व्यंग्य // शराब के ग्लैमरस पैरोकार // देवेंद्र भारद्वाज

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व्यंग्य

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शराब के ग्लैमरस पैरोकार

देवेंद्र भारद्वाज

सुरा और सुंदरी के बारे में हमेशा कसीदे पढ़े जाते रहे हैं. आज सिर्फ और सिर्फ शराब के बारे में ही बात करूंगा. कामगारों की बस्ती में मंदिर से 100 मीटर के घेरे में नशे की रसधारा निरंतर बह रही है. वहां देशी-विदेशी शराब की दुकान, भांग का ठेका, और बियर शॉप चारों आसानी से एप्रोचेबल हैं. जितना ऐश करना चाहो, कर सकते हो.

एक भिखारी ने दिन भर ईश्वर, अल्लाह, और गॉड के नाम पर मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे पर भिक्षावृत्ति का कार्य बड़ी लगन से किया. कोई भक्त ऐसा न मिला, जो उसे उन्मुक्त होकर उसे भिक्षा देता और दुआयें लेता. भिखारी निराश था. शाम तक 100 रुपये भी इकट्ठे न कर पाया तो उसने शार्ट ड्यूरेशन में निर्णय लिया और स्थान परिवर्तन करके नशे की रसधारा के केंद्र में जा बैठा. ऑलमाइटी गॉड के नाम पर 500 रुपये फटकारने में कामयाब हो गया. एक रसरंजक तो लड़खड़ाते हुए पास आया और 100 का नोट उसकी ओर बढ़ाने लगा. उसे लगा कि या तो वह अधिक नशे में है या फिर मजाक कर रहा है. उसे अचंभे से देखते हुए भिखारी ने इनकार कर दिया. नोट लेने में उसे संकोच हो रहा था. लेकिन नोट देने वाला जिद्दी था. वह नोट देकर ही माना. भिखारी नतमस्तक हुआ और दिल-ही-दिल बोला, या परवरदिगार! आप भी आजकल रोमिंग पर रहते हो, स्थाई पते पर रहते ही नहीं. घर कहीं, पर रहते वहां नहीं.

क्षेत्रीय कूड़ाघर, बगल में कार्यशाला का बहता हुआ नाला. कूड़े के ढेर से सटी हुई देशी दारू की दुकान. बड़े-बड़े अक्षरों में बोर्ड लगा- यही है मधुशाला. बैठने की व्यवस्था और देसी जि यानी कि घड़े का ठंडा पानी. अंदर का नजारा कुछ यूं था- पत्थरों की टेबल पर गिलास, बोतल और नमकीन (चखना) रखने की व्यवस्था. पत्थर के पटियों और रेत-मिट्टी के ढेर पर इत्मीनान से बैठकर शराब को गले में उंड़ेलते सुरा प्रेमी, बहकी-बहकी बातें करते हुए. कुछ इधर की और कुछ उधर की. तीन-चार जगहों पर रखे हुए खुले मुंह के घड़े, जिनमें पानी कम मच्छर ज्यादा. आस-पास लोटते सुअर और आस लगाए ताकते कुत्ते. एक ही प्लेटफार्म पर सुअर, शराबियों और कुत्तों का सौहार्दपूर्ण सह अस्तित्व की अनूठी मिशाल पेश करता माहौल. शायद, यही है यूनिटी इन डाइवर्सिटी.

कसैली शराब की तेज बू, कच्चे फर्श पर फैला गंदा पानी, खाली बोतलों के ढेर, बीड़ी और सिगरेट का मिलाजुला धुआं वातावरण को और भी रहस्यमय बना रहा था. देशी दारू के प्रेमियों की विदेशी मदिरा पर चर्चा सुनकर मेरे कुछ मुगालते दूर हुए. उनमें से एक थ्री-एक्स रम की व्याख्या यूं समझा रहा था- थर्टी डेज रेगुलर यूज्ड मेडिसन. वहीं दूसरी टोली में ड्रिंक की व्याख्या- पहला पैग- डिलीशियस, दूसरा- रोमांटक, तीसरा- इंटेलीजेंट, चौथा- न्यूसेंस और पांचवां किंग बना देता है. अक्ल के दुश्मन रात भर जिसे मांसल सौंदर्य से युक्त मेनका समझ गले से लगाए रहे, दिन के उजाले में पता लगा कि वह तो हड्डियों की ढांचेनुमा चुड़ैल थी.

दिल उदास है, मन बेबस है, दारू के अड्डे की
मधुशाला. कभी पूज्य पिताजी ने समझाते हुए कहा था कि बेटा, ‘आशनाई उतनी बुरी नहीं. जब तक ताकत और दौलत होगी, तभी तक करोगे, मगर शराब जान लेकर ही पीछा छोड़ती है.’

मधुशाला के कशीदे पढ़ने वाले पर जार-जार दिल रो रहा है. जिन पीने वालों को यही नहीं पता कि हम मधु नहीं वरन जीवन को बहुत तेजी से खत्म करने वाले जहरीले विष को पी रहे हैं. जिन दारूवालों को अपने आस-पास के माहौल का ज्ञान नहीं, जिनकी सारी इद्रियां कुंद हो गई हैं, तन-मन में काहिली आ बैठी है. वे क्या जानें मेल और क्या जानें बैर-

बैर बढ़ाते मस्जिद-मंदिर, मेल कराती मधुशाला

अभी युगों तक सिखलाएगी, ध्यान लगाना मधुशाला.

संपर्क : रेलवे बंगला नं. एफ-300,

(बाल मंदिर के पास),

पश्चिम विहार कॉलोनी, झांसी-284003


ईमेल dkbhardwaj1962@gmail.com

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