समीक्षा पुष्पा सिंघी / “मौन का अनुवाद” (हाइकु –संग्रह) / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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समीक्षा

पुष्पा सिंघी / “मौन का अनुवाद” (हाइकु –संग्रह) / हर्षित प्रकाशन / दिल्ली, २०१७ / मूल्य,रु. ३००/- / पृष्ठ १०४

एक से बढकर एक

डा. सुरेन्द्र वर्मा

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शब्द बड़े छलिया होते हैं | ज़रूरी नहीं कि वे अपने अर्थ को स्पष्ट कर ही दें | कभी कभी तो अनर्थ कर देते हैं | फिर भी सारी दुनिया अल्फाजों के ही अर्थ ढूँढ़ती है | शब्द और अर्थ में किसे वरीयता दी जाए, पक्के तौर पर कोई नहीं जानता | लेकिन शब्द ही नहीं, मौन भी तो कभी कभी बहुत कुछ कह जाता है और उसके सामने शब्द व्यर्थ हो जाते हैं | बड़े ज्ञाता हैं शब्द ? लेकिन मौन के समक्ष उनका ज्ञान धरा का धरा रह जाता है | शब्द अर्थ और मौन में उलझे पुष्पा सिंघी की कुछ हाइकु देखें –

दुनिया सारी / उलझी अल्फाजों में / अर्थ अछूता

शब्द अर्थ में / बड़ा या छोटा कौन / दोनों ही मौन

जो न समझे / मेरे मौन का अर्थ / शब्द हैं व्यर्थ

शब्द ज्ञाता हैं / मौन का अनुवाद / कर पाएंगे?

मौन के अनुवाद की आकांक्षी पुष्पा सिंघी ने अपने हाइकु संग्रह के शीर्षक के लिए इसी पद-बन्ध, “मौन का अनुवाद” को चुना है, और खूब चुना है !

पुष्पा सिंघी अपेक्षाकृत एक नई हाइकुकार हैं | ‘मौन का अनुवाद’ उनका पहला ही हाइकु संग्रह है | लेकिन लगता ऐसा है कि मानों वे वर्षों से एक सिद्धहस्त रचनाकार की तरह हाइकु लिख रहीं हों | हाइकु के शरीर-शास्त्र और उसकी आत्मा की उनकी पकड़ अद्भुत है | हाइकु क्रमश: ५-७-५ अक्षरों वाली तीन पंक्तियों की एक लघुकाय काव्य विधा है जिसमें, कविता के नाते काव्य तत्व का होना अत्यंत आवश्यक है | पुष्पा सिंघी की रचनाएं न केवल हाइकु अनुशासन का कडाई से पालन करतीं हैं बल्कि उनके हर हाइकु में हमें एक सुन्दर कविता भी मिलती है |

हाइकु का प्रकृति के साथ एक घनिष्ट सम्बन्ध है | प्रकृति की छटाएं, प्रकृति का मानवीकरण, प्रकृति और मनुष्य के बीच का अटूट सम्बन्ध आदि सभी पहलुओं पर हाइकु अपनी बात बड़े काव्यात्मक ढंग से कहता है | “मौन का अनुवाद” में भी पुष्पा जी ने प्रकृति को आधार बना कर अनेक हाइकु रचे हैं | वर्षा ऋतु लगता है उन्हें विशेष रूप से लुभाती है | वे बादलों से निवेदन करती हैं कि प्रकृति के प्रांगण में बरसें | वे मेघों की टकराहट के शोर में नटखट बच्चों का खेल देख पाती हैं जो ओलों को कंचों की तरह इस्तेमाल कर रहे होते हैं | जब बारिश के रूप में वसुधा पर मेह बरसता है तो यह अम्बर का प्यार ही तो है !-

नर्तक मन / प्रकृति का प्रांगण / बरसों घन

बादल आते / नटखट बालक / शोर मचाते

प्रसन्न इंद्र / खेलें गली के बच्चे / बर्फ के कंचे

बरसा मेंह / वसुधा मन भाए / अम्बर नेह

इतना ही नहीं, बारिश से काई पैदा होती है और यही काई अगर रिश्तों में आजाए ?- पुष्पा जी बिम्ब और इशारे में बात करती हैं--

बारिश आई / आँगन जमी काई / फिसले रिश्ते

वर्षा ही नहीं, कवियित्री ने शरद और शारदीय चाँद पर रीझ कर भी सुन्दर रचनाएं प्रस्तुत की हैं –

धानी चूनर / धरा के मन भाई / शरदोत्सव

शरद चन्द्र / छलके सुधा घट / वसुधा तृप्त

स्निग्ध चांदनी / चारुचंद्र सौगात / पूनों की रात

नीली झील में / सो गया चुपके से / दूधिया चाँद

सांझ और सवेरे के कुछ चित्र भी देखें –

विमल रूप / कुहारे से निकलीं / स्वर्णिम धूप

पर्वत हँसे / स्वर्ण परिधान में / उषा लजाती

राग प्रभाती / अंतर्ध्यान हो जाती / शर्मीली ओस

सांझ जोगन / पीताम्बरी दुशाला / ओढ़े मगन

और वसंत में दीवानी पवन के तो क्या कहने हैं –

वासंती हवा / फूलों में टांक गई / यादें प्रिय की

हाइकु रचनाएं प्रकृति के साथ तो मगन होकर खेलती ही हैं. किन्तु विचार प्रधान भी होती हैं जापानी हाइकुओं में ज़ैन ( जैन नहीं ) दर्शन का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है | ज़ेन संतों ने वहां हाइकुकारों को खासा प्रभावित किया था | भारत में, जाहिर है भारतीय दर्शन की अपनी साख है | पुष्पा सिन्धी जी तो दर्शन की, विशेष कर जैन-दर्शन की, मर्मज्ञ हैं | कई जैन संस्थाओं की आजीवन सदस्य भी रही हैं | अत: उनकी हाइकु रचनाओं में यदि हम दार्शनिक सोच न देख पाएं तो यह केवल पाठक की अपनी सीमा ही कही जा सकेगी | पुष्पा जी के अनेकानेक रचनाओं में दार्शनिक विचारों की बड़ी सहज और सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है | जगत की नि;सारिता को स्पष्ट करते कुछ हाइकु –

माटी का घर / ढह जाएगा कब / कोई न जाने

मंजिल दूर / जग रेन बसेरा / जोगी का डेरा

बरखा बूंद / हाथ में न ठहरी / उम्र झरी

राजा और रंक / जावेंगे एक घाट / माटी मानुस

सारा जीवन दुःख और सुख में लिपटा हुआ है | यहीं स्वर्ग है और यहीं नर्क है | यहाँ गुलाब के साथ कांटे और काँटों के साथ गुलाब है | हमारे जीवन की कुछ संरचना ही ऐसी है –

उम्र जुलाहा / काटती सुख दुःख / वस्त्र अद्भुत

चाह किसकी ? / जन्नत जहन्नुम / सभी हैं यहाँ

छत पर सजे / बुलाब और केक्टस / जीवन रंग

भौतिक जगत से परे भी एक दुनिया है, जिसका न कोई अंत है न आदि | एक घना जंगल है, जिसमें व्यक्ति भटक रहा है, व्यक्ति के अंतर्मन में एक शून्यता घर किए हुए ई | चारो और उत्ताल लहरें हैं और उनके बीच एक द्वीप की तरह आदमी का मौन अस्तित्व स्थित है | मन बेचैन है | कस्तूरी मृग की तरह अपनी ही तलाश में जुटा है | उसे लगता है कि अपने सिवा कोई अपना ही ही नहीं, और यही अक मात्र सत्य है | -

देह से परे / एक दुनिया और / ओर न छोर

घना जंगल / भटक रही आत्मा / मेरी सदेह

अंतर्मन में / महाशून्य समाया / कोई न जाने

मेरा अस्तित्व / उत्ताल तरंगों पर / नि:शब्द द्वीप

कस्तूरी मृग / अपनी तलाश में / बेचैन मन

यह गंभीर दार्शनिक सोच कवियित्री को उदास नही करता | पुष्पा जी ने सदैव एक सकारात्मक दृष्टि अपनाए रखी है | कभी कभी उन्हें यह ज़रूर आभास सा होता है कि क्या शाम की उदासी उनके ही हिस्से में आ गई है, और कि, एक मुर्दा शहर में लोग इसी प्रकार जीने के लिए अभिशप्त है क्या, किन्तु उन्हें पूरा विश्वास है कि नए सृजन के लिए सुबह कभी तो आएगी | पतझड़ है तो फूल भी खिलेंगे | निराश होने की आवश्यकता नहीं है | कोई चाहे तो छोटी छोटी बातों में भी बड़ी खुशी ढूँढ़ सकता है –

उदास शाम / क्यों दौड़ कर आती ? / मेरे ही पास

मुर्दा शहर / कैसे हंस लेते हो / इस कदर ?

किन्तु,

पतझड़ में / मिटाना नियन्ति है / अभी तो खिलें

उजली भोर / आँगन में उतरी / नया अध्याय

नए दिन के / सृजन की यामिनी / हंसी चांदनी

कल ने कहा / कल फिर आऊंगा / राह देखना

छोटी बातों में / ढूँढ़ते खुशी बड़ी / वार त्यौहार

प्रकृति और दार्शनिक सोच के साथ साथ हाइकु काव्य प्यार और खुलूस का भी काव्य है | इस सन्दर्भ में पुष्पा जी की रचनाएं भी अपवाद नहीं हैं | वे प्रेम के प्रति मौन नहीं रही है | उन्होंने अपनी खामोशियों का अनुवाद किया है | कहीं कहीं स्याही के बिना भी प्रणय कथा लिखी है | चाँद, तारों और निशा को साक्षी मानकर, मौसम और दर्पण के बहाने उन्होंने अपने प्यार को अभिव्यक्त किया है | कुछ उदाहरण देखें –

लव्जों में तुम / खामोशियों में तुम / कैसे मैं भूलूं ?

पुरान्र ख़त / पढ़कर हो गई / मैं नई नई

रंग-बिरंगे / क्यारियों में भंवरे / प्रेम रसिक

नयन मिले / लिखते प्रणय कथा / मसि के बिना

गोरी की पाती / पेड़ की फुनगी पे / कोकिल गाती

बेसुध रात / सितारों की साजिश / अकेला चाँद

मुक्त आकाश / सांकल बंधा प्रेम / खोल दे आज

सामने तुम / मनमौजी मौसम / कितने रंग

याद तुम्हारी / दर्पण पे चिपकी / गुलाबी बिंदी

प्यार है तो उसकी याद भी है | ये यादें भी अजीब शै हैं | एकदम यायावर | मन में मछलियों की तरह थिरकतीं, स्मृति वन में हिरन की भाँति कुलांचें भरती, आंसुओं में तैरतीं, पतंग सी उड़तीं –

कहाँ न जातीं / यायावर स्मृतियाँ / बिन पावों के

आँखों में झील / थिरकीं उम्र भर / स्मृतियाँ मीन

स्मृति वन में / घूमे अबोध मन / नन्हा हिरण

पलक ओट / समुद्र आंसुओं का / स्मृति नौका

हृदयाकाश / स्मृतियाँ पतंग सी / उड़ती रहीं

एक स्त्री होने के नाते पुष्पा सिन्धी ने न केवल नारी के दर्द को निकट से जाना है बल्कि उसको अपने काव्य में उसे बेबाकी से अभिव्यक्त भी किया है | आजकल स्त्री सशक्तिकरण की बातें जोरशोर से चल रही हैं | लेकिन ये केवल खोखली बातें भर हैं | नारी आज भी अबला है और वर्जनाओं में जकड़ी हुई है | बहुएं आज भी जलाई जा रही है और नव-जात बालिकाओ को आज भी मार दिया जाता है –

नारी वृत्तांत / क्या कहें और सुने / आदि न अंत

तूफानी रात / स्त्री सशक्तिकरण / खोखली बात

पाकशाला में / जलने की दुर्गन्ध / बहू न रही

भौंकते श्वान / जच्चा घर के पीछे / बेदम कल

अनाथ बच्ची / डाकखाने में पडी / बैरंग चिट्ठी

सुबह शाम / स्त्री को नहीं आराम / बंदी गौरैया

किन्तु समाज का दोगलापन देखिए,

देवी कहकर / बर्गलाई जाती / नारी बेचारी

समाज के आचरण में विरोधाभास देखकर कवियित्री कटाक्ष करने के लिए मजबूर हो जाती है | कुछ तीखी व्यंग्य रचनाओं का जायज़ा लें --

शीशे से करें / पत्थर का शिकार / लोग अनोखे

काले दिल से / होगा स्वच्छ भारत / कैसा मज़ाक

अजब दौर / गिराने वाला पाता / ठौर ही ठौर

पुष्पा सिन्धी ने एक से बढ़कर एक हाइकु लिखे हैं | उनका हर हाइकु एक कविता है | १३ अक्षरों में सार्थक बिम्बों के साथ कविता को कैद कर लेना कोई पुष्पा जी से सीखे | पुष्पा जी ने जिन्हें अपना मार्ग दर्शक और गुरु माना उन्हें भी भी उन्होंने बहुत पीछे छोड़ दिया है | किसी भी गुरु की इससे बढाकर और क्या उपलब्धि हो सकती है !

अंत में पुष्पा जी के कुछ अत्यंत सशक्त और सुन्दर हाइकु मैं उद्धृत कर अपनी बात समाप्त करता हूँ –

हवा निगोड़ी / दर ब दर दौड़ी / अफवाहों सी

गुमानी नभ / कभी न झूल पाया / दम्भी पुरुष

एक लड़की / सुर्ख स्वेटर बुने / गुलाबी ठंठ

मेहदी सजी / हाथों से बालों तक / दौड़ती उम्र

कौन ढूँढ़ता / पुराना अखबार / ढलती सांझ

मुट्ठी भर दो / मैंने कब माँगा / सारा आकाश

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८), १/१० एच आई जी इलाहाबाद-२११००१

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1 टिप्पणी "समीक्षा पुष्पा सिंघी / “मौन का अनुवाद” (हाइकु –संग्रह) / डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. पुष्पा सिंधी ने मौन का अनुवाद हाइकु के माध्यम से किया है और मौन मुखर हो उठा है यह आपकी पूर्ण समीक्षा से पता चलता है डॉ.सुरेन्द्र वर्माजी। आपकी समीक्षा पुष्प पर ओस सी है। पता ही नहीं चलता कि हम हाइकु संग्रह पढ़ रहे हैं या मौन की समीक्षा!आप तीनों को हृदय पूर्वक बधाई, पुष्पाजी समर्थ समीक्षक एवं रचनाकार।

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