ज्योति शर्मा की लघुकथाएँ

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10 लघुकथाएँ
ज्योति शर्मा

1

##"गमले की मिट्टी"##


विनीता रसोई में रोटियां बना रही थी।
सास और ससुर डायनिंग हॉल में खाना खा रहे थे।
रोटी परोसने जब वो एक हाथ से साड़ी का पल्लू पकड़ दूसरे हाथ से रोटी की प्लेट थामें आई और जैसे ही उसने दूसरा हाथ रोटी रखने के लिए आगे बढ़ाया पल्लू सिर से गिर गया तो खाना खाती सुनीता ने भवें टेढ़ी करके जैसे ही उसे घूरा अचकचा कर उसने फिर से पल्लू को उठा कर जल्दी से अपने सिर पर रख लिया और सहमी हुई सी चलने लगी तो श्रीकांत जी ने उससे कहा।
'कोई बात नहीं बेटी । वैसे भी शर्म आंखों में होती है पल्लू से नहीं। हमारा हो गया अब तुम भी खाना खा लेना'।
जी पापाजी’

उसके मन में ससुर जी का आदर और बढ़ गया।
रोटी का कौर चबाते हुए श्रीकांत जी ने अपनी धर्मपत्नी सुनीता से कहा।
‘ बहू को साड़ी पहनने में दिक्कत हो तो उसे सूट सलवार पहनने की कह देना तुम। '
और कोई बात समझानी हो तो उसे प्यार से समझाया करो। हम उसे उसका मायका न सही मायके जैसा वातावरण तो दे ही सकते हैं न?'
'हाँ हाँ मैं तो पत्थर की बनी थी। मुझे तो स्नेह की ज़रूरत कभी थी ही नहीं। तब तो तुमने और तुम्हारी माँ ने कभी नहीं सोचा मेरे बारे में। अब जब मैं सास बनी हूँ और बहू की निभाने की बारी आई तो उसे छूट दे दो अभी से। इतना सिर न चढ़ाओ उसे। नहीं तो पढताओगे। कहे देती हूँ। '

तभी नौकर ने आवाज़ दी।
बाबूजी ये लीजिये आपका नया पौधा जो आपने मँगवाया था। माली ने कहा है कि इस छोटे गमले से निकाल कर इसे बड़े दूसरे गमले में लगाना पड़ेगा। पुराना गमला तोड़ कर पुरानी मिट्टी के साथ ही इसे दूसरे नए गमले में रख देना'।
'क्यों भई?अगर पुराने गमले की मिट्टी के बजाय सीधे ही नए गमले की मिट्टी में ही इस पौधे को लगाएं तो?
श्रीकान्त जी ने पूछा।
तो पौधा सूख जाएगा सुनीता जी बीच में ही बोल पड़ीं।
'सब जानती हों फिर भी?'
अपनी पत्नी की आँखों में झांकते हुए वो बोल उठे।
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2.##'ममता की पराकाष्ठा"##


'मारो इसे'।
'जाने किसका बच्चा चुरा लाई है औऱ उसे अपने आँचल में छुपा कर बैठी है। '
'मारो, तभी दूसरी तरफ से आवाज़ आयी 'पहले बच्चे को छीन लो इसकी गोद से। कहीं पत्थर बच्चे को न लग जाये। '
'हाँ ..हाँ... ये भाई साहब सही कह रहे हैं। '
इन आवाज़ों से विनीता भी रुक गयी ये देखने कि आखिर माज़रा क्या है?अकेली ही तो रहती है उसका कौन है? जो उसका घर इंतज़ार करेगा।

पूछने पर किसी ने बताया कि 'एक पागल लड़की है जो कि अनाथ है। यहीं फुटपाथ पर ही रहती है। एक रात सामूहिक बलात्कार का शिकार हो गयी। एक बच्चा पैदा हुआ उसे पर वो भी मरा हुआ बस तभी से 'मेरा मुन्ना, मेरा मुन्ना'कहती हुई दुनिया भर के बच्चों को जबरन गोद में लेकर चूमती है। अभी जाने किसका बच्चा आँचल में लेकर बैठी है। '
तभी विनीता ने पत्थर लिए खड़ी भींड़ को रोक कर कहा 'रुको, मैं देखती हूँ पहले, आप सब पीछे जाओ। '
वो बड़ी मगन होकर 'मेरा मुन्ना, मेरा मुन्ना' कहकर अपना दूध पिला रही थी। विनीता ने धीरे से उसका आँचल उठा कर देखा तो बिल्ली का छोटा सा बच्चा था उसके पैर में कपड़े की एक चीर बँधी हुई थी।
तभी एक बच्चा चिल्लाया 'अरे बिल्ली का ये बच्चा तो कल एक मोटर साइकिल के नीचे आ गया था इसका पैर भी टूट गया था'।

मन ही मन में वो कह उठी 'ममता की पराकाष्ठा'और अपनी भींगी कोरों को पौंछती हुई उसकी बाँह पकड़ ले चली उसे अपने घर की ओर।
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3.##" अनकहा प्यार"##


'सुनो। '
'हाँ। '
'मत जाओ ना अभी। '
'क्यों?'
'अरे क्यों क्या?क्या करोगी वहाँ जाकर?मन तो लगेगा नहीं तुम्हारा?'
'क्यों नहीं लगेगा?वहाँ मेरे मम्मी पापा हैं उनसे साल में दो ही बार तो मिल पाती हूँ सिर्फ। '
'अच्छा मिलना ही है तो तीन चार दिन में लौट आना फिर'।
'नहीं, कम से कम पन्द्रह दिन। '
'देखो, अभी तो ट्रेन में रिजर्वेशन ही नहीं मिल रहा और फिर तेईस तारीख से गुर्जर आंदोलन शुरू होने वाला है तो उसमें सारी ट्रैन्स ही ठप्प हो जाएंगी तो तुम्हें बाईस को ही आना पड़ेगा। '
'अच्छा जी, रिजर्वेशन नहीं मिल रहा ज़रा देखूं तो अपने फ़ोन में मैं?'
'नहीं, जिस ट्रैन से तुम जाती हो उसमें नहीं है। '

'देखो, मैं नहीं रुकने वाली तुम चाहे कितनी भी कोशिश कर लो। और पूरे पंद्रह दिन रहूंगी। और रही रिजर्वेशन की बात तो वो अब मैंने खुद ने करवा लिया है अभी एक घण्टे बाद ही निकल रही हूं। पैकिंग भी कर ली है। बाईस तक पूरे सोलह दिन हैं'। विक्रम को चिढ़ाते हुए साँची बोली।
पर मन ही मन में कहा 'बुद्धू, मुझे तुम्हारी याद आती है। मत जाओ ये कहते तो रुक भी जाती। अब बच्चू इतने दिन दूर रहूंगी तो कहना ही पड़ेगा तुम्हें। '
'अरे यार! ऐसे कैसे चली जाओगी तुम?'
'क्यों? नहीं रह सकते मेरे बिना, याद आएगी तुम्हें?'
नहीं ये मैंने कब कहा।

'ये तो अब जाए ही मानेगी। फिर क्यों फजीहत करवाऊं अपनी?पर जो भी हो, कहेगी ये ही कि 'तुम्हारे बिना नहीं रह जाता। आ जाऊँ लौट कर?'मैं पहले नहीं कहूँगा। '
ये सोच कर रंग बदलते हुए विक्रम बोला।
'वैसे जाओ यार तुम तो। अच्छा है मेरे लिए तो। खूब एन्जॉय करूँगा। अब रात-रात भर क्रिकेट देखूंगा और मुझे रोकने वाला कोई नहीं होगा। चलो छोड़ आता हूँ तुम्हें'।
विक्रम ने दिखावटी मुस्कुराहट लिए साँची को और चिढ़ाया। और उसकी ये मुस्कुराहट देख सच में जल-भुन गयी वो।
'हाँ तो मुझे भी कौनसा तुम्हारे पास रहना है?हरदम लड़ते ही तो रहते हो। मैं भी खुश रहूंगी वहाँ। कम से कम कुछ दिन सुकून से तो निकलेंगे मेरे। '
बातों ही बातों में स्टेशन भी आ गया।

' लो , आ गयी अब तुम्हारी ट्रैन भी, जाओ।
'बाय, अपना ध्यान रखना'।
'तुम भी'।
चलते वक़्त दोनों की ही आंखों में आँसू थे जिन्हें दोनों ने ही छुपा लिया।
ट्रैन में किसी के मोबाइल में गाना बज रहा था।
"दो दिल मिल रहे हैं मगर चुपके चुपके। "
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4.##“आज की दुर्गा”##

आज शुभि को दिल्ली जाना था एक प्रेजेंटेशन के लिए। स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते हुए उसकी नज़र आस पास पड़ीं। हद से ज्यादा भींड़ थी वहाँ। स्टूडेंट्स ही थे ज्यादातर। पैर रखने तक को जगह नहीं थी। शुक्र है उसने रिजर्वेशन करवा लिया था । और वैसे भी कॉलेज की प्रेजिडेंट और ब्लैक बेल्ट चैंपियन होने से उसमें आत्मविश्वास भी गज़ब का था। फिर उसे किसका डर?ये सब सोचते हुए उसने खुद को दिलासा दिया। पास ही में करीब उन्नीस बीस ग्रामीण लड़कियों का एक ग्रुप था। जो कि स्टेशन पर ज़मीन पर ही बैठीं हुईं थीं। उन्हें देख उसने मुँह बिचकाया’हुंह गंदे गंवार लोग’। उनमें से कुछ किताब खोले पढ़ भी रहीं थीं। उनकी बातों को सुनकर लगा कल पुलिस कांस्टेबल का एग्जाम है। जिसे वो भी देने जा रहीं हैं। 'उफ़्फ़ तभी इतनी भींड़ है आज'। उसने सोचा।
तभी सीटी बजाती हुई ट्रेन भी आ गयी। आश्चर्य से आंखें फैल गयीं उसकी। पूरी ट्रेन पर, खिड़कियों पर यहाँ तक कि छत पर भी ढ़ेर सारे लड़के ही लड़के बैठे हुए हैं। तिल भर भी जगह नहीं। एक बार वो डरी, थोड़ा सहमी पर फिर उसके अंदर की ब्लैक बेल्ट चैंपियन बोल उठी ‘अरे!तू ही डरेगी तो इनके जैसी गंवार, कमज़ोर लड़कियाँ क्या करेंगी भला?कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तेरा, चल चढ़ जा। ‘

धक्का मुक्की करके वो चढ़ने लगी उसके थर्ड ए.सी. डब्बे में बगल में ही जनरल लेडीज कोच था । जिसमें वो ग्रुप भी चढ़ रहा था। तो एक बार फिर से मुँह बिचका दिया उसने घृणा से। अपने डिब्बे में गयी तो देखा ऊपर-नीचे सब जगह लोगों ने डेरा जमा रखा था। उसने उन्हें हटने को कहा तो बोले’ मैडम जी आज कोई रिजर्वेशन न है कोई कौ। आज तौ बस हमारौ ही राज़ रहैगो यहाँ। ‘

हालांकि उसे बैठने की जगह तो दे दी पर उस डब्बे में वो अकेली ही लड़की थी। बाकि सब आवारा, गंवार से दिखने वाले लड़के ही कब्ज़ा करके बैठे थे। ट्रेन चल पड़ी रात के आठ बजे थे। कॉलेज में उसने इतने आवारा मजनुओं को ठोका है। पर यहां तो पूरा डब्बा ही आवारा मजनुओं से भरा पड़ा है। वो उस पर फब्तियां कसने लगे। अंधेरा बढ़ते ही कुछ तो उससे सट कर बैठ गए और जैसे ही उनमें से एक ने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाया उसने उसे कस कर उसे एक जोरदार लाफा मार दिया। इससे वो सारे तैश में आ गए और उसे पकड़ लिया और उनमें से एक लड़का बोला’ ले अब हम तुझे सिर्फ छुएंगे ही नहीं तेरे साथ….ऐसा कहकर दूसरे लड़के की तरफ आँख दबाते हुए बेशर्मी से ठहाके मार कर हंसने लगा’ ‘ले अब बुला ले किसी को खुद की इज़्ज़त बचने के लिए’जैसे ही उसने उसके टॉप की तरफ हाथ बढ़ाया। एक लात उसके मुँह पर लगी और दो दाँत टूट कर बाहर आ गिरे उसके। शुभि ने भौचक्की होकर सामने देखा तो सामने उन्हीं लड़कियों का ग्रुप खड़ा था। उनमें से कुछ ने उन लड़कों को हॉकी से ठोकना शुरू किया। धड़ाधड़ हाथ और लातें चल रहीं थीं उनकी। चोट खाये नाग की तरह जब सारे लड़के एक साथ उनकी ओर बढ़ने लगे तो हाथ में उन लड़कियों ने बड़े बड़े चाकू निकाल लिए और बोलीं’बेटाऔ, वहीं रुक जाओ, नहीं तो एक एक की गर्दन अभी नीचे पड़ी होगी।

चलो मैडम हमारे साथ। इस दुनियां में जब रावण ही रावण भरे पड़े हों तो हमें खुद ही दुर्गा बणना पडेगो कोई राम न आवेगों हमें यहां बचावे।
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5.##"डार्विन का सिद्धान्त"##


फ़ूट फ़ूट कर रोते रोते हुए अचानक वो उठी और आंखों से आंसू पौंछ, कुछ दृढ़ निश्चय कर अलमारी से साड़ी निकाली और फंदा गले में डाल लिया।

अब तक का सारा जीवन चलचित्र के सदृश उसके जहन में घूमने लगा।
पढ़ाई लिखाई में बचपन से ही तेज़ थी वो। उसके पिता कस्बे से बाहर शहर कॉलेज जाकर पढ़ने के विरोधी थे इसलिए घर पर रहकर दूरस्थ शिक्षा से उसने परास्नातक तक पढ़ाई की वो भी गोल्ड मेडल के साथ। पर उसमें आत्मविश्वास की कमीं थी वो कुछ अंतर्मुखी, अपने में ही सिमटी और सहमी हुई सी रहती थी। किसी बाहरी व्यक्ति से बात करने में भी बहुत झिझकती थी वो। क्योंकि बचपन से ही उसने घर में पिता का कठोर अनुशासन और हमेशा माँ को उनके सामने नतमस्तक होते हुए देखा है। छोटे भाई से भी जब कभी उसकी लड़ाई होती तो माँ सिर्फ उसे ही चुप रहने को कहती और यही समझाती रहती कि बेटी लड़कियों और औरतों को तेज बोलना, ज्यादा ज़ोर से हँसना, बहस करना इन सबसे बचना चाहिए तभी घर इन सुख शांति रह सकती है। '

तो बस इन्हीं बातों को दिल में सहेजे वो ससुराल चली आयी। यहाँ पर भी सारे दिन काम में खटते रहना पर उसे बदले में पति, सास और ससुर और ननद के ताने और दुत्कार ही मिलतीं। माँ बाबा से कुछ कहती तो कहते 'बेटी तुम्हारा घर अब वही है। हर हाल में तुम्हें वहीं रहना है। थोड़ी और सहनशीलता रखो सब ठीक हो जाएगा। '
ऐसे ही दो बरस बीत गए अब तो बच्चा न होने के ताने भी उसे दिए जाने लगे। अभी कुछ देर पहले भी खाने में कमीं बताकर उसे जली कटी सुनाकर उसके माँ बाप को कोसा गया तो दौड़ कर वो कमरे में चली आयी।
"अब और कोई रास्ता नहीं बचा अब बर्दाश्त नहीं होता माँ"

पत्र लिख टेबल पर छोड़ दिया।
और स्टूल नीचे से वो हटाने ही वाली थी कि तभी उसकी साइंस टीचर का मुस्कुराता चेहरा उसके दिमाग में कौंध गया और उनका पढ़ाया पाठ डार्विन का सिद्धांत 'survival of fittest (योग्यतम की उत्तरजीविता) भी घूमने लगा।
तभी अचानक एक झटके से उसने फंदा गले से निकाला और 100 न. मोबाइल से डायल कर दिया।
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6.##निगाहें##


'माँ माँ'। तेज़ी से दौड़ती हुई शीना रोती बिलखती घर में घुसी। आंसुओं से भरीं आँखें एकदम लाल और पलकें सूज गयीं थीं। बिखरे बाल, जगह जगह से फटे हुए कपड़े।
उसकी ये हालात देख हक्की बक्की रह गयी सविता। और बदहवास सी उसे हिला कर पूछने लगी। क.. क... क... क्या हुआ शी... शी...शीनू
'वो आफिस में बॉस ने।
'क्या किया बॉस ने?'
उसे झिंझोड़ कर सविता ने पूछा।

'मेरे साथ....मेरे साथ....जबरदस्ती करने की कोशिश की। '
क्या?सर पर हाथ रख धम्म से जमीन पर बैठ गयी सविता...पलकों के किनोरों से अश्रुधार बह निकली।
पर......पर....पर...माँ..... मैं उसके सिर पर फूलदान मार कर भाग निकली। '
ये सुन कुछ राहत की सांस ली सविता ने पर एक गम्भीर चिंता से घिर उठी और बोली 'तू चल पहले पुलिस रिपोर्ट करवा कर आते हैं। '

अपने और शीना के आँसू पोंछ और उसे एक दुप्पटे से ढँक कर अपने साथ ले सविता जब बाहर निकली तो पूरी सोसाइटी के लोग जमा होकर उसके बारे में खुसुर पुसुर करने लगे।
'इसका तो चाल-चलन शुरू से ही अच्छा नहीं था।

छोटी छोटी स्कर्ट पहन कर इस तरह आमंत्रण देती हुई बाहर निकलेगी तो यही होगा न?..
ये बोलने वाली महिला की तरफ मुखातिब होते हुए सविता बोली"क्यों मिसेज सिन्हा सुना है पिछले साल आपके घर एक बदमाश घुस आया और आपके साथ छेड़छाड़ करने लगा तो क्या आपने भी उसे आमंत्रण ही दिया था ?
बाहर निकलती हमारी इन बेटियों के उभारों पर.....यहाँ वहां से झांकते उनके शरीर पर, गंदी निगाहें तो आप लोग डालो...उन्हें हॉट, सेक्सी, माल और जाने क्या क्या कहो। ...मौका मिलने पर उन्हें नोंच डालो।
पर दोषी कौन?

हमारी बेटियाँ और उनके कपड़े?
अरे इससे अच्छा तो वो आदिवासी समाज है जिसमें नग्न रहने के बावजूद महिलाओं का बलात्कार नहीं होता बल्कि बेटियों के जन्म की खुशी मनायी जाती है। "
ये सब सुन वो सब अनगिनत निगाहें जो शीना को बेध रहीं थी अब एक एक करके ज़मीन पर झुकने लगीं।
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7.

##"मुल्लमा आधुनिकता का"##


गाँव से शहर में पहला पोस्टिंग था सोमेश का। तो ले आया अपनी अर्धांगिनी को भी यहां साथ ही में। पुश्तों के बाद कोई सरकारी नौकरी लगा गाँव में से। शादी भी की तो गाँव की गोरी से जिससे वो ज्यादा उड़े नहीं। क्योंकि शहर की लड़कियाँ तो वहाँ पढ़ने के दौरान देख लीं थीं उसने। पूरी परकटियाँ, पतन छुरियाँ थीं जो उसकी बाबूगिरी की तनख्वाह को एक ही दिन के अपने फ़ैशन में ही उड़ा देतीं।

अब उसके नौकरीं पर जाने के बाद रीना अकेली घर में बोर न हो जाये इसलिए डिश कनेक्शन लगवा दिया tv में। भोली भाली रीना जिसने जिंदगी में tv की शक्ल भी नहीं देखी थी अब सारा सारा दिन उससे चिपके रहती थी।
एक दिन दोपहर का समय था बिस्तर पर बैठी रीना फ़िल्मी गाने देख रही थी....बड़ा ही प्यारा दृश्य था अक्षय कुमार अपनी पत्नी को साईकल पर घुमाते हुए गा रहा था 'तेरे माथे के कुमकुम को मैं तिलक लगा कर घूमूंगा'।
ये देख रीना सोच उठी हाय काश हमार सोमेश जी भी एतना ही रोमांटिक होते?तो का बात थी'।
चैनल बदला तो गाना आ रहा था "दिल दियाँ गल्ला" जिसमें नायक नायिका को शादी की वर्षगांठ के दिन बहुत सारे सरप्राइज देकर खुश करता है। मन ही तो है बेचारा अटक गया औऱ एक हाथ अपनी ठुड्डी पर धरे उड़ने लगी कल्पनाओं के बादलों में अपने सोमेश जी के संग।

तभी दरवाज़ा बजा ....तो तन्द्रा से जागी.. "अरे सोमेश जी आप...आ गए...ये लीजिये पानी"।
'हाँ लाओ'।
सुनिए आप भी हमें हमारी बियाह की बर्षगाँठ पर ऐसे ही वो दिया कीजिये न?वो का होत है?
'सरप्राइज ?'
'हाँ जी, हाँ जी, बस वही'।
'ये बोल साड़ी का पल्लू दाँतों में खोंस धीरे से शर्मा के मुस्कुरा दी रीना'।
फिर तुरन्त ही भौंहें तान कर बोली
'और सुनिये अब से हम ये साड़ी वाड़ी नहीं पहनेंगे हां, हमार लिए भी ऊ तंग पेंट और टाप लाईएगा आप, नहीं तो हम कल से खाना नहीं बनाएंगे ई घर मा, कान खोल सुन लीजिएगा आप'।
'हाँ , हाँ क्यों नहीं, ला दूँगा मेरी प्यारी। '
सर खुजाते हुए सोमेश बोला।

'अब खाना लाओगी या फिर फरमाइशों से ही पेट भर दोगी हमारा?'
'हाँ हाँ जी, अभई लाते हैं, जस्ट टू मिनट्स वेट'।
हैं?आंखें फाड़ फाड़ कर सोमेश अपनी दसवीं फैल बीवी पर अंग्रेजी का मुल्लमा चढ़ते देख रहा था।
जाते जाते बोली
'और सुनिये ऊ छोटी सी फ्रॉक भी लाईएगा, बहुत जंचेगी हम पर, आप चकरा न गए ना तो नाम बदल दीजियेगा हमारा'।
'अरी हाँ, मेरी माँ, सब ले जाएंगे तुम्हार लिए, बिकिनी भी'।

'जी ई का होत है?'
'कछु न, तुम जाओ और खाना ले आओ यार, हमरा माथा भन्ना रहा है अब, पेट में चूहे दौड़ लगा रहे हैं सो अलग'।
रीना के रसोई में जाते ही डिश कनेक्शन वाले को फ़ोन लगाया
"हाँ जी, नज़ीर जी वो क्या है ना, कि हमें हमारा डिश कनेक्शन कटवाना है, कब, अजी आज ही आ जाइये आप तो, क्यों अमा यार अब आपको इससे क्या लेना देना?गुस्से में भर कर फोन काट दिया और बोला।
'साला अब न रहेगा बांस और न बजेगी हमारी ई बाँसुरिया'।
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8.

##"असली दहेज़"##


"कहाँ जा रही ऐ टिंपू की अम्मा"।
"यहीं पास ही में काकी। आज नई बहू कूँ ज़रा सौ मंदिर घुमा लाऊँ, सगरे दिन घर मा बैठी बोर हुआ करै बिचारी"।
"लेऔ फिर हमारे घर तौ आओ, तनिक बैठो, चाय वाय पीओ फिर चली जाइयों मंदिर।
आजा री बहुरिया।
बहुत ही सुंदर है ई तौ,
कितनों थरा लाई ?"
'कछु ना लियौ काकी'।

'कछु ना लियौ, या मिलौ न कछु?व्यंग्य मिश्रित मुस्कान से नई बहू की ओर देखते हुए फूलवती काकी बोली।
हाँ....जाणू ...छोरा तौ छोटी मोटी नौकरी करे है तेरो, बाको बियाह है गयो ई बहुत है। '
'अरी काकी अब तुम्हारे जितने भाग्यवान, सब थोड़े ही होवें हैं? जिन्हें करोड़ों कौ थरा बियाह में मिल जावे।
ये बोलते हुए बहू की ओर तीखी दृष्टि डालती हुई।
खिसिया कर रह गयी सुगना। तभी अंदर से आवाज़ आयी।

'माँ जी, ये झुमकी कहाँ मर गई?चाय नहीं लाई अभी तक मेरे लिए वो'।
'अरी बहुरिया आज ऊ छुट्टी पर है'।
तो आप बना दो मेरे लिए एक कप चाय, अगर दोपहर की चाय न मिले तो आँख ही नहीं खुलती ढंग से मेरी तो।
काकी उनकी ओर देखते हुए खिसिया कर उठने लगी। तो उसके कंधे पर सुगना चाची की बहू ने हाथ रखते हुए बड़े ही विनम्र स्वर में कहा

"काकी जी आप रहने दीजिए, आप सबके लिए आज चाय मैं बनाती हूं"।
अब काकी असली दहेज़ को रसोई में जाते नम आंखों से देख रही थी।
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9.

##" टूटते दायरे"##


घर आकर बिस्तर पर ज़ोर से आ पड़ी वो, डूब गई आँसुओं में। .....हिलकियाँ भर भर कर रोने लगी। ....
उसने कब सोचा था कि वो भी किसी के लिए जिंदगी बन जाएगी। ऐसा प्यार तो बस फिल्मों में ही देखा था उसने। विवाह किया फिर प्रेम भी किया पर जो उसके लिए प्रेम था उसके पति नागेश के लिए मात्र स्वार्थपूर्ति के लिए किया गया एक समझौता मात्र था। उसकी खुशी की कोई कीमत ही नहीं थी उस घर में।
वो बस सर पर पल्लू ओढ़े, हर गलत सही बात मानने वाली कठपुतली मात्र थी।

उसे क्या पहनना है क्या नहीं, क्या खरीदना है, कहाँ जाना है कहाँ नहीं, सब वो लोग ही तय करते थे। और नागेश भी हमेशा ही उनकी ही हाँ में हाँ मिलाता था। छोटी छोटी बात पर हाथ उठाना उसकी आदत बन चुका था। बाबा की दिल की बीमारी की वजह से उनसे भी कहती सब ठीक है यहाँ।

उसकी दिली इच्छा थी जिससे उसकी शादी हो वो उसे सच्चा प्यार करे। ऐसा प्यार जो उसकी रूह को भिगो दें । उसे टूट कर चाहे , जान देने की हद तक। पर रेत की दीवार की तरह धराशायी हो गए उसके सारे सपने।
ऐसे में वो आया हवा के एक झोंके ही तरह। उसके लिए बस वो ही सब कुछ थी। उसने उसके अनुरोध को ठुकरा दिया ये कहकर कि मैं शादी शुदा हूँ और खुश हूं अपनी जिंदगी में। उसने एक बार मिलने को कहा और कहा कि वो उसे प्यार करता है। भले ही वो उसे मिले या न मिले पर वो उसका मरते दम तक इंतजार करेगा।
वो पत्थर बन गयी तब, आंखें भी नहीं मिला पाई उससे क्यों कि उसकी आंखें बह रहीं थीं और उन अश्कों को वो पोंछना चाहती थी अपनी हथेलियों से पर हाथ वहीं रुक गए उसके।

पर वो पिघल रही थी। जी भर कर रोना चाह रही थी। ये पूछना चाह रही थी कि पहले क्यों नहीं मिले तुम मुझे?'..
पर जुबान बोल उठी 'मैं शादी शुदा हूँ इसलिए अब कुछ नहीं हो सकता। '
वो रो रहा था फ़ूट फ़ूट कर....
'जिंदा नहीं रह सकता तुम्हारे बिन मैं। '
पर अपना आँचल छुड़ा आ गयी वो।
और घर आकर खुद भी आँसुओं में डूब गयी।
फिर बहुत देर जी-भर कर रो लेने के बाद। वो उठी , एक हाथ से आँसू पोंछ, दिल में कुछ दृढ़ निश्चय कर उसे फ़ोन लगाया।
और पूछा 'क्या चाहते हो मुझसे?'
'जिंदगी भर साथ रहना'।

शादी करके?
'ऐसी खुशनसीबी कहाँ?
पर तुम्हें तो अविवाहित और मुझसे भी अच्छी लड़की मिल सकती है फिर मैं ही क्यों?
'नहीं जानता, पर सिर्फ तुम ही हो जिसे मैं मरते दम तक हर पल अपने साथ देखना चाहता हूं।
तुम नहीं तो ये जिंदगी नहीं। '
'और जो मैं हमेशा साथ रहूँ तो'। .....
आँसू पोंछ कर शरारत से बोल उठी वो।

'तो.....तो....मैं खुशी से पागल ही हो जाऊंगा। '
'तो हो जाओ फिर'। ...
अब दोनों तरफ खामोशी भारी सिसकियां थीं।
और वक़्त ठहरा हुआ था फ़ोन पर।
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10.

##"विडम्बना"##


एक सुहानी शाम रमा अपने पति सुरेश और बच्चों के साथ घूमने निकली। सोचा बहुत गर्मी है पैदल जाकर गन्ने का जूस पी लें तो गला तर हो जाये। साथ के साथ ही शाम की वाक भी हो जाएगी। घर से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित चौपाटी बाजार पर सब पहुँच गए। बड़ी चहल पहल थी। मेला सा लगा था दुकानों का । उन पर स्थित भीड़ अपनी ही मस्ती में मस्त थी। सड़क के दोनों किनारों पर फुटपाथ पर बहुत सी गन्ने के जूस की दुकानें लगी थीं। पर एक ख़ास बात ये कि इन सब के सभी दुकानों पर नवयौवनाएँ घाघरा चोली पहने, होठों पर लाली, आंखों में अंजन की लकीर खींचे, मुस्कुराती हुई गन्ने का रस निकाल रही थीं। जिस युवती के अंग घाघरा चोली में से ज्यादा झाँक रहे थे या सौंदर्य ज्यादा मादक था उसी पर ग्राहकों की ज्यादा भींड़ पड़ रही थी। ये सब देख मन थोड़ा कसैला सा हो आया। तभी दृष्टि कोने की एक ग्राहक विहीन दुकान पर पड़ी जिस पर सोलह सत्तरह वर्ष का एक लड़का माथा पकड़ कर बैठा था। वो सब वहीं जाकर बैठ गए। सुरेश ने कहा 'बेटा चार गिलास बना। '
चहकता हुआ वो बोला 'अभी बनाता हूँ साब'।

उसने फिर पूछ लिया 'तेरी दुकान चलती वलती नहीं है क्या?'
बोला 'साब इन सबके बीच कहाँ चलेगी?'
उदासी भरे स्वर में वो बोला।
तो उसने फिर मज़ाक में बोल दिया 'अरे ! तू कौनसा कम है? इन लड़कियों से। गोरा रंग, भूरी - भूरी आंखें एक बार घाघरा चोली पहन ले तो छुट्टी कर दे इन सबकी। '
अगले ही दिन से उस दुकान पर सबसे ज्यादा भीड़ रहा करती है।
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ज्योति शर्मा
जन्म तिथि : 31 जनवरी 1984
शैक्षणिक योग्यता: BSc, MA, (Hindi, History),BEd , UGC NET
सम्प्रति: प्रधानाचार्य,राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,राजस्थान सरकार
विधा : लघुकथा
प्रकाशन : सफर संवेदनाओं का लघुकथा संकलन में, लघुकथा कलश,सत्य की मशाल  पत्रिकाओं में लघुकथाओं का प्रकाशन।
संपर्क : दादाबाड़ी, कोटा , राजस्थान

ई.मेल: jyotishinjini171108js@gmail.com

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1 टिप्पणी "ज्योति शर्मा की लघुकथाएँ"

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