अम्बरीश त्रिपाठी की कविताएँ

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

कविताएँ
अम्बरीश त्रिपाठी


1.  दामिनी 
कल्पना तो यह थी कि तितली सम मैं उड़ सकूंगी
रंगहीन जीवन में सुमन सम रंग भरूँगी
निशा के अन्धकार को सूर्यमय मैं कर दूँगी
मध्याह्न के सूर्यताप को चन्द्रशील कर दूँगी
कल्पना की उड़ान से मैं आसमान छू लूँगी
गिरिराज सम उंचाई का स्वप्न पूर्ण कर लूंगी
रत्नाकर सम गहराई का स्वप्न पूर्ण कर लूंगी

किन्तु मेरे स्वप्न को कुछ राक्षसों ने तोड़ दिया
कल्पना के पंखों को काली की भाँति नोच लिया
निशा के अन्धकार में निशाचरों को छोड़कर
मुझसे मेरे प्राण तक को हर लिया

अब मैं नहीं हूँ और तुमसे ये पूंछती हूँ
क्या मेरी कल्पना उनका दिया वरदान थी ?
या मेरी ज़िन्दगी उनका कोई सामान थी?

यदि ऐसा नहीं है तो चुप अब क्यों बैठे हो ?
मेरे दिल की आग को हृदय  में समेटे हो
उठो बढ़ो और काट दो उन राक्षसों के हाथों को
नोचना जो चाह रहे दामिनी के दामन को

2. किस्मत
ऐ किस्मत मुझे यूँ सताती है तू
गिराकर गले से लगाती है तू

संभालता था गिरकर तेरे साथ मैं
अब ठोकरों से भी ज्यादा सताती है तू

तेरी मयकशी निगाहों की कसम है
इशारे नहीं समझ पाती है तू

ये बारिश भी अच्छी न लगती मुझे अब
जो बाहों में मेरे न होती है तू

मैं जाता जहाँ नज़र आती है तू
बिछड़कर क्यों मुझको सताती है तू

जो किये थे वादे तूने कभी
उन्हें तोड़ मुझको रुलाती है क्यों

3. फितरत-ए-शायर
ये मौसम सुहाना है बदल जाएगा
पर फितरत-ए-शायर बदलती नहीं

कभी दिखा था चाँद छत से मेरी
चाँदनी है कि वैसी खिलती नहीं

है नवाज़िश तेरी तूने अपना कहा
रातें तनहा मेरी वरना होती नहीं

यूँ तो ख्वाहिशें बहुत हैं दिल में मेरे
पर तेरी सूरत है की आँखों से हटती नहीं

प्यार करता था तुझसे यूँ ही करता रहूँगा
जब तलक की ये साँसें थमती नहीं

4. प्रेम
मानवता का अध्याय है प्रेम |
ईश्वर का पर्याय है प्रेम |
कृष्ण का अधिकार है प्रेम |
राधा को स्वीकार है प्रेम |
चंदा की शीतलता है प्रेम |
चकोर की स्थिरता है प्रेम |
प्रेम कविता का अलंकार है |
     शायर का संसार है |
     दिलरुबा का दीदार है |
     आशिकी का त्यौहार है |
इसीलिये केहता हूँ प्रेम बिन जीना बेकार है|
परंतु क्या यही प्रेम है? मैं प्रेम के कुछ अन्य प्रकार भी बताता हूँ |
माता की ममता में भी प्रेम है |
पिता की डांट में भी प्रेम है |
मात्रभूमि का मान भी प्रेम है |
देश का सम्मान भी प्रेम है |
मीरा की भक्ति भी प्रेम है |
गुरुभक्त कर्ण की सहनशक्ति भी प्रेम है |
प्रेम पुत्र के लिये माता-पिता को सम्मान है |
    वीर के लिये देश को बलिदान है |
    भक्त के लिये ईश्वर का ध्यान है |
    शिष्य के लिये गुरुवर को सम्मान है |

इस सम्पूर्ण प्रेम को जान लेना ही ज्ञान है |

5.  तमन्ना
घने कोहरे की चादर हटाने निकला हूँ
आज फिर से आसमां देखने की तमन्ना है

बहुत रोज़ बाद नींद से जाएगा हूँ
आज फिर से सपने देखने की तमन्ना है

थक गया हूँ वक़्त के आईने में खुद को बूढ़ा होते देख
आज फिर से बच्चा बन जाने की तमन्ना है |

6.  इंतज़ार
अब तो बस कल की सुबह का इंतज़ार है
इनकार है या इक़रार है ये सब इस दीवार के पार है

दिल्लगी होगी या दिल के टुकड़े हज़ार होंगे
इसका फैसला वो बड़ी फुरसत में करते होंगे

रात दोनों की तनहा ही रही होगी
प्यास न सही पर आस तो ज़रूर बंधी होगी

मानकर तकिये को अपना पूछा कई बार
पर उसकी भी राय है करूँ कल का इंतज़ार

7.  आँखें
तुम्हारी झील सी आँखें हमें इतना सताती हैं ,
हमारी जान लेती हैं कि जब ये मुस्कुराती हैं ।

इनकी ओर जो देखा तो मैं खींचा चला आया ,
जन्नत-ए-इश्क़ की चाहत में मैं दोज़ख़ को भुला आया ।

उन मासूम नज़रों से जो आँखें चार कर पाया,
न अपनी सुध रही मुझको न कुछ भी याद तब आया ।

इनकी मय को मै पीकर था जान ये पाया,
था मयखाने का जो प्यासा ,मधुशाला से नह आया ।

इन्हें देखे बिना अब तो न मुझको नींद आती है,
और जब देख लूँ इनको तो दुनिया थम सी जाती है ।

हमारा कल भी इनसे था हमारा आज भी इनसे,
नशा सा छा गया हम पर ये आँखें देख ली जबसे ।

8.  बसा लूँ इस कदर तेरी यादों को ज़हन में...
तेरी इजाज़त हो तो तेरी आँखों में खो जाऊँ
सीप में बारिश सा गिरूँ और मोती बन जाऊँ

मायूसी गुजरने ना दूं तेरे गलियारे से
तेरे रास्ते के काँटों पर बहारें बन जाऊँ

बसा लूँ इस कदर तेरी यादों को ज़हन में
कि तुझे याद ना करूँ तो साँसें भूल जाऊँ

9.  तूने छोड़ा जिस दिन से साथ मेरा....
शमा की आग में जल जाना नसीब होता है
आफताब तक तो पहुच पाना भी मुश्किल होता है।

बड़ा खुशनसीब है वो जो तुझे पा गया
हमें तो तेरी याद में आहें भर पाना ही मुकम्मल होता है।

लोग कहते हैं की हमेशा याद रखूं तुझे
हमें तो तेरी यादों के सिवा कुछ याद रखना भी मुश्किल होता है ।

तू कहती थी की खुदा पर ऐतबार करूँ
मै कैसे समझाऊं मुझे तुझमे ही रब दिखता है

तूने छोड़ा जिस दिन से साथ मेरा
उस दिन से खुदा भी पराया सा दिखता है।

10.  क्या यही हैं वो जो हमें प्यार करते हैं ?
नवाज़िशों का यूँ आगाज़ करतें हैं
हमारे आब-ए-चश्मों को नज़रअंदाज़ करतें हैं

मगरूर, चालबाज़, धोखेबाज़ कहते हैं
गिला फिर भी उन्हें कि हम नाराज़ रहते हैं

बदलना चाहते हैं हमको ये वो हर बार कहते हैं
क्या यही हैं वो जो हमें प्यार करते हैं ?

11. शायद
बे इम्तियाज़ी है मेरी जो खफा हूँ तुमसे
या शायद मोहब्बत-ए-इब्तिला सह नहीं सकता

तुमसे दूर होकर के बेचैन हूँ
या शायद खुद को दूर करके रह नहीं सकता
--

Ambrish Tripathi

e mail: ambrishtripathi14@gmail.com

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "अम्बरीश त्रिपाठी की कविताएँ"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.