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कहानी // मुआवज़ा // सुधा गोयल " नवीन"

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मुआवज़ा सुधा गोयल " नवीन " आलिया की किस्मत ने एक बार फिर उसे धोखा दे दिया। कोठरी के दरवाजे की चौखट पर निढाल खड़ी आलिया अशरफ को जाते...

मुआवज़ा

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सुधा गोयल " नवीन"

आलिया की किस्मत ने एक बार फिर उसे धोखा दे दिया। कोठरी के दरवाजे की चौखट पर निढाल खड़ी आलिया अशरफ को जाते देख रही थी। अशरफ उसका शौहर, केवल तीन शब्दों,  'तलाक' 'तलाक' 'तलाक' की गोली दाग कर उसे अधमरी अवस्था में छोड़कर जा रहा था। तीन बिलखते बच्चों ने उसे सहारा देने की नाकाम कोशिश की, पर वे इतने छोटे थे कि उठते-गिरते और रोने लगते। यह दूसरा अवसर था जब उसे शौहर के बिछोह का दुःख सहना पड़ रहा था। पहला शौहर किसी अमीरजादे, ऐय्याश, शराबी की बेतहाशा दौड़ती गाड़ी का शिकार हो गया था। उस दिन भी खबर मिलने पर आलिया इसी तरह चौखट पर निढाल खड़ी सूचना देने वाले को जाते हुए निहार रही थी। तब उसकी गोदी में एक बेटा था, उसकी छाती से चिपका उसका सारा दर्द चूसने में मग्न।

फिर कुछ सालों के लिए जिंदगी ने उसे ऐसे दिन दिखाए जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी।

आलिया की मदद करने शहर के अखबार-वाले, सामाजिक संस्थायें और टी. वी. वाले उस अमीरजादे को कोर्ट तक घसीटकर ले गए और तमाम बहसा-बहसी के बाद आलिया को 15 लाख का हर्जाना मिले, तय करवा कर रहे। कितना समय लगेगा हर्ज़ाना मिलने में, पूछने पर उत्तर मिलता, कोर्ट-कचहरी का मामला है, समय लगेगा।

15 लाख की रकम कितनी होती है, यह तो आलिया को नहीं पता था, पर इतने से उसके बच्चे की जिंदगी पार लग जायेगी, इतना ज़रूर पता था।

शौहर की हत्या के गम को,  सुरक्षित भविष्य के आश्वासन की चादर ढकने ही लगी थी कि अशरफ के रूप में एक ढंडी हवा का झोंका उसकी जिंदगी को संवार गया।  अशरफ उसकी मौसी की जिठानी का बेटा था। अशरफ ने आलिया के साथ न केवल निकाह किया वरन उसे रानी बनाकर रखा। उनके दो बच्चे भी हुए। आलिया खुश थी बहुत खुश।  वह अपने पहले शौहर को लगभग भूल चुकी थी।

कहते हैं दुःख की उमर और तीव्रता तभी तक रहती है,  जब तक सुख की दस्तक न हो। सुख की सेज सजी नहीं कि दुःख दुम दबा कर भाग जाता है। आलिया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

लेकिन आज पहले शौहर की ह्त्या के 12 सालों के बाद फिर एक फैसला आया कि अमीरज़ादा निर्दोष था,  इसलिए आलिया को 15 लाख का मुआवजा नहीं मिलेगा और ना ही अमीरजादे को कोई बड़ी सज़ा। आलिया भौंचक थी और अशरफ संजीदा-निराश, नाराज़ और हताश। इसी मनःस्थिति में एकदम से उसने आलिया को तलाक, तलाक, तलाक कहा और घर-बच्चों को छोड़ निकल गया।

कोठरी के दरवाजे की चौखट पर निढाल खड़ी आलिया अशरफ को जाते देख रही थी।

पहले पति के साथ आलिया एक कमरे के घर में भी खुश थी फिर अशरफ ने उसके लिए एक रसोईघर की अलग से व्यवस्था कर दी तो वह बहुत-बहुत खुश हो गई। अशरफ के दोनों बच्चों की जचगी आलिया हँसते-हँसते झेल गई क्योंकि अशरफ उससे सच्चा प्यार करता था। फल-दूध-दवाई, राशन, किताब-कॉपी, कपड़े-लत्ते के लिये कभी भी आलिया को मिन्नत-गुज़ारिश या किल्लत नहीं हुई।

उसने तो कभी भी अशरफ से कोई मांग नहीं की, शिकायत का तो अशरफ ने कभी मौक़ा भी नहीं दिया। हाँ एक बार पूछा ज़रूर था कि वह क्या काम करता है, क्योंकि हाड़ पेल मेहनत के बाद भी पहला पति इतना सब कुछ जुगाड़ नहीं कर पाता था, पर आलिया खुश थी बहुत खुश क्योंकि तंगी, फटेहाली, या भुखमरी में भी कभी उसके पहले पति ने उससे ऊंची आवाज़ में बात नहीं की। न वह कभी दारू पीता ना ही जुआ खेलता।  काम से सीधा घर आता, रूखी-सूखी खाता और आलिया को बगल में दबाकर सो जाता।

एक दिन आलिया के पूछने पर,  "बता न क्या काम करता है" अशरफ ने पूछा था "कोई कमी है क्या? ....  तुझे और कुछ चाहिए तो बता। मेरे काम से तुझे क्या लेना?" फिर उसने आलिया को आँख मारी और शरारत पर उतर आया। 

आलिया के लिए अशरफ का प्यार ही सब कुछ था। उसके काम से उसे क्या लेना-देना। फिर आज यह क्या हो गया।

आलिया समझ नहीं पा रही थी कि यह खबर उसे इतना क्यों दहला गई कि तीन लफ्जों की गाली दाग कर ना जाने कहाँ चला गया अशरफ।

अड़ोस-पड़ोस वाले कहते,

"बड़ा लालची निकला, धन का लोभी !! बीबी पर पैसे तो इस तरह लुटाता था जैसे लॉटरी लगी हो।"

कोई दूसरा तर्क प्रस्तुत करता,

"लॉटरी ही तो लगी थी। 15 लाख की रकम अचानक से मिलने की खबर किसी लॉटरी से कम है क्या ?"

पड़ोसियों की बात पर आलिया को कभी भी विश्वास न हुआ। वह जानती है, उसका खुदा जानता है कि दोनों मियाँ-बीबी एक दूसरे को मन की गहराइयों से चाहते थे। क्या प्यार का धागा इतना कच्चा था कि हल्का सा झटका भी न सह सका। छोटे-छोटे मासूम भोले बच्चों का ही ख्याल किया होता।  बच्चों से तो अशरफ को ऐसा प्यार था कि कभी-कभी उसे भी जलन होती। उसके अपने बच्चे हैं या कासिम (आलिया का पहला शौहर) का, उसने कभी फरक न किया, भेद भाव न किया।

जो नियति है, उसे टाला नहीं जा सकता। जितना भोगना लिखा है, उतना भोगना ही पड़ता है। कोई सवाल-ज़वाब काम नहीं आते। एक बार फिर से दुःख की अंधियारी,  आलिया के जीवन को ढकने लगी। अशरफ ने उसे सीपी में मोती की तरह बाहरी दुनिया से सहेज कर रखा था। अब ना ही सीप की सुरक्षा थी ना ही गर्माहट। आलिया बिखर गई। 

यथार्थ के थपेड़ों ने उसकी डगमगाती नैया को डुबाने में कोई कसर न छोड़ी। जल्दी ही उसे पता चलने लगा कि अशरफ ने किस किस से उधार लिया है। तगादा करने वालों का सिलसिला हर दिन बढ़ने लगा।

घर का सामान बिकने की नौबत आ गई।

हालात के थपेड़ों ने आलिया को मरणासन्न छोड़ने में कोई कसर न छोड़ी थी कि आलिया तक खबर पहुंची कि उसे थाने बुलाया गया है, कुछ शिनाख्त करनी है। थाने का नाम सुनकर आलिया के हाथ-पैर फूल गए। बुरे-बुरे ख्याल दिल में आने लगे। उसके परिवार में आजतक किसी ने थाने का मुँह न देखा था। रात को गहरी नींद के बावज़ूद वह बच्चों को टटोलती रहती और यदि कोई पानी पीने या पिशाब करने भी जाता तो उसका कलेजा धक से कराह उठता।  जब तक बच्चे वापस आकर उससे लिपट कर सो नहीं जाते उसे चैन न पडता। ऐसे में थाने से पहुंची खबर उसके लिए वज्रपात से कम न थी। पहले कासिम फिर अशरफ दो-दो शौहर का दुःख झेल रही आलिया को एक और नए दुःख की आहट भी दहलाने के लिए काफी थी।

सहमी, डरी हुई आलिया थाने पहुँची तो सफ़ेद कपड़ा हटाकर जिसका मुँह उसे दिखाया गया वह अशरफ ही था। हो चुकी शिनाख्त। इसीलिए तो उसे बुलाया गया था। अब वह जा सकती है, आगे की कार्यवाही होती रहेगी, उसे खबर मिलती रहेगी। लेकिन आलिया तो कटे पेड़ की तरह वहीं धम से गिर पड़ी। एक बार फिर उसके गाल पर बेवा नाम का तमाचा पड़ा था। इस बार भी एक्सीडेंट या खुदा........

आलिया को जब होश आया तो वह अपने घर के बिस्तर पर पड़ी थी और उसके बच्चे उससे लिपटे रो-रोकर उसे उठाने की कोशिश में लगे थे। उसे बस एक ही दुःख साल रहा था कि घर छोड़ने के पहले अशरफ ने  तलाक,तलाक,तलाक क्यों कहा? अपने आगोश में ना सही अपने नाम के साथ ही जी लेने देता उसे। क्या कसूर था उसका?

उसका कसूर बस यही था कि उसके निःश्छल प्रेम के प्रतिदान में अशरफ ने उससे बेपनाह मोहब्बत की थी। हां जब उसने निकाह किया था तब 10 लाख का लालच उसके मन में ज़रूर आया था।  निकाह के बाद उधार पर उधार लेकर सुख-सुविधाएं मुहैया कराते - कराते वह आलिया के मोह जाल में इस कदर फँसता चला गया कि आलिया के दुःख या अभाव का विचार भी उसे दहला देता। शायद इसीलिए जब यह खबर मिली कि उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिलेगा तो उसने एक योजना बनाई जिससे उसकी जान-जिंदगी, भले ही चली जाए पर उसकी जान-आलिया, जीवन भर के लिए क़र्ज़-मुक्त हो जायेगी और उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।

अशरफ ने अपने जीवन का भारी बीमा करवाया हुआ था और प्रावधान किया था कि किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक मौत आने पर बीमे की सम्पूर्ण राशि आलिया को मिलेगी।

तेज़ रफ़्तार से आती ट्रक से अशरफ का एक्सीडेंट मात्र बहाना बना,  बीमे की भारी राशि आलिया को दिलवाने का। वास्तव में अशरफ खुद ही ट्रक की चपेट में आया था। तलाक देने के पीछे भी उसकी मंशा आलिया का सुख ही थी। एक बार बंधन-मुक्त होने के बाद आलिया चाहे तो फिर से किसी के साथ निकाह कर ले और इस बार वह फक्कड़ भी नहीं होगी, अशरफ के जीवन बीमा की भारी राशि आलिया के पास होगी।

पर क्या आलिया को मंज़ूर होगा, शायद कभी नहीं। स्त्री को समझा ही कौन है ?

                                                  *************************************


सुधा गोयल " नवीन"


3533 सतमला विजया हेरिटेज फेस - 7

कदमा ,  जमशेदपुर  - 831005


इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से मास्टर्स (हिंदी )

'और बादल छंट गए " एवं "चूड़ी वाले हाथ" कहानी संग्रह प्रकाशित

आकाशवाणी से नियमित प्रसारण एवं कई पुरस्कारों से सम्मानित ...

झारखंड की चर्चित, एवं जमशेदपुर एंथम की लेखिका

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रचनाकार: कहानी // मुआवज़ा // सुधा गोयल " नवीन"
कहानी // मुआवज़ा // सुधा गोयल " नवीन"
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