पुस्तक समीक्षा - अनुभूतियों का सच

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समीक्ष्य कृति- अनुभूतियों का सच

रचनाकार - अरविन्द भट्ट

प्रकाशक - अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद

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कुल 52 कविताओं का संग्रह

प्रथम कविता 'अधिग्रहण 'में एक कृषक जोधना की पीड़ा जिसकी जान से प्यारी जमीन अधिग्रहण की जाती है लेकिन आज की पीढ़ी का उसका पुत्र गोधना मुआबजे,और विकास को लेकर खुश है

वहीं अंतिम कविता शीर्षक कविता है जिसमें "काश मैं ऐसा कुछ लिख पाता

अपनी अनुभूतियों के सच को"

अपने शब्दों में समस्त सृष्टि को बांधना चाहता है कवि का मन।

जीवन की विसंगतियों को बड़ी नज़दीक से देखा है कवि की कलम ने। वर्तमान व्यवस्था में मंत्री जी के दौरे को 'दौरा' कविता में बांधा है, मंत्री जी आने के समय अधिकारियों द्वारा आदर्श गाँव और उसके बाद उसी बदहाली को झेलता जैसी त्रासदी को उकेरती है कविता

कोई भी कवि मां के निश्छल प्रेम का वर्णन जब तक अपनी कृति में न करे तो काव्य संग्रह अधूरा सा ही लगता है। 'धुन्ध'  'तुम्हें तो आना ही होगा '। मां को स्मरण किया है।

आज के युग में मीडिया टिकाऊ नहीं बिकाऊ हो गया है तभी केवल टी आर पी के लिये खबरें बनाई जा रही हैं हक़ीक़त कोसों दूर हो गयी है। पीत पत्रकारिता का स्वरूप भी सामने देखने को मिलता है। '24गुणा7 'का मजमून भी यही है।

'प्रगति' के मायने बदल गए है, गाँव खो गए है पहचान खो गयी है केवल सेक्टर रह गए है। शायद कवि महानगरीय संस्कृति की विभीषिका को दर्शाना चाहता है कवि का मन। सफल भी हुए हैं।

हक़ीक़त से दूर कहीं व्यक्ति खो गया है केवल दिखावे में जीना चाहता है।अपनों को भूल गया है यही है ,'ओल्ड वर्जन'

'मेरा बचपन' कविता अपना अतीत ढूँढती है। आदर्श की स्थापना के लिये 'कृष्ण'कविता  में-

'और मैं डूबता जा रहा हूँ अंतर्मन में

कहीं गहरे तुम्हारी तलाश में'

कुछ कविताओं के शीर्षक अंग्रेजी में हैं जैसे,' कोल्ड ब्लेडड मर्डर,ओल्ड वर्जन,एलियन, प्रोफेशनलिज्म, आज की पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिखी गईं  कविताएं हैं , क्योंकि कवि जानता है कि कहीं न कहीं संस्कारों में कमी आयी है आधुनिकता के नाम पर , भाषा के नाम पर पहनावे के नाम पर। उसकी पुनर्स्थापना कैसे सम्भव हो सकती है? उसी प्रयास को जीने की कोशिश की है।

धर्म और सद्भवनाओं को 'प्रतीक्षा' कविता में बड़े मार्मिक ढंग से वर्णित किया है।

कवि महानगर में रहता है उसकी संस्कृति को बड़ी नजदीक से देखा है, मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत युवक, युवती, सोशल मीडिया में ग्रस्त जमाना 'अहमियत' कहाँ समझता है। बदलते'आयाम' उसकी जकड़न हैं। उनसे'मुक्ति' चाहता है। कवि कहता है ''प्रतीक्षा' में हो तो 'पुकारो मुझे,',एक बार फिर' 'तुम्हें आना ही होगा।

अनेकों 'प्रश्न'हैं। जीवन के कोई 'सुनहरी छड़ी' नहीं है जिससे छुटकारा मिल सके।

संघर्ष ही जीवन है इसी को दर्शाना चाहता है कवि । इन्हीं अनुभूतियों के साथ कवि जी रहा है। 'जिजीविषा ' है 'यात्रा' में सफल होने की।

इन अनुभूतियों के लिये जन मानस की भाषा ही सम्प्रेषणीय हो सकती है, उसी भाषा में सहज भाव से बड़ी बातें कहने में सक्षम हुआ है कवि। कविधर्म का निर्वाह बड़ी बखूबी किया है।

काव्य संग्रह को पढ़कर ऐसा नहीं लगा कि छंदविधान की कविता ही अपना असर छोड़ती है, बल्कि अतुकान्त कविता भी अनुभूतियों को जी सकती है। कवि की कलम से निकले इस प्रथम काव्य संग्रह को अनेकानेक मंगलकामनाएं। प्रभु से यही प्रार्थना  की कवि इसी प्रकार अपनी अनुभूतियों के महल शब्दों के माध्यम से खड़े करते रहें और माँ भारती के भंडार को भरते रहे। युग की सच्चाई इसी प्रकार निसंकोच कलम लिखती रहे इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।


डॉ राजीव कुमार पाण्डेय

कवि, कथाकार, हाइकुकार, सम्पादक, समीक्षक

1323/भूतल सेक्टर 2

वेबसिटी, गाजियाबाद


ईमेल dr.rajeevpandey@yahoo.co

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