोई।

बात   उतर  जाए  जो  शीघ्र हृदय में हमारे।।
ऐसा काव्य जगत में लिखता है कोई -कोई।।

लिख डालिए न आप कोई ग्रन्थ इंतजार का।
मिलेगा पढ़ जिसे तन्हाई में मौसम बहार का।।

चमकता जिस प्रकार आपका तेज से मुख है।
उसी प्रकार चमकती आपकी कविता नज्म है।।

लिखती जो आप नित प्रेम से हमारे लिए -२।
हमें  वह  सब हज्म है - जी वह  सब हज्म हैं।।

फूल संग फल भी मिलेंगे वह भी मीठे मीठे।
आप  हमारे  इंहा एकबार  सकतपुर आइए।।

बेला गुलाब गुडहल हुक्का पवना  के संग।
पपीता आम फरेंद के संग नींबू को खाइए।।

----


वर्षा का इंतजार


सनन सनन करती चलती पुरवाई है।
मौसम की मुझसे ई कैसी रुसवाई है।।

तेज हवा के झोंके आकर
पूरव से पश्चिम बल खाकर
बादल को उड़ा ले जाते हैं
तेज तपिश क्यूँ तड़पाते हैं
घिर -घिर कर यह चहुँओर
चहुँओर छाई घटा घनघोर
दुमक  दुम  बादल  करते
बारिश  को  मनवा  तरशे
घनघोर घटा क्यूँ अब तक न आई है।।

तन व्याकुल मन व्याकुल
हुआ व्याकुल जग संसार
पशु पक्षी व्याकुल हो गए
कुछ प्यासे भी मर गए
फसलों का हुआ बेहाल
सूख गई मक्का औ दाल
गन्ना भी है अब सूख गया
मेरे प्रभु औघड़ करो दया
खाने को पड़ जाएंगे लाले
बचा न कुछ कृषक के पाले
खेतों से पानी की यह कैसी जुदाई  है।।

कुछ समय पुरवाई रूकवा दो
थोड़ा पछियाव नाथ चलवा दो
पुरवा पछुआ के टक्कर से
होगी फिर बरसात प्यारी
फिर से कल्ला उठेगी
मेरे आंगन की क्यारी
जो अबकी भीषण गर्मी से झुराई है।।


---


करेगा न कोई छात्र जुर्रत  इश्क करने की।
स्कूलों में प्रेम कहानी पढ़ाकर तो देखिए।।

सताई जाती हैं किस तरह पीड़िता जिहाद।
लड़कियों  से जरा  बताकर  तो देखिए।।

कांप उठेगी रूह सुन दशा आएशा की।
फरमान आसमानी सुनाकर तो देखिए।।

दशा बन्द हरिजन एक्ट में उस ठाकुर की।
जेल में अपने बच्चों को दिखाकर देखिए।।

हैं बने कितने आज तलक इश्क में जरा।
मुआयना फिर इन्हीं से करवाकर देखिए।।

---


घर छोड़ो बाहर देश बेगाना है।
भागदौड़ में न तेरा कोई परवाना हैं।।

कार्य कोई असम्भव न है जग में।
ढूंढ ले न तू क्यूँ अपना खग विहग में।।

भूलता रहा तू काहे तू ये मानव राही।
मेहनत करने पर कुछ मुश्किल नाही।।

प्रेम सौम्य और शालीनता से तुमको ।
इस मायावी जग को अपना बनाना है।।

वह  चोर उच्चका गुण्डा चाहे जो हो।
सबसे तुम मित्रता का ख्याल रखना।
जो  कुछ  भी हो  दिल में तेरे तीरथ
हाल अपना भी सब तुम उससे कहना

दी कला जो तुमको ईश्वर ने रे मानव
वह पूरे जग को अब दिखलाना है।।

चर्म नहीं कर्म महकेगा तेरा यहाँ पर।
नेकी रहेगी सदा तेरी अजर - अमर।।

मलने से हाथ बैठकर खाली तेरा तीरथ।
न  बनना किसी को  तेरा दीवाना है।।


इश्क


समेटा है जब से मैंने दिल में तुमको।
तभी से मेरे अल्फाजों में बिखर गए।।

समेटना चाहा मैंने जब तुम्हें गजल बना।
तब बनकर आंसू स्याही से उतर गए।।

सोचा न था कि जुदा होवेगा इस कदर।
हुए जबसे जुदा जाने हम किधर गए।।

जुदाई सीमा तेरी ऐसी कि कहा न जाए।
होते हुए भी जिंदा जैसे हम अब मर गए।।

दिखता हूँ जिंदा अब बस पर जान नहीं।
इस जुदाई में हम हर दुःख से गुजर गए।।

रोना चाहा पर रो न सका मैं प्रियतम।
बस फफक फफक कर  ही बिफर गए।।

रहेगी कविता तीरथ यह तब भी जिंदा।
जो जुदाई  में दुनिया से हम गुजर  गए ।।


@
आंख दिखाने की तो बात दूर की
वह  आंख   ही  निकाल  लेते  हैं।
राजनीतिक  तुष्टिकरण  झेल रहे
भारत  माता के  सैनिक  बेटे  हैं।।

अपने ही  मार रहे हैं  अब पाथर
मन चाहे कितना भी हो लहूलुहान।
हे ! वीर पुत्र भारत माता के रक्षक
नहीं ले  पा  रहे तुम  उनकी जान।।

चाहो यदि आप उनका नष्ट जन्म
आप हजारों लाखों कर सकते हो।
फिर भी आप सरकारी बन्धन में
बन्धकर  कर कुछ नहीं करते हो।।

एक बात और बड़ी है इसके पीछे
आज्ञा नहीं देता हमारा संविधान।
ऊपर से  नेता खूब  करें शव पर
अपना मत  राजनीतिक व्यायाम ।।

भारत में  बैठे  गद्दारों के  कारण
हो रहा भारत माता का अपमान।
बार बार  यह  शत्रु  को देते क्षमा
जबकि  है उनका  न कोई ईमान।।

आशुतोष मिश्र तीरथ
जनपद गोण्डा
कापीराइट एक्ट के अंतर्गत

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "आशुतोष मिश्र की कविताएँ"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.